वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१७० | वेदान्तपरिभाषा | [ मिथ्यात्वलक्षणम्
भाव-प्रतियोगित्वम्। अभिमतपदं¹ वस्तुतः स्वाश्रयाप्रसिद्ध्या असंभव-वारणाय। यावत्पदमर्थान्तर-वारणाय। तदुक्तम्— ²सर्वेषामेव भावानां स्वाश्रयत्वेन सम्मते। प्रतियोगित्वमत्यन्ताभावं प्रति मृषात्मता ॥ इति। चि० ७।
**अर्थ—**मिथ्यात्व से यह विवक्षित है कि स्वाश्रय से अभिमत जितनी वस्तु हो, तन्निष्ठ (उसमें रहनेवाला) अत्यन्ताभाव का प्रतियोगित्व। इस मिथ्यात्व के लक्षण में 'अभिमत' पद, वस्तुतः स्व-श्रय की अप्रसिद्धि होने से उस पर आनेवाले असंभव दोष की निवृत्ति करने के लिये है और 'यावत्' पद, अर्थान्तर का निवारण करने के लिये है। इस विषय में चित्सुखी में इस प्रकार कहा है—'स्वाश्रय से सम्मत पदार्थ में स्थित अत्यन्ताभाव का सब पदार्थों में प्रतियोगित्व रहता है, यही सब पदार्थों का मिथ्यात्व है।
**विवरण—**घटादि किसी कार्य की समवाय से स्थिति, कपालादि अपने कारण-प्रदेश के अतिरिक्त प्रदेश में नहीं हुआ करती। अर्थात् कपाल, तन्तु आदि कारण, जिस स्थान में होते हैं उससे भिन्न स्थान में घट, पट आदि कार्य हुआ करते हैं ऐसा कोई नहीं मानता, और वे कार्य, कपालादि कारणों में भी नहीं रहते, यह प्रमाणसिद्ध है। परन्तु उसके विपरीत प्रत्यक्ष दिखाई देते हैं। इसलिये सब कार्य मिथ्या हैं। इस विषय में "यदसद्भासमानं तन्मिथ्या स्वप्नगजादिवत्।" जो वास्तव में न होकर भी भासता हो वह मिथ्या है। जैसे स्वप्नगजादि—यह सांप्रदायिकों का अभ्युपगम है। ब्रह्मभिन्न समस्त पदार्थों का मिथ्यात्व बतानेवाले अनुमान-प्रमाण का उपन्यास ऊपर हम कर ही चुके हैं। 'परन्तु उस अनुमान का प्रत्यक्ष प्रमाण से बाध होता है, क्योंकि सृष्टि में सभी पदार्थ प्रत्यक्ष प्रतीत होते हैं। इसलिये पूर्वोक्त अनुमान से उनका मिथ्यात्व सिद्ध नहीं हो सकता' परन्तु यह आक्षेप उचित नहीं है। क्योंकि चन्द्रबिम्ब, एक प्रादेशमात्र हमें प्रत्यक्ष दीखता है। परन्तु शब्द-प्रमाण से उस प्रत्यक्ष-प्रत्यय का बाध हो जाता है। इससे जो प्रत्यक्ष दिखाई दे वह सत्य ही है—यह नियम नहीं। 'नेह नानास्ति किञ्चन' इस ब्रह्म में नानात्व (द्वैत) का लेश तक नहीं है। इत्यादि अर्थ के आगम, ब्रह्म
१. दमसंभव०'—इति पाठान्तरम्। २. सर्वेषामपि भावानामाश्रयत्वेन सम्मते अत्यन्ताभावं प्रति यत् प्रतियोगित्वम्, तदेव तेषां मृषात्मत्वं मिथ्यात्वमितियावत्। भावानां सताम्। सत्त्वञ्च कालसंबन्धित्वम्, तेन अभावस्यापि परिग्रहः स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन, 'स्वपदं मिथ्यात्वेन अभिमतपरम्। सम्मते प्रतीते, न तु प्रमिते। तेन च बाधः परिहृतः। सप्तम्यर्थो निष्ठात्वम्। तथा च सर्वेषां घटपटादीनां भावानां सतां स्वाश्रयत्वेन स्वोपादानत्वेन सम्मताः प्रतीता ये तन्त्वादयः तन्निष्ठः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वमेव तेषां मिथ्यात्वमिति श्लोकार्थः।