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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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पृष्ठ 209

परामर्शखण्डनम् ] अनुमानपरिच्छेदः १५१

न¹ तु तृतीय-लिङ्गपरामर्शोऽनुमितौ करणम्, तस्यानुमितिहेतुत्वा-ऽसिद्ध्या तत्करणत्वस्य दूरनिरस्तत्वात् ।

अर्थ— व्याप्तिज्ञान, अनुमिति-करण ( साधन ) है, और उसका ( व्याप्ति-ज्ञान का ) संस्कार, अवान्तर व्यापार है । तृतीय ( तीसरा ) लिंगपरामर्श, अनुमिति का करण नहीं है । क्योंकि उसमें अनुमिति का हेतुत्व ( कारणत्व ) ही असिद्ध है । इसलिये असाधारणकारणत्वरूप करणत्व दूरनिरस्त ( अत्यन्त खण्डित ) होता है ।

विवरण— 'धूम वह्निव्याप्य है' इत्याकारक व्याप्तिज्ञान ही अनुमिति का करण है । अर्थात् व्याप्तिज्ञान ही अनुमान है ।

शंका— आपने पहले 'अनुमिति, व्याप्तिज्ञानजन्य है' कहा था, जिससे व्याप्ति-ज्ञान, अनुमिति का कारण है—यह अर्थ निष्पन्न होता है । और अब व्याप्तिज्ञान को अनुमिति का करण बताया जा रहा है । ये दोनों बातें कैसे संगत हो सकती हैं ? ( एक ही को कारणत्व तथा करणत्व कैसे हो सकता है ? ) ।

उत्तर— कारणत्व और करणत्व—ये दोनों यदि परस्पर विरोधी होते तो एक ही व्याप्ति ज्ञानको कारण तथा करण नहीं कहा जा सकता था । परन्तु ये दो धर्म ( कारणत्व-करणत्व ) परस्पर विरोधी नहीं हैं । किन्तु करणत्व, कारणत्व का ही एक विशेष है । क्योंकि असाधारण कारण को ही करण कहते हैं । जैसे एक ही ब्राह्मण पर ब्राह्मणत्व और परिव्राजकत्व रहता है वैसे ही एक ही व्याप्ति-ज्ञान पर कारणत्व तथा

मध्यवर्ती व्यापारः । व्याप्तिसंस्कारस्य व्याप्तिज्ञानजन्यत्वात् व्याप्तिज्ञानजन्याऽनुमिति-जनकत्वाच्च युक्तं तस्य व्यापारत्वम् । 'तज्जन्यत्वे सति तज्जन्यजनको व्यापारः' इति तल्लक्षणात् । एवञ्च सति व्याप्तिज्ञानस्य अनुमितिकरणत्वं नानुपपन्नम् । व्याप्तिसंस्कार-रूप-व्यापारद्वारैव तस्यानुमितिजनकत्वात् ।


१. तृतीयलिङ्गपरामर्शस्य अनुमितिकरणत्वं प्राचीनैरुक्तम् । तथा चोक्तं न्याय-वार्तिके—"वयन्तु पश्यामः सर्वमनुमानम्, अनुमितेस्तन्नान्तरीयकत्वात् । प्रधानोप-सर्जनताविवक्षायां लिङ्गपरामर्श इति न्याय्यम्" किन्तु मीमांसकानां वेदान्तिनाञ्च तन्न सम्मतम् । महानसादौ दृष्टान्ते हेतौ साध्यव्याप्तिप्रत्यक्षदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तत्प्रथमम् । 'पर्वतो धूमवान् इत्याकारकपक्षधर्मता-ज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तद् द्वितीयम् । वह्निव्याप्य-धूमवान् पर्वतः इत्याकारक-परामर्शज्ञानदशायां यल्लिङ्गज्ञानं, तदेव तृतीय-लिङ्गपरामर्श इत्युच्यते । स च अनुमितौ न करणम् । यतः अशेषसाधना-श्रयाश्रितसाध्यसामानाधिकरण्यरूपस्य व्याप्तिवैशिष्टयस्य पर्वतीय धूमे ग्रहणाऽसंभ-वात्, महानसीयधूमे एव धूमत्वेन रूपेण गृहीतव्याप्तिसंस्कारस्यैव हि पक्षधर्मताज्ञान-सहितस्य अनुमितिंप्रति कारणत्वं मीमांसकैर्वेदान्तिभिश्चाङ्गीक्रियते । अतो व्याप्ति-विशिष्टपक्षधर्मताज्ञानं नानुमितिकारणम् । पक्षधर्मताज्ञान-संस्कारयोरेव अनुमितिहेतुत्वम्, न लिङ्गपरामर्शस्येति विज्ञेयम् ।