वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१६८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रकृते अनुमानोपयोगः
उपनय और निगमन रूप अधिक अवयवों के मानने की आवश्यकता नहीं है, और उनका स्वीकार करने पर प्रतिज्ञा और हेतुरूप अवयवों की आवश्यकता नहीं होती । अनुमिति ज्ञान के उपयुक्त ज्ञान को पैदा करना ही सब अवयवों का कार्य है ।
इस प्रकार अनुमान का निरूपण कर उसका प्रकृत प्रसंग में उपयोग बताते हैं—
एवमनुमाने निरूपिते $^१$तस्माद् ब्रह्मभिन्न-निखिल-प्रपञ्चस्य मिथ्यात्वसिद्धिः । तथा हि—ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या, ब्रह्मभिन्नत्वात्, यदेवं तदेवं यथा शुक्तिरूप्यम् । न च दृष्टान्ताऽसिद्धिः, तस्यसाधितत्वात् । न $^२$चाप्रयोजकत्वं, शुक्तिरू$^३$प्यरज्जुसर्पादीनां मिथ्यात्वे ब्रह्मभिन्नत्वस्यैव लाघवेन प्रयोजकत्वात् ।
**अर्थ—**इस रीति से अनुमान का निरूपण कर चुकने पर अब उसी अनुमान के द्वारा ब्रह्म-भिन्न समस्त प्रपञ्च की मिथ्यात्व-सिद्धि हो जाती है । तथाहि—ब्रह्मभिन्न ( ब्रह्म से भिन्न ) सर्व ( समस्त पदार्थजात ) मिथ्या ( असत्य ) है । क्योंकि वह सब ब्रह्मभिन्न है । जो ब्रह्मभिन्न रहता है वह मिथ्या होता है, जैसे शुक्तिरूप्य । 'इस अनुमान में तीसरे दृष्टान्त रूप अवयव की सिद्धि नहीं होती' । ऐसी शंका नहीं करनी चाहिये । क्योंकि शुक्तिरूप्य का मिथ्यात्व हमने प्रत्यक्ष परिच्छेद में सिद्ध कर दिखाया है । उसी तरह 'ब्रह्मभिन्नत्व' हेतु अप्रयोजक ( साध्य की सिद्धि करने में असमर्थ) है, यह कहना भी ठीक नहीं, क्योंकि शुक्तिरूप्य, रज्जुसर्प आदि के मिथ्यात्व में लाघव से ब्रह्मभिन्नत्व हेतु में ही प्रयोजकत्व है ।
**विवरण—**यहाँ तक अपने पक्ष में अनुमान का स्वरूप क्या है—बताया । इस तरह के अनुमान से ही 'ब्रह्मभिन्न सर्व प्रपंच मिथ्या है,' यह सिद्ध होता है । मीमांसकों को मान्य ऐसे दो पक्षों में से प्रथम पक्ष, हमें अधिक संमत है इसलिए प्रतिज्ञादि अवयव-त्रयात्मक वाक्य का मूल में उपयोग किया गया है । इस अनुमान में 'ब्रह्मभिन्न
१. तस्मात् अनुमानात् । पूर्वोक्तेषु त्रिषु अवयवेषु प्रतिज्ञाद्यवयवत्रये स्वसम्मतिम्प्रदर्शयितुमाह—'ब्रह्मभिन्नं सर्वं मिथ्या ब्रह्मभिन्नत्वात्' इति । शुक्तिरूप्यादौ सिद्धसाधन-वारणाय सर्वमिति । ब्रह्मणि बाधनिरासाय ब्रह्मभिन्नमिति । न च दृष्टान्तासिद्धिः, तस्य दृष्टान्तस्य प्रत्यक्षपरिच्छेदे साधितत्वात् ।
२. अविद्या-तत्कार्यसाधारणस्य ब्रह्मभिन्नत्वस्य प्रयोजकत्वे न गौरवम् अपितु लाघवम् । अतस्तस्य मिथ्यात्व-प्रयोजकत्वम् । न च तत्र व्यभिचार-शङ्कोदयः, 'ब्रह्मभिन्नत्वं यदि मिथ्यात्वव्यभिचारि स्यात्, तदा दृग्-दृश्ययोः सम्बन्धो न स्यात्' इत्याकारकस्य व्यभिचारशंकानिवर्तकस्य अनुकूलतर्कस्य जागरूकत्वात् ।
३. 'प्यादीनां मि०'— इति पाठान्तरम् ।