वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| १८० | वेदान्तपरिभाषा | [ उपमानलक्षणम् |
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सन्निकर्षे सति भवति प्रतीतिः, 'अयं पिण्डो गोसदृश' इति। तदनन्तरं^१ भवति निश्चयः, अनेन सदृशी मदीया गौरिति। तत्रान्वय-व्यतिरेकाभ्यां गवयनिष्ठ-गोसादृश्यज्ञानं करणम्। गोनिष्ठ-गवयसादृश्यज्ञानं फलम्।
अर्थ— अब उपमान प्रमाण का निरूपण किया जाता है। 'सादृश्य प्रमा के करण' को उपमान कहते हैं। वह इस प्रकार है—जिस व्यक्ति ने शहर में गोव्यक्ति को देखा हो, वह अरण्य में जाकर जब 'गवय' को देखता है (चक्षुरिन्द्रिय का गवय के साथ सन्निकर्ष होता है)। उस समय उसे 'यह व्यक्ति, गाय जैसी है' ज्ञान होता है। तदनन्तर उसे 'इस गवय जैसी ही मेरी गाय है' निश्चयात्मक ज्ञान होता है। इन दो ज्ञानों में से अन्वय और व्यतिरेक के बल से गवय में होने वाला जो गोसादृश्यज्ञान (यह गवय, गाय जैसा है) है, वह करण (उपमान) है, और गोनिष्ठ गवय का सादृश्यज्ञान (इसके जैसी ही मेरी गाय है) फल (उपमिति) है।
विवरण— अनुमान का निरूपण करने के अनन्तर उपमान प्रमाण ही निरूपण का विषय होता है। इसीलिए यहाँ उसके निरूपण की प्रतिज्ञा की है। निरूपण का अर्थ है—वस्तु के लक्षण, प्रमाण तथा स्वरूप का कथन करना। उनमें से यहाँ प्रथमतः उपमान का लक्षण कहना है इसलिये ग्रन्थकार ने 'तत्र' शब्द का प्रयोग किया है। 'अनुमान' शब्द के समान ही अव्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्ष्य है और 'उपमीयते अनेन तत् उपमानम्' इस रीति से व्युत्पन्न 'उपमान' शब्द, लक्षण है। सादृश्य, प्रमा (उपमिति) के करण (असाधारण-कारण) को 'उपमान' प्रमाण कहते हैं। नगर में 'गाय' को देखा हुआ व्यक्ति अरण्य में जाकर कदाचित् उसे 'गवय' पशु दिखाई देने पर 'यह प्राणी गाय जैसा है' इस प्रकार गवय में गाय का सादृश्य ज्ञान होना ही उपमान है (यही उपमान का स्वरूप है)। इसके अनन्तर ही 'मेरी गाय इस पशु जैसी ही है' इस प्रकार होने वाली सादृश्यप्रमा को ही उपमिति कहते हैं। अर्थात् उपमानरूप सादृश्यज्ञान और उपमितिरूप सादृश्यप्रमा के मध्य में अन्य कोई व्यापार विद्यमान नहीं रहता। इसलिये 'असाधारणं कारणं करणम्' इतना ही करण-लक्षण यहाँ स्वीकार किया है। उसे व्यापारघटित मानने की यहाँ आवश्यकता नहीं। यहाँ 'सादृश्यज्ञान' को प्रमाण और प्रमा भी कहा है। दोनों के सादृश्यज्ञान-रूप होने पर भी उनमें भेद है।
प्रमाणरूप सादृश्यज्ञान में 'गो' की 'गवय' को उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गो' उपमान और 'गवय' उपमेय है। और प्रमारूप सादृश्यमान में 'गो' को 'गवय' की उपमा दी गई है। अर्थात् इस ज्ञान में 'गवय' उपमान और 'गो' उपमेय है। यही
१. 'रञ्च'—इति पाठान्तरम्।