वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९२ | वेदान्तपरिभाषा | [ आकांक्षा लक्षणम्
क्रिया-श्रवणे कारकस्य कारक-श्रवणे क्रियायाः¹ करण-²श्रवणे इति-कर्तव्यतायाश्च³ जिज्ञासाविषयत्वात्। अजिज्ञासोरपि वाक्यार्थ-बोधाद् योग्यत्वमुपात्तम्। तदवच्छेदकं च क्रियात्व-कारकत्वादिकमिति नाति-व्याप्तिः 'गौरश्व'⁴ इत्यादौ। ⁵अभेदान्वये च समान-विभक्तिक⁶प्रति-पाद्यत्वं तदवच्छेदकमिति तत्त्वमस्यादिवाक्येषु नाव्याप्तिः।
अर्थः-- आकांक्षा, योग्यता, आसत्ति और तात्पर्य ज्ञान, इनमें से पदार्थों की परस्पर जिज्ञासा में विषय होने की योग्यता को आकांक्षा कहते हैं। क्रिया का श्रवण होने पर कारक के ज्ञान की इच्छा उत्पन्न होती है। उसी प्रकार कारक का श्रवण होने पर क्रिया की और करण का श्रवण होते ही इति कर्तव्यता की आकांक्षा होती है। (इस आकांक्षा के लक्षण में 'योग्यत्व' पद की आवश्यकता को बताते हैं) जिज्ञासारहित व्यक्ति को भी वाक्यार्थ का बोध होने से उसमें (बोध में) आकांक्षा का लक्षण अव्याप्त न हो इसलिये लक्षण में 'योग्यत्व' पद दिया है। क्रियात्व, कारकत्व आदि धर्म, उस योग्यता के अवच्छेदक होने से आकांक्षा के लक्षण की 'गो, अश्व, पुरुष' आदि पदसमूह में अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' इत्यादि अभेदान्वय-प्रतिपादक वाक्यों में समान विभक्तिवाले पदों से प्रतिपाद्यत्व ही अवच्छेदक है। इसलिए वहाँ भी लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती।
विवरण— दो अथवा अधिक पदों में से एक पद का श्रवण होने पर उसके ज्ञान के लिये समीपस्थित दूसरे पद के ज्ञान की अपेक्षा होती है। उस दूसरे पद को प्रथम पद की या अन्य पदों की अपेक्षा होती है। ऐसी परस्पर अपेक्षा की योग्यता जिन पदों में रहती है उन पदों को साकांक्ष शब्द कहते हैं। जैसे 'गामानय' गाय को लाओ। इस वाक्य में 'गाम्' और 'आनय' दो पद हैं। वैसे ही 'आनय' मध्यम पुरुष के एकवचन की क्रिया का 'त्वं' कर्ता भी अर्थतः ही प्राप्त होता है। इन तीन पदों में से 'आनय' पद के उच्चारण करते ही, 'क्या लावें और कौन लावे' यह आकांक्षा उत्पन्न होती है। अर्थात् 'आनय' क्रिया को 'गाम्' और 'त्वं' इन कारकों की अपेक्षा होती है। इसी तरह 'गाम्' इस कर्म कारक को 'आनय' क्रिया की अपेक्षा होती है। 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो
१. क्रियायाः आख्यातार्थभावनायाः।
२. करणश्रवणे धात्वर्थश्रवणे।
३. इतिकर्त्तव्यतायाः उपकारकक्रियायाः।
४. 'श्वः पुरुषोहस्ती'-इति पाठान्तरम्।
५. अभेदान्वये क्रियाबोधं विना स्वरूपमात्रान्वये।
६. 'क-पद'-इति पाठान्तरम्।