वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १७६ | वेदान्तपरिभाषा | [ सत्तात्रैविध्यम् |
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आश्रय को द्रव्य कहा गया है। परन्तु 'साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च' ( श्वे० ६-११ ) इस श्रुति में ब्रह्म को स्पष्टतया निर्गुण कहा है। इसलिए सत्त्वादि-गुणरहित ब्रह्म, रूपादि गुणों का भी आश्रय नहीं हो सकता, क्योंकि वैशेषिकों के सम्मत रूपादि गुण, सत्त्वादि तीन गुणों के ही परिणाम हैं। इस कारण 'गुणाश्रयत्व' रूप द्रव्यलक्षण, ब्रह्म में घटित नहीं होता। 'समवाय' पदार्थ का अस्तित्व ही न होने से ब्रह्म में समवायिकारणता नहीं है। उसके न होने से 'समवायिकारणत्व रूप द्रव्य-लक्षण भी ब्रह्म में घटित नहीं होता।
अथवा ब्रह्म में यथा कथंचित् द्रव्यत्व मान भी लें तथापि 'नीरूप-द्रव्य, प्रत्यक्ष के योग्य नहीं होता' यह नियम नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि 'इस काल में यहाँ घट नहीं है' इस प्रतीति के बल पर अध्वर-मीमांसकों ने जैसे इन्द्रियविषयता, काल में स्वीकार की है, उसी प्रकार 'सन् घट:' इत्याकारक प्रतीति में अन्य किसी कारण के न होने से उस अनन्यथा-सिद्ध प्रतीति के बल पर हम भी ब्रह्म में चाक्षुषत्व स्वीकार करते हैं। इसलिए ब्रह्मव्यतिरिक्त पदार्थ की चाक्षुषत्व में ही 'महत्त्व के साथ उद्भूतरूपवत्त्व' प्रयोजक होता है। ब्रह्म की चाक्षुषता में नहीं।
"रूपरहित काल का प्रत्यक्ष मानने पर 'आकाश में बलाका' इस प्रतीति के बल पर आकाश का भी चाक्षुष प्रत्यक्ष कहना होगा" इस आशंका के कारण पूर्व समाधान में अरुचि होने से दूसरा समाधान कहते हैं—
यद्वा—त्रिविधं सत्त्वं¹-पारमार्थिकं व्यावहारिकं प्रातिभासिकं च। पारमार्थिकं सत्त्वं ब्रह्मणः, व्यावहारिकं² सत्त्वमाकाशादेः, प्रातिभासिकं³ सत्त्वं शुक्ति⁴रजतादेः। तथा च घटः सन्निति प्रत्यक्षस्य व्यावहारिकसत्त्व-विषयत्वेन प्रामाण्यम्। अस्मिन्पक्षे⁵ च घटादेर्ब्रह्मणि निषेधो न स्वरूपेण,⁶ किन्तु पारमार्थिकत्वेनैवेति न विरोधः। अस्मिन्पक्षे⁷ च मिथ्यात्वलक्षणे पारमार्थिकत्वावच्छिन्न-प्रतियोगिता
१. 'पारमार्थिकसत्त्व'-इति पाठान्तरम्।
२. 'कसत्त्व' इति पाठान्तरम्।
३. 'कसत्त्व'-इति पाठान्तरम्।
४. 'रूप्यादे:'-इति पाठान्तरम्।
५. 'क्षे घटा:' इति पाठान्तरम्।
६. न स्वपेण न व्यावहारिकत्वेन।
७. अस्मिन् पक्षे सत्तात्रैविध्यपक्षे।