वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
अनुमानत्रैविध्यानङ्गीकारः ] अनुमानपरिच्छेदः १६५
साधन जो धूम; उसका अभाव, सिद्ध किया जाता है। परन्तु उसका अनुमिति के लिए क्या उपयोग ? अर्थात् कोई उपयोग नहीं। इससे अधिक से अधिक लाभ हुआ तो साध्य के अभाव से साधन का अभाव सिद्ध होगा, परन्तु साध्य की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि साधन से साध्य का अनुमान किया जाता है। यह प्रसिद्ध है, और उस अनुमिति में साध्य-साधन का व्याप्तिज्ञान, उपयुक्त है। परन्तु साध्याभाव और साधनाभाव के—व्याप्तिज्ञान का अनुमिति में कोई उपयोग नहीं है। ( १ ) पृथ्वी, इतर ( अन्य ) से भिन्न है, ( २ ) गन्धत्व के कारण, ( ३ ) जो इतर से भिन्न नहीं रहता, वह गन्धवत् भी नहीं रहता जैसे जलादि' इत्यादि केवल व्यतिरेकिलिंग के उदाहरण नैयायिकों ने दिये हैं। परन्तु वास्तव में ये सब उदाहरण, अर्थापत्ति प्रमाण के उदाहरण हैं, क्योंकि गन्धत्व, इतर भेद का उपपादक है, अर्थात् पृथ्वी का गन्धत्व ही 'पृथ्वी इतरों से भिन्न है' यह ज्ञान करा सकता है।
शंका—अन्वय व्याप्ति का ज्ञान न रहने पर भी व्यतिरेकव्याप्ति के ज्ञान से भी अनुमिति होती है। अर्थात् 'जहाँ धूम रहता है वहाँ अग्नि होता है' इत्याकारक अन्वय व्याप्ति का जिसे ज्ञान नहीं है ऐसे व्यक्ति को भी 'जहाँ अग्नि नहीं है वहाँ धूम भी नहीं है—इत्याकारक व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान से भी अनुमिति हो सकती है। परन्तु अन्वयिरूप एक ही लिंग को मानने वाले आप के मत में वह अनुमिति कैसे उत्पन्न हो सकेगी ?
समाधान—जिसे 'अन्वयव्याप्ति का ज्ञान नहीं रहता उसे अर्थापत्ति प्रमाण से अग्नि आदि का ज्ञान होता है। अनुमान से नहीं। इस कारण आप की उपर्युक्त शंका ही ठीक नहीं है। अर्थापत्तिप्रमाण की आवश्यकता को हम आगे बतावेंगे। आप के व्यतिरेक-अनुमान का अर्थापत्ति प्रमाण में अन्तर्भाव हो सकता है। इसलिये व्यतिरेक-अनुमान, पृथक्तया मानने की कोई आवश्यकता नहीं।
अब नैयायिकों के माने हुए तीसरे भेद का निराकरण करते हैं।
अत एवाऽनुमानस्य नान्वयव्यतिरेकि-रूपत्वं व्यतिरेकव्याप्ति-ज्ञानस्यानुमित्यहेतुत्वात् ।
**अर्थ—**इसीलिए अनुमान को अन्वय-व्यतिरेकिरूपता भी नहीं है। क्योंकि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति के प्रति हेतुत्व नहीं है।
**विवरण—**जब कि व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान में अनुमिति-जनकत्व नहीं है तब नैयायिकों द्वारा मानी हुई अन्वय, व्यतिरेक-उभयरूपता, अनुमान से सम्भव नहीं होती। क्योंकि अन्वयरूप ओर व्यतिरेकरूप दोनों में से एक अन्वयव्याप्तिज्ञान से ही यदि अनुमिति हो सकती है तो व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान को अनुमिति के प्रति हेतु मानना व्यर्थ
१६६ वेदान्तपरिभाषा [ अनुमानभेदः
है। 'व्यतिरेकव्याप्तिज्ञान को अनुमिति के प्रति हेतुत्व नहीं है' यह बात केवल व्यति-रेकिं का निराकरण करते समय हम बता चुके हैं।
इस प्रकार 'अन्वयिरूप एक ही अनुमान है' यह सिद्ध कर अब उसका द्विविधत्व बताते हैं—
तच्चानुमानं¹ स्वार्थ-परार्थ-भेदेन² द्विविधम्। तत्र स्वार्थं तूक्तमेव, परार्थं तु न्यायसाध्यम्। न्यायो नामावयव-समुदायः। अवयवाश्च त्रय एव³ प्रसिद्धाः—प्रतिज्ञाहेतूदाहरण-रूपाः, उदाहरणोपनय-निगमन-रूपा वा, न तु पञ्चावयव⁴रूपाः। अवयव-त्रयेणैव व्याप्ति-पक्षधर्मतयोरुपदर्शन-सम्भवेनाऽधिकावयव-द्वयस्य व्यर्थत्वात्।
अर्थ—और वह अनुमान, स्वार्थ और परार्थ भेद से दो प्रकार की (स्वार्थानुमान
१. अन्वय-व्यतिरेक-व्याप्तिद्वयमूलकमनुमानं स्वार्थ-परार्थभेदेन द्विविधम्। तत्र धूमेन्द्रियसन्निकर्षदशायामुत्पन्नं स्वार्थानुमानम्, तच्च न्यायप्रयोगानपेक्षं स्वमात्रनिष्ठप्रतीतिफलम् परार्थानुमानं च न्यायप्रयोगापेक्षं परपुरुषनिष्ठप्रतीतिफलम्। अत्र नैयायिकाः प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमाः पंचावयवाः परार्थानुमाने अपेक्षिता भवन्तीति वदन्ति। तत्र साध्यनिर्देशरूप-प्रतिज्ञया यो यो धूमवान् स सोऽग्निमान् इत्युदाहरणेन धूमादिति हेतूपन्यासेन च व्याप्ति-पक्षधर्मताज्ञानयोरुत्पत्त्या अनुमिति-संभवात् नोपनय-निगमनयोरपेक्षा। अथवा उदाहरणोपनयनिगमनैरेवाऽनुमिति-संभवात् न प्रतिज्ञा-हेतुवाक्ययोरुपयोगः इति शास्त्रदीपिकोक्तिमनुसरति ग्रन्थकारः 'अवयवाश्चे'त्यादि ग्रन्थेन।
ननु अनुमानलक्षणादिनिरूपणस्य वेदान्तग्रन्थेषु क उपयोगः ? ब्रह्मस्वरूपज्ञानस्य उपनिषदेकसमधिगम्यत्वान्न तत्रोपयोगः। अपि तु द्वैतमिथ्यात्वतात्पर्यग्राहकतया उपपत्तिपदाभिधेयस्य अनुमानस्य अपेक्षणीयत्वात्। तदुक्तमद्वैतसिद्धौ—"अद्वैतसिद्धेर्द्वैतमिथ्यात्वसिद्धिपूर्वकत्वात् द्वैतमिथ्यात्वमेव प्रथममुपपादनीयम्" इति। अत्र उपपादनीयमित्यस्य अनुमानेन साधनीयमित्यर्थः। एवं च द्वैतमिथ्यात्वनिर्णये अनुमानस्योपयोगः। यद्यपि श्रुतिरेव अद्वैतिनां मुख्यं प्रमाणम्, तथापि तत्तात्पर्यनिर्णायकतया उपपत्तिपदाभिधेयमनुमानमपि सार्थंकम्। तदुक्तम्—
"उपक्रमोपसंहारावभ्यासोऽपूर्वता फलम्।
अर्थवादोपपत्ती च लिङ्गं तात्पर्य-निर्णये॥" इति।
२. 'दाद्'—इति पाठान्तरम्।
३. 'एव-प्रति०'—इति पाठान्तरम्।
४. 'वा:'—इति पाठान्तरम्।
अनुमानभेदः ] | अनुमानपरिच्छेदः | १६७
तथा परार्थानुमान) है। उनमें से स्वार्थानुमान तो बता ही चुके हैं। इसलिये परार्थानुमान को ही बताते हैं। वह न्यायसाध्य है। न्याय का अर्थ है अवयवों का समूह। अनुमान के अवयव तीन ही प्रसिद्ध हैं। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण अथवा उदाहरण, उपनय और निगमन—उन अवयवों के ये तीन स्वरूप हैं। तार्किक लोग पाँच अवयव मानते हैं। परन्तु हमारे मत में अनुमान के पाँच अवयव नहीं हैं। क्योंकि उपर्युक्त किन्हीं तीन अवयवों से ही व्याप्ति और पक्षधर्मता का ठीक-ठीक ज्ञान होने के कारण अधिक दो अवयवों की कल्पना करना व्यर्थ है।
विवरण—अपने विवाद का विषय बने हुए अर्थ के साधक अनुमान को स्वार्थानुमान कहते हैं। अर्थात् अपने मन में किसी विशिष्ट स्थान पर विशिष्ट पदार्थ है या नहीं—ऐसा संशय उत्पन्न होने पर जिस बाह्य प्रत्यक्ष लिंग के ज्ञान से वह निवृत्त हो, वह स्वार्थानुमान है। इस स्वार्थानुमान को पहले ही ('व्यभिचार के अदर्शन के साथ सहचार के दर्शन से व्याप्ति का ग्रहण होता है' पीछे बताया है। यह व्याप्तिज्ञान ही स्वार्थानुमान है) बता चुके हैं।
दूसरी व्यक्ति के विवाद का विषय बने हुए पदार्थ के साधक अनुमान को परार्थानुमान कहते हैं। वह परार्थानुमान न्याय से सिद्ध होता है। यहाँ 'न्याय' शब्द का अर्थ अवयव-समुदाय है, यह मूल में ही बताया है। अर्थात् अवयवघटित वाक्य ही 'न्याय' है। न्याय का परिष्कृत लक्षण इस प्रकार है—'अनुमान-प्रयोजक-वाक्यार्थ-ज्ञान-जनक-वाक्यत्वं न्यायत्वम्'—अनुमान प्रयोजक जो वाक्यार्थ ज्ञान, उसे उत्पन्न करने वाले वाक्य को ही न्याय कहते हैं। ऐसे ही न्याय से उत्पन्न हुए ज्ञान का प्रयोज्य (कार्य) व्याप्तिज्ञान है और वही परार्थानुमान है। परार्थानुमान के अवयव तीन ही प्रसिद्ध हैं। प्रतिज्ञा, हेतु और उदाहरण, या उदाहरण, उपनय और निगमन। यथा—'पर्वत वह्निमान् है' यह प्रतिज्ञा रूप अवयव का उदाहरण है। 'क्योंकि उस पर धूम है' यह हेतुरूप अवयव है। 'जो जो धूमवान् रहता है वह वह अग्निमान् रहता है, जैसे महानस' यह उदाहरण रूप अवयव है। 'वैसे ही यह पर्वत वह्निव्याप्य धूमवान् है' यह उपनय रूप अवयव है। 'इसलिये वह अग्निमान् हैं' यह निगमन रूप अवयव है। अनुमान के इन पाँचों अवयवों को नैयायिक मानते हैं। परन्तु वेदान्ती इस प्रकार पाँच अवयव नहीं मानते। किन्तु धर्ममीमांसकों के तीन अवयवों का स्वीकार करते हैं। क्योंकि तीन अवयव-समुदाय से ही व्याप्ति और पक्षधर्मता (व्याप्ति विशिष्ट हेतु का पक्ष पर रहना) का ज्ञान यदि होता है तो अधिक दो अवयवों को मानना व्यर्थ है। मीमांसकों के द्वारा स्वीकृत किये गये पूर्वोक्त दो पक्षों में से पहले पक्ष में उपनय और निगमन का कार्य, हेतु और प्रतिज्ञा के द्वारा हो सकता है। और दूसरे पक्ष में हेतु और प्रतिज्ञा का कार्य, उपनय और निगमन से हो सकता है। इसलिए प्रतिज्ञा और हेतु इन दो अवयवों को मानने पर
१६८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रकृते अनुमानोपयोगः
उपनय और निगमन रूप अधिक अवयवों के मानने की आवश्यकता नहीं है, और उनका स्वीकार करने पर प्रतिज्ञा और हेतुरूप अवयवों की आवश्यकता नहीं होती । अनुमिति ज्ञान के उपयुक्त ज्ञान को पैदा करना ही सब अवयवों का कार्य है ।
इस प्रकार अनुमान का निरूपण कर उसका प्रकृत प्रसंग में उपयोग बताते हैं—
एवमनुमाने निरूपिते $^१$तस्माद् ब्रह्मभिन्न-निखिल-प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसिद्धिः । तथा हि—ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात्, यदेवं तदेवं यथा शुक्तिरूप्यम् । न च दृष्टान्ताऽसिद्धिः, तस्यसाधितत्वात् । न $^२$चाप्रयोजकत्वं, शुक्तिरू$^३$प्यरज्जुसर्पादीनां मिथ्यात्वे ब्रह्मभिन्नत्वस्यैव लाघवेन प्रयोजकत्वात् ।
**अर्थ—**इस रीति से अनुमान का निरूपण कर चुकने पर अब उसी अनुमान के द्वारा ब्रह्म-भिन्न समस्त प्रपञ्च की मिथ्यात्व-सिद्धि हो जाती है । तथाहि—ब्रह्मभिन्न ( ब्रह्म से भिन्न ) सर्व ( समस्त पदार्थजात ) मिथ्या ( असत्य ) है । क्योंकि वह सब ब्रह्मभिन्न है । जो ब्रह्मभिन्न रहता है वह मिथ्या होता है, जैसे शुक्तिरूप्य । 'इस अनुमान में तीसरे दृष्टान्त रूप अवयव की सिद्धि नहीं होती' । ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि शुक्तिरूप्य का मिथ्यात्व हमने प्रत्यक्ष परिच्छेद में सिद्ध कर दिखाया है । उसी तरह 'ब्रह्मभिन्नत्व' हेतु अप्रयोजक ( साध्य की सिद्धि करने में असमर्थ) है, यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि शुक्तिरूप्य, रज्जुसर्प आदि के मिथ्यात्व में लाघव से ब्रह्मभिन्नत्व हेतु में ही प्रयोजकत्व है ।
**विवरण—**यहाँ तक अपने पक्ष में अनुमान का स्वरूप क्या है—बताया । इस तरह के अनुमान से ही 'ब्रह्मभिन्न सर्व प्रपंच मिथ्या है,' यह सिद्ध होता है । मीमांसकों को मान्य ऐसे दो पक्षों में से प्रथम पक्ष, हमें अधिक संमत है इसलिए प्रतिज्ञादि अवयव-त्रयात्मक वाक्य का मूल में उपयोग किया गया है । इस अनुमान में 'ब्रह्मभिन्न
१. तस्मात् अनुमानात् । पूर्वोक्तेषु त्रिषु अवयवेषु प्रतिज्ञाद्यवयवत्रये स्वसम्मतिम्प्रदर्शयितुमाह—'ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या ब्रह्मभिन्नत्वात्' इति । शुक्तिरूप्यादौ सिद्धसाधन-वारणाय सर्वमिति । ब्रह्मणि बाधनिरासाय ब्रह्मभिन्नमिति । न च दृष्टान्तासिद्धिः, तस्य दृष्टान्तस्य प्रत्यक्षपरिच्छेदे साधितत्वात् ।
२. अविद्या-तत्कार्यसाधारणस्य ब्रह्मभिन्नत्वस्य प्रयोजकत्वे न गौरवम् अपितु लाघवम् । अतस्तस्य मिथ्यात्व-प्रयोजकत्वम् । न च तत्र व्यभिचार-शङ्कोदयः, 'ब्रह्मभिन्नत्वं यदि मिथ्यात्वव्यभिचारि स्यात्, तदा दृग्-दृश्ययोः सम्बन्धो न स्यात्' इत्याकारकस्य व्यभिचारशंकानिवर्तकस्य अनुकूलतर्कस्य जागरूकत्वात् ।
३. 'प्यादीनां मि०'— इति पाठान्तरम् ।
मिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६९
सर्व' पक्ष है। इसमें 'सर्व' शब्द का प्रयोग, शुक्तिरूप्यादि उदाहरण में सिद्धसाधन दोष के निवारणार्थ किया गया है। और ब्रह्म में बाध-प्रसंग के निवारणार्थ 'ब्रह्मभिन्न' कहा गया है। रज्जुसर्पादि उदाहरणों में मिथ्यात्वरूप साध्य की सिद्धि होने पर भी सिद्धसाधन दोष नहीं आ पाता। क्योंकि अन्यान्यवादियों ने भी 'वाक् और मन दोनों अनित्य हैं', इस प्रतिज्ञा में अंशतः 'सिद्धसाधन-दोष' का स्वीकार किया है।
शंका—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व में कोई प्रमाण न होने से शुक्तिरूप्य का दृष्टान्त असिद्ध है। उसके मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण कहें तो अनवस्था दोष होगा।
समाधान—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व का प्रतिपादन हमने प्रथम परिच्छेद में किया है। इसलिये दृष्टान्त 'असिद्ध' नहीं है।
शंका—यह अनुमान, अप्रयोजक है अर्थात् सर्व, ब्रह्मभिन्न रहे, परन्तु मिथ्या नहीं। इससे अन्यान्य पदार्थों में सत्यत्व होने पर भी ब्रह्मभिन्नत्व हो सकता है।
समाधान—यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि शुक्तिरजतादि के मिथ्यात्व में कारण, अविद्या' से अतिरिक्त दोषजन्यत्व न होकर लाघव से 'ब्रह्मभिन्नत्व' ही है। ऐसा लाघव-रूप अनुकूल तर्क होने से अनुमान, मिथ्यात्व साधन में अप्रयोजक नहीं है।
शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थों में जो प्रत्यक्षसिद्ध मिथ्यात्व है, उसका क्या लक्ष्य है ? जिस मिथ्यात्व को आप समस्त प्रपंच में अनुमान से साधन करना चाह रहे हैं।
इस शंका का समाधान—
'मिथ्यात्वं (२) च स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत यावन्निष्ठात्यन्ता-
१. चित्सुखाचार्योक्तिमनुस्मरन् साध्यं मिथ्यात्वं निर्वक्ति—'स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत-यावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्, स्वस्य आश्रयत्वेन अभिमताः यावन्तः तेषु निष्ठः यः अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वम्, । अत्र 'स्व' पदं, यस्य मिथ्यात्वं साधनीयं तत्परम्। अभिमतपदं प्रमितिव्यावृत्ति-प्रतीति विशेष्यपरम्। यावत् पदमशेषपरम्। तथा च-स्वाश्रयत्वेन स्वप्रकारक-प्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमते प्रतीते यावति सकले निष्ठः स्थितः विद्यमानः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं स्वस्य मिथ्यात्वमित्यर्थः। यथा 'इदं रजतम्' इत्यत्र स्वं शुक्तिरूप्यं तदाश्रयत्वेन तत्प्रकारकप्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमतं प्रतीत यद् यद् इदमात्मकं पुरोवर्तिद्रव्यं, तस्मिन् यावति समस्ते पुरोवर्तिनि द्रव्ये निष्ठः स्थितः यः स्वस्य शुक्तिरूप्यस्य अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं शुक्तिरूप्यस्य इति मिथ्याभूते प्रातिभासिके लक्षण-समन्वयः। एवं स्वप्रकारकप्रतीतिविशेष्ये स्वाधिष्ठान-चैतन्ये सर्वस्यापि व्यावहारिकाभावस्य विद्यमानत्वात् तत्प्रतियोगित्वं सर्वस्यैव व्यावहारिकस्येति व्यावहारिकऽपि लक्षणसमन्वयः।
१७० | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वलक्षणम्
भाव-प्रतियोगित्वम्। अभिमतपदं¹ वस्तुतः स्वाश्रयाप्रसिद्ध्या असंभव-वारणाय। यावत्पदमर्थान्तर-वारणाय। तदुक्तम्— ²सर्वेषामेव भावानां स्वाश्रयत्वेन सम्मते। प्रतियोगित्वमत्यन्ताभावं प्रति मृषात्मता ॥ इति। चि० ७।
**अर्थ—**मिथ्यात्व से यह विवक्षित है कि स्वाश्रय से अभिमत जितनी वस्तु हो, तन्निष्ठ (उसमें रहनेवाला) अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व। इस मिथ्यात्व के लक्षण में 'अभिमत' पद, वस्तुतः स्व-श्रय की अप्रसिद्धि होने से उस पर आनेवाले असंभव दोष की निवृत्ति करने के लिये है और 'यावत्' पद, अर्थान्तर का निवारण करने के लिये है। इस विषय में चित्सुखी में इस प्रकार कहा है—'स्वाश्रय से सम्मत पदार्थ में स्थित अत्यन्ताभाव का सब पदार्थों में प्रतियोगित्व रहता है, यही सब पदार्थों का मिथ्यात्व है।
**विवरण—**घटादि किसी कार्य की समवाय से स्थिति, कपालादि अपने कारण-प्रदेश के अतिरिक्त प्रदेश में नहीं हुआ करती। अर्थात् कपाल, तन्तु आदि कारण, जिस स्थान में होते हैं उससे भिन्न स्थान में घट, पट आदि कार्य हुआ करते हैं ऐसा कोई नहीं मानता, और वे कार्य, कपालादि कारणों में भी नहीं रहते, यह प्रमाणसिद्ध है। परन्तु उसके विपरीत प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। इसलिये सब कार्य मिथ्या हैं। इस विषय में "यदसद्भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत्।" जो वास्तव में न होकर भी भासता हो वह मिथ्या है। जैसे स्वप्नगजादि—यह सांप्रदायिकों का अभ्युपगम है। ब्रह्मभिन्न समस्त पदार्थों का मिथ्यात्व बतानेवाले अनुमान-प्रमाण का उपन्यास ऊपर हम कर ही चुके हैं। 'परन्तु उस अनुमान का प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होता है, क्योंकि सृष्टि में सभी पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। इसलिये पूर्वोक्त अनुमान से उनका मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो सकता' परन्तु यह आक्षेप उचित नहीं है। क्योंकि चन्द्रबिम्ब, एक प्रादेशमात्र हमें प्रत्यक्ष दीखता है। परन्तु शब्द-प्रमाण से उस प्रत्यक्ष-प्रत्यय का बाध हो जाता है। इससे जो प्रत्यक्ष दिखाई दे वह सत्य ही है—यह नियम नहीं। 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस ब्रह्म में नानात्व (द्वैत) का लेश तक नहीं है। इत्यादि अर्थ के आगम, ब्रह्म
१. दमसंभव०'—इति पाठान्तरम्। २. सर्वेषामपि भावानामाश्रयत्वेन सम्मते अत्यन्ताभावं प्रति यत् प्रतियोगित्वम्, तदेव तेषां मृषात्मत्वं मिथ्यात्वमितियावत्। भावानां सताम्। सत्त्वञ्च कालसंबन्धित्वम्, तेन अभावस्यापि परिग्रहः स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन, 'स्वपदं मिथ्यात्वेन अभिमतपरम्। सम्मते प्रतीते, न तु प्रमिते। तेन च बाधः परिहृतः। सप्तम्यर्थो निष्ठात्वम्। तथा च सर्वेषां घटपटादीनां भावानां सतां स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन सम्मताः प्रतीता ये तन्त्वादयः तन्निष्ठः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वमेव तेषां मिथ्यात्वमिति श्लोकार्थः।
मिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७१
आगम, ब्रह्म भिन्न वस्तु का निषेध करते हैं। इस कारण समस्त द्वैत, मिथ्या है, यह सिद्ध होता है। इस प्रकार हमने यहाँ पर घटादि पदार्थों के मिथ्यात्व का केवल दिग्दर्शन करा दिया है।
अब मूल ग्रन्थ को विवृत करते हैं—
स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना पदार्थ हो उसमें स्थित जो ‘स्व’ का (आश्रित का) अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व ही मिथ्यात्व है। भाव रूप से स्वीकार किये हुए घटादि पदार्थों के आश्रय रूप से (अधिकरण) अभिमत कपालादि उपादान-कारणभूत पदार्थ में विद्यमान, वास्तविक रूप से (वस्तुतः) घट का जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व (घट का वस्तुतः वहाँ न रहना) ही मिथ्यात्व है। इसी का प्रकृत विषय से सम्बन्धित दूसरा उदाहरण—उपर्युक्त लक्षण में ‘स्व’ शब्द से समस्त प्रपञ्च की विवक्षा है। उसके आश्रय रूप से ब्रह्म है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत ब्रह्म में स्थित समस्त-प्रपंच का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व समत-प्रपंच में है। अर्थात् ब्रह्म में प्रपञ्च का लेश तक नहीं है, यही प्रपंच का मिथ्यात्व है।
**शंका—**इस मिथ्यात्व के लक्षण में ‘अभिमत’ पद का क्यों निवेश किया है ? ‘स्वाश्रययावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्’ इतना ही मिथ्यात्व का लक्षण किया जाय।
**समाधान—**ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि सभी स्वाश्रयों में स्वात्यन्ताभाव का असंभव (स्वयं के ही अत्यन्ताभाव का जो असम्भव, उसका निवारण करने के लिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद की आवश्यकता है। अन्यथा ‘जितना भी स्वाश्रय’ शब्द से शुक्त्यादि भी गृहीत हो सकते हैं, उनमें रहने वाला जो अत्यन्ताभाव शुक्त्यादिकों का ही अत्यन्ताभाव लेना होगा, परन्तु यह तो असम्भव ही है। इसलिये लक्षण, असम्भव दोष से दूषित होता है, उसके निवारणार्थ ‘अभिमत’ पद का निवेश, लक्षण में किया गया है। वस्तुतः शुक्त्यादि, रजतादिकों का आश्रय नहीं है, तथापि ‘इदं रजतम्’ यह भ्रम होने पर शुक्ति को उसका आश्रय मानना पड़ता है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत शुक्ति आदि पदार्थों में जो रजतादिकों का अत्यन्ताभाव उसका प्रतियोगित्व, शुक्तिरूप्यादिकों में है, इसलिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद का निवेश करना उचित ही है।
**शंका—**यदि ‘अभिमत’ पद के निवेश करने से ही मिथ्यात्व लक्षण का निर्वाह हो जाता है तो पुनः ‘यावत्’ पद के निवेश की क्या आवश्यकता ?
**समाधान—**लक्षण में ‘अभिमत’ पद के निवेश करने पर भी जब तक ‘यावत्’ पद का निवेश न किया जाय, तब तक लक्षण निर्दुष्ट नहीं हो पाता। लक्षण में ‘यावत्’ पद के निवेश न करने पर कपि-संयोग के आश्रय रूप से अभिमत जो वृक्ष है, उस पर मूलावच्छेद से (मूल प्रदेश में विद्यमान) विद्यमान जो कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व शाखावच्छेद से विद्यमान कपिसंयोग में है। इस कारण सामाना-
१७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वानुमानम्
धिकरणरूप अर्थान्तर की सिद्धि हो जाती है। इस अर्थान्तर के निवारणार्थ लक्षण में ‘यावत्’ पद का निवेश अवश्य करना चाहिये। जिससे, स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना भी शाखादि पदार्थ है उसमें कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव नहीं है। इस कारण अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी, कपिसंयोग नहीं बन पाता। इसलिये ‘अर्थान्तरसिद्धि’ रूप दोष नहीं है। हमारे मत में ‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः’ पूर्वोक्त सत्य-ज्ञानानन्त-लक्षण ब्रह्माख्य आत्मा में आकाश उत्पन्न हुआ। ऐसी श्रुति होने से तार्किकों के द्वारा नित्य माने गये आकाशादि में भी जन्यत्व ज्ञात होता है। जन्य होने से वे कार्य हैं। कोई भी कार्य, अपने कारण के आश्रित रहता है। इस कारण आकाशादि सभी कार्य, ब्रह्मरूप आश्रय में स्थित है। इसलिये पूर्वोक्त लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं आ पाता। यह लक्षण, प्राचीन विद्वानों को भी सम्मत है। इस विषय में ‘सर्वेषामेव’ इत्यादि चित्सुखाचार्य की कारिका उद्धृत की गई है।
इस प्रकार प्राचीन वेदान्तियों के द्वारा किये गये जगन्मिथ्यात्व-साधक अनुमान का उपपादन कर, नवीन वेदान्तियों का मिथ्यात्व के अनुमान का प्रकार बताते हैं—
¹यद्वा-अयं पटः एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव-प्रतियोगी पटत्वात् पटान्तरवदित्या²द्यनुमानं मिथ्यात्वे प्रमाणम् । तदुक्तम्— ³अंशिनः स्वांशगात्यन्ताभावस्य प्रतियोगिनः । अंशित्वादितरांशिव दिगेषैव गुणादिषु ॥ इति । चि० ८ ।
**अर्थ—**अथवा ( १ ) यह पट, एतत्तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। ( ३ ) अन्य पट के समान। यह अनुमान, मिथ्यात्व में प्रमाण है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है—( १ ) अवयवी पदार्थ में, उसके अवयव में विद्यमान जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता होती है। ( २ ) क्योंकि उसमें अवयवित्व है। ( ३ ) अन्य अवयवी के समान। गुणादिकों के मिथ्यात्व का अनुमान करने का यही मार्ग है।
१. प्राचीनोक्तमनुमानप्रयोगमुपपाद्य नवीनोक्तमनुमानप्रयोगमाह—यद्वेति ।
२. ‘त्यनुमा०’—इति पाठान्तरम् ।
३. चित्सुखाचार्योक्तेन श्लोकेन अनुमानप्रयोगं दर्शयति—अंशिन इति । अंशिनः अवयविनः । स्वांशगात्यन्ताभावस्य स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावस्य । ‘स्वपदं पक्षीभूत-पटविशेषपरम् । अनेन अवयविविशेषस्य पक्षत्वं—स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य च साध्यत्वं दर्शितम् । अंशित्वात् इति हेतुः । कार्यत्वेन सम्मतत्वादित्यर्थः । इतरांशिव इतरांशिन इवेत्यर्थः । यथा इतरांशिनमंशित्वात् एतदवयवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं, तद्वत् एतदंशिनोऽपि अंशित्वात् एतदवयव-निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसिद्धौ मिथ्यात्वसिद्धिः ।
मिथ्यात्वानुमानम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७३
विवरण—यहाँ '(१) यह पट, इस तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। (३) अन्य पटों के समान। इस अनुमान में 'अयं पटः' इस शब्द से वह पूरा (सम्पूर्ण) पट विवक्षित है। उसका उसी पट में विद्यमान किसी एक तन्तु में अत्यन्ताभाव है। इस कारण वह पट एक तन्तु में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी होता है। यहाँ पर एक तन्तु के अवच्छेद से रहने वाला पट का जो अत्यन्ताभाव, वह 'तादात्म्य' सम्बन्ध से रहता है, यह समझना चाहिये। जिससे पहले की तरह अर्थान्तरता नहीं हो पायेगी। यथा— एक तन्तु पर संयोग सम्बन्ध से जैसे पट रहता है वैसे ही उस पट का अत्यन्ताभाव भी रहता है। अतः प्रतियोगी और उसके अभाव का सामानाधिकरण्य ही अर्थान्तर है। और इस अनुमान से उसी की सिद्धि होती है। मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो पाती। परन्तु 'तादात्म्य संबन्ध से वृत्ति' विशेषण देने पर, अर्थान्तर की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि तादात्म्य सम्बन्ध से ही अभाव लेना अभीष्ट होने से संयोग सम्बन्ध से अभाव का ग्रहण ही नहीं किया जा सकेगा।
इसी तरह एक और 'व्यधिकरण-धर्मानवच्छिन्न-प्रतियोगिताकत्व' विशेषण, अत्यन्ताभाव में जोड़ देना चाहिए। (व्यधिकरण धर्मावच्छिन्न अभाव का ग्रहण करने पर अर्थान्तर नहीं होता)। तथा हि—तन्तु पर तादात्म्य-सम्बन्ध से तथा पटत्व धर्म से पट का अत्यन्ताभाव न रहने पर भी 'घटत्व' धर्म से वह रहता है, क्योंकि 'घटत्वेन पटो नास्ति' इस तन्तु पर घटत्वरूप से पट नहीं है, प्रतीति होती है। ऐसे अभाव को ही व्यधिकरण-धर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक अभाव कहते हैं। अर्थात् 'घटत्वेन पाटो नास्ति' इस अभाव की पट में रहने वाली जो प्रतियोगिता, वह पट के व्यधिकरण (पट पर न रहने वाले घटत्व) धर्म से, अवच्छिन्न (युक्त) है। ऐसे अभाव का ग्रहण कर मिथ्यात्व-साधक पूर्वोक्त अनुमान से तन्तु पर घटत्वेन पट का अभाव रूप अर्थान्तर की ही सिद्धि होती है। इस दोष के निवारणार्थ 'व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न नहीं है' इतना विशेषण लगाकर अत्यन्ताभाव का ग्रहण करना चाहिए। जिससे व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न अभाव को लेकर अर्थान्तरसिद्धि रूप दोष, उपर्युक्त अनुमान पर नहीं आता। क्योंकि अब उस अभाव का ग्रहण ही नहीं हो सकेगा।
अब 'पटः' शब्द से जिस किसी भी पट को पक्ष न बनाकर 'अयं पटः' इसे पक्ष बनाया है। कारण यह है कि जिस किसी पट को पक्ष बनाकर 'एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व' को साध्य किया जाय तो वही अर्थान्तर दोष पुनः प्राप्त होता है। क्योंकि अन्य कोई भी पट, एतत्तन्तुनिष्ठ नहीं होता। इसलिये 'अयं पटः' इतना पक्ष कोटि में रखना पड़ा। इसी प्रकार इसी दोष के निवारणार्थ 'एतत्कालिनत्व' विशेषण भी देना चाहिये। इस पर कदाचित् आप यह कहें कि 'इस तन्तु में पट का समवाय है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का बाध होगा। परन्तु यह भी उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्ष
१७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः
प्रमाण, भ्रम और प्रमा दोनों के लिए साधारण होने से 'चन्द्र प्रादेशमात्र है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का शास्त्र से जैसा बाध होता है वैसे समवाय से प्रत्यक्ष का कहीं बाध तो नहीं होता, इस प्रकार के सन्देह मात्र से ही समवाय का प्रत्यक्ष, बाधित समझा जाता है । इसलिए तन्तु और पट के समवाय के प्रत्यक्ष का बाघ रूप दोष नहीं होता । इस विषय में चित्सुखाचार्य की सम्मति ऊपर निर्दिष्ट कर ही चुके हैं । इसी प्रकार अन्यान्य अनुमानों में भी बताया जा सकता है । 'रूप, रूपी पदार्थ में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है । क्योंकि उस पर गुणत्व है । स्पर्श के समान । क्रिया आदि में भी ऐसी ही अनुमानों की कल्पना कर लेनी चाहिए ।
किन्तु आपका यह मिथ्यात्वानुमान 'सन् घट:' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है । यह शङ्का और उसका समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं--
न च घटादेर्मिथ्यात्वे सन् घट इति प्रत्यक्षेण¹ बाधः । अधिष्ठानब्रह्मसत्तायास्तत्र विषयतया घटादेः सत्यत्वासिद्धेः । न च नीरूपस्य ब्रह्मणः कथं चाक्षुषादिज्ञान-विषयतेति वाच्यम् । नीरूपस्यापि रूपादेः प्रत्यक्षविषयत्वात् । न च नीरूपस्य द्रव्यस्य चक्षुराद्ययोग्यत्वमिति नियमः । ²मन्मते ब्रह्मणो द्रव्यत्वासिद्धेः । गुणाश्रयत्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यत्वमिति तेऽभिमतम् । न हि निर्गुणस्य ब्रह्मणो गुणाश्रयता । नापि समवायिकारणता, समवायासिद्धेः । अस्तु वा द्रव्यत्वं ब्रह्मणः, तथाऽपि नीरूपस्य कालस्येव चाक्षुषादि-ज्ञान-विषयत्वेऽपि न विरोधः ।
अर्थ— घटादि ब्रह्माभिन्न पदार्थों में, ब्रह्मभिन्नत्व होने से ही मिथ्यात्व है, इस प्रकार अनुमान करने पर 'सन् घट:'--विद्यमान-घट,-इस प्रत्यक्ष ज्ञान से उसका बाध होता है, यह कहना ठीक नहीं प्रतीत होता है । क्योंकि यह 'विद्यमान घट' इस ज्ञान में अधिष्ठानरूप ब्रह्मसत्ता विषय है, इस कारण उस सत्ता से पृथक् स्थित घटादि पदार्थों के सत्यत्व की सिद्धि नहीं होती ।
१. 'क्षविरोध:'-इति पाठान्तरम् ।
२. मन्मते अद्वैतवेदान्तिमते । तथा च द्रव्यप्रत्यक्षे चक्षुषो रूपापेक्षा, न तु अन्यप्रत्यक्षे । ब्रह्म तु न द्रव्यम् । तथा चोक्तं विवरणे "ब्रह्म तु न द्रव्यं प्रमाणाभावात् । समवायिकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, आरम्भवादानभ्युपगमात् । उपादानकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, गुणादीनामपि ग्रहणधर्मत्वादि-धर्मोपादानत्वात्" इति । तस्मात् तस्य प्रत्यक्षत्वं युक्तमितिभावः ।
अनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः ] अनुमानपरिच्छेदः १७५
इस पर आप यदि पूछें कि रूपरहित ब्रह्म, चाक्षुष ज्ञान का विषय कैसे होता है ? तो उसका उत्तर यह होगा कि रूपरहित रूप में प्रत्यक्षविषयता जैसी आपने मानी है। वैसी ही रूपरहित ब्रह्म में चाक्षुषज्ञान-विषयता के होने में कोई विरोध नहीं है।
परन्तु नीरूप-रूप, गुण है, और नीरूप-द्रव्य में चाक्षुष प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती—ऐसा हमारा विशेष नियम है, तो यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' द्रव्य नहीं है। कारण यह है कि 'गुणाश्रयत्व या समवायि-कारणत्व को ही तार्किकों ने 'द्रव्य' माना है।' परन्तु निर्गुण-ब्रह्म में गुणाश्रयत्व का सम्भव नहीं। समवायिकारणत्व रूप लक्षण का ब्रह्म में सम्भव नहीं। क्योंकि 'समवाय' नामक कोई पदार्थ ही नहीं है। अथवा 'तुष्यतु दुर्जनन्याय' से 'ब्रह्म' को द्रव्य मान लेने पर भी जैसे रूपरहित काल का प्रत्यक्ष होता है वैसे ही 'ब्रह्म' का भी यदि चाक्षुष-प्रत्यक्ष हो तो इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है।
विवरण—"ब्रह्म से भिन्न समस्त प्रपंच मिथ्या" यह अनुमान ऊपर किया गया है। परन्तु ब्रह्म से भिन्न घट-पटादि समस्त पदार्थ, 'असत्' न होकर, 'सत्' हैं। यह अनुभव प्रत्यक्ष है और इस प्रत्यक्ष ज्ञान से अनुमान का बाध हो जाता है।
परन्तु ऐसा समझना अनुचित है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान में 'सन्' और 'घट' ये दो विषय हैं। उनमें 'सन्' इस ज्ञान का विषय 'सत् ब्रह्म' है और 'घट' इस ज्ञान का विषय, 'सद्भिन्न असत् घट' है। इसलिए 'सन् घटः' इस प्रत्यक्षज्ञान का विषय, अधिष्ठान 'ब्रह्मसत्ता' होने से, उससे भिन्न की (घटादि असत् पदार्थों की) सत्यता सिद्ध नहीं होती।
शंका—रूपरहित ब्रह्म का चाक्षुष-प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तब 'सन् घटः' इस प्रत्यक्ष का विषय 'सत् ब्रह्म' है, कैसे कह सकते हैं ?
समाधान—'नीरूप पदार्थ का प्रत्यक्ष नहीं होता' आपका यह नियम, अव्यभिचारी नहीं है, किन्तु व्यभिचारी है। क्योंकि रूप स रहित रूपादिकों का प्रत्यक्ष होता है। अतः नीरूप-पदार्थ का प्रत्यक्ष-ज्ञान नहीं होता, यह नियम व्यभिचरित है।
इस पर आप यह कहें कि 'रूपरहित रूपादि गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता' ऐसा नियम हमारा नहीं है, किन्तु 'रूपरहित द्रव्य में चाक्षुष-प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती' यह नियम है।
तों यह भी ठीक नहीं, क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' की द्रव्य में गणना नहीं है। अतः द्रव्य के विषय में आपका विशेष नियम होने पर भी हमारी कोई हानि नहीं है।
शंका—'ब्रह्म' में द्रव्यत्व नहीं है, यह आप कैसे कहते हैं ?
समाधान—तार्किकों ने द्रव्य के दो लक्षण दिये हैं, उन दोनों की ब्रह्म में सम्भावना न हो सकने से उसमें द्रव्यत्व नहीं है। आपके यहाँ 'गुणाश्रयत्वं द्रव्यत्वम्'-गुण के
| १७६ | वेदान्तपरिभाषा | [ सत्तात्रैविध्यम् |
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आश्रय को द्रव्य कहा गया है। परन्तु 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' ( श्वे० ६-११ ) इस श्रुति में ब्रह्म को स्पष्टतया निर्गुण कहा है। इसलिए सत्त्वादि-गुणरहित ब्रह्म, रूपादि गुणों का भी आश्रय नहीं हो सकता, क्योंकि वैशेषिकों के सम्मत रूपादि गुण, सत्त्वादि तीन गुणों के ही परिणाम हैं। इस कारण 'गुणाश्रयत्व' रूप द्रव्यलक्षण, ब्रह्म में घटित नहीं होता। 'समवाय' पदार्थ का अस्तित्व ही न होने से ब्रह्म में समवायिकारणता नहीं है। उसके न होने से 'समवायिकारणत्व रूप द्रव्य-लक्षण भी ब्रह्म में घटित नहीं होता।
अथवा ब्रह्म में यथा कथंचित् द्रव्यत्व मान भी लें तथापि 'नीरूप-द्रव्य, प्रत्यक्ष के योग्य नहीं होता' यह नियम नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि 'इस काल में यहाँ घट नहीं है' इस प्रतीति के बल पर अध्वर-मीमांसकों ने जैसे इन्द्रियविषयता, काल में स्वीकार की है, उसी प्रकार 'सन् घट:' इत्याकारक प्रतीति में अन्य किसी कारण के न होने से उस अनन्यथा-सिद्ध प्रतीति के बल पर हम भी ब्रह्म में चाक्षुषत्व स्वीकार करते हैं। इसलिए ब्रह्मव्यतिरिक्त पदार्थ की चाक्षुषत्व में ही 'महत्त्व के साथ उद्भूतरूपवत्त्व' प्रयोजक होता है। ब्रह्म की चाक्षुषता में नहीं।
"रूपरहित काल का प्रत्यक्ष मानने पर 'आकाश में बलाका' इस प्रतीति के बल पर आकाश का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष कहना होगा" इस आशंका के कारण पूर्व समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान कहते हैं—
यद्वा—त्रिविधं सत्त्वं¹-पारमार्थिकं व्यावहारिकं प्रातिभासिकं च। पारमार्थिकं सत्त्वं ब्रह्मणः, व्यावहारिकं² सत्त्वमाकाशादेः, प्रातिभासिकं³ सत्त्वं शुक्ति⁴रजतादेः। तथा च घटः सन्निति प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकसत्त्व-विषयत्वेन प्रामाण्यम्। अस्मिन्पक्षे⁵ च घटादेर्ब्रह्मणि निषेधो न स्वरूपेण,⁶ किन्तु पारमार्थिकत्वेनैवेति न विरोधः। अस्मिन्पक्षे⁷ च मिथ्यात्वलक्षणे पारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिता
१. 'पारमार्थिकसत्त्व'-इति पाठान्तरम्।
२. 'कसत्त्व' इति पाठान्तरम्।
३. 'कसत्त्व'-इति पाठान्तरम्।
४. 'रूप्यादे:'-इति पाठान्तरम्।
५. 'क्षे घटा:' इति पाठान्तरम्।
६. न स्वपेण न व्यावहारिकत्वेन।
७. अस्मिन् पक्षे सत्तात्रैविध्यपक्षे।
सत्तात्रैविध्यम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७७
कत्वमप्यन्ताभाव-विशेषणं द्रष्टव्यम्। ¹तस्मादुपपन्नं मिथ्यात्वानुमानमिति ।
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्त-परिभाषायाम् अनुमान-परिच्छेदः समाप्तः ।
**अर्थ—**अथवा—पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक भेद से तीन प्रकार का सत्त्व है। ब्रह्म का सत्त्व, पारमार्थिक है। आकाशादि भूत भौतिकों का सत्त्व, व्यावहारिक है। शुक्तिरजत, स्वप्नगज आदि का सत्त्व, प्रातिभासिक है। इस कारण 'घटः सन्' इस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य, 'व्यावहारिक' सत्त्व, उसका (प्रत्यक्ष का) विषय होने के कारण है। इस पक्ष में घटादि का ब्रह्म में स्वरूपतः निषेध नहीं किया जाता किन्तु परमार्थतः ही उसका निषेध किया जाता है। अतः कोई किसी प्रकार का विरोध नहीं होता। और इस पक्ष में पूर्वोक्त मिथ्यात्व के लक्षण में, 'जिसकी प्रतियोगिता पारमार्थिकत्व से अवच्छिन्न है' यह विशेषण, अत्यन्ताभाव में देना चाहिये। इस रीति से पूर्वोक्त मिथ्यात्वानुमान सर्वथा उपपन्न है।
**विवरण—**पारमार्थिकत्व, व्यावहारिकत्व और प्रातिभासिकत्व—ये सब, विषयभेद के कारण एक ही सत्त्व के तीन प्रकार हैं। ब्रह्म का सत्त्व, पारमार्थिक है, आकाशादिकों का सत्त्व व्यावहारिक और रज्जु-सर्पादिकों का सत्त्व, प्रातिभासिक हुआ करता है। प्रातिभासिक सत्ता का व्यावहारिक सत्ता से बाध होता है, और व्यावहारिक सत्ता का ब्रह्म की—पारमार्थिक सत्ता से बाध होता है। ब्रह्म की सत्ता का किसी से भी बाध न होने से वह पारमार्थिक है। 'घटः सन्'—घट विद्यमान है, इस प्रकार घटसत्ता का जो प्रत्यक्ष अनुभव होता है उसका व्यावहारिक सत्त्व, विषय है और उस प्रत्यक्ष में प्रामाण्य भी व्यावहारिक सत्त्वविषयत्वेनैव ही है, अर्थात् व्यावहारिक सत्ता में ही उसे प्रामाण्य है। पारमार्थिक सत्ता में नहीं।
यदि आप ऐसा कहें कि सत्त्व की त्रिविधता के स्वीकार पक्ष में वृक्ष पर कपिसंयोग और उसका अभाव दोनों का समानाधिकरण्य जैसे सिद्ध होता है, वैसे ही ब्रह्म में घट और उसका अभाव दोनों का समानाधिकरण्य सिद्ध होगा, परन्तु घटादिकों का उससे मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होगा।
तो उस पर हमारा यह उत्तर है कि ब्रह्म में घटादि पदार्थों का जो निषेध किया गया है, वह स्वरूपेण (व्यावहारिक रूप से = यह व्यावहारिक घट नहीं) नहीं किया
१. मिथ्यात्वलक्षणस्य पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकात्यन्ताभावघटितत्वात्। अनुमानस्य पारमार्थिकत्वाभावविषयकत्वात् प्रत्यक्षस्य च व्यावहारिकसत्त्वविषयकत्वात् तयोर्भिन्नविषयत्वेन अविरोधात् मिथ्यात्वानुमानं समुचितमेव।
१७८ वेदान्तपरिभाषा [ सत्तात्रैविध्यम्
गया है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( यह घट पारमार्थिक = वास्तविक, नहीं ) किया गया है। और 'जो जो पारमार्थिक से भिन्न रहता है, वह मिथ्या होता है' यह नियम है। घट, पारमार्थिक से भिन्न है, इस कारण घटादिकों के मिथ्यात्व के साथ कोई विरोध नहीं है।
शंका—इस त्रिविध सत्ता पक्ष में 'स्वाश्रयत्वेनाभिमत यावत्' मिथ्यात्व का लक्षण, उचित नहीं होगा। क्योंकि स्वाश्रयत्व से अभिमत यावत् ( ब्रह्म ) में व्यावहारिकत्व धर्म से घटादि के अभाव का संभव नहीं होता, इसलिये उनमें अत्यन्ताभाव की प्रतियोगिता नहीं कह सकते।
समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि इस त्रिविध सत्ता पक्ष में मिथ्यात्व लक्षणगत अत्यन्ताभाव में विशेषण जोड़ देना चाहिये, अर्थात् जिसकी प्रतियोगिता पारमार्थिकत्व से अवच्छिन्न है ऐसा अत्यन्ताभाव। ऐसा करने से लक्षण पर पूर्वोक्त दोष नहीं आवेगा। ब्रह्म में घटादि का अभाव व्यावहारिकत्व रूप से हमें विवक्षित नहीं है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताकत्व रूप से ) अभाव का ग्रहण करना है। अर्थात् व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है, ऐसे अभाव का ही ग्रहण करना है। ब्रह्म में व्यावहारिकत्व रूप से घटादिकों के होने पर भी पारमार्थिकत्वरूप से उनका ब्रह्म में अत्यन्ताभाव है ही। इस कारण 'पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक-स्वात्यन्ताभाव-सामानाधिकरण्यम्'--पारमार्थिकत्व धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है ऐसे स्व के अत्यन्ताभाव का, स्व से सामानाधिकरण्य रहना ही मिथ्यात्व का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है और वह घटादि में उत्पन्न होता है। अतः मिथ्यात्व का अनुमान सर्वथा युक्तियुक्त है।
श्रीगजाननशास्त्रिमुसलगांवकरविरचिते सविवरण-प्रकाशे अनुमान-परिच्छेदः समाप्तः।
—:०:—
अथ उपमान-परिच्छेदः ३
प्रतिज्ञात छह प्रमाणों में से प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण का निरूपण किया गया। अब उद्देश्यक्रम के अनुसार क्रमप्राप्त उपमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।
'अथोपमानं निरूप्यते। तत्र सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्²। तथा हि; ³नगरेषु दृष्टगोपिण्डस्य पुरुषस्य वनं गतस्य गवयेन्द्रिय-
१. आनन्तर्यार्थकः 'अथ' शब्दः। तेन अनुमाननिरूपणानन्तरमुपमाननिरूपणं क्रियते। शाबरभाष्य-श्लोकवार्तिक-शास्त्रदीपिकानुसारेण अनुमाननिरूपणानन्तरं शब्द-प्रमाणं निरूप्यापि उपमानं निरूपयितुं शक्यते, तथापि सूचीकटाहन्यायेन नैयायिकादृत-क्रममनुसृत्यैवात्रापि अनुमानानन्तरमुपमाननिरूपणमेवक्रियते।
ननु अद्वैत-द्वैत-मिथ्यात्वादीनां सादृश्याऽघटितत्वात् अद्वैतज्ञाने उपमानस्य अनुप-योगात् अत्र उपमानप्रमाणविचारोऽयं किं प्रयोजनः ?
तत्रेदं समाधानम्—अद्वैतिनामपि अद्वितीयब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तं चित्तशुद्ध्याद्यर्थं कर्मानुष्ठानमपेक्षितं भवति, तत्र प्रकृति-विकृति-भावादिविज्ञानस्य अपेक्षितत्वात् तत्समर्प-कतया उपमानप्रमाणविचारः सार्थक इति केचिन्निरूपयन्ति। अन्ये च वार्तिकमनुसृत्य भ्रमात्मकं प्रमात्मकञ्चेति द्विविधमुपमानमिति वदन्ति। तत्र प्रपञ्चे सत्यत्वादिना ब्रह्मसादृश्यानुभवादिकं च ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तमबाधेऽपि ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारा-नन्तरं बाध्यत एवेति भ्रमात्मकमेवेतिसिद्धिरुपमानविचारस्य प्रयोजनम्।
उपमानप्रमाणलक्षणादिकं मीमांसकसंम्मतलक्षणाद्यनुसारेणैवाभिमतम्। न नैयायिक-सम्मतलक्षणाद्यनुसारेणेत्यवगन्तव्यम्।
२. भट्टमतमनुसृत्याह—'सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्' इति। सादृश्यप्रमायाः करण-मिति विग्रहः। सादृश्यप्रमा च असन्निहितगोतद्गतगवयसादृश्यविषयिणी प्रमा, सैव उप-मितिः, प्रत्यक्षादिविलक्षणत्वात्। तत्करणञ्च सन्निहितगवयनिष्ठगोसादृश्यज्ञानम्, तदेव उपमानम्। तेन उपमितिकरणमुपमानमिति लक्षणं फलितम्। सादृश्यञ्च असाधारण-धर्मशून्यत्वे सति तद्गतधर्मवत्त्वम्। तेन सादृश्यं पदार्थान्तरमिति प्राभाकारमतं निराकृतं भवति। एवं च सादृश्यप्रमैवोपमितिः। उपमिनोमि इति अनुव्यवसायस्य तत्रैव विद्यमान-त्वात्। कमलेन लोचनमुपमिनोमीत्यनुभवोऽपि तत्रैव भवति। एतादृशी उपमितिः गोस-दृशो गवय इति सादृश्यज्ञानेनैव जायते। तच्च अतिदेशवाक्यानुसन्धानं नापेक्षते। तस्मात् अयं गवय-पदवाच्यः इति ज्ञानमेव उपमितिरिति नैयायिकाभिमतः पक्षो ग्रन्थकाराऽन-भिमत इति सूचितं भवति।
३. 'प्राङ्गणेषु'-इति पाठान्तरम्।
| १८० | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानलक्षणम् |
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सन्निकर्षे सति भवति प्रतीतिः, 'अयं पिण्डो गोसदृश' इति। तदनन्तरं^१ भवति निश्चयः, अनेन सदृशी मदीया गौरिति। तत्रान्वय-व्यतिरेकाभ्यां गवयनिष्ठ-गोसादृश्यज्ञानं करणम्। गोनिष्ठ-गवयसादृश्यज्ञानं फलम्।
अर्थ— अब उपमान प्रमाण का निरूपण किया जाता है। 'सादृश्य प्रमा के करण' को उपमान कहते हैं। वह इस प्रकार है—जिस व्यक्ति ने शहर में गोव्यक्ति को देखा हो, वह अरण्य में जाकर जब 'गवय' को देखता है (चक्षुरिन्द्रिय का गवय के साथ सन्निकर्ष होता है)। उस समय उसे 'यह व्यक्ति, गाय जैसी है' ज्ञान होता है। तदनन्तर उसे 'इस गवय जैसी ही मेरी गाय है' निश्चयात्मक ज्ञान होता है। इन दो ज्ञानों में से अन्वय और व्यतिरेक के बल से गवय में होने वाला जो गोसादृश्यज्ञान (यह गवय, गाय जैसा है) है, वह करण (उपमान) है, और गोनिष्ठ गवय का सादृश्यज्ञान (इसके जैसी ही मेरी गाय है) फल (उपमिति) है।
विवरण— अनुमान का निरूपण करने के अनन्तर उपमान प्रमाण ही निरूपण का विषय होता है। इसीलिए यहाँ उसके निरूपण की प्रतिज्ञा की है। निरूपण का अर्थ है—वस्तु के लक्षण, प्रमाण तथा स्वरूप का कथन करना। उनमें से यहाँ प्रथमतः उपमान का लक्षण कहना है इसलिये ग्रन्थकार ने 'तत्र' शब्द का प्रयोग किया है। 'अनुमान' शब्द के समान ही अव्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्ष्य है और 'उपमीयते अनेन तत् उपमानम्' इस रीति से व्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्षण है। सादृश्य, प्रमा (उपमिति) के करण (असाधारण-कारण) को 'उपमान' प्रमाण कहते हैं। नगर में 'गाय' को देखा हुआ व्यक्ति अरण्य में जाकर कदाचित् उसे 'गवय' पशु दिखाई देने पर 'यह प्राणी गाय जैसा है' इस प्रकार गवय में गाय का सादृश्य ज्ञान होना ही उपमान है (यही उपमान का स्वरूप है)। इसके अनन्तर ही 'मेरी गाय इस पशु जैसी ही है' इस प्रकार होने वाली सादृश्यप्रमा को ही उपमिति कहते हैं। अर्थात् उपमानरूप सादृश्यज्ञान और उपमितिरूप सादृश्यप्रमा के मध्य में अन्य कोई व्यापार विद्यमान नहीं रहता। इसलिये 'असाधारणं कारणं करणम्' इतना ही करण-लक्षण यहाँ स्वीकार किया है। उसे व्यापारघटित मानने की यहाँ आवश्यकता नहीं। यहाँ 'सादृश्यज्ञान' को प्रमाण और प्रमा भी कहा है। दोनों के सादृश्यज्ञान-रूप होने पर भी उनमें भेद है।
प्रमाणरूप सादृश्यज्ञान में 'गो' की 'गवय' को उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गो' उपमान और 'गवय' उपमेय है। और प्रमारूप सादृश्यमान में 'गो' को 'गवय' की उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गवय' उपमान और 'गो' उपमेय है। यही
१. 'रञ्च'—इति पाठान्तरम्।
उपमानलक्षणम् ] उपमानपरिच्छेदः १८१
दोनों में भेद है। इनमें प्रथम सादृश्यज्ञान, द्वितीय सादृश्यज्ञान का जनक ( कारण ) है। और द्वितीय सादृश्यज्ञान, उसका फल ( कार्य ) है। इस प्रकार उनमें जन्य-जनक भाव है। इस सादृश्यज्ञान की उत्पत्ति इन्द्रियादिकों से नहीं होती, अतः उपमान, एक पृथक् प्रमाण सिद्ध होता है।
उपमान को वेदान्ती तथा नैयायिक दोनों के मानने पर भी उसमें जो भेद है, उसे बताना भी अनुचित न होगा।
नैयायिक का अभिमत 'उपमान' प्रमाण—किसी आरण्यक व्यक्ति से 'गवय गोसदृश होता है' सुनकर अरण्य में गये हुए शहरी व्यक्ति का 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर 'यह गोसदृश है' ऐसा गोसादृश्यज्ञान होता है। तदनन्तर आरण्यक व्यक्ति के बताये हुए 'गवय, गोसदृश होता है' वाक्यार्थ का स्मरण होता है। इसके पश्चात् 'अयं गवयपदवाच्य = यह गवय पशु 'गवय' शब्द का वाच्य अर्थ है—यह ज्ञान होना ही उपमिति है। इनके मत में उपमान प्रमाण वस्तुबोधक न होकर शक्ति-ग्राहक है। 'गवय' पद की एक विशिष्ट पशु में शक्ति है' इस प्रकार ज्ञान कराना ही 'उपमान' का प्रयोजन है।
परन्तु वेदान्तियों के मत में 'उपमान' का यह प्रयोजन नहीं है। उनके मत में 'अनेन सदृशी मदीया गौः' इस गवय जैसी ही मेरी गौ है—यह ज्ञान होना ही, उपमान का फल ( उपमिति ) है। अनुभव भी 'इस पशु जैसी मेरी गाय है' ऐसा ही होता है। अतः 'गोसदृशो गवयः' इस अतिदेश-वाक्य के स्मृतिरूप व्यापार की कल्पना कर पश्चात् उससे 'गवय, गवयशब्द का वाच्य है' ज्ञान की कल्पना करना, यह सब अनुभव के विरुद्ध है।
नैयायिक 'यह व्यक्ति गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार उपमिति ज्ञान नहीं मानते किन्तु 'गवय, गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार के ज्ञान को उपमान का फल ( उपमिति ) बताते हैं।
परन्तु जहाँपर गो, गवय, गज, अज आदि सामने स्थित हों, वहाँ पर इनमें से 'गवय पद का वाच्य कौन सा है' इस प्रकार किसी के प्रश्न कर देने पर उसे 'गवय', गवय पद का वाच्य है उत्तर दिया जाय तो हँसी उड़ेगी। वहाँ तो 'यह व्यक्ति गवय पद का वाच्य है' यही उत्तर देना चाहिये, और ऐसा मानने पर उपमान को शक्ति-ग्राहक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि एक गवय की शक्ति को वह दिखा सकेगा किन्तु अन्य गवय में उस शक्ति का ज्ञान कराने में उसका उपयोग नहीं होगा। इसलिये अनुभव के अनुरूप ही उपमिति का स्वीकार करना चाहिये।
शंका— आपके मत में उपमान यदि शक्तिग्राहक नहीं है ( उपमितिरूप प्रमा से यदि गवयादि पदार्थों की शक्ति = वाच्यत्व का ज्ञान नहीं होता ) तो उसका होना ही व्यर्थ है, क्योंकि अनुमान जैसे जगन्मिथ्यात्व को सिद्ध करता है, उस प्रकार उपमान का कोई उपयोग नहीं दिखाई देता।
समाधान— यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि अद्वैतब्रह्मसाक्षात्कार होने तक मुमुक्षु
१८२ वेदान्तपरिभाषा [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
को चित्तशुद्धयर्थ वेदोक्त कर्म के अनुष्ठान की आवश्यकता होती है। कर्मानुष्ठान को यागसम्बन्धी 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' प्रकृतिभूत दर्श-पूर्णमासादि के समान विकृति-भूत सौर्यायागादिकों का अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकृति-विकृतिभाव के ज्ञान की अपेक्षा होती है। और वह ज्ञान, सादृश्यमूलक होने से उपमान प्रमाण के अधीन है, अतः हमारे मत से तो इस ज्ञान को करा देना ही उपमान का उपयोग है।
इस पर आप यदि यह शंका करें कि 'अनेन सदृशी मदीया गौः' आदि ज्ञान, प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से भी हो सकेगा। उसके लिए उपमान को एक स्वतन्त्र रूप से प्रमाण मानने की क्या आवश्यकता है? तो इसका उत्तर ग्रन्थकार स्वयं अग्रिम ग्रन्थ से देते हैं—
न^१ चेदं प्रत्यक्षेण संभवति, गोपिण्डस्य तदेन्द्रियासन्निकर्षात्। ना^२प्यनुमानेन, गवयनिष्ठ-गोसादृश्यस्यातल्लिङ्गत्वात्।
नापि 'मदीया गौरेतद्गवय-सदृशी, एतन्निष्ठ-सादृश्यप्रतियोगित्वाद्, यो यद्गत-सादृश्यप्रतियोगी, स तत्सदृशः, यथा मैत्रनिष्ठसादृश्यप्रतियोगी चैत्रो मैत्रसदृश' इत्यनुमानात्तत्संभव इति वाच्यम्। एवविधानुमानानवतारेऽप्यनेन सदृशी मदीया गौरिति प्रतीतेरनुभवसिद्धत्वात्। उपमिनोमीत्यनुव्यवसायाच्च। तस्मादुपमानं मानान्तरम्।^४
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम् उपमानपरिच्छेदः समाप्तः॥ ३॥
१. उपमानस्य न प्रत्यक्षे नाप्यनुमाने अन्तर्भावो भवति। गवि जायमानमुपमिति-पदवाच्यं गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षेण भवति इति वदन् वादी प्रष्टव्यः—किं गवयज्ञानं प्रत्यक्षेण भवतीति तात्पर्यम्, उत सादृश्यज्ञानम्, आहो गोज्ञानम् आहोस्वित् गोसादृश्यवैशिष्ट्यज्ञानम्? तत्र आद्ये इष्टापत्तिः, अत एव न द्वितीयः, तुरीये उपमानप्रमाणं विना स्मृतायां गवि सादृश्यवैशिष्ट्यग्रहाऽसंभवः, अत एव न तृतीयः, गवांशे इन्द्रियसन्निकर्षाभावेन प्रत्यक्षत्वं न संभवति इति स्मृतिरेव वक्तव्या। तदुक्तं वार्तिके—“नगरस्थस्य तु गोज्ञानं स्मरणान्नातिवर्तते” इति। तथा च न प्रत्यक्षे उपमानस्य अन्तर्भावः।
२. 'कृष्टत्वात्'-इति पाठान्तरम्।
३. अनुमानेऽपि उपमानस्य नान्तर्भावः। यतो हि 'मदीया गौः गवयसदृशी एतन्निष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वात्' इत्यनुमानं तस्यैव पुरुषस्य भवेत्, यो हि युगपत् द्वौ पदार्थौ मिथः सदृशौ पश्यति। यस्य तु युगपत् तादृशं दर्शनं नास्ति, तस्य सम्बन्धग्रहणाऽभावात् न उक्तानुमानं भवितुमर्हति।
४. उपमानं प्रमाणान्तरमेव प्रत्यक्षानुमानयोरनन्तर्भूतत्वात्। तस्य च संज्ञा-
उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम् ] उपमानपरिच्छेदः १८३
अर्थ—'यह गवयनिष्ठ सादृश्यज्ञान, प्रत्यक्ष से भी हो सकता है' यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि उस समय 'गो' व्यक्ति से इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं रहता। 'अनुमान'-प्रमाण से उसका ( सादृश्य का ) ज्ञान होता है, यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि 'गवय' में रहने वाला 'गो' का सादृश्य, 'गो' में रहने वाले 'गवय' के सादृश्य का लिङ्ग ( साधक हेतु ) बन नहीं सकता।
इस पर '( १ ) मेरी गाय इस गवय जैसी है। ( २ ) क्योंकि उसमें एतद्गवयनिष्ठ सादृश्य का प्रतियोगित्व है। ( ३ ) जो जिसमें रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी होता है वह उसके जैसा होता है।'¹
उदाहरण—'चैत्र, मैत्र में रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी है, इसलिये वह मैत्र जैसा है' ऐसे अनुमान से 'गवयनिष्ठ सादृश्य का ज्ञान हो सकेगा' यह शंका करना भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा अनुमान न करने पर भी 'इस गवय जैसी मेरी गाय है' यह ज्ञान होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है और इस ज्ञान के अनन्तर 'मैं इस बात को उपमान-प्रमाण से जानता हूँ' यही अनुव्यवसाय होता है। इसलिये 'उपमान' स्वतन्त्र प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।
**विवरण—**सांख्य²-दर्शनकार 'प्रत्यक्ष' में ही उपमान-प्रमाण का अन्तर्भाव करते हैं। उनका कहना है कि 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर उसमें जो 'गोसादृश्य' का ज्ञान होता है और वह जैसे प्रत्यक्षात्मक ही रहता है, उसी प्रकार 'गो' का स्मरण होने के बाद 'गो' में जो गवयसादृश्य का ज्ञान ( जिसे आप उपमिति कहते हैं ) होता है वह भी प्रत्यक्ष रूप ही है, यह मानना चाहिये। क्योंकि गवय में भासित होने वाला सादृश्य, गो में भासित होने वाले सादृश्य से भिन्न नहीं है। जो सादृश्य गवयनिष्ठ है वही गोनिष्ठ है। क्योंकि किसी एक जाति का, अन्य जाति में रहने वाला जो भूयोऽवयवसामान्ययोग ( बहुत से अवयवों का साम्य ) रूप सम्बन्ध को सादृश्य कहते हैं। और ऐसे सादृश्य का गवय में जिस प्रकार प्रत्यक्षात्मक ज्ञान होता है उसी
संज्ञिसम्बन्धसिद्धिः न प्रयोजनम्। अपि तु सादृश्यज्ञानमेव फलम् तस्य च प्रतिनिध्यादिनिर्णयः वार्तिकोक्तं फलमित्यवगन्तव्यम्।
१. 'मदीया गौः एतद्गवयसदृशी एतद्गवयनिष्ठसादृश्यप्रतियोगितावत्त्वात्।'
२. सांख्याः उपमानं न प्रमाणान्तरं प्रमेयाभात्। यतः असन्निहिते गवि यद् गवयसादृश्यं, तत् न तस्य प्रमेयं, तस्य तु प्रत्यक्षविषयत्वात्। गवयनिष्ठसादृश्यस्य प्रत्यक्षत्वे गवि अपि तस्य प्रत्यक्षत्वौचित्यात्, गुणकर्मवयवसामान्ययोगरूपस्य तस्य एकरूपत्वात्। तथा चोक्तं तत्त्वकौमुद्याम्—"भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते। सामान्ययोगश्चैकः। स चेत् गवये प्रत्यक्षः गवि अपि तथेति नोपमानस्य प्रमेयान्तरमस्तीति वर्णयन्ति।
१८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
प्रकार गो में भी उसका प्रत्यक्ष होना ही उचित है। इसलिये सादृश्य, प्रमाणान्तर नहीं है, उसका प्रत्यक्ष में ही अन्तर्भाव होता है।
परन्तु सांख्य का यह अभ्युपगम ठीक नहीं है, क्योंकि आपके कथनानुसार यद्यपि सादृश्य सर्वत्र एक सा ही है तथापि उसके धर्मी और प्रतियोगी सर्वत्र भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिये तत्तद्-विशेष-व्यक्ति पर रहने वाला सादृश्य भिन्न होता है, यह मानना ही पड़ेगा। सादृश्य जिसमें प्रतीत होता है, वह उस सादृश्य का धर्मी होता है, उसी को सादृश्य का अनुयोगी भी कहते हैं और जिसका सादृश्य भासित होता है उसे प्रतियोगी कहते हैं। ‘गोसदृशो गवय:’ इस ज्ञान में—गवय में, गो का सादृश्य भासित होता है, इसलिये इस सादृश्य का ‘गवय’ धर्मी या अनुयोगी और ‘गो’ प्रतियोगी है, यह कहना चाहिये। परन्तु यह धर्मि-प्रतियोगिभाव ‘गवय-सदृशी गो:’ गवय जैसी मेरी गाय है, इस ज्ञान में नहीं रहता। यहाँ पर ‘गो’ धर्मी और गवय प्रतियोगी होता है। इसलिए गोगत और गवयगत सादृश्य को एकरूप (समान) ही मान लेने पर जिस व्यक्ति को ‘गोसदृशो गवय:’ इस प्रकार गवयनिष्ठ गोसादृश्य का ज्ञान हुआ है उस व्यक्ति को ‘गोगतगवयसादृश्यं पश्यामि’ ‘मैं गोनिष्ठ गवयसादृश्य को देखता हूँ’ ऐसा अनुव्यवसाय होना चाहिये, परन्तु होता नहीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में ‘सादृश्य’ पृथक्-पृथक् ही रहता है, यह अवश्य ही स्वीकार करना होगा। इसीलिए गवय-प्रत्यक्ष होने के कारण उसके साथ चक्षु का सन्निकर्ष होता है अतः ‘तद्गत-सादृश्य’ प्रत्यक्ष भासित होता है। परन्तु गोव्यक्ति, वहाँ पर उस समय समीप नहीं होने से उसके साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं रहता। इसलिये गोनिष्ठ-सादृश्य, प्रत्यक्ष का विषय हो नहीं सकता। तस्मात् ‘सादृश्य का प्रत्यक्ष में अन्तर्भाव होता है’ यह सांख्यमत, युक्ति तथा अनुभव के विरुद्ध होने से सर्वथा उपेक्षणीय है।
इस पर कदाचित् वैशेषिक कहे कि—प्रत्यक्ष में उपमान का अन्तर्भाव न होने पर भी अनुमान में उसका अन्तर्भाव हो सकेगा। इसका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—उपमान प्रमाण का ‘अनुमान’ में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता। क्योंकि ‘गो’ के साथ गवय के सादृश्य का ज्ञान, अनुमान-प्रमाण से होना सम्भव नहीं। ‘अनुमान से गवय-सादृश्य का ज्ञान होता है’ स्वीकार करनेवाले वैशेषिकों को यहाँ इस प्रकार अनुमान¹ करना चाहिए—(१) मेरी गौ, इस गवय से निरूपित (गवयप्रतियोगिक) सादृश्य से युक्त है। (२) क्योंकि वह गोनिरूपित (गोप्रतियोगिक अर्थात् ‘गो’ जिसका प्रतियोगी है अर्थात् ‘गवय’ जिसका अनुयोगी है) सादृश्य से युक्त है। (३) इस गवय के समान।
१. ‘मदीया गौ: एतद्गवयनिरूपितसादृश्यवती गोप्रतियोगिकगवयानुयोगिकसादृश्यविशिष्टत्वात्, एतद्गवयवत्।’