वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६० | वेदान्तपरिभाषा | [ पर्वतांशे प्रत्यक्षत्वम्
इस कारण पूर्वोक्त अनुमिति की सामग्री और अनुमिति इन दोनों में गौरव दोष के तथा प्रमाणाभाव के कारण परामर्श आदि की कल्पना की आवश्यकता नहीं है। 'पर्वतो वह्निमान्' इसे एक ही अनुमित्यात्मक ज्ञान समझने वालों के निराकरणार्थ सिद्धान्ती कहता है—
तच्च^१ व्याप्तिज्ञानं वह्निविषयक^२ज्ञानांश एव करणम्, न तु पर्वतविषयक^३ज्ञानांश इति। पर्वतो वह्निमानिति ज्ञानस्य वह्न्यंश एवाऽनुमितित्वं न पर्वताद्यंशे, तदंशे प्रत्यक्षत्वस्योपपादितत्वात्।
**अर्थ—**और वह व्याप्तिज्ञान वह्निविषयक ज्ञान अंश में ही करण है, पर्वतविषयक ज्ञान अंश में नहीं। इसलिये 'पर्वतवह्निमान् है' इस ज्ञान को वह्नि अंश में ही अनुमितित्व है, पर्वत आदि अंश में नहीं। पर्वत आदि अंश में उस ज्ञान को प्रत्यक्षत्व है। यह यह हमने प्रत्यक्षपरिच्छेद में उपपादन किया है।
**विवरण—**प्रत्यक्ष परिच्छेद में—जिस अनुमितिज्ञान में पक्ष, इन्द्रियसन्निकृष्ट रहता है उस अनुमितिज्ञान में अनुमित वह्नि-आदि अंश में ज्ञान को अनुमितित्व रहता है और इन्द्रियसन्निकृष्ट पर्वत आदि अंश में प्रत्यक्षत्व रहता है—उपपादन किया है। 'मैं पर्वत को देखता हूँ और वह्नि का अनुमान करता हूँ' यही अनुभव में आता है। इसलिये वहां अनुमिति और प्रत्यक्ष, दो प्रकार का ज्ञान मानना पड़ता है। जातित्व, उपाधित्व आदि तार्किकों की परिभाषा में कोई प्रमाण नहीं है, यह पीछे कह चुके हैं। इस कारण एक ही ज्ञान में अंश भेद से परोक्षत्व तथा अपरोक्षत्व के होने में कोई विरोध नहीं है।
उपर्युक्त उपपादन से 'अनुमिति में कारण व्याप्तिज्ञान है'—यह सिद्ध होने पर भी व्याप्ति का स्वरूप क्या है? यह प्रश्न पैदा होता है। इसलिये ग्रंथकार अग्रिम ग्रन्थ से से व्याप्ति का स्वरूप बताते हैं।
१. 'पर्वतो वह्निमान्' इत्यस्य ज्ञानस्य अंशद्वयम्—एकः पर्वतविषयकत्वांशः, द्वितीयः वह्निविषयकत्वांशः। तत्र वह्निविषयकत्वांशे एव ज्ञाने व्याप्तिज्ञानं करणम्। न सन्निकृष्टपक्षकांशे पर्वताद्यंशे व्याप्तिज्ञानं करणम् व्याप्तिज्ञानाऽजन्यत्वात्, तस्य तु प्रत्यक्षत्वेन इन्द्रियजन्यत्वात्। एवं च पर्वतांशे ज्ञानस्य प्रत्यक्षत्वं, वह्न्यंशे च अनुमितित्वम्। वह्निविषयकत्वांशे--पर्वतवह्निसम्बन्धांशे इत्यमरः। तदुक्तं शास्त्रदीपिकायाम्—"यथा दध्ना जुहोति इति विशिष्टविषयोऽपि विधिः विशेषणपरो भवति तथैव इहापि विशिष्टविषयमेव अनुमानं विशेष्य-विशेषणयोः प्राप्तत्वात् सम्बन्धविषयं भवति।" २. 'कत्वांश एव कारणम्'—इति पाठान्तरम्। ३. 'कत्वांश इति'—इति पाठान्तरम्।