भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 232, कुल 482 में से

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१७४ | वेदान्तपरिभाषा | [ अनुमानस्य प्रत्यक्षाऽविरोधः

प्रमाण, भ्रम और प्रमा दोनों के लिए साधारण होने से 'चन्द्र प्रादेशमात्र है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का शास्त्र से जैसा बाध होता है वैसे समवाय से प्रत्यक्ष का कहीं बाध तो नहीं होता, इस प्रकार के सन्देह मात्र से ही समवाय का प्रत्यक्ष, बाधित समझा जाता है । इसलिए तन्तु और पट के समवाय के प्रत्यक्ष का बाघ रूप दोष नहीं होता । इस विषय में चित्सुखाचार्य की सम्मति ऊपर निर्दिष्ट कर ही चुके हैं । इसी प्रकार अन्यान्य अनुमानों में भी बताया जा सकता है । 'रूप, रूपी पदार्थ में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है । क्योंकि उस पर गुणत्व है । स्पर्श के समान । क्रिया आदि में भी ऐसी ही अनुमानों की कल्पना कर लेनी चाहिए ।

किन्तु आपका यह मिथ्यात्वानुमान 'सन् घट:' इत्यादि प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है । यह शङ्का और उसका समाधान ग्रन्थकार स्वयं करते हैं--

न च घटादेर्मिथ्यात्वे सन् घट इति प्रत्यक्षेण¹ बाधः । अधिष्ठानब्रह्मसत्तायास्तत्र विषयतया घटादेः सत्यत्वासिद्धेः । न च नीरूपस्य ब्रह्मणः कथं चाक्षुषादिज्ञान-विषयतेति वाच्यम् । नीरूपस्यापि रूपादेः प्रत्यक्षविषयत्वात् । न च नीरूपस्य द्रव्यस्य चक्षुराद्ययोग्यत्वमिति नियमः । ²मन्मते ब्रह्मणो द्रव्यत्वासिद्धेः । गुणाश्रयत्वं समवायिकारणत्वं वा द्रव्यत्वमिति तेऽभिमतम् । न हि निर्गुणस्य ब्रह्मणो गुणाश्रयता । नापि समवायिकारणता, समवायासिद्धेः । अस्तु वा द्रव्यत्वं ब्रह्मणः, तथाऽपि नीरूपस्य कालस्येव चाक्षुषादि-ज्ञान-विषयत्वेऽपि न विरोधः ।

अर्थ— घटादि ब्रह्माभिन्न पदार्थों में, ब्रह्मभिन्नत्व होने से ही मिथ्यात्व है, इस प्रकार अनुमान करने पर 'सन् घट:'--विद्यमान-घट,-इस प्रत्यक्ष ज्ञान से उसका बाध होता है, यह कहना ठीक नहीं प्रतीत होता है । क्योंकि यह 'विद्यमान घट' इस ज्ञान में अधिष्ठानरूप ब्रह्मसत्ता विषय है, इस कारण उस सत्ता से पृथक् स्थित घटादि पदार्थों के सत्यत्व की सिद्धि नहीं होती ।


१. 'क्षविरोध:'-इति पाठान्तरम् ।
२. मन्मते अद्वैतवेदान्तिमते । तथा च द्रव्यप्रत्यक्षे चक्षुषो रूपापेक्षा, न तु अन्यप्रत्यक्षे । ब्रह्म तु न द्रव्यम् । तथा चोक्तं विवरणे "ब्रह्म तु न द्रव्यं प्रमाणाभावात् । समवायिकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, आरम्भवादानभ्युपगमात् । उपादानकारणत्वाद् द्रव्यमिति चेत्, न, गुणादीनामपि ग्रहणधर्मत्वादि-धर्मोपादानत्वात्" इति । तस्मात् तस्य प्रत्यक्षत्वं युक्तमितिभावः ।