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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 212, कुल 482 में से

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१५४वेदान्तपरिभाषा[ व्याप्तिसंस्कारस्य कारणत्वम्

आपके कथनानुसार व्याप्तिज्ञान ही संस्कार द्वारा अनुमिति का कारण मान लिया जाय तो अनुमिति को संस्कारजन्य मानना होगा। और संस्कारजन्यज्ञान, स्मृतिरूप होने से, अनुमिति को भी स्मृति कहना होगा। इस आशङ्का का निराकरण करते हैं—

¹ न च संस्कार जन्यत्वेनाऽनुमितेः स्मृतित्वापत्तिः, ²स्मृति-प्राग-भाव ³स्य संस्का ⁴रमात्रजन्यत्वस्य वा स्मृतित्व-प्रयोजकतया संस्कार-ध्वंस-साधारण-संस्कारजन्यत्वस्य तदप्रयोजकत्वात् ।

अर्थ — अनुमिति को व्याप्तिज्ञान-संस्कारजन्य मान लिया जाय तो उस अनुमिति को 'स्मृति' कहना होगा। क्योंकि 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' संस्कार से उत्पन्न होने वाले ज्ञान को स्मृति कहते हैं—यह स्मृति का लक्षण अनुमिति पर घटित होता है। परन्तु यह कहना ठीक नहीं है। क्योंकि स्मृतिप्राग्भावजन्यत्व, या केवल संस्कार-जन्यत्व स्मृतित्व का प्रयोजक ( कारण ) माना गया है। इस कारण संस्कारध्वंस और स्मृति दोनों को साधारण ऐसा 'संस्कारजन्यत्व' रूप प्रयोजक, स्मृति का नहीं माना जा सकता।

विवरण — प्रथमतः महानस में व्याप्तिज्ञान होने पर, उसका अन्तःकरण पर सूक्ष्म संस्कार होता है। वही संस्कार पर्वत पर धूम के देखने पर उद्बुद्ध होता है, तदनन्तर व्याप्ति का स्मरणात्मक ज्ञान होता है ततः पश्चात् अनुमिति होती है यह क्रम है। इस क्रम को देखने से यह स्पष्ट हो जाता है कि व्याप्तिज्ञान से संस्कार और संस्कार से अनुमिति होती है। अर्थात् अनुमिति में संस्कार कारण है।

परन्तु संस्कार को अनुमिति में कारण कहने पर 'संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिः' यह स्मृति का लक्षण अनुमिति में घटित हो जाने से अनुमिति को भी स्मृति कहना होगा। किन्तु यह अभीष्ट नहीं है। क्योंकि स्मृति, अनुभवरूप नहीं है, किन्तु अनुमिति अनुभव-रूप है, और 'मैंने कल वह्नि का अनुमान किया था' ऐसी अनुमिति की स्मृति,


१. संस्कारजन्यं ज्ञानं स्मृतिरिति स्मृतिलक्षणम् । तदा संस्कारजन्यत्वस्य अनुमितौ स्वीकारे अनुमितेरपि स्मृतित्वप्रसङ्गः इति शंकाकर्तुराशयः ।
२. स्मृति प्राग्भावजन्यज्ञानस्यैव स्मृतित्वनियमात् अनुमितेः स्मृतिप्राग्भावाऽजन्य-तया न स्मृतित्वम् ।
३. 'जन्यत्वस्य' इति पाठान्तरम् ।
४. स्मृतिप्राग्भावसाक्षात्कारस्य स्मृतिप्राग्भावजन्यतया स्मृतित्वापातादात्माश्रय-प्रसंगाच्चेति अरुच्या संस्कारमात्रजन्यत्वस्य प्रयोजकत्वमुच्यते । एवञ्च संस्कारेतरेन्द्रिय-सन्निकर्षाद्यसाधारणकारणाऽजन्यत्वे सति संस्कारजन्यत्वं स्मृतित्वप्रयोजकमुक्तम् । तेन अनुमिते लिङ्गज्ञानाद्यसाधारणकारणजन्यत्वान्न स्मृतित्वप्रसंगः इति समाधान-ग्रन्थस्याशयः ।