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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 227, कुल 482 में से

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पृष्ठ 227

मिथ्यात्वलक्षणम् ] अनुमानपरिच्छेदः १६९

सर्व' पक्ष है। इसमें 'सर्व' शब्द का प्रयोग, शुक्तिरूप्यादि उदाहरण में सिद्धसाधन दोष के निवारणार्थ किया गया है। और ब्रह्म में बाध-प्रसंग के निवारणार्थ 'ब्रह्मभिन्न' कहा गया है। रज्जुसर्पादि उदाहरणों में मिथ्यात्वरूप साध्य की सिद्धि होने पर भी सिद्धसाधन दोष नहीं आ पाता। क्योंकि अन्यान्यवादियों ने भी 'वाक् और मन दोनों अनित्य हैं', इस प्रतिज्ञा में अंशतः 'सिद्धसाधन-दोष' का स्वीकार किया है।

शंका—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व में कोई प्रमाण न होने से शुक्तिरूप्य का दृष्टान्त असिद्ध है। उसके मिथ्यात्व में अनुमान प्रमाण कहें तो अनवस्था दोष होगा।

समाधान—शुक्तिरूप्य के मिथ्यात्व का प्रतिपादन हमने प्रथम परिच्छेद में किया है। इसलिये दृष्टान्त 'असिद्ध' नहीं है।

शंका—यह अनुमान, अप्रयोजक है अर्थात् सर्व, ब्रह्मभिन्न रहे, परन्तु मिथ्या नहीं। इससे अन्यान्य पदार्थों में सत्यत्व होने पर भी ब्रह्मभिन्नत्व हो सकता है।

समाधान—यह शंका ठीक नहीं। क्योंकि शुक्तिरजतादि के मिथ्यात्व में कारण, अविद्या' से अतिरिक्त दोषजन्यत्व न होकर लाघव से 'ब्रह्मभिन्नत्व' ही है। ऐसा लाघव-रूप अनुकूल तर्क होने से अनुमान, मिथ्यात्व साधन में अप्रयोजक नहीं है।

शंका—शुक्तिरूप्यादि प्रातिभासिक पदार्थों में जो प्रत्यक्षसिद्ध मिथ्यात्व है, उसका क्या लक्ष्य है ? जिस मिथ्यात्व को आप समस्त प्रपंच में अनुमान से साधन करना चाह रहे हैं।

इस शंका का समाधान—

'मिथ्यात्वं (२) च स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत यावन्निष्ठात्यन्ता-


१. चित्सुखाचार्योक्तिमनुस्मरन् साध्यं मिथ्यात्वं निर्वक्ति—'स्वाश्रयत्वेनाऽभिमत-यावन्निष्ठात्यन्ताभावप्रतियोगित्वम्, स्वस्य आश्रयत्वेन अभिमताः यावन्तः तेषु निष्ठः यः अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वम्, । अत्र 'स्व' पदं, यस्य मिथ्यात्वं साधनीयं तत्परम्। अभिमतपदं प्रमितिव्यावृत्ति-प्रतीति विशेष्यपरम्। यावत् पदमशेषपरम्। तथा च-स्वाश्रयत्वेन स्वप्रकारक-प्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमते प्रतीते यावति सकले निष्ठः स्थितः विद्यमानः यः स्वात्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं स्वस्य मिथ्यात्वमित्यर्थः। यथा 'इदं रजतम्' इत्यत्र स्वं शुक्तिरूप्यं तदाश्रयत्वेन तत्प्रकारकप्रतीतिविशेष्यत्वेन अभिमतं प्रतीत यद् यद् इदमात्मकं पुरोवर्तिद्रव्यं, तस्मिन् यावति समस्ते पुरोवर्तिनि द्रव्ये निष्ठः स्थितः यः स्वस्य शुक्तिरूप्यस्य अत्यन्ताभावः तत्प्रतियोगित्वं शुक्तिरूप्यस्य इति मिथ्याभूते प्रातिभासिके लक्षण-समन्वयः। एवं स्वप्रकारकप्रतीतिविशेष्ये स्वाधिष्ठान-चैतन्ये सर्वस्यापि व्यावहारिकाभावस्य विद्यमानत्वात् तत्प्रतियोगित्वं सर्वस्यैव व्यावहारिकस्येति व्यावहारिकऽपि लक्षणसमन्वयः।