वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५२ वेदान्तपरिभाषा [ परामर्शखण्डनम्
करणत्व इन अविरोधी धर्मों के रहने में कोई दोष नहीं है। इसीलिए हम 'दण्ड घट में कारण है' और 'दण्ड से घट को उत्पन्न करता है' इत्यादि व्यवहार करते हैं। इस कारण एक ही पदार्थ को कारण और करण कह सकते हैं।
प्राचीन नैयायिक अनुमिति के प्रति लिङ्ग (हेतु = धूमादि) को ही कारण मानते हैं। परन्तु यह उचित नहीं है। क्योंकि जहाँ लिंग (हेतु) प्रत्यक्ष योग्य नहीं होता वहाँ परामर्श को व्यापारत्व संभव नहीं होता। अर्थात् व्यापार के न होने से लिग को करणत्व भी नहीं मान सकते। क्योंकि 'व्यापारवत् (व्यापारयुक्त) जो 'असाधारण कारण' उसे ही 'करण' संज्ञा है। सिवाय धूलि में धूम का भ्रम होने से 'पर्वत वह्निमान् है' ऐसी अयथार्थ अनुमिति होती है। यहाँ पर लिंग के न होते हुए भी अनुमिति हुई। इसलिए 'लिंग अनुमिति में करण है' नहीं कहा जा सकता। केवल धूम का ज्ञान हुआ और व्याप्तिज्ञान (व्याप्ति-स्मृति) नहीं हुआ, अर्थात् केवल पर्वत धूमवान् है, पर्वत पर धूम है—एतावन्मात्र ज्ञान होने से 'वह वह्निमान् है' यह अनुमिति नहीं होती। और प्रत्यक्ष के अयोग्यहेतुक स्थल में किसी व्यापार का भी सम्भव नहीं। इसलिए लिंगज्ञान को भी करण नहीं माना जा सकता। परामर्श, अनुमिति में करण क्यों नहीं? इसे ग्रन्थकार आगे बतावेंगे। अतः व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण (अनुमान) है—कहने से लिंग, लिंगज्ञान, और लिंगपरामर्श को ही अनुमितिकरणत्व है—माननेवाले नैयायिक-वैशेषिकों का खण्डन हो गया।
शंका—आपने 'व्याप्तिज्ञान, अनुमिति के प्रति करण है' बताया। परन्तु यहाँ व्यापार कौन सा है? क्योंकि 'जो असाधारण, व्यापार से युक्त रहता है उसे ही करण कहते हैं।' व्याप्तिज्ञान में व्यापार कौन सा है, समझ में नहीं आता।
समाधान—अन्तःकरण पर रहनेवाला व्याप्तिज्ञान का संस्कार ही मध्यवर्ती व्यापार है। तस्मात् व्याप्तिसंस्कार से युक्त होने के कारण व्याप्तिज्ञान करण है, अर्थात् व्याप्ति-ज्ञान, संस्कार द्वारा अनुमिति में करण होता है।
परन्तु नैयायिक तृतीय लिंगपरामर्श को ही अनुमिति के प्रति 'करण' कहते हैं। महानस में जब धूम और अग्नि की व्याप्ति ज्ञात होती है तब धूम का जो ज्ञान होता है, वह प्रथम लिंगज्ञान (हेतुज्ञान = धूमज्ञान) है। उसके बाद वह व्यक्ति वन में जाता है। वहाँ उसे पर्वत पर धूम दीखता है—यह द्वितीय लिंगज्ञान है। और उसके बाद 'यह पर्वत वह्निव्याप्य धूमवान् है' ज्ञान होता है, इसमें भी 'धूम' विषय है। इसलिये यह तृतीय लिंगज्ञान है। और यही परामर्श कहलाता है। इसके अनन्तर अग्रिम क्षण में ही 'पर्वत वह्निमान् है' अनुमिति होती है। इसलिए यह तृतीय लिंगपरामर्श (वह्निव्याप्यत्व = व्याप्ति रूप धर्म से पर्वतनिष्ठ धूमज्ञान) ही अनुमिति का करण है—यह मानना होगा। इनके मत में 'जो असाधारण कारण हो वही करण है' ऐसा करण का लक्षण में मध्य में (बीच में) व्यापार नहीं मानते।