वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१५० | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमितिकरणम्
उनके साथ विषयत्व, प्रतियोगित्वादि रूप से सम्बन्ध रहता है । ज्ञानत्व-रूप से उसे उनका जनकत्व नहीं होता । इसलिए उक्त अनुमितिलक्षण की अनुव्यवसायादि में अतिव्याप्ति नहीं है । अनुमिति का 'व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना ही लक्षण यदि किया होता तो उस लक्षण की अनुव्यवसाय आदि में अतिव्याप्ति हुई होती । परन्तु 'व्याप्तिज्ञानत्वेन व्याप्तिज्ञानजन्या' इतना कहने के कारण ( लक्षण में 'व्याप्तिज्ञानत्वेन' यह पद जोड़ने के कारण ) लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं आने पाता !
'ज्ञानं प्रति विषयस्य कारणत्वम्' किसी भी ज्ञान में उसका विषय कारण होता है—यह नियम है । इस नियम के अनुसार 'व्याप्तिज्ञान' अपने अनुव्यवसाय का 'विषयत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपनी स्मृति का भी 'समान-विषयक-अनुभवत्व' धर्म से कारण होता है। वह अपने ध्वंस का भी 'प्रतियोगित्व' धर्म से कारण होता है। 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से कारण नहीं होता । वह ( व्याप्तिज्ञान ) तो 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से केवल अनुमिति को ही उत्पन्न करता है । इसलिये पूर्वोक्त अनुव्यवसायादिकों में इस लक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती ।
'दण्ड' पदार्थ इन्धनत्व ( काष्ठत्व ) धर्म से ( रूप से ) यद्यपि ज्वलन ( जलना ) क्रिया में कारण होता है, तथापि 'घट' का कारण अपने 'दण्डत्व' धर्म से ही होता है । वहाँ दण्ड की कारणता का अवच्छेदक धर्म दण्डत्व है, इन्धनत्वादि नहीं । इसी प्रकार व्याप्तिज्ञान में जो अनुमिति-कारणत्व है, वह 'व्याप्तिज्ञानत्व' धर्म से ही है । विषयत्वादि धर्मों से ( रूपों से ) नहीं । अर्थात् यहाँ कारणतावच्छेदक व्याप्तिज्ञानत्व है । इससे उक्त लक्षण पर अतिव्याप्ति दोष नहीं है ।
अनुमिति के कारण को अनुमान कहते हैं । परन्तु अनुमिति का करण क्या है ? ऐसी आकांक्षा होने पर अग्रिम ग्रन्थ से उसका समाधान करते हैं—
अनुमितिकरणं च व्याप्तिज्ञानं । तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः,
१. अनुमितिकरणरूपमनुमानं निरूपयति—'अनुमितिकरणमि'ति । अनुमितिरूपायाः प्रमायाः करणं व्याप्तिज्ञानमेव । अर्थात् 'साध्याभाववदवृत्तिर्हेतु'रित्याकारकं व्याप्तिज्ञानम् । अथवा 'यावत्साधनाश्रयाश्रित-साध्यसमानाधिकरणो हेतु'रित्याकारकं ज्ञानम् । तत्र यदा साध्याभाववदवृत्तिर्हेतुरिति ज्ञानं भवति, तदा हेतौ साध्याभाववद्वृत्तित्वरूपाया व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोः साध्याभाववदवृत्तिरूपतया तत्र साध्याभाववदवृत्तित्व-धर्मस्य सत्त्वात् । यदा तु 'यावत् साधनाश्रयाश्रितसाध्यसमानाधिकरणो हेतु'-रिति ज्ञानं भवति, तदापि हेतौ तादृशसमानाधिकरण्यरूपाय व्याप्तेर्ज्ञानं भवति, हेतोस्तादृशसाध्य-समानाधिकरणरूपतया तत्र तादृशसाध्यसामानाधिकरण्यस्य सत्त्वात् । एतेन ज्ञायमानस्य लिङ्गस्य अनुमितिकरणत्वे अतीतादिलिङ्गकानुमितेरुच्छेदापत्तेः, अतीतादिलिङ्गस्य तदानीमविद्यमानत्वेन ज्ञायमानत्वाभावात् । विद्यमानस्यैव ज्ञानविषयीभूतस्य ज्ञायमानत्वात् ।
२. तत्संस्कारोऽवान्तरव्यापारः व्याप्तिसंस्कारः कार्य-कारणयोर्व्याप्तिज्ञानाऽनुमित्यो-