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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 251, कुल 482 में से

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आकाङ्क्षास्वरूपम् ] आगमपरिच्छेदः १९३

यजेत' स्वर्गोच्छुव्यक्ति दर्श-पूर्णमास याग करे । इस श्रुति-वाक्य से दर्शपूर्णमासयाग, स्वर्ग का करण ( साधन ) है, ऐसा ज्ञान होने पर 'कथम्' इन दर्शपूर्णमासों से स्वर्ग किस प्रकार का साधा जाय—इस प्रकार इति-कर्तव्यता की आकांक्षा होती है अर्थात् 'इति-कर्तव्यता', जिज्ञासा का विषय होती है, और इस आकांक्षा की निवृत्ति 'समिधो यजति' 'इडो यजति'—'समिध् यागादि-प्रयाज' और 'अनुयाजादि' से दर्शपूर्णमास याग को करे, आदि वाक्यों से होती है । इस प्रकार क्रिया को कारक की, कारक को क्रिया की और करण को इति-कर्तव्यता की परस्पर जिज्ञासा होने की योग्यता का होना अर्थात् ऐसी जिज्ञासा उत्पन्न कराने वाले पदों का वाक्य में होना ही आकांक्षा का लक्षण है ।

आकांक्षा का 'जिज्ञासाविषयत्व' इतना लक्षण करने पर भी सर्वत्र समन्वय हो जाता है, तब 'जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्व' इतना गुरुभूत-लक्षण क्यों किया गया है ?

इस आशंका का निराकरण 'अजिज्ञासोः' आदि ग्रन्थ से ग्रन्थकार करते हैं । वाक्यार्थ-ज्ञान की इच्छा न रखने वाले व्यक्ति को भी वाक्य को सुनते ही उसके अर्थ का ज्ञान होता है । परन्तु उस समय उन पदार्थों में जिज्ञासाविषयत्व नहीं रहता । 'जिज्ञासाविषयत्व' मात्र आकांक्षा का लक्षण करने पर ऐसे स्थलों में उसका संभव नहीं हो पाता । अर्थात् इस लक्षण की जिज्ञासारहित वाक्यार्थ बोध में अव्याप्ति होती है । उसे दूर करने के लिये लक्षण में 'योग्यत्व' पद का निवेश आवश्यक है ।

जिज्ञासारहित व्यक्ति को होने वाले वाक्यार्थ-बोध में पदार्थों को परस्पर जिज्ञासा-विषयत्व न होने पर भी उसकी योग्यता उनमें रहती है, अर्थात् वे पदार्थ परस्पर की जिज्ञासा में विषय बनने के योग्य रहते हैं । अतः उक्त अव्याप्ति का निराकरण हो जाता है । पदार्थ में यह योग्यता किस धर्म से आती है ? अर्थात् इस योग्यता का अवच्छेदक ( भेदक ) धर्म कौन-सा आप मानते हैं ? लक्ष्यता के अन्यूनानतिरिक्तवृत्तिधर्म को ही अवच्छेदक कहते हैं । अर्थात् जो धर्म अपने लक्ष्य से अन्यत्र कहीं नहीं रहता और यावत् ( समस्त ) लक्ष्य पर रहता है वही अवच्छेदक बन सकता है । जैसे दण्ड, घट का कारण है । परन्तु दण्ड में घट के प्रति जो कारणता है, वह किस धर्म से है, ऐसी आकांक्षा होने पर, दण्ड में विद्यमान पार्थिवत्व या पीतदण्डत्व को उसका अवच्छेदक नहीं कह सकते । क्योंकि पार्थिवत्व यद्यपि यावत् दण्डों में रहने पर भी दण्डभिन्न घटादिकों पर भी रहता है, इसलिये वह अतिरिक्त वृत्ति है । उसी तरह पीतदण्डत्व, रक्तदण्ड में नहीं रहता । इसलिये वह पीतदण्डत्व, न्यून वृत्ति है, अतः न्यून या अधिक प्रदेश में न रहने वाला ऐसा 'दण्डत्व' धर्म ही वहाँ पर अवच्छेदक है, समझना चाहिये । उसी प्रकार आप प्रकृत स्थल में योग्यता का अवच्छेदक किसे कहते हैं ? अर्थात् योग्यता में अन्यून, अनतिरिक्त वृत्ति कौन-सा धर्म आपको सम्मत है ! 'अर्थवत्पदवत्त्व'—वाक्य में अर्थयुक्त पदों का होना, इसे यदि आप अवच्छेदक मानें तो उस धर्म से अवच्छिन्न हुई योग्यता से घटित जो आकांक्षालक्षण, वह 'गौरश्वः' आदि पदसमूह में,