वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
१७८ वेदान्तपरिभाषा [ सत्तात्रैविध्यम्
गया है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( यह घट पारमार्थिक = वास्तविक, नहीं ) किया गया है। और 'जो जो पारमार्थिक से भिन्न रहता है, वह मिथ्या होता है' यह नियम है। घट, पारमार्थिक से भिन्न है, इस कारण घटादिकों के मिथ्यात्व के साथ कोई विरोध नहीं है।
शंका—इस त्रिविध सत्ता पक्ष में 'स्वाश्रयत्वेनाभिमत यावत्' मिथ्यात्व का लक्षण, उचित नहीं होगा। क्योंकि स्वाश्रयत्व से अभिमत यावत् ( ब्रह्म ) में व्यावहारिकत्व धर्म से घटादि के अभाव का संभव नहीं होता, इसलिये उनमें अत्यन्ताभाव की प्रतियोगिता नहीं कह सकते।
समाधान—यह शंका ठीक नहीं, क्योंकि इस त्रिविध सत्ता पक्ष में मिथ्यात्व लक्षणगत अत्यन्ताभाव में विशेषण जोड़ देना चाहिये, अर्थात् जिसकी प्रतियोगिता पारमार्थिकत्व से अवच्छिन्न है ऐसा अत्यन्ताभाव। ऐसा करने से लक्षण पर पूर्वोक्त दोष नहीं आवेगा। ब्रह्म में घटादि का अभाव व्यावहारिकत्व रूप से हमें विवक्षित नहीं है। किन्तु पारमार्थिकत्व रूप से ( व्यधिकरणधर्मावच्छिन्न प्रतियोगिताकत्व रूप से ) अभाव का ग्रहण करना है। अर्थात् व्यधिकरण धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है, ऐसे अभाव का ही ग्रहण करना है। ब्रह्म में व्यावहारिकत्व रूप से घटादिकों के होने पर भी पारमार्थिकत्वरूप से उनका ब्रह्म में अत्यन्ताभाव है ही। इस कारण 'पारमार्थिकत्वावच्छिन्नप्रतियोगिताक-स्वात्यन्ताभाव-सामानाधिकरण्यम्'--पारमार्थिकत्व धर्म से जिसकी प्रतियोगिता अवच्छिन्न है ऐसे स्व के अत्यन्ताभाव का, स्व से सामानाधिकरण्य रहना ही मिथ्यात्व का निष्कृष्ट लक्षण सिद्ध होता है और वह घटादि में उत्पन्न होता है। अतः मिथ्यात्व का अनुमान सर्वथा युक्तियुक्त है।
श्रीगजाननशास्त्रिमुसलगांवकरविरचिते सविवरण-प्रकाशे अनुमान-परिच्छेदः समाप्तः।
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अथ उपमान-परिच्छेदः ३
प्रतिज्ञात छह प्रमाणों में से प्रत्यक्ष और अनुमान प्रमाण का निरूपण किया गया। अब उद्देश्यक्रम के अनुसार क्रमप्राप्त उपमान प्रमाण के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।
'अथोपमानं निरूप्यते। तत्र सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्²। तथा हि; ³नगरेषु दृष्टगोपिण्डस्य पुरुषस्य वनं गतस्य गवयेन्द्रिय-
१. आनन्तर्यार्थकः 'अथ' शब्दः। तेन अनुमाननिरूपणानन्तरमुपमाननिरूपणं क्रियते। शाबरभाष्य-श्लोकवार्तिक-शास्त्रदीपिकानुसारेण अनुमाननिरूपणानन्तरं शब्द-प्रमाणं निरूप्यापि उपमानं निरूपयितुं शक्यते, तथापि सूचीकटाहन्यायेन नैयायिकादृत-क्रममनुसृत्यैवात्रापि अनुमानानन्तरमुपमाननिरूपणमेवक्रियते।
ननु अद्वैत-द्वैत-मिथ्यात्वादीनां सादृश्याऽघटितत्वात् अद्वैतज्ञाने उपमानस्य अनुप-योगात् अत्र उपमानप्रमाणविचारोऽयं किं प्रयोजनः ?
तत्रेदं समाधानम्—अद्वैतिनामपि अद्वितीयब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तं चित्तशुद्ध्याद्यर्थं कर्मानुष्ठानमपेक्षितं भवति, तत्र प्रकृति-विकृति-भावादिविज्ञानस्य अपेक्षितत्वात् तत्समर्प-कतया उपमानप्रमाणविचारः सार्थक इति केचिन्निरूपयन्ति। अन्ये च वार्तिकमनुसृत्य भ्रमात्मकं प्रमात्मकञ्चेति द्विविधमुपमानमिति वदन्ति। तत्र प्रपञ्चे सत्यत्वादिना ब्रह्मसादृश्यानुभवादिकं च ब्रह्मसाक्षात्कारपर्यन्तमबाधेऽपि ब्रह्मस्वरूपसाक्षात्कारा-नन्तरं बाध्यत एवेति भ्रमात्मकमेवेतिसिद्धिरुपमानविचारस्य प्रयोजनम्।
उपमानप्रमाणलक्षणादिकं मीमांसकसंम्मतलक्षणाद्यनुसारेणैवाभिमतम्। न नैयायिक-सम्मतलक्षणाद्यनुसारेणेत्यवगन्तव्यम्।
२. भट्टमतमनुसृत्याह—'सादृश्यप्रमाकरणमुपमानम्' इति। सादृश्यप्रमायाः करण-मिति विग्रहः। सादृश्यप्रमा च असन्निहितगोतद्गतगवयसादृश्यविषयिणी प्रमा, सैव उप-मितिः, प्रत्यक्षादिविलक्षणत्वात्। तत्करणञ्च सन्निहितगवयनिष्ठगोसादृश्यज्ञानम्, तदेव उपमानम्। तेन उपमितिकरणमुपमानमिति लक्षणं फलितम्। सादृश्यञ्च असाधारण-धर्मशून्यत्वे सति तद्गतधर्मवत्त्वम्। तेन सादृश्यं पदार्थान्तरमिति प्राभाकारमतं निराकृतं भवति। एवं च सादृश्यप्रमैवोपमितिः। उपमिनोमि इति अनुव्यवसायस्य तत्रैव विद्यमान-त्वात्। कमलेन लोचनमुपमिनोमीत्यनुभवोऽपि तत्रैव भवति। एतादृशी उपमितिः गोस-दृशो गवय इति सादृश्यज्ञानेनैव जायते। तच्च अतिदेशवाक्यानुसन्धानं नापेक्षते। तस्मात् अयं गवय-पदवाच्यः इति ज्ञानमेव उपमितिरिति नैयायिकाभिमतः पक्षो ग्रन्थकाराऽन-भिमत इति सूचितं भवति।
३. 'प्राङ्गणेषु'-इति पाठान्तरम्।
| १८० | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानलक्षणम् |
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सन्निकर्षे सति भवति प्रतीतिः, 'अयं पिण्डो गोसदृश' इति। तदनन्तरं^१ भवति निश्चयः, अनेन सदृशी मदीया गौरिति। तत्रान्वय-व्यतिरेकाभ्यां गवयनिष्ठ-गोसादृश्यज्ञानं करणम्। गोनिष्ठ-गवयसादृश्यज्ञानं फलम्।
अर्थ— अब उपमान प्रमाण का निरूपण किया जाता है। 'सादृश्य प्रमा के करण' को उपमान कहते हैं। वह इस प्रकार है—जिस व्यक्ति ने शहर में गोव्यक्ति को देखा हो, वह अरण्य में जाकर जब 'गवय' को देखता है (चक्षुरिन्द्रिय का गवय के साथ सन्निकर्ष होता है)। उस समय उसे 'यह व्यक्ति, गाय जैसी है' ज्ञान होता है। तदनन्तर उसे 'इस गवय जैसी ही मेरी गाय है' निश्चयात्मक ज्ञान होता है। इन दो ज्ञानों में से अन्वय और व्यतिरेक के बल से गवय में होने वाला जो गोसादृश्यज्ञान (यह गवय, गाय जैसा है) है, वह करण (उपमान) है, और गोनिष्ठ गवय का सादृश्यज्ञान (इसके जैसी ही मेरी गाय है) फल (उपमिति) है।
विवरण— अनुमान का निरूपण करने के अनन्तर उपमान प्रमाण ही निरूपण का विषय होता है। इसीलिए यहाँ उसके निरूपण की प्रतिज्ञा की है। निरूपण का अर्थ है—वस्तु के लक्षण, प्रमाण तथा स्वरूप का कथन करना। उनमें से यहाँ प्रथमतः उपमान का लक्षण कहना है इसलिये ग्रन्थकार ने 'तत्र' शब्द का प्रयोग किया है। 'अनुमान' शब्द के समान ही अव्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्ष्य है और 'उपमीयते अनेन तत् उपमानम्' इस रीति से व्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्षण है। सादृश्य, प्रमा (उपमिति) के करण (असाधारण-कारण) को 'उपमान' प्रमाण कहते हैं। नगर में 'गाय' को देखा हुआ व्यक्ति अरण्य में जाकर कदाचित् उसे 'गवय' पशु दिखाई देने पर 'यह प्राणी गाय जैसा है' इस प्रकार गवय में गाय का सादृश्य ज्ञान होना ही उपमान है (यही उपमान का स्वरूप है)। इसके अनन्तर ही 'मेरी गाय इस पशु जैसी ही है' इस प्रकार होने वाली सादृश्यप्रमा को ही उपमिति कहते हैं। अर्थात् उपमानरूप सादृश्यज्ञान और उपमितिरूप सादृश्यप्रमा के मध्य में अन्य कोई व्यापार विद्यमान नहीं रहता। इसलिये 'असाधारणं कारणं करणम्' इतना ही करण-लक्षण यहाँ स्वीकार किया है। उसे व्यापारघटित मानने की यहाँ आवश्यकता नहीं। यहाँ 'सादृश्यज्ञान' को प्रमाण और प्रमा भी कहा है। दोनों के सादृश्यज्ञान-रूप होने पर भी उनमें भेद है।
प्रमाणरूप सादृश्यज्ञान में 'गो' की 'गवय' को उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गो' उपमान और 'गवय' उपमेय है। और प्रमारूप सादृश्यमान में 'गो' को 'गवय' की उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गवय' उपमान और 'गो' उपमेय है। यही
१. 'रञ्च'—इति पाठान्तरम्।
उपमानलक्षणम् ] उपमानपरिच्छेदः १८१
दोनों में भेद है। इनमें प्रथम सादृश्यज्ञान, द्वितीय सादृश्यज्ञान का जनक ( कारण ) है। और द्वितीय सादृश्यज्ञान, उसका फल ( कार्य ) है। इस प्रकार उनमें जन्य-जनक भाव है। इस सादृश्यज्ञान की उत्पत्ति इन्द्रियादिकों से नहीं होती, अतः उपमान, एक पृथक् प्रमाण सिद्ध होता है।
उपमान को वेदान्ती तथा नैयायिक दोनों के मानने पर भी उसमें जो भेद है, उसे बताना भी अनुचित न होगा।
नैयायिक का अभिमत 'उपमान' प्रमाण—किसी आरण्यक व्यक्ति से 'गवय गोसदृश होता है' सुनकर अरण्य में गये हुए शहरी व्यक्ति का 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर 'यह गोसदृश है' ऐसा गोसादृश्यज्ञान होता है। तदनन्तर आरण्यक व्यक्ति के बताये हुए 'गवय, गोसदृश होता है' वाक्यार्थ का स्मरण होता है। इसके पश्चात् 'अयं गवयपदवाच्य = यह गवय पशु 'गवय' शब्द का वाच्य अर्थ है—यह ज्ञान होना ही उपमिति है। इनके मत में उपमान प्रमाण वस्तुबोधक न होकर शक्ति-ग्राहक है। 'गवय' पद की एक विशिष्ट पशु में शक्ति है' इस प्रकार ज्ञान कराना ही 'उपमान' का प्रयोजन है।
परन्तु वेदान्तियों के मत में 'उपमान' का यह प्रयोजन नहीं है। उनके मत में 'अनेन सदृशी मदीया गौः' इस गवय जैसी ही मेरी गौ है—यह ज्ञान होना ही, उपमान का फल ( उपमिति ) है। अनुभव भी 'इस पशु जैसी मेरी गाय है' ऐसा ही होता है। अतः 'गोसदृशो गवयः' इस अतिदेश-वाक्य के स्मृतिरूप व्यापार की कल्पना कर पश्चात् उससे 'गवय, गवयशब्द का वाच्य है' ज्ञान की कल्पना करना, यह सब अनुभव के विरुद्ध है।
नैयायिक 'यह व्यक्ति गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार उपमिति ज्ञान नहीं मानते किन्तु 'गवय, गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार के ज्ञान को उपमान का फल ( उपमिति ) बताते हैं।
परन्तु जहाँपर गो, गवय, गज, अज आदि सामने स्थित हों, वहाँ पर इनमें से 'गवय पद का वाच्य कौन सा है' इस प्रकार किसी के प्रश्न कर देने पर उसे 'गवय', गवय पद का वाच्य है उत्तर दिया जाय तो हँसी उड़ेगी। वहाँ तो 'यह व्यक्ति गवय पद का वाच्य है' यही उत्तर देना चाहिये, और ऐसा मानने पर उपमान को शक्ति-ग्राहक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि एक गवय की शक्ति को वह दिखा सकेगा किन्तु अन्य गवय में उस शक्ति का ज्ञान कराने में उसका उपयोग नहीं होगा। इसलिये अनुभव के अनुरूप ही उपमिति का स्वीकार करना चाहिये।
शंका— आपके मत में उपमान यदि शक्तिग्राहक नहीं है ( उपमितिरूप प्रमा से यदि गवयादि पदार्थों की शक्ति = वाच्यत्व का ज्ञान नहीं होता ) तो उसका होना ही व्यर्थ है, क्योंकि अनुमान जैसे जगन्मिथ्यात्व को सिद्ध करता है, उस प्रकार उपमान का कोई उपयोग नहीं दिखाई देता।
समाधान— यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि अद्वैतब्रह्मसाक्षात्कार होने तक मुमुक्षु
१८२ वेदान्तपरिभाषा [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
को चित्तशुद्धयर्थ वेदोक्त कर्म के अनुष्ठान की आवश्यकता होती है। कर्मानुष्ठान को यागसम्बन्धी 'प्रकृतिवद् विकृतिः कर्तव्या' प्रकृतिभूत दर्श-पूर्णमासादि के समान विकृति-भूत सौर्यायागादिकों का अनुष्ठान करना चाहिये। इस प्रकृति-विकृतिभाव के ज्ञान की अपेक्षा होती है। और वह ज्ञान, सादृश्यमूलक होने से उपमान प्रमाण के अधीन है, अतः हमारे मत से तो इस ज्ञान को करा देना ही उपमान का उपयोग है।
इस पर आप यदि यह शंका करें कि 'अनेन सदृशी मदीया गौः' आदि ज्ञान, प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से भी हो सकेगा। उसके लिए उपमान को एक स्वतन्त्र रूप से प्रमाण मानने की क्या आवश्यकता है? तो इसका उत्तर ग्रन्थकार स्वयं अग्रिम ग्रन्थ से देते हैं—
न^१ चेदं प्रत्यक्षेण संभवति, गोपिण्डस्य तदेन्द्रियासन्निकर्षात्। ना^२प्यनुमानेन, गवयनिष्ठ-गोसादृश्यस्यातल्लिङ्गत्वात्।
नापि 'मदीया गौरेतद्गवय-सदृशी, एतन्निष्ठ-सादृश्यप्रतियोगित्वाद्, यो यद्गत-सादृश्यप्रतियोगी, स तत्सदृशः, यथा मैत्रनिष्ठसादृश्यप्रतियोगी चैत्रो मैत्रसदृश' इत्यनुमानात्तत्संभव इति वाच्यम्। एवविधानुमानानवतारेऽप्यनेन सदृशी मदीया गौरिति प्रतीतेरनुभवसिद्धत्वात्। उपमिनोमीत्यनुव्यवसायाच्च। तस्मादुपमानं मानान्तरम्।^४
श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र-विरचितायां वेदान्तपरिभाषायाम् उपमानपरिच्छेदः समाप्तः॥ ३॥
१. उपमानस्य न प्रत्यक्षे नाप्यनुमाने अन्तर्भावो भवति। गवि जायमानमुपमिति-पदवाच्यं गवयसादृश्यज्ञानं प्रत्यक्षेण भवति इति वदन् वादी प्रष्टव्यः—किं गवयज्ञानं प्रत्यक्षेण भवतीति तात्पर्यम्, उत सादृश्यज्ञानम्, आहो गोज्ञानम् आहोस्वित् गोसादृश्यवैशिष्ट्यज्ञानम्? तत्र आद्ये इष्टापत्तिः, अत एव न द्वितीयः, तुरीये उपमानप्रमाणं विना स्मृतायां गवि सादृश्यवैशिष्ट्यग्रहाऽसंभवः, अत एव न तृतीयः, गवांशे इन्द्रियसन्निकर्षाभावेन प्रत्यक्षत्वं न संभवति इति स्मृतिरेव वक्तव्या। तदुक्तं वार्तिके—“नगरस्थस्य तु गोज्ञानं स्मरणान्नातिवर्तते” इति। तथा च न प्रत्यक्षे उपमानस्य अन्तर्भावः।
२. 'कृष्टत्वात्'-इति पाठान्तरम्।
३. अनुमानेऽपि उपमानस्य नान्तर्भावः। यतो हि 'मदीया गौः गवयसदृशी एतन्निष्ठसादृश्यप्रतियोगित्वात्' इत्यनुमानं तस्यैव पुरुषस्य भवेत्, यो हि युगपत् द्वौ पदार्थौ मिथः सदृशौ पश्यति। यस्य तु युगपत् तादृशं दर्शनं नास्ति, तस्य सम्बन्धग्रहणाऽभावात् न उक्तानुमानं भवितुमर्हति।
४. उपमानं प्रमाणान्तरमेव प्रत्यक्षानुमानयोरनन्तर्भूतत्वात्। तस्य च संज्ञा-
उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम् ] उपमानपरिच्छेदः १८३
अर्थ—'यह गवयनिष्ठ सादृश्यज्ञान, प्रत्यक्ष से भी हो सकता है' यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि उस समय 'गो' व्यक्ति से इन्द्रियसन्निकर्ष नहीं रहता। 'अनुमान'-प्रमाण से उसका ( सादृश्य का ) ज्ञान होता है, यह कहना भी ठीक नहीं। क्योंकि 'गवय' में रहने वाला 'गो' का सादृश्य, 'गो' में रहने वाले 'गवय' के सादृश्य का लिङ्ग ( साधक हेतु ) बन नहीं सकता।
इस पर '( १ ) मेरी गाय इस गवय जैसी है। ( २ ) क्योंकि उसमें एतद्गवयनिष्ठ सादृश्य का प्रतियोगित्व है। ( ३ ) जो जिसमें रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी होता है वह उसके जैसा होता है।'¹
उदाहरण—'चैत्र, मैत्र में रहने वाले सादृश्य का प्रतियोगी है, इसलिये वह मैत्र जैसा है' ऐसे अनुमान से 'गवयनिष्ठ सादृश्य का ज्ञान हो सकेगा' यह शंका करना भी ठीक नहीं, क्योंकि ऐसा अनुमान न करने पर भी 'इस गवय जैसी मेरी गाय है' यह ज्ञान होता है, यह बात अनुभवसिद्ध है और इस ज्ञान के अनन्तर 'मैं इस बात को उपमान-प्रमाण से जानता हूँ' यही अनुव्यवसाय होता है। इसलिये 'उपमान' स्वतन्त्र प्रमाण है, यह सिद्ध होता है।
**विवरण—**सांख्य²-दर्शनकार 'प्रत्यक्ष' में ही उपमान-प्रमाण का अन्तर्भाव करते हैं। उनका कहना है कि 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर उसमें जो 'गोसादृश्य' का ज्ञान होता है और वह जैसे प्रत्यक्षात्मक ही रहता है, उसी प्रकार 'गो' का स्मरण होने के बाद 'गो' में जो गवयसादृश्य का ज्ञान ( जिसे आप उपमिति कहते हैं ) होता है वह भी प्रत्यक्ष रूप ही है, यह मानना चाहिये। क्योंकि गवय में भासित होने वाला सादृश्य, गो में भासित होने वाले सादृश्य से भिन्न नहीं है। जो सादृश्य गवयनिष्ठ है वही गोनिष्ठ है। क्योंकि किसी एक जाति का, अन्य जाति में रहने वाला जो भूयोऽवयवसामान्ययोग ( बहुत से अवयवों का साम्य ) रूप सम्बन्ध को सादृश्य कहते हैं। और ऐसे सादृश्य का गवय में जिस प्रकार प्रत्यक्षात्मक ज्ञान होता है उसी
संज्ञिसम्बन्धसिद्धिः न प्रयोजनम्। अपि तु सादृश्यज्ञानमेव फलम् तस्य च प्रतिनिध्यादिनिर्णयः वार्तिकोक्तं फलमित्यवगन्तव्यम्।
१. 'मदीया गौः एतद्गवयसदृशी एतद्गवयनिष्ठसादृश्यप्रतियोगितावत्त्वात्।'
२. सांख्याः उपमानं न प्रमाणान्तरं प्रमेयाभात्। यतः असन्निहिते गवि यद् गवयसादृश्यं, तत् न तस्य प्रमेयं, तस्य तु प्रत्यक्षविषयत्वात्। गवयनिष्ठसादृश्यस्य प्रत्यक्षत्वे गवि अपि तस्य प्रत्यक्षत्वौचित्यात्, गुणकर्मवयवसामान्ययोगरूपस्य तस्य एकरूपत्वात्। तथा चोक्तं तत्त्वकौमुद्याम्—"भूयोऽवयवसामान्ययोगो हि जात्यन्तरवर्ती जात्यन्तरे सादृश्यमुच्यते। सामान्ययोगश्चैकः। स चेत् गवये प्रत्यक्षः गवि अपि तथेति नोपमानस्य प्रमेयान्तरमस्तीति वर्णयन्ति।
१८४ | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
प्रकार गो में भी उसका प्रत्यक्ष होना ही उचित है। इसलिये सादृश्य, प्रमाणान्तर नहीं है, उसका प्रत्यक्ष में ही अन्तर्भाव होता है।
परन्तु सांख्य का यह अभ्युपगम ठीक नहीं है, क्योंकि आपके कथनानुसार यद्यपि सादृश्य सर्वत्र एक सा ही है तथापि उसके धर्मी और प्रतियोगी सर्वत्र भिन्न-भिन्न होते हैं, इसलिये तत्तद्-विशेष-व्यक्ति पर रहने वाला सादृश्य भिन्न होता है, यह मानना ही पड़ेगा। सादृश्य जिसमें प्रतीत होता है, वह उस सादृश्य का धर्मी होता है, उसी को सादृश्य का अनुयोगी भी कहते हैं और जिसका सादृश्य भासित होता है उसे प्रतियोगी कहते हैं। ‘गोसदृशो गवय:’ इस ज्ञान में—गवय में, गो का सादृश्य भासित होता है, इसलिये इस सादृश्य का ‘गवय’ धर्मी या अनुयोगी और ‘गो’ प्रतियोगी है, यह कहना चाहिये। परन्तु यह धर्मि-प्रतियोगिभाव ‘गवय-सदृशी गो:’ गवय जैसी मेरी गाय है, इस ज्ञान में नहीं रहता। यहाँ पर ‘गो’ धर्मी और गवय प्रतियोगी होता है। इसलिए गोगत और गवयगत सादृश्य को एकरूप (समान) ही मान लेने पर जिस व्यक्ति को ‘गोसदृशो गवय:’ इस प्रकार गवयनिष्ठ गोसादृश्य का ज्ञान हुआ है उस व्यक्ति को ‘गोगतगवयसादृश्यं पश्यामि’ ‘मैं गोनिष्ठ गवयसादृश्य को देखता हूँ’ ऐसा अनुव्यवसाय होना चाहिये, परन्तु होता नहीं। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति में ‘सादृश्य’ पृथक्-पृथक् ही रहता है, यह अवश्य ही स्वीकार करना होगा। इसीलिए गवय-प्रत्यक्ष होने के कारण उसके साथ चक्षु का सन्निकर्ष होता है अतः ‘तद्गत-सादृश्य’ प्रत्यक्ष भासित होता है। परन्तु गोव्यक्ति, वहाँ पर उस समय समीप नहीं होने से उसके साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष नहीं रहता। इसलिये गोनिष्ठ-सादृश्य, प्रत्यक्ष का विषय हो नहीं सकता। तस्मात् ‘सादृश्य का प्रत्यक्ष में अन्तर्भाव होता है’ यह सांख्यमत, युक्ति तथा अनुभव के विरुद्ध होने से सर्वथा उपेक्षणीय है।
इस पर कदाचित् वैशेषिक कहे कि—प्रत्यक्ष में उपमान का अन्तर्भाव न होने पर भी अनुमान में उसका अन्तर्भाव हो सकेगा। इसका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार कहते हैं—उपमान प्रमाण का ‘अनुमान’ में भी अन्तर्भाव नहीं हो सकता। क्योंकि ‘गो’ के साथ गवय के सादृश्य का ज्ञान, अनुमान-प्रमाण से होना सम्भव नहीं। ‘अनुमान से गवय-सादृश्य का ज्ञान होता है’ स्वीकार करनेवाले वैशेषिकों को यहाँ इस प्रकार अनुमान¹ करना चाहिए—(१) मेरी गौ, इस गवय से निरूपित (गवयप्रतियोगिक) सादृश्य से युक्त है। (२) क्योंकि वह गोनिरूपित (गोप्रतियोगिक अर्थात् ‘गो’ जिसका प्रतियोगी है अर्थात् ‘गवय’ जिसका अनुयोगी है) सादृश्य से युक्त है। (३) इस गवय के समान।
१. ‘मदीया गौ: एतद्गवयनिरूपितसादृश्यवती गोप्रतियोगिकगवयानुयोगिकसादृश्यविशिष्टत्वात्, एतद्गवयवत्।’
उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम् ] उपमानपरिच्छेदः १८५
परन्तु ऐसा अनुमान होना संभव नहीं। क्योंकि उस पर 'स्वरूपासिद्धि' दोष आता है। 'हेतु का पक्ष पर न रहना' स्वरूपासिद्धि दोष कहलाता है। यहाँ पर हेतु है—'गोप्रतियोगिक सादृश्य'। वह (हेतु) 'गो' रूप पक्ष पर नहीं रहता। गो में गवय-निरूपित सादृश्य रहेगा, परन्तु गोनिरूपित (स्वयं गो का) सादृश्य कैसे रह सकेगा ? सादृश्य भेद-घटित होने से, दो पदार्थों में भेद के बिना उनमें सादृश्य है, नहीं कहा जा सकता। और जो हेतु अपने पक्ष पर रहता ही नहीं, वह वहाँ पर साध्य की सिद्धि कैसे कर सकेगा। इसलिये अनुमान से उपमान की गतार्थता नहीं होती। इस पर वैशेषिक ऐसा कहें कि—आपके कथनानुसार यदि हम अनुमान करें तो हमारे पक्ष में उपर्युक्त दोष आवेगा, परन्तु हम वैसा अनुमान नहीं करते। हम ^१अनुमान-प्रयोग इस प्रकार करते हैं—(१) मेरी गाय इस गवय जैसी है। (२) क्योंकि उसमें एतद्गवयनिष्ठ सादृश्य का प्रतियोगित्व है (यह गवय जिस सादृश्य का अनुयोगी है और यह गो जिस सादृश्य की प्रतियोगी है, अर्थात् गवय का सादृश्य गो पर रहता है)। (३) जो पदार्थ, जिस पदार्थगत सादृश्य का प्रतियोगी होता है वह पदार्थ उस पदार्थ के सदृश रहता है। जैसे—चैत्र, मैत्र में रहने वाले अपने सादृश्य का प्रतियोगी (आधेय) है, इसलिये वह मैत्रसदृश है। अर्थात् मैत्र व्यक्ति यदि चैत्र व्यक्ति जैसा है तो चैत्र भी मैत्र जैसा अवश्य ही होगा। ऐसा अनुमान करने पर कोई दोष नहीं आने पाता। इसलिए अनुमान से ही उपमान चरितार्थ हो जाता ।
परन्तु यह शंका भी ठीक नहीं है। क्योंकि इस अनुमान पर किसी प्रकार का दोष न आने पर भी प्रत्येक सादृश्य-प्रमा के समय ऐसा अनुमान किया ही जाय, यह कोई नियम नहीं है। बिना अनुमान के भी 'अनेन सदृशी मदीया गो:' ऐसी अबाधित प्रतीति होती है। इसलिए जहाँ पर साध्य (वह्नि आदि) प्रत्यक्ष है, वहाँ पर भी आप 'पर्वतो वह्निमान् धूमात्' अनुमान करते हैं, परन्तु उतने से ही प्रत्यक्ष-प्रमाण की व्यर्थता जैसे सिद्ध नहीं होती (अनुमान से प्रत्यक्ष अगतार्थ है), वैसे ही अनुमान से यद्यपि उक्त सादृश्य-ज्ञान सिद्ध होने पर भी उपमिति-प्रमा का पृथक् अनुभव होने से उपमान-प्रमाण, अनुमान से चरितार्थ नहीं हो सकता। इसके अतिरिक्त इस सादृश्यज्ञान के अनन्तर
१. 'मदीया गो एतद्गवयसदृशी (एतद्गवयप्रतियोगिक सादृश्यवती) गवयानुयोगिकसादृश्यप्रतियोगित्वात्। यत्र सादृश्यं, स तत्सादृश्यस्य अनुयोगी। यस्य सादृश्यं, स तत्सादृश्यस्य प्रतियोगी। यदा गवये गोसादृश्यं, तदा तत्सादृश्यस्य गवयः अनुयोगी गौश्च प्रतियोगीति तत् सादृश्यं गवयानुयोगिकं गोप्रतियोगिकमिति व्यवह्रियते। अत एव गवयानुयोगिक-सादृश्यप्रतियोगित्वस्य गवि विद्यमानत्वात् तस्य तल्लिङ्गत्वं युक्तमिति।
१८६ | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानस्य प्रमाणान्तरत्वम्
'अहम् अनुमिनोमि' मैं गवय-सादृश्य का अनुमान करता हूँ, यह अनुव्यवसाय नहीं होता। किन्तु 'उपमिनोमि' मैं उपमान से जानता हूँ—यह अनुव्यवसाय होता है। इससे भी 'गोनिष्ठ सादृश्यज्ञान' अनुमित्यात्मक न होकर उपमित्यात्मक है, यह सिद्ध होता है। अतः 'उपमान' यह स्वतन्त्र पृथक् प्रमाण है, यह अवश्य स्वीकार करना चाहिए।
श्रीगजाननशास्त्रि-मुसलगांवकर-विरचिते सविवरण-प्रकाशे
॥ उपमानपरिच्छेदः समाप्तः ॥
—: ० :—
अथ आगमपरिच्छेदः ४
उपमान प्रमाण का निरूपण करने के अनन्तर अब क्रमप्राप्त आगम प्रमाण (शब्द प्रमाण) के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं।
'अथागमो निरूप्यते । यस्य² वाक्यस्य तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गो
१. उपमानप्रमाणनिरूपणानन्तरमद्वैतब्रह्मसाक्षात्कारानुकूलमागमप्रमाणनिरूपणाय 'अथागम' इत्यादिग्रन्थः प्रतिज्ञापरः । 'आ सम्यग् गम्यते ज्ञायते अर्थः अनेन' इत्यागमो वाक्यविशेषः । स एव प्रमाणम् ।
वैशेषिकादयः प्रत्यक्षाऽनुमाने द्वे एव प्रमाणे इति वदन्ति । तेषां मते शब्दस्य अनुमानविधया प्रामाण्यमभ्युपगम्यते । तेषामाशयः श्लोकवार्त्तिककारेणोपवर्णितः शब्दानुमानयोरैक्यम्०' इत्यादिभिः ४१६ तमे पृष्ठे पञ्चमसूत्रगते व्याख्याने ( ३५, ३६, ३७,) त्रिभिः श्लोकैः । तदनन्तरं मतमिदं वार्त्तिककारैरेव सम्यगपाकृतम् । वार्त्तिककारचरणाः कथयन्ति — शब्दो न अनुमानविधया अर्थप्रत्यायकः । अनुमाने हि पक्षः, पक्षधर्मः सपक्षान्वयः, विपक्षव्यतिरेकश्च अपेक्षिता भवन्ति । शब्दे चतुष्टयमपि नैतद्विद्यते । यदि अत्र वाक्यं पक्षः, अर्थवृत्तित्वं साध्यं, वाक्यमेव हेतुः (वाक्यम् अर्थवृत्ति वाक्यत्वात् ), तर्हि पक्षहेत्वोरैक्यम् । तदर्थं यदि अर्थो धर्मी पक्षः तर्हि शब्दस्य आकाशवृत्तेः अर्थेन सम्बन्धाऽभावात् न हेतोः पक्षवृत्तित्ता संभवति । एतेन सपक्षान्वयरूपा व्याप्तिरपि नास्ति, इति सूच्यते, विपक्षव्यतिरेकस्तु न भवत्येव, युधिष्ठिराद्यर्थाभावेऽपि शब्दसत्त्वात् । अतः 'शब्दः' अतिरिक्तम्प्रमाणम् । यथा हि धूमाग्न्योः सम्बन्धग्रहे सत्येव धूमेन अग्नेरनुमानं भवति, तथा वाक्यस्य वाक्यार्थेन सम्बन्धग्रहे सत्यवे वाक्यार्थज्ञानं भवतीति न नियमः । यद्यपि अन्विताभिधानमते वाक्यार्थेऽपि वाक्यस्य शक्तिरिष्यते, तथापि सा स्वरूपसती एव वाक्यार्थं गमयति, न तु तद्ग्रहस्तत्र कारणम् । एतेन अभिहितान्वयवादोऽपि व्याख्यातः । तत्रापि पदार्थनिष्ठायाः स्वरूपसत्याः एव शक्तेः वाक्यार्थानुभावकत्वात् । व्याप्त्यादिज्ञानं विनापि शब्दबोधस्य आनुभविकत्वात् वैशेषिकमतं प्रत्युक्तं भवति । तदुक्तं शब्दशक्तिप्रकाशिकायाम्—"साकांक्षशब्दैर्यो बोधः तदर्थान्वयगोचरः । सोऽयं नियन्त्रितार्थत्वान्न प्रत्यक्षं न चानुमा ॥" इति । तदुक्तं श्लोकवार्तिके—पृ० ४२२ । ५ सूत्रे—६२½, ६८½, ६९½, ७०½, ७१, ७२, ७३½, ७७, ८२½, ८६, ९७½, १०९ । पृ० ४३० यावत् ।
यथा—
"अथ शब्दोऽर्थवत्त्वेन पक्षः कस्मान्न कल्प्यते ।
प्रतिज्ञाऽर्थैकदेशो हि हेतुस्तत्र प्रसज्यते ॥" इत्यादिभिः ।
,तथा च आगमोऽपि प्रमाणमेव । ननु शब्द प्रमाणनिरूपणस्य वेदान्तिनो मते कि
१८८ वेदान्तपरिभाषा [ आगमनिरूपणम्
प्रयोजनम् ? न च अद्वितीय ब्रह्मावगतिः प्रपञ्चमिथ्यागतिश्च प्रयोजनमिति वाच्यम् । वेदान्तिनां मते वेदस्यापि मिथ्यात्वेन तेन सत्याद्वितीयब्रह्मावगत्यसंभवात् ।
अत्रोच्यते—मिथ्याभूतादपि सत्यार्थविगतिः संभवत्येव । तदुक्तं भामत्याम्—"अतात्त्विकप्रमाणभावेभ्योऽपि व्यावहारिकप्रमाणेभ्यः तत्त्वज्ञानोत्पत्तिहेतवः । नहि लौकिका नाग इति वा नग इति वा पदात् कुञ्जरं, तरुं वा प्रतिपद्यमाना भवन्ति भ्रान्ताः ॥" इति । एवं च पारमार्थिकाऽद्वितीय निरस्तसमस्तोपाधिनित्यशुद्धबुद्धमुक्तप्रत्यगभिन्नब्रह्मस्वरूपादिसिद्धिरागमपरिच्छेदस्य फलमिति मन्तव्यम् । सर्वथा च शब्दप्रमाणनिरूपणमावश्यकमेवेति । ( प० प्र० )
२. अन्विताभिधानवादः अभिहितान्वयवादः इति मतद्वयं मीमांसकानामिति प्रसिद्धम् । तत्र अन्विताभिधानवादे पदैः पदार्थानां स्मरणम्, स्मृतानां पदार्थानां संसर्गोऽपि पदैरेव अवगम्यते इति मतम् । तत्र पदे एव शक्तिद्वयम्—एका स्मारिकाशक्तिः, या ज्ञायमानैव पदार्थं स्मारयति । अपरा अन्वयानुभाविकाशक्तिः, या तु स्वरूपसती वाक्यार्थमन्वयं गमयति । अत्र मते वाक्यमेव वाक्यार्थं प्रमापयति ।
अभिहितान्वयवादे तु पदेभ्यः पदार्थानुभावकशक्तिरेका, यया पदार्थानामनुभवो जायते । अयं च अनुभवः न स्मृतिर्नाप्यनुभव इति 'अभिधा' पदेन व्यवह्रियते । एवं च पदैः पदार्था अभिधीयन्ते । तदुक्तम्—
'अभिहितघटना यदा तदानीं स्मृतिसमबुद्धियुगं पदे विधत्तः ।
परदृशि पुनरन्विताभिधाने पदयुगलात् स्मृतियुग्ममेव जन्यम् ॥
अभिहितेषु च पदार्थेषु एका शक्तिः, या स्वरूपसती वाक्यार्थमनुभावयति । अस्मिंश्च मते वाक्यं न वाक्यार्थं प्रमापयति । किन्तु अभिहिताः पदार्था एव । तत्र तु पदार्थद्वारकं परम्परया जनकत्वमादाय वाक्यस्यापि प्रमाणत्वेन व्यवहारः । तदुक्तं शबरभाष्ये—"तस्माद्वाक्यव्यतिरेकेऽपि पदार्थान्वयेऽन्वीयमानः पदार्थनिमित्त एव वाक्यार्थप्रत्ययः ।" श्लोकवार्तिकेऽप्युक्तं सप्तमे वाक्याधिकरणे—
"पश्यतः श्वेतिमारूपं हेषाशब्दं च शृण्वतः ।
खुरविक्षेपशब्दञ्च श्वेतोऽश्वो धावतीति धीः ॥
दृष्टा वाक्यविनिर्मुक्ता न पदार्थैर्विना क्वचित् ।
मानसेनापराधेन पदार्थान् ये न गृह्णते ॥
ते तद्वाक्यार्थं गृहीत्वापि नार्थं गृह्णन्ति कर्हिचित् ॥
श्लो० वा० पृ० ९४७ । श्लो० ३५७३-३६०
न्यायरत्नेऽप्युक्तम्—"क्लृप्तं तावत् पदार्थानामाकांक्षासन्निधियोग्यतावशेन समान्यतोऽन्वयबोधनम्, तद्विशेषनियमस्त्वर्थापत्त्येति ।"
श्लोकवार्तिकेऽन्यत्राप्युक्तम्—
वाक्यजन्यज्ञाने कारणनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः १८९
मानान्तरेण न बाध्यते ^१तद्वाक्यं प्रमाणम् । वाक्यजन्यज्ञाने^२ च आकाङ्क्षायोग्यताऽऽसत्तयस्तात्पर्यज्ञानं चेति चत्वारि कारणानि^३ ।
**अर्थ—**अब आगम प्रमाण (शब्द-प्रमाण) का निरूपण किया जाता है। जिस वाक्य के तात्पर्य का विषय होने वाला संसर्ग, अन्य प्रमाणों से बाधित नहीं होता, वह वाक्य, प्रमाण होता है। वाक्यजन्य ज्ञान में, आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति (सन्निधि) और तात्पर्यज्ञान—ये चार कारण होते हैं।
श्लोकवार्तिकेऽन्यत्राप्युक्तम्—
"साक्षाद्यद्यपि कुर्वन्ति पदार्थप्रतिपादनम् ।
पाके ज्वालेव काष्ठानां पदार्थप्रतिपादनम् ॥"
तथा च—पदार्थनिष्ठैव वाक्यार्थानुभावकशक्तिरिति अभिहितान्वयवादाशयः ।
तत्र अन्विताभिधानवादे वाक्यसामान्यस्य संसर्गविषयकत्वमावश्यकम् । अभिहितान्वयवादेऽपि एवमेवेति मीमांसका मन्यन्ते । ब्रह्मानन्दसरस्वत्यस्तु मतद्वयेऽपि तात्पर्यविषयार्थबोधकत्वमेव । तात्पर्यविषयश्च क्वचित् संसर्गः—यथा, 'गामानय' 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत' इत्यादौ । क्वचित्तु अखण्डस्वरूपम्—यथा, 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' इत्यादौ । 'अन्वित' पदस्य तात्पर्यविषय इत्यर्थः इति न्यायरत्नावल्यां निरूपयन्ति । तथा च—तात्पर्यविषयार्थानुभावकवाक्यत्वं शब्दप्रमाणत्वमिति वेदान्तिनां सिद्धान्तः । तमिमं सिद्धान्तं मनसि निधाय वाक्यप्रमाणं लक्षयति—'यस्य वाक्यस्येति संसर्ग इति प्रायिकाभिप्रायम् । न तु वाक्यसामान्यस्य संसर्गविषयकत्वमावश्यकमित्यभिप्रायः । तेन 'मानान्तराऽबाधिततात्पर्यविषयार्थानुभावकवाक्यत्वं वाक्यप्रमाणत्वम्' । अत्र 'मानान्तरपदेन' वेदान्तेतरप्रमाणस्य परिग्रहः । तेन 'घटमानय' 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत्' इत्यादि वाक्यानां न असंग्रहः ।
१. तद्वाक्यं प्रमाणम् व्यापारवत्तासम्बन्धेन प्रमायाःअसाधारणकारणमितियावत् । अत्र वाक्यशब्दः न वाक्यसामान्यपरः, किन्तु आकांक्षा-योग्यतादिमद्वाक्यविशेषपरः, तेन आकांक्षायोग्यतादिकमपि कारणतावच्छेदकत्वेन विवक्षितम् । अतः वाक्यजन्यज्ञाने वाक्यस्य कारणत्वमुक्त्वा पुनराकांक्षादीनां कारणत्वोक्तिरनुपपन्नेति शङ्काया नावकाशः ।
२. 'ने आकाङ्क्षा' इति पाठान्तरम् ।
३. कारणानि सहकारिकारणानीत्यर्थः । यथा अभिहितान्वयवादे परम्परया शब्दस्य उपयोगित्वात् शाब्दबोध इति व्यवहारः, तथा अकांक्षादिजन्यस्यापि ज्ञानस्य शाब्दबोध इति व्यवहारः कुतो नोपपद्यते ? उपपद्यत एवेति यावत् । एतेन अनुमानविधया शब्दप्रामाण्यवादः परास्तः । न हि अनुमितौ आकांक्षायोग्यतासत्तीनां तात्पर्यज्ञानस्य वा कारणत्वमस्ति ।
१९० वेदान्तपरिभाषा [ वाक्यजन्यज्ञाने कारणनिरूपणम्
**विवरण—**इस प्रकार उपमान-प्रमाण का निरूपण करने के अनन्तर अब शब्द प्रमाण का निरूपण करना क्रम से ही प्राप्त है। 'यस्य', इत्यादि वाक्य से शब्दप्रमाण का लक्षण बताया है। जिसका निष्कृष्ट अर्थ इस प्रकार है—जिसका पदार्थ-संसर्ग, किसी भी अन्य प्रमाण से बाधित नहीं होता ऐसे और वक्ता के तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग के बोधक वाक्य को ही शब्द-प्रमाण कहते हैं। यहाँ पर वाक्य के संसर्ग में 'मानान्तराबाधितत्व' और 'तात्पर्य-विषयीभूतत्व' ये दो विशेषण दिये गये हैं। इन दोनों की आवश्यकताओं का क्रम से विचार करें। 'मानान्तराबाधितत्व' विशेषण के न देने पर 'वह्निना सिञ्चेत्' = अग्नि से सेचन करे, इस वाक्य में अतिव्याप्ति होगी। क्योंकि इस वाक्य का अग्नि-सेचन रूप अर्थ, वक्ता के तात्पर्य का विषय है। उपर्युक्त विशेषण के देने पर उसका निवारण हो जाता है। क्योंकि अग्निकरणक (अग्निसाध्य) सेचन, यद्यपि तात्पर्य का विषय है तथापि प्रत्यक्षप्रमाण से बाधित हो रहा है। सेचन का होना द्रव पदार्थ से ही संभव है। अग्नि जैसे अद्रव पदार्थ से द्रवद्रव्यकरणक-व्यापार रूप सेचन का होना संभव नहीं। इसी प्रकार 'तात्पर्यविषयीभूतत्व' विशेषण के देने पर 'स प्रजापतिरात्मनो वपामुदखिदत्' उस प्रजापति ने अपनी वपा को उपट (खरोंच) कर निकाला, इत्यादि श्रुतिवाक्य पर अव्याप्ति दोष आता है। क्योंकि अपनी वपा का स्वयं उच्छेद करना रूप अर्थ, प्रमाणान्तर से बाधित है, क्योंकि वपोत्खेद होने पर जीवित रहना ही असंभव है।
इस कारण ऐसे वाक्य को प्रमाण वाक्य नहीं कहा जा सकेगा। अन्यथा वेद का प्रामाण्य नष्ट होगा। अतः इस अव्याप्ति के निराकरणार्थ 'तात्पर्यविषयीभूतत्व' विशेषण देना आवश्यक है। यहाँ पर श्रुति के तात्पर्य का विषय, याग की अवश्यकर्तव्यता ही है। अर्थात् स्वयं ब्रह्मदेव ने भी इतनी श्रद्धा से याग (यज्ञ) किया, तब हम संसारी मनुष्यों को तो वह अवश्य ही कर्तव्य है—इस प्रकार बोधन कराना ही उस मंत्र का तात्पर्य है। जो किसी प्रमाण से बाधित नहीं होता। इसलिये वह श्रुतिवाक्य, वाक्य होने से उपर्युक्त अव्याप्ति नहीं होने पाती।
शब्द के लक्षण में 'वाक्यस्य' कहने की आवश्यकता यह है कि—शब्द-प्रमाण से जिस अर्थ का हमें ज्ञान होता है वही अर्थ, अन्य प्रमाणों से भी सिद्ध होता है। इसलिए अन्य प्रमाणों को भी शब्द या आगम कहना पड़ेगा। इसके निराकरणार्थ लक्षण में 'वाक्यस्य' अवश्य ही निविष्ट करना चाहिये। अन्यथा—'यह घट है' इस चक्षुरिन्द्रियजन्य ज्ञान का विषय 'घट' है और वह बाधित भी नहीं है। ऐसे प्रत्यक्ष में, शब्द का लक्षण अतिव्याप्त होगा।
**शंका—**आपके मत में घटादि सभी जगत् मिथ्या है। तब शब्द से व्यक्त किया हुआ सभी अर्थ बाधित है। ऐसी स्थिति में 'अबाधितार्थकत्व' रूप विशेषण, संसर्ग में कभी संभव ही नहीं हो सकता। इसलिये यह लक्षण, असंभव दोष से दूषित है।
आकांक्षा लक्षणम् ] आगमपरिच्छेदः १९१
समाधान—घटादि पदार्थों में पारमार्थिक-सत्तारूप से बाधितत्व होने पर भी उनका व्यावहारिक प्रामाण्य अबाधित ही है। क्योंकि 'बाधित' शब्द से व्यवहारकालीन बाध ही विवक्षित है। इसी कारण 'नेह नानास्ति किंचन' श्रुति से स्वर्गादि-साध्य-साधन भाव का बाध होने पर भी उपर्युक्त दोष नहीं आता। इस रीति से शब्द-प्रमाण का लक्षण सिद्ध होता है। अतः 'शब्द का अनुमान में ही अन्तर्भाव होने से उसे पृथक् प्रमाण के रूप में मानने की आवश्यकता नहीं' कहने वाले वैशेषिकों का खण्डन हो जाता है। वैशेषिकों का कथन है कि—( १ ) 'वत्सं बधान' वत्स को बाँधो, आदि पद अर्थ-संसर्गज्ञानपूर्वक हैं। ( २ ) क्योंकि उनमें आकांक्षा आदिकों से युक्त पदसमूहत्व है। ( ३ ) 'दण्ड से गाय लाओ' आदि पदसमूह के समान। ऐसे अनुमान¹ से शब्द-प्रमाण गतार्थ होता है। इसलिए 'शब्द' को स्वतन्त्र प्रमाण मानने की आवश्यकता नहीं। दण्डादि पदों की शक्ति के अनुमान के लिए अन्य पदों का दृष्टान्त देकर उनकी शक्ति का अनुमान कर लेना चाहिये। इस पर वेदान्तादि शब्द-प्रामाण्यवादी शास्त्रकारों का कथन है कि—'ऐसे अनुमान से शब्द-प्रमाण गतार्थ होता है' कहने पर शाक्य, भिक्षु आदि के वाक्य में भी वह संसर्ग है ही, इस कारण वे भी प्रमाण होने लगेंगे। 'उनके वाक्यों में प्राप्त होना हमें इष्ट ही है' यह कहना ठीक नहीं। क्योंकि श्रुति से तत्प्रतिपादित अर्थ का बाध होने से 'शाक्यादिकों के वाक्य अप्रमाण हैं। तस्मात् बौद्धादि नास्तिकों के मूल-प्रमाणरहित दर्शनों में अप्रामाण्य सिद्ध करने के लिये शब्द-प्रमाण को पृथक् स्वीकार करना ही चाहिये।
इसके अतिरिक्त यह ज्ञान, आकांक्षा, योग्यता आदि की सहायता से होता है, वहाँ अनुमान का नियत रूप से अनुभव नहीं आता। इससे भी अनुमान-प्रमाण की अपेक्षा शब्द-प्रमाण का पृथक् फल सिद्ध होता है। इस कारण भी शब्द रूप प्रमाण पृथक् सिद्ध होता है। यही प्रदर्शित करने के लिए ग्रन्थकार ने आकांक्षादिकों के निरूपण की 'वाक्यजन्यज्ञाने च' आदि वाक्य से प्रतिज्ञा की है। आकांक्षादि पदों के अर्थ और लक्षणों को ग्रन्थकार अग्रिम ग्रन्थ से स्वयं कथन करते हैं।
तत्र² पदार्थानां परस्पर-जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वमाकाङ्क्षा³ ।
१. 'वत्सं बधानेतिपदम् अर्थसंसर्गज्ञानपूर्वकम् आकांक्षादिमत्पदसमूहत्वात् दण्डेन-गामानयेति पदसमूहवत् । २. तत्र आकांक्षा-योग्यता-आसत्ति-तात्पर्यज्ञानानां मध्ये । ३. 'येन विना यस्य अन्वयाननुभावकत्वं तादृशपदवत्त्वमाकांक्षा' इति नैयायिकाः । किन्त्वदमभिहितान्वयवादे न संभवति, आकांक्षायां पदार्थधर्मत्वात्, पदधर्मत्वाऽभावात् । अन्विताभिधानवादेऽपि 'वाजिभ्यो वाजिनमि'त्यादौ वाजिनपदस्य वाजिनपदादि विना अन्वयानुभावकत्वाभावात् वैश्वदेवयागविवक्षायामपि आकांक्षासत्वात् द्वितीयाध्याये गुणात् तत्र कर्मभेदवर्णनमनुपपन्नं स्यात् । अतः मीमांसकमतानुसारेण आकांक्षास्वरूपं वर्णयति ग्रन्थकारः ।
१९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ आकांक्षा लक्षणम्
क्रिया-श्रवणे कारकस्य कारक-श्रवणे क्रियायाः¹ करण-²श्रवणे इति-कर्तव्यतायाश्च³ जिज्ञासाविषयत्वात्। अजिज्ञासोरपि वाक्यार्थ-बोधाद् योग्यत्वमुपात्तम्। तदवच्छेदकं च क्रियात्व-कारकत्वादिकमिति नाति-व्याप्तिः 'गौरश्व'⁴ इत्यादौ। ⁵अभेदान्वये च समान-विभक्तिक⁶प्रति-पाद्यत्वं तदवच्छेदकमिति तत्त्वमस्यादिवाक्येषु नाव्याप्तिः।
अर्थः-- आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्य ज्ञान, इनमें से पदार्थों की परस्पर जिज्ञासा में विषय होने की योग्यता को आकांक्षा कहते हैं। क्रिया का श्रवण होने पर कारक के ज्ञान की इच्छा उत्पन्न होती है। उसी प्रकार कारक का श्रवण होने पर क्रिया की और करण का श्रवण होते ही इति कर्तव्यता की आकांक्षा होती है। (इस आकांक्षा के लक्षण में 'योग्यत्व' पद की आवश्यकता को बताते हैं) जिज्ञासारहित व्यक्ति को भी वाक्यार्थ का बोध होने से उसमें (बोध में) आकांक्षा का लक्षण अव्याप्त न हो इसलिये लक्षण में 'योग्यत्व' पद दिया है। क्रियात्व, कारकत्व आदि धर्म, उस योग्यता के अवच्छेदक होने से आकांक्षा के लक्षण की 'गो, अश्व, पुरुष' आदि पदसमूह में अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि अभेदान्वय-प्रतिपादक वाक्यों में समान विभक्तिवाले पदों से प्रतिपाद्यत्व ही अवच्छेदक है। इसलिए वहाँ भी लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती।
विवरण— दो अथवा अधिक पदों में से एक पद का श्रवण होने पर उसके ज्ञान के लिये समीपस्थित दूसरे पद के ज्ञान की अपेक्षा होती है। उस दूसरे पद को प्रथम पद की या अन्य पदों की अपेक्षा होती है। ऐसी परस्पर अपेक्षा की योग्यता जिन पदों में रहती है उन पदों को साकांक्ष शब्द कहते हैं। जैसे 'गामानय' गाय को लाओ। इस वाक्य में 'गाम्' और 'आनय' दो पद हैं। वैसे ही 'आनय' मध्यम पुरुष के एकवचन की क्रिया का 'त्वं' कर्ता भी अर्थतः ही प्राप्त होता है। इन तीन पदों में से 'आनय' पद के उच्चारण करते ही, 'क्या लावें और कौन लावे' यह आकांक्षा उत्पन्न होती है। अर्थात् 'आनय' क्रिया को 'गाम्' और 'त्वं' इन कारकों की अपेक्षा होती है। इसी तरह 'गाम्' इस कर्म कारक को 'आनय' क्रिया की अपेक्षा होती है। 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो
१. क्रियायाः आख्यातार्थभावनायाः।
२. करणश्रवणे धात्वर्थश्रवणे।
३. इतिकर्त्तव्यतायाः उपकारकक्रियायाः।
४. 'श्वः पुरुषोहस्ती'-इति पाठान्तरम्।
५. अभेदान्वये क्रियाबोधं विना स्वरूपमात्रान्वये।
६. 'क-पद'-इति पाठान्तरम्।
आकाङ्क्षास्वरूपम् ] आगमपरिच्छेदः १९३
यजेत' स्वर्गोच्छुव्यक्ति दर्श-पूर्णमास याग करे । इस श्रुति-वाक्य से दर्शपूर्णमासयाग, स्वर्ग का करण ( साधन ) है, ऐसा ज्ञान होने पर 'कथम्' इन दर्शपूर्णमासों से स्वर्ग किस प्रकार का साधा जाय—इस प्रकार इति-कर्तव्यता की आकांक्षा होती है अर्थात् 'इति-कर्तव्यता', जिज्ञासा का विषय होती है, और इस आकांक्षा की निवृत्ति 'समिधो यजति' 'इडो यजति'—'समिध् यागादि-प्रयाज' और 'अनुयाजादि' से दर्शपूर्णमास याग को करे, आदि वाक्यों से होती है । इस प्रकार क्रिया को कारक की, कारक को क्रिया की और करण को इति-कर्तव्यता की परस्पर जिज्ञासा होने की योग्यता का होना अर्थात् ऐसी जिज्ञासा उत्पन्न कराने वाले पदों का वाक्य में होना ही आकांक्षा का लक्षण है ।
आकांक्षा का 'जिज्ञासाविषयत्व' इतना लक्षण करने पर भी सर्वत्र समन्वय हो जाता है, तब 'जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्व' इतना गुरुभूत-लक्षण क्यों किया गया है ?
इस आशंका का निराकरण 'अजिज्ञासोः' आदि ग्रन्थ से ग्रन्थकार करते हैं । वाक्यार्थ-ज्ञान की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति को भी वाक्य को सुनते ही उसके अर्थ का ज्ञान होता है । परन्तु उस समय उन पदार्थों में जिज्ञासाविषयत्व नहीं रहता । 'जिज्ञासाविषयत्व' मात्र आकांक्षा का लक्षण करने पर ऐसे स्थलों में उसका संभव नहीं हो पाता । अर्थात् इस लक्षण की जिज्ञासारहित वाक्यार्थ बोध में अव्याप्ति होती है । उसे दूर करने के लिये लक्षण में 'योग्यत्व' पद का निवेश आवश्यक है ।
जिज्ञासारहित व्यक्ति को होने वाले वाक्यार्थ-बोध में पदार्थों को परस्पर जिज्ञासा-विषयत्व न होने पर भी उसकी योग्यता उनमें रहती है, अर्थात् वे पदार्थ परस्पर की जिज्ञासा में विषय बनने के योग्य रहते हैं । अतः उक्त अव्याप्ति का निराकरण हो जाता है । पदार्थ में यह योग्यता किस धर्म से आती है ? अर्थात् इस योग्यता का अवच्छेदक ( भेदक ) धर्म कौन-सा आप मानते हैं ? लक्ष्यता के अन्यूनानतिरिक्तवृत्तिधर्म को ही अवच्छेदक कहते हैं । अर्थात् जो धर्म अपने लक्ष्य से अन्यत्र कहीं नहीं रहता और यावत् ( समस्त ) लक्ष्य पर रहता है वही अवच्छेदक बन सकता है । जैसे दण्ड, घट का कारण है । परन्तु दण्ड में घट के प्रति जो कारणता है, वह किस धर्म से है, ऐसी आकांक्षा होने पर, दण्ड में विद्यमान पार्थिवत्व या पीतदण्डत्व को उसका अवच्छेदक नहीं कह सकते । क्योंकि पार्थिवत्व यद्यपि यावत् दण्डों में रहने पर भी दण्डभिन्न घटादिकों पर भी रहता है, इसलिये वह अतिरिक्त वृत्ति है । उसी तरह पीतदण्डत्व, रक्तदण्ड में नहीं रहता । इसलिये वह पीतदण्डत्व, न्यून वृत्ति है, अतः न्यून या अधिक प्रदेश में न रहने वाला ऐसा 'दण्डत्व' धर्म ही वहाँ पर अवच्छेदक है, समझना चाहिये । उसी प्रकार आप प्रकृत स्थल में योग्यता का अवच्छेदक किसे कहते हैं ? अर्थात् योग्यता में अन्यून, अनतिरिक्त वृत्ति कौन-सा धर्म आपको सम्मत है ! 'अर्थवत्पदवत्त्व'—वाक्य में अर्थयुक्त पदों का होना, इसे यदि आप अवच्छेदक मानें तो उस धर्म से अवच्छिन्न हुई योग्यता से घटित जो आकांक्षालक्षण, वह 'गौरश्वः' आदि पदसमूह में,
१९४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आकांक्षास्वरूपम्
अतिव्याप्त होगा। इसलिये उसे अवच्छेदक नहीं मान सकते। इस पर ग्रन्थकार कहते हैं कि हम अर्थवत्पदवत्त्व को योग्यतावच्छेदक नहीं मानते, अपितु कारक पर विद्यमान कारकत्व और क्रिया पर विद्यमान क्रियात्व को ही योग्यतावच्छेदक कहते हैं। केवल 'गाय, घोड़ा, पट' आदि पदों में क्रियात्व या कारकत्व अवच्छेदक नहीं है। इसलिये ऐसे निराकांक्ष पदों पर जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वरूप आकांक्षा का लक्षण अतिव्याप्त नहीं होता। इसी प्रकार इतिकर्तव्यताबोधक वाक्य में इतिकर्तव्यतात्व को ही अवच्छेदक समझना चाहिये। 'गौरश्वः' आदि पद-समूह में अतिव्याप्ति न होने के लिये क्रियात्व, कारकत्व आदिकों को योग्यता का अवच्छेदक मानने पर भी 'तत्त्वमसि' आदि अभेदार्थक वाक्यों में क्रियात्व या कारकत्व आदि का अवच्छेदक होना संभव नहीं। इसलिए उन वाक्यों में इस लक्षण की अव्याप्ति होती है।
समाधान—तत्त्वमस्यादि वाक्यों में क्रियात्व, कारकत्व को हम अवच्छेदक नहीं कहते। किन्तु जिनकी विभक्ति समान ( एक ) है, ऐसे पदों से प्रतिपाद्यत्व को—ऐसे स्थल पर योग्यता का अवच्छेदक हम मानते हैं। 'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'तत्' और 'त्वम्' ये पद, समानविभक्तिक हैं, अर्थात् दोनों को ही 'प्रथमा' यह एक ही विभक्ति है। और उन पदों से जीव और ब्रह्म का अभेद प्रतिपाद्य है। अतः उपर्युक्त अव्याप्ति नहीं हो पाती।
समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व को अवच्छेदक मानने पर 'गौरश्वः' आदि स्थल में लक्षण की पुनः अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि वहाँ पर 'गौः' और 'अश्वः' आदि पद भी एक ही प्रथमा विभक्ति में हैं।
परन्तु यह शंका ठीक नहीं है। क्योंकि 'गौरश्वः' आदि पदसमूह से वहाँ अभेद प्रतिपाद्य नहीं है। गाय कभी अश्व नहीं होती, और न अश्व कभी गाय। इसलिये उन पदों को अभेद-प्रतिपादक मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध होगा। अर्थात् उनका अभेदार्थ मानने के लिए योग्यतारूप कारण के अभाव में ( न होने पर ) उन पदों में भेदान्वय का होना संभव नहीं। इसलिये समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व रूपावच्छेदक, जो अभेदान्वय योग्यता स्थल में अवश्य अपेक्षित होता है उसका यहाँ संभव नहीं है। इसलिए उक्त अतिव्याप्ति की शंका करना ठीक नहीं है। इस प्रकार भेदान्वयस्थल में क्रियात्व-कारकत्वादि को और अभेदान्वय स्थल में समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व को ही, योग्यता का अवच्छेदक धर्म कहते हैं। यद्यपि सर्वत्र एक अवच्छेदक मानने में गौरव है तथापि वह फलमुख होने से उस पर अननुगम रूप दोष नहीं आता।
नैयायिक आकांक्षा का इस प्रकार लक्षण करते हैं—
'पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वम्' इसका अर्थ इस प्रकार है—अपने को अपेक्षित दूसरे पद के अभाव के कारण ( अनुच्चारण के कारण ) एक पद का
बलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९५
शाब्दबोध न होना ही आकांक्षा है। जैसे—'गामानय' = गाय लाओ। यह वाक्य है। परन्तु यदि कोई 'गाम्' इतना ही पद कहे, तो उसे अपेक्षित 'आनय' पद के अभाव के कारण 'गाम्' पद से अन्वय का ( शाब्द-ज्ञान का ) बोध नहीं होता। अर्थात् 'गाम्' के साथ 'आनय' पद का उच्चारण होने पर ही अन्वय-बोध होगा। बिना उसके नहीं होगा। इसलिये वह वाक्य साकांक्ष है और ऐसे आकांक्षायुक्त वाक्य से ही वाक्यार्थबोध होता है। नैयायिकों के आकांक्षालक्षण का यह आशय है।
परन्तु यह नैयायिकाभिमत आकांक्षा, वाक्यार्थ-निर्णयक मीमांसकों को मान्य नहीं है। इसलिये वह अग्राह्य है। वाक्यार्थ के निर्णयार्थ ही मीमांसा प्रवृत्त हुई है। इसलिये वाक्यार्थ-निर्णय के प्रसंग में मीमांसकों का मत ही अधिक ग्राह्य है। इसी आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—
'एतादृशाकाङ्क्षाऽभिप्रायेणैव बलाबलाधिकरणे 'सा वैश्वदेव्या- मिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' इत्यत्र वैश्वदेव-यागस्यामिक्षाऽन्वितत्वेन न वाजिनाकाङ्क्षेत्यादिव्यवहारः।
**अर्थ—**हमारा बताया हुआ आकांक्षा का लक्षण मीमांसकों को भी अभिमत होने से उन्होंने भी इसी प्रकार की आकांक्षा को मानकर बलाबलाधिकरण में 'वह आमिक्षा वैश्वदेवी (विश्वेदेव देवताक) है, और वाजिन वाजिदेवताक है' इस वाक्य का विचार करते समय वहाँ पर वैश्वदेव याग का आमिक्षा के साथ अन्वय होने से वाजिनान्वय की उसे आकांक्षा नहीं रहती। इसलिये वैश्वदेवयाग का वाजिन से अन्वय नहीं होता, कहा है।
**विवरण—**पूर्वमीमांसा के तीसरे अध्याय के तीसरे पद में 'बलाबलाधिकरण' नामक अधिकरण है। 'सन्दिग्ध-वाक्यार्थ का विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और संगति, इन पाँच अवयवों से निर्णय करना' इसे 'अधिकरण' यह पारिभाषिक संज्ञा मीमांसकों की है। इस अधिकरण में श्रुति, लिङ्ग आदिकों के दौर्बल्य, प्राबल्य का विचार किया है। इस कारण इसे 'बलाबलाधिकरण' कहते हैं। इस अधिकरण का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है—'श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्' (जै० सू० ३।३।१४)। इस सूत्र ने श्रुत्यादिकों के बलाबल का निर्णय किया है। यहाँ पर श्रुति-लिङ्गादिकों के बलाबल का विचार ही विषय है। क्योंकि एक ही स्थल में जब श्रुति-लिङ्ग आदि अनेक की प्राप्ति होती है, तब उनमें से
१. 'येन विना यस्यान्वयाननुभावकत्वं तत्त्वमाकांक्षा' इत्यङ्गीकारे तादृशाकांक्षायाः वाजिभ्यो वाजिनमित्यत्र वाजिनस्य विश्वदेवयागसम्बन्धेऽपि सत्त्वात् बलाबलाधिकरण-विरोधः आपद्येत, तत्परिहारार्थं 'जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वं पदार्थनिष्ठमेवाकांक्षा' इत्येवं युक्तम्।
१९६ | वेदान्तपरिभाषा- | [ बलाबलाधिकरणविचारः
प्रबल और दुर्बल प्रमाण का विचार कर दुर्बल का बाध करके प्रबल प्रमाण के द्वारा निर्णय करना होता है। इस विषय में मीमांसा का उदाहरण इस प्रकार है—"ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते" यह श्रुति, 'ऐन्द्रीऋचा से गार्हपत्य का उपस्थान करे,' बताती है। और 'कदाचन स्तरीरसि नेन्द्रसश्चसि दाशुषे' इस वचन में 'इन्द्र' यह लिङ्ग उससे उस मन्त्र का इन्द्रोपस्थान में विनियोग करना बताया गया है। ऐसी परिस्थिति में लिङ्ग से श्रुति का बाध करके इन्द्रोपस्थान किया जाय ? या श्रुति से लिङ्ग का बाध कर गार्हपत्योपस्थान किया जाय ? ऐसा संशय उपस्थित होता है।
इस पर इस प्रकार पूर्वपक्ष किया जाता है—जब कि श्रुति, गार्हपत्य का उपस्थान (स्तवन) करने को कहती है ओर 'इन्द्र' रूप लिङ्ग इन्द्रोपस्थान करना बता रहा है, तब 'व्रीहिभिर्यजेत' 'यवैर्जुहोति' यहाँ पर जैसे व्रीहि से अथवा यव से याग करे—ऐसा विकल्प स्वीकार किया गया है, वैसे ही यहाँ पर भी अपनी इच्छा के अनुसार इन्द्र या गार्हपत्य का उपस्थान करे, अर्थात् उनके उपस्थान का विकल्प या समुच्चय समझा जाय।
ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर उपर्युक्त 'श्रुतिलिङ्गवाक्य०' आदि सूत्र से सिद्धान्त बताया है। जो इस प्रकार है—'श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या इनकी एकत्र प्राप्ति होने पर आगे-आगे के लिङ्गादि दुर्बल हैं। अर्थात् लिङ्गादि पाँचों की अपेक्षा श्रुति प्रबल है। वाक्यादिकों की अपेक्षा लिंग प्रबल, और सबकी अपेक्षा समाख्या दुर्बल है। गार्हपत्योपस्थानरूप श्रुत्यर्थ संनिकृष्ट है और इन्द्रोपस्थान रूप लिंगगम्य अर्थ विप्रकृष्ट है। गार्हपत्योपस्थान रूप अर्थ साक्षात् श्रुति के द्वारा बताये जाने के कारण प्रथमतया बुद्धि में शीघ्र उपस्थित होता है परन्तु 'इन्द्र' रूप लिंग का अर्थ शीघ्र उपस्थित नहीं होता। क्योंकि लिंग से इतना ही प्रतीत होता है कि इन्द्र का और इस मंत्र का सम्बन्ध है, इतना ही अर्थ प्रथमतः मन में उपस्थित होता है और पश्चात् 'जब कि इनका सम्बन्ध है तब इस ऋचा से इन्द्रोपस्थान करे' इस प्रकार श्रुति का अनुमान करना पड़ता है। इस प्रकार 'ऐन्द्रया इन्द्रमुपतिष्ठेत्' ऐसी श्रुति की कल्पना करने से पूर्व ही उक्त श्रुति 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' स्वार्थ का विधान कर देती है। यही न्याय लिंगादि अन्य प्रमाणों की ओर लगाकर उनके द्वारा वाक्यादिकों का बाध समझना चाहिए। इस अध्याय का विषय अंगांगिभाव बताना होने से ही उसके अनुरूप संगति की कल्पना कर लेनी चाहिये।
प्रकृत में बलाबलाधिकार का स्वरूप बताने का प्रयोजन यह है कि वाक्य और श्रुति की एक जगह प्राप्ति होने पर श्रुति के द्वारा वाक्य का बाध किस प्रकार होता है, इसका 'आमिक्षावाजिनन्याय' उदाहरण है। इस अधिकरण का भी संक्षेप में स्वरूप बताते हैं—'तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' इस श्रुति वाक्य का अर्थ इस प्रकार है—तपे हुए दूध में दही डालने पर फटे हुए दूध में जो घनभाग तैयार होता है—वह आमिक्षा, वैश्वदेवी = विश्वेदेवदेवता की है, और जो पानी
बलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९७
बचा रहता है उसे 'वाजिन' कहते हैं, वह वाजिदेवताओं के लिए है। इस अधिकरण में 'वाजिभ्यो वाजिनम्' रूप वाक्यांश, विषय है। यहाँ पर जिसका वाज ( आमिक्षा रूप अन्न ) है—वह वाजी, इस ( मत्वर्थीय इन् ) व्युत्पत्ति से वाजि शब्द, विश्वेदेवबोधक है, और वैश्वदेव याग में ही वाजिन द्रव्य का विधान है ? या वाजी नामक कोई अन्य देवता है, और उसका बोधक यह वाजिन शब्द है, ऐसा समझ कर वाजिदेवताक एक स्वतन्त्र याग का विधान है ? इस प्रकार संशय उत्पन्न होता है। तब पूर्वपक्ष इस प्रकार करते हैं—उक्त व्युत्पत्ति से वाजिन में वैश्वदेव याग का ही अंगत्व समझना चाहिये।
शंका—'तप्ते पयसि-वाक्य में आमिक्षा नामक द्रव्य भी कहा गया है तब उस उत्पत्तिशिष्ट आमिक्षा द्रव्य से वाजिन का बाध होगा' परन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि दोनों का जब कि विधान है तब इन दो द्रव्यों का विकल्प समझ लिया जाय अथवा वाजिन तथा आमिक्षा दोनों का समुच्चय कर ( मिलाकर ) वैश्वदेव याग करे।
इस पर सिद्धान्त किया गया कि—वाजिन में वैश्वदेवयागांगत्व का होना संभव नहीं। क्योंकि 'वैश्वदेवी आमिक्षा' यहाँ वैश्वदेवी शब्द से 'विश्वेदेव जिसकी देवता है' यह अर्थ विवक्षित है। विश्वेदेव शब्द से 'साऽस्य देवता' इस पाणिनिसूत्र से देवता अर्थ में तद्धित 'अण्' प्रत्यय किया है। इसलिये आमिक्षा की विश्वेदेव रूप देवता तद्धित-श्रुतिरूप प्रमाण से प्राप्त है, और वाजिन का विश्वेदेव से जो सम्बन्ध होगा, यह 'समभिव्याहाररूप वाक्य' से ही होगा। अतः श्रुति-प्रमाण, वाक्य-प्रमाण की अपेक्षा प्रबल होने से श्रुति से वाक्यप्राप्त 'वाजिन' का बाध होता है। क्योंकि वैश्वदेव-याग की देवता-विषयक आकांक्षा, तद्धितश्रुति से प्राप्त होने के कारण प्रबल हुई 'आमिक्षा' से ही शान्त होती है, पुनश्च उस याग को 'वाजिन' की आकांक्षा नहीं रहती। क्योंकि 'वाजिन' से अन्वय करते समय वह 'वाजिन,' निराकांक्ष हुए 'वैश्वदेव' याग की जिज्ञासा में विषय होने के योग्य नहीं है। इसलिये यहाँ 'वाजिन' और 'अमिक्षा' का विकल्प या समुच्चय स्वीकार न कर आमिक्षा से वैश्वदेव याग करे और वाजिन द्रव्य से वाजिदेवताक स्वतंत्र ( पृथक् ) याग करे। इस प्रकार दो पृथक् यागों का विधान है।
ग्रन्थकार ने जो पदार्थ, जिज्ञासा के विषय होने में योग्य रहता है तद्विषयक ही आकांक्षा मीमांसकों को मान्य होती है। नैयायिकों की अभिमत आकांक्षा, प्रमाणरहित होने से मान्य नहीं है। अतः उसका स्वीकार न किया जाय, यह कथन करने के लिये ही यहाँ बलाबलाधिकरण का और आमिक्षा का उल्लेख किया है। इससे वेदान्तियों का बताया आकांक्षा-लक्षण ही युक्त है।
अब नैयायिकाभिमत आकांक्षा और मीमांसकों से बताई हुई आकांक्षा में क्या भेद है ? और नैयायिक के पक्ष में कौन से दोष हैं, उन्हें बताते हैं। नैयायिक—एक पद को दूसरे पद की आकांक्षा मानते हैं और वह अन्वयबोधाभावरूप ( अन्वयबोध के प्रागभाव रूप ) है, कहते हैं।