वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमिथ्यात्वानुमानम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७३
विवरण—यहाँ '(१) यह पट, इस तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। (३) अन्य पटों के समान। इस अनुमान में 'अयं पटः' इस शब्द से वह पूरा (सम्पूर्ण) पट विवक्षित है। उसका उसी पट में विद्यमान किसी एक तन्तु में अत्यन्ताभाव है। इस कारण वह पट एक तन्तु में विद्यमान अपने अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी होता है। यहाँ पर एक तन्तु के अवच्छेद से रहने वाला पट का जो अत्यन्ताभाव, वह 'तादात्म्य' सम्बन्ध से रहता है, यह समझना चाहिये। जिससे पहले की तरह अर्थान्तरता नहीं हो पायेगी। यथा— एक तन्तु पर संयोग सम्बन्ध से जैसे पट रहता है वैसे ही उस पट का अत्यन्ताभाव भी रहता है। अतः प्रतियोगी और उसके अभाव का सामानाधिकरण्य ही अर्थान्तर है। और इस अनुमान से उसी की सिद्धि होती है। मिथ्यात्व की सिद्धि नहीं हो पाती। परन्तु 'तादात्म्य संबन्ध से वृत्ति' विशेषण देने पर, अर्थान्तर की सिद्धि नहीं होगी। क्योंकि तादात्म्य सम्बन्ध से ही अभाव लेना अभीष्ट होने से संयोग सम्बन्ध से अभाव का ग्रहण ही नहीं किया जा सकेगा।
इसी तरह एक और 'व्यधिकरण-धर्मानवच्छिन्न-प्रतियोगिताकत्व' विशेषण, अत्यन्ताभाव में जोड़ देना चाहिए। (व्यधिकरण धर्मावच्छिन्न अभाव का ग्रहण करने पर अर्थान्तर नहीं होता)। तथा हि—तन्तु पर तादात्म्य-सम्बन्ध से तथा पटत्व धर्म से पट का अत्यन्ताभाव न रहने पर भी 'घटत्व' धर्म से वह रहता है, क्योंकि 'घटत्वेन पटो नास्ति' इस तन्तु पर घटत्वरूप से पट नहीं है, प्रतीति होती है। ऐसे अभाव को ही व्यधिकरण-धर्मावच्छिन्न-प्रतियोगिताक अभाव कहते हैं। अर्थात् 'घटत्वेन पाटो नास्ति' इस अभाव की पट में रहने वाली जो प्रतियोगिता, वह पट के व्यधिकरण (पट पर न रहने वाले घटत्व) धर्म से, अवच्छिन्न (युक्त) है। ऐसे अभाव का ग्रहण कर मिथ्यात्व-साधक पूर्वोक्त अनुमान से तन्तु पर घटत्वेन पट का अभाव रूप अर्थान्तर की ही सिद्धि होती है। इस दोष के निवारणार्थ 'व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न नहीं है' इतना विशेषण लगाकर अत्यन्ताभाव का ग्रहण करना चाहिए। जिससे व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न अभाव को लेकर अर्थान्तरसिद्धि रूप दोष, उपर्युक्त अनुमान पर नहीं आता। क्योंकि अब उस अभाव का ग्रहण ही नहीं हो सकेगा।
अब 'पटः' शब्द से जिस किसी भी पट को पक्ष न बनाकर 'अयं पटः' इसे पक्ष बनाया है। कारण यह है कि जिस किसी पट को पक्ष बनाकर 'एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्व' को साध्य किया जाय तो वही अर्थान्तर दोष पुनः प्राप्त होता है। क्योंकि अन्य कोई भी पट, एतत्तन्तुनिष्ठ नहीं होता। इसलिये 'अयं पटः' इतना पक्ष कोटि में रखना पड़ा। इसी प्रकार इसी दोष के निवारणार्थ 'एतत्कालिनत्व' विशेषण भी देना चाहिये। इस पर कदाचित् आप यह कहें कि 'इस तन्तु में पट का समवाय है' इस प्रत्यक्ष अनुभव का बाध होगा। परन्तु यह भी उचित नहीं। क्योंकि प्रत्यक्ष