वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंमिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७१
आगम, ब्रह्म भिन्न वस्तु का निषेध करते हैं। इस कारण समस्त द्वैत, मिथ्या है, यह सिद्ध होता है। इस प्रकार हमने यहाँ पर घटादि पदार्थों के मिथ्यात्व का केवल दिग्दर्शन करा दिया है।
अब मूल ग्रन्थ को विवृत करते हैं—
स्वाश्रयत्व से अभिमत जितना पदार्थ हो उसमें स्थित जो ‘स्व’ का (आश्रित का) अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व ही मिथ्यात्व है। भाव रूप से स्वीकार किये हुए घटादि पदार्थों के आश्रय रूप से (अधिकरण) अभिमत कपालादि उपादान-कारणभूत पदार्थ में विद्यमान, वास्तविक रूप से (वस्तुतः) घट का जो अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व (घट का वस्तुतः वहाँ न रहना) ही मिथ्यात्व है। इसी का प्रकृत विषय से सम्बन्धित दूसरा उदाहरण—उपर्युक्त लक्षण में ‘स्व’ शब्द से समस्त प्रपञ्च की विवक्षा है। उसके आश्रय रूप से ब्रह्म है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत ब्रह्म में स्थित समस्त-प्रपंच का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व समत-प्रपंच में है। अर्थात् ब्रह्म में प्रपञ्च का लेश तक नहीं है, यही प्रपंच का मिथ्यात्व है।
**शंका—**इस मिथ्यात्व के लक्षण में ‘अभिमत’ पद का क्यों निवेश किया है ? ‘स्वाश्रययावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्’ इतना ही मिथ्यात्व का लक्षण किया जाय।
**समाधान—**ऐसी शंका करना ठीक नहीं। क्योंकि सभी स्वाश्रयों में स्वात्यन्ताभाव का असंभव (स्वयं के ही अत्यन्ताभाव का जो असम्भव, उसका निवारण करने के लिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद की आवश्यकता है। अन्यथा ‘जितना भी स्वाश्रय’ शब्द से शुक्त्यादि भी गृहीत हो सकते हैं, उनमें रहने वाला जो अत्यन्ताभाव शुक्त्यादिकों का ही अत्यन्ताभाव लेना होगा, परन्तु यह तो असम्भव ही है। इसलिये लक्षण, असम्भव दोष से दूषित होता है, उसके निवारणार्थ ‘अभिमत’ पद का निवेश, लक्षण में किया गया है। वस्तुतः शुक्त्यादि, रजतादिकों का आश्रय नहीं है, तथापि ‘इदं रजतम्’ यह भ्रम होने पर शुक्ति को उसका आश्रय मानना पड़ता है। इस प्रकार स्वाश्रयत्व से अभिमत शुक्ति आदि पदार्थों में जो रजतादिकों का अत्यन्ताभाव उसका प्रतियोगित्व, शुक्तिरूप्यादिकों में है, इसलिये लक्षण में ‘अभिमत’ पद का निवेश करना उचित ही है।
**शंका—**यदि ‘अभिमत’ पद के निवेश करने से ही मिथ्यात्व लक्षण का निर्वाह हो जाता है तो पुनः ‘यावत्’ पद के निवेश की क्या आवश्यकता ?
**समाधान—**लक्षण में ‘अभिमत’ पद के निवेश करने पर भी जब तक ‘यावत्’ पद का निवेश न किया जाय, तब तक लक्षण निर्दुष्ट नहीं हो पाता। लक्षण में ‘यावत्’ पद के निवेश न करने पर कपि-संयोग के आश्रय रूप से अभिमत जो वृक्ष है, उस पर मूलावच्छेद से (मूल प्रदेश में विद्यमान) विद्यमान जो कपि-संयोग का अत्यन्ताभाव, उसका प्रतियोगित्व शाखावच्छेद से विद्यमान कपिसंयोग में है। इस कारण सामाना-