वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९५
शाब्दबोध न होना ही आकांक्षा है। जैसे—'गामानय' = गाय लाओ। यह वाक्य है। परन्तु यदि कोई 'गाम्' इतना ही पद कहे, तो उसे अपेक्षित 'आनय' पद के अभाव के कारण 'गाम्' पद से अन्वय का ( शाब्द-ज्ञान का ) बोध नहीं होता। अर्थात् 'गाम्' के साथ 'आनय' पद का उच्चारण होने पर ही अन्वय-बोध होगा। बिना उसके नहीं होगा। इसलिये वह वाक्य साकांक्ष है और ऐसे आकांक्षायुक्त वाक्य से ही वाक्यार्थबोध होता है। नैयायिकों के आकांक्षालक्षण का यह आशय है।
परन्तु यह नैयायिकाभिमत आकांक्षा, वाक्यार्थ-निर्णयक मीमांसकों को मान्य नहीं है। इसलिये वह अग्राह्य है। वाक्यार्थ के निर्णयार्थ ही मीमांसा प्रवृत्त हुई है। इसलिये वाक्यार्थ-निर्णय के प्रसंग में मीमांसकों का मत ही अधिक ग्राह्य है। इसी आशय से ग्रन्थकार कहते हैं—
'एतादृशाकाङ्क्षाऽभिप्रायेणैव बलाबलाधिकरणे 'सा वैश्वदेव्या- मिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' इत्यत्र वैश्वदेव-यागस्यामिक्षाऽन्वितत्वेन न वाजिनाकाङ्क्षेत्यादिव्यवहारः।
**अर्थ—**हमारा बताया हुआ आकांक्षा का लक्षण मीमांसकों को भी अभिमत होने से उन्होंने भी इसी प्रकार की आकांक्षा को मानकर बलाबलाधिकरण में 'वह आमिक्षा वैश्वदेवी (विश्वेदेव देवताक) है, और वाजिन वाजिदेवताक है' इस वाक्य का विचार करते समय वहाँ पर वैश्वदेव याग का आमिक्षा के साथ अन्वय होने से वाजिनान्वय की उसे आकांक्षा नहीं रहती। इसलिये वैश्वदेवयाग का वाजिन से अन्वय नहीं होता, कहा है।
**विवरण—**पूर्वमीमांसा के तीसरे अध्याय के तीसरे पद में 'बलाबलाधिकरण' नामक अधिकरण है। 'सन्दिग्ध-वाक्यार्थ का विषय, संशय, पूर्वपक्ष, उत्तरपक्ष और संगति, इन पाँच अवयवों से निर्णय करना' इसे 'अधिकरण' यह पारिभाषिक संज्ञा मीमांसकों की है। इस अधिकरण में श्रुति, लिङ्ग आदिकों के दौर्बल्य, प्राबल्य का विचार किया है। इस कारण इसे 'बलाबलाधिकरण' कहते हैं। इस अधिकरण का संक्षिप्त स्वरूप इस प्रकार है—'श्रुति-लिङ्ग-वाक्य-प्रकरण-स्थान-समाख्यानां समवाये पारदौर्बल्यमर्थविप्रकर्षात्' (जै० सू० ३।३।१४)। इस सूत्र ने श्रुत्यादिकों के बलाबल का निर्णय किया है। यहाँ पर श्रुति-लिङ्गादिकों के बलाबल का विचार ही विषय है। क्योंकि एक ही स्थल में जब श्रुति-लिङ्ग आदि अनेक की प्राप्ति होती है, तब उनमें से
१. 'येन विना यस्यान्वयाननुभावकत्वं तत्त्वमाकांक्षा' इत्यङ्गीकारे तादृशाकांक्षायाः वाजिभ्यो वाजिनमित्यत्र वाजिनस्य विश्वदेवयागसम्बन्धेऽपि सत्त्वात् बलाबलाधिकरण-विरोधः आपद्येत, तत्परिहारार्थं 'जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वं पदार्थनिष्ठमेवाकांक्षा' इत्येवं युक्तम्।