वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें१९६ | वेदान्तपरिभाषा- | [ बलाबलाधिकरणविचारः
प्रबल और दुर्बल प्रमाण का विचार कर दुर्बल का बाध करके प्रबल प्रमाण के द्वारा निर्णय करना होता है। इस विषय में मीमांसा का उदाहरण इस प्रकार है—"ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते" यह श्रुति, 'ऐन्द्रीऋचा से गार्हपत्य का उपस्थान करे,' बताती है। और 'कदाचन स्तरीरसि नेन्द्रसश्चसि दाशुषे' इस वचन में 'इन्द्र' यह लिङ्ग उससे उस मन्त्र का इन्द्रोपस्थान में विनियोग करना बताया गया है। ऐसी परिस्थिति में लिङ्ग से श्रुति का बाध करके इन्द्रोपस्थान किया जाय ? या श्रुति से लिङ्ग का बाध कर गार्हपत्योपस्थान किया जाय ? ऐसा संशय उपस्थित होता है।
इस पर इस प्रकार पूर्वपक्ष किया जाता है—जब कि श्रुति, गार्हपत्य का उपस्थान (स्तवन) करने को कहती है ओर 'इन्द्र' रूप लिङ्ग इन्द्रोपस्थान करना बता रहा है, तब 'व्रीहिभिर्यजेत' 'यवैर्जुहोति' यहाँ पर जैसे व्रीहि से अथवा यव से याग करे—ऐसा विकल्प स्वीकार किया गया है, वैसे ही यहाँ पर भी अपनी इच्छा के अनुसार इन्द्र या गार्हपत्य का उपस्थान करे, अर्थात् उनके उपस्थान का विकल्प या समुच्चय समझा जाय।
ऐसा पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर उपर्युक्त 'श्रुतिलिङ्गवाक्य०' आदि सूत्र से सिद्धान्त बताया है। जो इस प्रकार है—'श्रुति, लिङ्ग, वाक्य, प्रकरण, स्थान, समाख्या इनकी एकत्र प्राप्ति होने पर आगे-आगे के लिङ्गादि दुर्बल हैं। अर्थात् लिङ्गादि पाँचों की अपेक्षा श्रुति प्रबल है। वाक्यादिकों की अपेक्षा लिंग प्रबल, और सबकी अपेक्षा समाख्या दुर्बल है। गार्हपत्योपस्थानरूप श्रुत्यर्थ संनिकृष्ट है और इन्द्रोपस्थान रूप लिंगगम्य अर्थ विप्रकृष्ट है। गार्हपत्योपस्थान रूप अर्थ साक्षात् श्रुति के द्वारा बताये जाने के कारण प्रथमतया बुद्धि में शीघ्र उपस्थित होता है परन्तु 'इन्द्र' रूप लिंग का अर्थ शीघ्र उपस्थित नहीं होता। क्योंकि लिंग से इतना ही प्रतीत होता है कि इन्द्र का और इस मंत्र का सम्बन्ध है, इतना ही अर्थ प्रथमतः मन में उपस्थित होता है और पश्चात् 'जब कि इनका सम्बन्ध है तब इस ऋचा से इन्द्रोपस्थान करे' इस प्रकार श्रुति का अनुमान करना पड़ता है। इस प्रकार 'ऐन्द्रया इन्द्रमुपतिष्ठेत्' ऐसी श्रुति की कल्पना करने से पूर्व ही उक्त श्रुति 'ऐन्द्रया गार्हपत्यमुपतिष्ठते' स्वार्थ का विधान कर देती है। यही न्याय लिंगादि अन्य प्रमाणों की ओर लगाकर उनके द्वारा वाक्यादिकों का बाध समझना चाहिए। इस अध्याय का विषय अंगांगिभाव बताना होने से ही उसके अनुरूप संगति की कल्पना कर लेनी चाहिये।
प्रकृत में बलाबलाधिकार का स्वरूप बताने का प्रयोजन यह है कि वाक्य और श्रुति की एक जगह प्राप्ति होने पर श्रुति के द्वारा वाक्य का बाध किस प्रकार होता है, इसका 'आमिक्षावाजिनन्याय' उदाहरण है। इस अधिकरण का भी संक्षेप में स्वरूप बताते हैं—'तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा वाजिभ्यो वाजिनम्' इस श्रुति वाक्य का अर्थ इस प्रकार है—तपे हुए दूध में दही डालने पर फटे हुए दूध में जो घनभाग तैयार होता है—वह आमिक्षा, वैश्वदेवी = विश्वेदेवदेवता की है, और जो पानी