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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 252, कुल 482 में से

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१९४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आकांक्षास्वरूपम्

अतिव्याप्त होगा। इसलिये उसे अवच्छेदक नहीं मान सकते। इस पर ग्रन्थकार कहते हैं कि हम अर्थवत्पदवत्त्व को योग्यतावच्छेदक नहीं मानते, अपितु कारक पर विद्यमान कारकत्व और क्रिया पर विद्यमान क्रियात्व को ही योग्यतावच्छेदक कहते हैं। केवल 'गाय, घोड़ा, पट' आदि पदों में क्रियात्व या कारकत्व अवच्छेदक नहीं है। इसलिये ऐसे निराकांक्ष पदों पर जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वरूप आकांक्षा का लक्षण अतिव्याप्त नहीं होता। इसी प्रकार इतिकर्तव्यताबोधक वाक्य में इतिकर्तव्यतात्व को ही अवच्छेदक समझना चाहिये। 'गौरश्वः' आदि पद-समूह में अतिव्याप्ति न होने के लिये क्रियात्व, कारकत्व आदिकों को योग्यता का अवच्छेदक मानने पर भी 'तत्त्वमसि' आदि अभेदार्थक वाक्यों में क्रियात्व या कारकत्व आदि का अवच्छेदक होना संभव नहीं। इसलिए उन वाक्यों में इस लक्षण की अव्याप्ति होती है।

समाधान—तत्त्वमस्यादि वाक्यों में क्रियात्व, कारकत्व को हम अवच्छेदक नहीं कहते। किन्तु जिनकी विभक्ति समान ( एक ) है, ऐसे पदों से प्रतिपाद्यत्व को—ऐसे स्थल पर योग्यता का अवच्छेदक हम मानते हैं। 'तत्त्वमसि' इस वाक्य में 'तत्' और 'त्वम्' ये पद, समानविभक्तिक हैं, अर्थात् दोनों को ही 'प्रथमा' यह एक ही विभक्ति है। और उन पदों से जीव और ब्रह्म का अभेद प्रतिपाद्य है। अतः उपर्युक्त अव्याप्ति नहीं हो पाती।

समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व को अवच्छेदक मानने पर 'गौरश्वः' आदि स्थल में लक्षण की पुनः अतिव्याप्ति होती है। क्योंकि वहाँ पर 'गौः' और 'अश्वः' आदि पद भी एक ही प्रथमा विभक्ति में हैं।

परन्तु यह शंका ठीक नहीं है। क्योंकि 'गौरश्वः' आदि पदसमूह से वहाँ अभेद प्रतिपाद्य नहीं है। गाय कभी अश्व नहीं होती, और न अश्व कभी गाय। इसलिये उन पदों को अभेद-प्रतिपादक मानना प्रत्यक्ष विरुद्ध होगा। अर्थात् उनका अभेदार्थ मानने के लिए योग्यतारूप कारण के अभाव में ( न होने पर ) उन पदों में भेदान्वय का होना संभव नहीं। इसलिये समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व रूपावच्छेदक, जो अभेदान्वय योग्यता स्थल में अवश्य अपेक्षित होता है उसका यहाँ संभव नहीं है। इसलिए उक्त अतिव्याप्ति की शंका करना ठीक नहीं है। इस प्रकार भेदान्वयस्थल में क्रियात्व-कारकत्वादि को और अभेदान्वय स्थल में समानविभक्तिकपद-प्रतिपाद्यत्व को ही, योग्यता का अवच्छेदक धर्म कहते हैं। यद्यपि सर्वत्र एक अवच्छेदक मानने में गौरव है तथापि वह फलमुख होने से उस पर अननुगम रूप दोष नहीं आता।

नैयायिक आकांक्षा का इस प्रकार लक्षण करते हैं—

'पदस्य पदान्तरव्यतिरेकप्रयुक्तान्वयाननुभावकत्वम्' इसका अर्थ इस प्रकार है—अपने को अपेक्षित दूसरे पद के अभाव के कारण ( अनुच्चारण के कारण ) एक पद का