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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 213, कुल 482 में से

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पृष्ठ 213

व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५५

अनुभवसिद्ध है। इसलिए व्याप्तिज्ञान, 'करण' है और संस्कार, 'अवान्तर व्यापार' है ऐसा आप भी नहीं कह सकते। अर्थात् आपके पक्ष में भी दोष है।

संस्कारजन्य ज्ञान को स्मृति कहते हैं—यह स्मृति का लक्षण गृहीत कर वादी ने यह शङ्का की थी। परन्तु 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह स्मृति का लक्षण नहीं हो सकता। क्योंकि वह स्मृति और संस्कारध्वंस दोनों के लिए साधारण है। अर्थात् वह लक्षण केवल स्मृति में ही घटित न होकर संस्कारध्वंस में भी घटित होता है। कारण, संस्कारनाश भी संस्कारजन्य ही होता है। संस्कार ही यदि नहीं होगा तो नाश किसका होगा ?

'ध्वंसं प्रति प्रतियोगिनः कारणत्वम्' ध्वंस में प्रतियोगी, कारण होता है—यह नियम है। अर्थात् अतिव्याप्ति दोष से दूषित होने के कारण 'संस्कारजन्यत्व' यह स्मृति का निर्दुष्ट लक्षण नहीं है। इससे यह सिद्ध हुआ कि 'संस्कारजन्यत्व' स्मृति का प्रयोजक नहीं है। इसीलिये अनुमति में संस्कारजन्यत्व होने पर भी 'स्मृतित्व' नहीं आ पाता। क्योंकि 'संस्कारजन्यत्व' स्मृति का लक्षण ही नहीं है।

'संस्कारजन्यत्व' यदि स्मृति में प्रयोजक नहीं है तो स्मृति में कौन प्रयोजक है ?

'स्मृतिप्रागभावजन्यत्व' या 'संस्कारमात्रजन्यत्व' को स्मृति का प्रयोजक समझना चाहिये।

प्रागभाव का अर्थ है—कार्य की उत्पत्ति से पूर्व स्थित, कार्य का अभाव। जिसका प्रागभाव रहता है उसी की उत्पत्ति होती है। इसलिये प्रत्येक कार्य में उसका प्रागभाव, कारण होता है। इस नियम के अनुसार स्मृति के प्रति भी उसका प्रागभाव कारण है ही। इस कारण--

स्मृतिप्रागभावजन्यत्व को ही स्मृति का प्रयोजक मानना पड़ता है। 'स्मृतिप्रागभावजन्यत्व' रूप स्मृतिलक्षण मानने पर संस्कारध्वंस में अतिव्याप्ति नहीं होती। क्योंकि संस्कारध्वंस, स्मृतिप्रागभावजन्य नहीं है, अपितु संस्कारजन्य है। इसलिये स्मृतिप्रागभावजन्यत्व ही स्मृतित्व में प्रयोजक है।

शंका--प्रत्येक कार्य के प्रति यदि उसका प्रागभाव कारण होता है तो प्रत्येक कार्य का 'तत्तत्प्रागभावजन्यत्व' ही लक्षण किया जाय। फिर किसी भी कार्य के प्रति दूसरा प्रयोजन मानने की आवश्यकता ही नहीं रहेगी। 'गो' का लक्षण 'गोप्रागभावजन्यत्व' ही करना चाहिये। तब प्रत्येक पदार्थ के भिन्न-भिन्न लक्षण जो किये गये हैं, वे सब व्यर्थ होंगे। ऐसी स्थिति में स्मृतिप्रागभावजन्यत्व को स्मृति का प्रयोजक कैसे माना जा सकता है ? सिवाय स्मृतिलक्षण स्मृतिघटित होने से आत्माश्रय दोष भी आता है।

समाधान—वादी का उपर्युक्त कथन ठीक है। इस अरुचि के कारण ही 'संस्कारमात्रजन्यत्वं वा' यह दूसरा स्मृतिप्रयोजक बताया गया है। इस पक्ष में कोई दोष नहीं आने पाता।