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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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१६४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः

कभी नहीं रहता )। परन्तु हमारे मत में ऐसा कोई साध्य पदार्थ ही सम्भव नहीं है। क्योंकि 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस श्रुति से ब्रह्मातिरिक्त समस्त वस्तुओं में ब्रह्मनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व रहता है। अर्थात् ब्रह्म रहने वाला समस्त वस्तुओं का जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता समस्त वस्तुओं में है। (ब्रह्म में कोई भी द्वैत वस्तु नहीं होती) इस कारण अत्यन्ताभावाप्रतियोगिसाध्यक ऐसे केवलान्वयित्व की सिद्धि नहीं हो पाती।

इस प्रकार नैयायिकाभिमत तीनों लिङ्गों में केवलान्वयी रूप पहले भेद का निराकरण कर केवल-व्यतिरेकी रूप दूसरे भेद का निराकरण करते हैं—

नाप्यनुमानस्य व्यतिरेकि-रूपत्वम् । साध्याभावे साधनाऽभाव-निरूपित-व्याप्तिज्ञानस्य साधनेन साध्यानुमितावनुपयोगात् । कथं तर्हि धूमादावन्वय-व्याप्तिमविदुषोऽपि व्यतिरेक-व्याप्तिज्ञानादनुमितिः ? अर्थापत्ति-प्रमाणादिति वक्ष्यामः ।

अर्थ-- केवलव्यतिरेकि-अनुमान भी नहीं हो सकता (अनुमान में केवलव्यतिरेकि रूपता भी नहीं है) क्योंकि साध्य के अभाव में साधनाभाव निरूपित व्याप्तिज्ञान का, साधन के द्वारा साध्य की अनुमिति कर्तव्य होने पर (करनी हो तो) कोई उपयोग नहीं है।

शंका— धूमादि हेतु के होने पर अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रखने वाले व्यक्ति को भी व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से ही अग्नि की अनुमिति कैसे हो जाती है ?

समाधान— वह अनुमिति अर्थापत्ति प्रमाण से होती है यह हम आगे बतावेंगे ।

विवरण— व्यतिरेक-व्याप्ति ज्ञान से उत्पन्न होने वाली अनुमिति का कारणत्व हो, व्यतिरेकित्व है। नैयायिकों ने व्यतिरेकव्याप्ति का परिष्कृत लक्षण किया है— 'साध्याभावव्यापकीभूताभाव-प्रतियोगित्वं-व्यतिरेकव्याप्तिः' साध्य का अभाव जहाँ हो वहाँ नियम से रहने वाला जो साधन का अभाव, उसका प्रतियोगित्व ही व्यतिरेक व्याप्ति कहलाती है। यथा—साध्य (अग्नि) का जहाँ अभाव रहता है वहाँ साधन (धूम) का भी अभाव रहता है। इसलिये धूम, साध्याभावव्यापकीभूत अभाव का प्रतियोगी होता है। उसका इस प्रकार प्रतियोगी होना (जहाँ वह्नि का अभाव हो वहाँ धूम का भी अभाव रहना) ही व्यतिरेकव्याप्ति है। धूम का सत्त्व (अस्तित्व) यदि हो तो वह्नि का भी सत्त्व (अस्तित्व) रहता है। इस कारण, व्याप्य (धूम) व्यापक (वह्नि) की कल्पना हो सकती है। परन्तु दो अभावों का कार्यकारणभाव और व्याप्यव्यापकभाव इसके विपरीत रहता है। यथा—जहाँ जहाँ वह्नि का अभाव रहता है, वहाँ वहाँ धूम का भी अभाव रहता है। इस कारण साध्य जो अग्नि, उसके अभाव से,