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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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१७२ | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वानुमानम्

धिकरणरूप अर्थान्तर की सिद्धि हो जाती है। इस अर्थान्तर के निवारणार्थ लक्षण में ‘यावत्’ पद का निवेश अवश्य करना चाहिये। जिससे, स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना भी शाखादि पदार्थ है उसमें कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव नहीं है। इस कारण अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी, कपिसंयोग नहीं बन पाता। इसलिये ‘अर्थान्तरसिद्धि’ रूप दोष नहीं है। हमारे मत में ‘तस्माद्वा एतस्मादात्मन आकाशः संभूतः’ पूर्वोक्त सत्य-ज्ञानानन्त-लक्षण ब्रह्माख्य आत्मा में आकाश उत्पन्न हुआ। ऐसी श्रुति होने से तार्किकों के द्वारा नित्य माने गये आकाशादि में भी जन्यत्व ज्ञात होता है। जन्य होने से वे कार्य हैं। कोई भी कार्य, अपने कारण के आश्रित रहता है। इस कारण आकाशादि सभी कार्य, ब्रह्मरूप आश्रय में स्थित है। इसलिये पूर्वोक्त लक्षण पर अव्याप्ति दोष नहीं आ पाता। यह लक्षण, प्राचीन विद्वानों को भी सम्मत है। इस विषय में ‘सर्वेषामेव’ इत्यादि चित्सुखाचार्य की कारिका उद्धृत की गई है।

इस प्रकार प्राचीन वेदान्तियों के द्वारा किये गये जगन्मिथ्यात्व-साधक अनुमान का उपपादन कर, नवीन वेदान्तियों का मिथ्यात्व के अनुमान का प्रकार बताते हैं—

¹यद्वा-अयं पटः एतत्तन्तुनिष्ठात्यन्ताभाव-प्रतियोगी पटत्वात् पटान्तरवदित्या²द्यनुमानं मिथ्यात्वे प्रमाणम् । तदुक्तम्— ³अंशिनः स्वांशगात्यन्ताभावस्य प्रतियोगिनः । अंशित्वादितरांशिव दिगेषैव गुणादिषु ॥ इति । चि० ८ ।

**अर्थ—**अथवा ( १ ) यह पट, एतत्तन्तुनिष्ठ अत्यन्ताभाव का प्रतियोगी है। (२) क्योंकि उसमें पटत्व है। ( ३ ) अन्य पट के समान। यह अनुमान, मिथ्यात्व में प्रमाण है। इस विषय में चित्सुखाचार्य ने इस प्रकार कहा है—( १ ) अवयवी पदार्थ में, उसके अवयव में विद्यमान जो अत्यन्ताभाव, उसकी प्रतियोगिता होती है। ( २ ) क्योंकि उसमें अवयवित्व है। ( ३ ) अन्य अवयवी के समान। गुणादिकों के मिथ्यात्व का अनुमान करने का यही मार्ग है।


१. प्राचीनोक्तमनुमानप्रयोगमुपपाद्य नवीनोक्तमनुमानप्रयोगमाह—यद्वेति ।
२. ‘त्यनुमा०’—इति पाठान्तरम् ।
३. चित्सुखाचार्योक्तेन श्लोकेन अनुमानप्रयोगं दर्शयति—अंशिन इति । अंशिनः अवयविनः । स्वांशगात्यन्ताभावस्य स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावस्य । ‘स्वपदं पक्षीभूत-पटविशेषपरम् । अनेन अवयविविशेषस्य पक्षत्वं—स्वोपादाननिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वस्य च साध्यत्वं दर्शितम् । अंशित्वात् इति हेतुः । कार्यत्वेन सम्मतत्वादित्यर्थः । इतरांशिव इतरांशिन इवेत्यर्थः । यथा इतरांशिनमंशित्वात् एतदवयवनिष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वं, तद्वत् एतदंशिनोऽपि अंशित्वात् एतदवयव-निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वसिद्धौ मिथ्यात्वसिद्धिः ।