भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 223, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 223

अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः ] अनुमानपरिच्छेदः १६५

साधन जो धूम; उसका अभाव, सिद्ध किया जाता है। परन्तु उसका अनुमिति के लिए क्या उपयोग ? अर्थात् कोई उपयोग नहीं। इससे अधिक से अधिक लाभ हुआ तो साध्य के अभाव से साधन का अभाव सिद्ध होगा, परन्तु साध्य की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि साधन से साध्य का अनुमान किया जाता है। यह प्रसिद्ध है, और उस अनुमिति में साध्य-साधन का व्याप्तिज्ञान, उपयुक्त है। परन्तु साध्याभाव और साधनाभाव के—व्याप्तिज्ञान का अनुमिति में कोई उपयोग नहीं है। ( १ ) पृथ्वी, इतर ( अन्य ) से भिन्न है, ( २ ) गन्धत्व के कारण, ( ३ ) जो इतर से भिन्न नहीं रहता, वह गन्धवत् भी नहीं रहता जैसे जलादि' इत्यादि केवल व्यतिरेकिलिंग के उदाहरण नैयायिकों ने दिये हैं। परन्तु वास्तव में ये सब उदाहरण, अर्थापत्ति प्रमाण के उदाहरण हैं, क्योंकि गन्धत्व, इतर भेद का उपपादक है, अर्थात् पृथ्वी का गन्धत्व ही 'पृथ्वी इतरों से भिन्न है' यह ज्ञान करा सकता है।

शंका—अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रहने पर भी व्यतिरेकव्याप्ति के ज्ञान से भी अनुमिति होती है। अर्थात् 'जहाँ धूम रहता है वहाँ अग्नि होता है' इत्याकारक अन्वय व्याप्ति का जिसे ज्ञान नहीं है ऐसे व्यक्ति को भी 'जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ धूम भी नहीं है—इत्याकारक व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से भी अनुमिति हो सकती है। परन्तु अन्वयिरूप एक ही लिंग को मानने वाले आप के मत में वह अनुमिति कैसे उत्पन्न हो सकेगी ?

समाधान—जिसे 'अन्वयव्याप्ति का ज्ञान नहीं रहता उसे अर्थापत्ति प्रमाण से अग्नि आदि का ज्ञान होता है। अनुमान से नहीं। इस कारण आप की उपर्युक्त शंका ही ठीक नहीं है। अर्थापत्तिप्रमाण की आवश्यकता को हम आगे बतावेंगे। आप के व्यतिरेक-अनुमान का अर्थापत्ति प्रमाण में अन्तर्भाव हो सकता है। इसलिये व्यतिरेक-अनुमान, पृथक्तया मानने की कोई आवश्यकता नहीं।

अब नैयायिकों के माने हुए तीसरे भेद का निराकरण करते हैं।

अत एवाऽनुमानस्य नान्वयव्यतिरेकि-रूपत्वं व्यतिरेकव्याप्ति-ज्ञानस्यानुमित्यहेतुत्वात् ।

**अर्थ—**इसीलिए अनुमान को अन्वय-व्यतिरेकिरूपता भी नहीं है। क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति के प्रति हेतुत्व नहीं है।

**विवरण—**जब कि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति-जनकत्व नहीं है तब नैयायिकों द्वारा मानी हुई अन्वय, व्यतिरेक-उभयरूपता, अनुमान से सम्भव नहीं होती। क्योंकि अन्वयरूप ओर व्यतिरेकरूप दोनों में से एक अन्वयव्याप्तिज्ञान से ही यदि अनुमिति हो सकती है तो व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान को अनुमिति के प्रति हेतु मानना व्यर्थ