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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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१७८ वेदान्तपरिभाषा [ सत्तात्रैविध्यम्

गया है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( यह घट पारमार्थिक = वास्तविक, नहीं ) किया गया है। और 'जो जो पारमार्थिक से भिन्न रहता है, वह मिथ्या होता है' यह नियम है। घट, पारमार्थिक से भिन्न है, इस कारण घटादिकों के मिथ्यात्व के साथ कोई विरोध नहीं है।

शंका—इस त्रिविध सत्ता पक्ष में 'स्वाश्रयत्वेनाभिमत यावत्' मिथ्यात्व का लक्षण, उचित नहीं होगा। क्योंकि स्वाश्रयत्व से अभिमत यावत् ( ब्रह्म ) में व्यावहारिकत्व धर्म से घटादि के अभाव का संभव नहीं होता, इसलिये उनमें अत्यन्ताभाव की प्रतियोगिता नहीं कह सकते।

समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि इस त्रिविध सत्ता पक्ष में मिथ्यात्व लक्षणगत अत्यन्ताभाव में विशेषण जोड़ देना चाहिये, अर्थात् जिसकी प्रतियोगिता पारमार्थिकत्व से अवच्छिन्न है ऐसा अत्यन्ताभाव। ऐसा करने से लक्षण पर पूर्वोक्त दोष नहीं आवेगा। ब्रह्म में घटादि का अभाव व्यावहारिकत्व रूप से हमें विवक्षित नहीं है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताकत्व रूप से ) अभाव का ग्रहण करना है। अर्थात् व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है, ऐसे अभाव का ही ग्रहण करना है। ब्रह्म में व्यावहारिकत्व रूप से घटादिकों के होने पर भी पारमार्थिकत्वरूप से उनका ब्रह्म में अत्यन्ताभाव है ही। इस कारण 'पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक-स्वात्यन्ताभाव-सामानाधिकरण्यम्'--पारमार्थिकत्व धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है ऐसे स्व के अत्यन्ताभाव का, स्व से सामानाधिकरण्य रहना ही मिथ्यात्व का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है और वह घटादि में उत्पन्न होता है। अतः मिथ्यात्व का अनुमान सर्वथा युक्तियुक्त है।

श्रीगजाननशास्त्रिमुसलगांवकरविरचिते सविवरण-प्रकाशे अनुमान-परिच्छेदः समाप्तः।

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