वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंउपमानलक्षणम् ] उपमानपरिच्छेदः १८१
दोनों में भेद है। इनमें प्रथम सादृश्यज्ञान, द्वितीय सादृश्यज्ञान का जनक ( कारण ) है। और द्वितीय सादृश्यज्ञान, उसका फल ( कार्य ) है। इस प्रकार उनमें जन्य-जनक भाव है। इस सादृश्यज्ञान की उत्पत्ति इन्द्रियादिकों से नहीं होती, अतः उपमान, एक पृथक् प्रमाण सिद्ध होता है।
उपमान को वेदान्ती तथा नैयायिक दोनों के मानने पर भी उसमें जो भेद है, उसे बताना भी अनुचित न होगा।
नैयायिक का अभिमत 'उपमान' प्रमाण—किसी आरण्यक व्यक्ति से 'गवय गोसदृश होता है' सुनकर अरण्य में गये हुए शहरी व्यक्ति का 'गवय' के साथ इन्द्रिय-सन्निकर्ष होने पर 'यह गोसदृश है' ऐसा गोसादृश्यज्ञान होता है। तदनन्तर आरण्यक व्यक्ति के बताये हुए 'गवय, गोसदृश होता है' वाक्यार्थ का स्मरण होता है। इसके पश्चात् 'अयं गवयपदवाच्य = यह गवय पशु 'गवय' शब्द का वाच्य अर्थ है—यह ज्ञान होना ही उपमिति है। इनके मत में उपमान प्रमाण वस्तुबोधक न होकर शक्ति-ग्राहक है। 'गवय' पद की एक विशिष्ट पशु में शक्ति है' इस प्रकार ज्ञान कराना ही 'उपमान' का प्रयोजन है।
परन्तु वेदान्तियों के मत में 'उपमान' का यह प्रयोजन नहीं है। उनके मत में 'अनेन सदृशी मदीया गौः' इस गवय जैसी ही मेरी गौ है—यह ज्ञान होना ही, उपमान का फल ( उपमिति ) है। अनुभव भी 'इस पशु जैसी मेरी गाय है' ऐसा ही होता है। अतः 'गोसदृशो गवयः' इस अतिदेश-वाक्य के स्मृतिरूप व्यापार की कल्पना कर पश्चात् उससे 'गवय, गवयशब्द का वाच्य है' ज्ञान की कल्पना करना, यह सब अनुभव के विरुद्ध है।
नैयायिक 'यह व्यक्ति गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार उपमिति ज्ञान नहीं मानते किन्तु 'गवय, गवयपद का वाच्य है' इस प्रकार के ज्ञान को उपमान का फल ( उपमिति ) बताते हैं।
परन्तु जहाँपर गो, गवय, गज, अज आदि सामने स्थित हों, वहाँ पर इनमें से 'गवय पद का वाच्य कौन सा है' इस प्रकार किसी के प्रश्न कर देने पर उसे 'गवय', गवय पद का वाच्य है उत्तर दिया जाय तो हँसी उड़ेगी। वहाँ तो 'यह व्यक्ति गवय पद का वाच्य है' यही उत्तर देना चाहिये, और ऐसा मानने पर उपमान को शक्ति-ग्राहक नहीं कहा जा सकता। क्योंकि एक गवय की शक्ति को वह दिखा सकेगा किन्तु अन्य गवय में उस शक्ति का ज्ञान कराने में उसका उपयोग नहीं होगा। इसलिये अनुभव के अनुरूप ही उपमिति का स्वीकार करना चाहिये।
शंका— आपके मत में उपमान यदि शक्तिग्राहक नहीं है ( उपमितिरूप प्रमा से यदि गवयादि पदार्थों की शक्ति = वाच्यत्व का ज्ञान नहीं होता ) तो उसका होना ही व्यर्थ है, क्योंकि अनुमान जैसे जगन्मिथ्यात्व को सिद्ध करता है, उस प्रकार उपमान का कोई उपयोग नहीं दिखाई देता।
समाधान— यह शंका ठीक नहीं है, क्योंकि अद्वैतब्रह्मसाक्षात्कार होने तक मुमुक्षु