वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 235, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंसत्तात्रैविध्यम् ] अनुमानपरिच्छेदः १७७
कत्वमप्यन्ताभाव-विशेषणं द्रष्टव्यम्। ¹तस्मादुपपन्नं मिथ्यात्वानुमानमिति ।
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्त-परिभाषायाम् अनुमान-परिच्छेदः समाप्तः ।
**अर्थ—**अथवा—पारमार्थिक, व्यावहारिक और प्रातिभासिक भेद से तीन प्रकार का सत्त्व है। ब्रह्म का सत्त्व, पारमार्थिक है। आकाशादि भूत भौतिकों का सत्त्व, व्यावहारिक है। शुक्तिरजत, स्वप्नगज आदि का सत्त्व, प्रातिभासिक है। इस कारण 'घटः सन्' इस प्रत्यक्ष का प्रामाण्य, 'व्यावहारिक' सत्त्व, उसका (प्रत्यक्ष का) विषय होने के कारण है। इस पक्ष में घटादि का ब्रह्म में स्वरूपतः निषेध नहीं किया जाता किन्तु परमार्थतः ही उसका निषेध किया जाता है। अतः कोई किसी प्रकार का विरोध नहीं होता। और इस पक्ष में पूर्वोक्त मिथ्यात्व के लक्षण में, 'जिसकी प्रतियोगिता पारमार्थिकत्व से अवच्छिन्न है' यह विशेषण, अत्यन्ताभाव में देना चाहिये। इस रीति से पूर्वोक्त मिथ्यात्वानुमान सर्वथा उपपन्न है।
**विवरण—**पारमार्थिकत्व, व्यावहारिकत्व और प्रातिभासिकत्व—ये सब, विषयभेद के कारण एक ही सत्त्व के तीन प्रकार हैं। ब्रह्म का सत्त्व, पारमार्थिक है, आकाशादिकों का सत्त्व व्यावहारिक और रज्जु-सर्पादिकों का सत्त्व, प्रातिभासिक हुआ करता है। प्रातिभासिक सत्ता का व्यावहारिक सत्ता से बाध होता है, और व्यावहारिक सत्ता का ब्रह्म की—पारमार्थिक सत्ता से बाध होता है। ब्रह्म की सत्ता का किसी से भी बाध न होने से वह पारमार्थिक है। 'घटः सन्'—घट विद्यमान है, इस प्रकार घटसत्ता का जो प्रत्यक्ष अनुभव होता है उसका व्यावहारिक सत्त्व, विषय है और उस प्रत्यक्ष में प्रामाण्य भी व्यावहारिक सत्त्वविषयत्वेनैव ही है, अर्थात् व्यावहारिक सत्ता में ही उसे प्रामाण्य है। पारमार्थिक सत्ता में नहीं।
यदि आप ऐसा कहें कि सत्त्व की त्रिविधता के स्वीकार पक्ष में वृक्ष पर कपिसंयोग और उसका अभाव दोनों का समानाधिकरण्य जैसे सिद्ध होता है, वैसे ही ब्रह्म में घट और उसका अभाव दोनों का समानाधिकरण्य सिद्ध होगा, परन्तु घटादिकों का उससे मिथ्यात्व सिद्ध नहीं होगा।
तो उस पर हमारा यह उत्तर है कि ब्रह्म में घटादि पदार्थों का जो निषेध किया गया है, वह स्वरूपेण (व्यावहारिक रूप से = यह व्यावहारिक घट नहीं) नहीं किया
१. मिथ्यात्वलक्षणस्य पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकात्यन्ताभावघटितत्वात्। अनुमानस्य पारमार्थिकत्वाभावविषयकत्वात् प्रत्यक्षस्य च व्यावहारिकसत्त्वविषयकत्वात् तयोर्भिन्नविषयत्वेन अविरोधात् मिथ्यात्वानुमानं समुचितमेव।