वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंबलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९७
बचा रहता है उसे 'वाजिन' कहते हैं, वह वाजिदेवताओं के लिए है। इस अधिकरण में 'वाजिभ्यो वाजिनम्' रूप वाक्यांश, विषय है। यहाँ पर जिसका वाज ( आमिक्षा रूप अन्न ) है—वह वाजी, इस ( मत्वर्थीय इन् ) व्युत्पत्ति से वाजि शब्द, विश्वेदेवबोधक है, और वैश्वदेव याग में ही वाजिन द्रव्य का विधान है ? या वाजी नामक कोई अन्य देवता है, और उसका बोधक यह वाजिन शब्द है, ऐसा समझ कर वाजिदेवताक एक स्वतन्त्र याग का विधान है ? इस प्रकार संशय उत्पन्न होता है। तब पूर्वपक्ष इस प्रकार करते हैं—उक्त व्युत्पत्ति से वाजिन में वैश्वदेव याग का ही अंगत्व समझना चाहिये।
शंका—'तप्ते पयसि-वाक्य में आमिक्षा नामक द्रव्य भी कहा गया है तब उस उत्पत्तिशिष्ट आमिक्षा द्रव्य से वाजिन का बाध होगा' परन्तु यह कहना ठीक नहीं, क्योंकि दोनों का जब कि विधान है तब इन दो द्रव्यों का विकल्प समझ लिया जाय अथवा वाजिन तथा आमिक्षा दोनों का समुच्चय कर ( मिलाकर ) वैश्वदेव याग करे।
इस पर सिद्धान्त किया गया कि—वाजिन में वैश्वदेवयागांगत्व का होना संभव नहीं। क्योंकि 'वैश्वदेवी आमिक्षा' यहाँ वैश्वदेवी शब्द से 'विश्वेदेव जिसकी देवता है' यह अर्थ विवक्षित है। विश्वेदेव शब्द से 'साऽस्य देवता' इस पाणिनिसूत्र से देवता अर्थ में तद्धित 'अण्' प्रत्यय किया है। इसलिये आमिक्षा की विश्वेदेव रूप देवता तद्धित-श्रुतिरूप प्रमाण से प्राप्त है, और वाजिन का विश्वेदेव से जो सम्बन्ध होगा, यह 'समभिव्याहाररूप वाक्य' से ही होगा। अतः श्रुति-प्रमाण, वाक्य-प्रमाण की अपेक्षा प्रबल होने से श्रुति से वाक्यप्राप्त 'वाजिन' का बाध होता है। क्योंकि वैश्वदेव-याग की देवता-विषयक आकांक्षा, तद्धितश्रुति से प्राप्त होने के कारण प्रबल हुई 'आमिक्षा' से ही शान्त होती है, पुनश्च उस याग को 'वाजिन' की आकांक्षा नहीं रहती। क्योंकि 'वाजिन' से अन्वय करते समय वह 'वाजिन,' निराकांक्ष हुए 'वैश्वदेव' याग की जिज्ञासा में विषय होने के योग्य नहीं है। इसलिये यहाँ 'वाजिन' और 'अमिक्षा' का विकल्प या समुच्चय स्वीकार न कर आमिक्षा से वैश्वदेव याग करे और वाजिन द्रव्य से वाजिदेवताक स्वतंत्र ( पृथक् ) याग करे। इस प्रकार दो पृथक् यागों का विधान है।
ग्रन्थकार ने जो पदार्थ, जिज्ञासा के विषय होने में योग्य रहता है तद्विषयक ही आकांक्षा मीमांसकों को मान्य होती है। नैयायिकों की अभिमत आकांक्षा, प्रमाणरहित होने से मान्य नहीं है। अतः उसका स्वीकार न किया जाय, यह कथन करने के लिये ही यहाँ बलाबलाधिकरण का और आमिक्षा का उल्लेख किया है। इससे वेदान्तियों का बताया आकांक्षा-लक्षण ही युक्त है।
अब नैयायिकाभिमत आकांक्षा और मीमांसकों से बताई हुई आकांक्षा में क्या भेद है ? और नैयायिक के पक्ष में कौन से दोष हैं, उन्हें बताते हैं। नैयायिक—एक पद को दूसरे पद की आकांक्षा मानते हैं और वह अन्वयबोधाभावरूप ( अन्वयबोध के प्रागभाव रूप ) है, कहते हैं।