वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 233, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंअनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः ] अनुमानपरिच्छेदः १७५
इस पर आप यदि पूछें कि रूपरहित ब्रह्म, चाक्षुष ज्ञान का विषय कैसे होता है ? तो उसका उत्तर यह होगा कि रूपरहित रूप में प्रत्यक्षविषयता जैसी आपने मानी है। वैसी ही रूपरहित ब्रह्म में चाक्षुषज्ञान-विषयता के होने में कोई विरोध नहीं है।
परन्तु नीरूप-रूप, गुण है, और नीरूप-द्रव्य में चाक्षुष प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती—ऐसा हमारा विशेष नियम है, तो यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' द्रव्य नहीं है। कारण यह है कि 'गुणाश्रयत्व या समवायि-कारणत्व को ही तार्किकों ने 'द्रव्य' माना है।' परन्तु निर्गुण-ब्रह्म में गुणाश्रयत्व का सम्भव नहीं। समवायिकारणत्व रूप लक्षण का ब्रह्म में सम्भव नहीं। क्योंकि 'समवाय' नामक कोई पदार्थ ही नहीं है। अथवा 'तुष्यतु दुर्जनन्याय' से 'ब्रह्म' को द्रव्य मान लेने पर भी जैसे रूपरहित काल का प्रत्यक्ष होता है वैसे ही 'ब्रह्म' का भी यदि चाक्षुष-प्रत्यक्ष हो तो इसमें किसी प्रकार का विरोध नहीं है।
विवरण—"ब्रह्म से भिन्न समस्त प्रपंच मिथ्या" यह अनुमान ऊपर किया गया है। परन्तु ब्रह्म से भिन्न घट-पटादि समस्त पदार्थ, 'असत्' न होकर, 'सत्' हैं। यह अनुभव प्रत्यक्ष है और इस प्रत्यक्ष ज्ञान से अनुमान का बाध हो जाता है।
परन्तु ऐसा समझना अनुचित है, क्योंकि 'सन् घटः' इत्यादि प्रत्यक्षज्ञान में 'सन्' और 'घट' ये दो विषय हैं। उनमें 'सन्' इस ज्ञान का विषय 'सत् ब्रह्म' है और 'घट' इस ज्ञान का विषय, 'सद्भिन्न असत् घट' है। इसलिए 'सन् घटः' इस प्रत्यक्षज्ञान का विषय, अधिष्ठान 'ब्रह्मसत्ता' होने से, उससे भिन्न की (घटादि असत् पदार्थों की) सत्यता सिद्ध नहीं होती।
शंका—रूपरहित ब्रह्म का चाक्षुष-प्रत्यक्ष नहीं हो सकता, तब 'सन् घटः' इस प्रत्यक्ष का विषय 'सत् ब्रह्म' है, कैसे कह सकते हैं ?
समाधान—'नीरूप पदार्थ का प्रत्यक्ष नहीं होता' आपका यह नियम, अव्यभिचारी नहीं है, किन्तु व्यभिचारी है। क्योंकि रूप स रहित रूपादिकों का प्रत्यक्ष होता है। अतः नीरूप-पदार्थ का प्रत्यक्ष-ज्ञान नहीं होता, यह नियम व्यभिचरित है।
इस पर आप यह कहें कि 'रूपरहित रूपादि गुणों का प्रत्यक्ष नहीं होता' ऐसा नियम हमारा नहीं है, किन्तु 'रूपरहित द्रव्य में चाक्षुष-प्रत्यक्ष होने की योग्यता नहीं होती' यह नियम है।
तों यह भी ठीक नहीं, क्योंकि हमारे मत में 'ब्रह्म' की द्रव्य में गणना नहीं है। अतः द्रव्य के विषय में आपका विशेष नियम होने पर भी हमारी कोई हानि नहीं है।
शंका—'ब्रह्म' में द्रव्यत्व नहीं है, यह आप कैसे कहते हैं ?
समाधान—तार्किकों ने द्रव्य के दो लक्षण दिये हैं, उन दोनों की ब्रह्म में सम्भावना न हो सकने से उसमें द्रव्यत्व नहीं है। आपके यहाँ 'गुणाश्रयत्वं द्रव्यत्वम्'-गुण के