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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 256, कुल 482 में से

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पृष्ठ 256
१९८वेदान्तपरिभाषा[ बलाबलाधिकरणविचारः

वेदान्ती—आकांक्षा, पदों में न मानकर उनके अर्थों में स्वीकार करते हैं। और वह 'अन्वय-बोध'-प्रागभावस्वरूप न होकर, जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्वरूप ( भावरूप ) स्वीकार करते हैं। नैयायिकों के समान आकांक्षा को पदनिष्ठ और अभाव रूप मानने पर 'तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा, वाजिभ्यो वाजिनम्' इस श्रुतिवाक्य में-वैश्वदेव-याग का जैसा आमिक्षा से अन्वय होता है, उसी प्रकार वाजिन से भी अन्वय होने लगेगा और इस याग के दो द्रव्य हैं, ऐसा अनुपपन्न अर्थ स्वीकार करना पड़ेगा। जिससे कर्म में विप्रतिपत्ति होगी। क्योंकि 'आमिक्षा' पद के समान 'वाजिन' पद को भी विश्वेदेवान्वयबोधप्रागभावरूप आकांक्षा है ही। तस्मात् आकांक्षा, वाजिनादि पदों में न होकर अर्थ में रहती है, और वह अन्वयबोधाभावरूप न होकर जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वरूप ही स्वीकार करनी चाहिये।

आपके कथनानुसार आकांक्षा का लक्षण स्वीकार करने पर भी वाजिन का वैश्वदेव के साथ अन्वय होने का अतिप्रसंग नहीं टलता। अर्थात् आपका आकांक्षा का लक्षण निराकांक्ष ( आकांक्षारहित ) वाजिन में अतिव्याप्त होता है। इस आशय की शंका कर ग्रन्थकार उसका-समाधान भी करते हैं।

ननु तत्रापि वाजिनस्य जिज्ञासाऽविषयत्वेऽपि तद्योग्यत्वमस्त्येव। प्रदेय-द्रव्यत्वस्य यागनिरूपित-जिज्ञासा-विषयता^१वच्छेदकत्वादिति चेत्, न। ^२स्व-समानजातीय-पदार्थान्वय-बोध^३विरहसहकृतप्रदेय-द्रव्यत्व^४स्यैव तदवच्छेदकत्वेन वाजिनद्रव्यस्य ^५स्वसमानजातीयामिक्षा-


१. 'तायोग्यता'-इति पाठान्तरम्।
२. स्वसमानजातीयेत्यत्र 'स्व'पदं यस्मिन् 'जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वमभिमतं'तत्परम्। तस्य समानजातीयः प्रदेयद्रव्यत्वेन समभिव्याहृतत्वेन वा सदृशः यः पदार्थः तस्य योऽन्वय-बोधविरहः अन्वयबोधाभावः तेन सहकृतं विशिष्टं यत् प्रदेयद्रव्यत्वं तस्यैवेत्यर्थः। एवकारेण अविशिष्टप्रदेयद्रव्यत्वस्य योग्यतावच्छेदकत्वनिरासः।
३. 'घासह'-इति पाठान्तरम्।
४. 'स्य तद'-इति पाठान्तरम्।
५. स्वसमानजातीयेत्यत्र 'स्व'पदं वाजिनपरम्। तस्य समानजातीयं प्रदेयद्रव्यत्वेन सदृशं यत् आमिक्षाद्रव्यं, तस्य यो वैश्वदेवयागे अन्वयबोधः तेन सहकृतत्वेन विशिष्टत्वेन। अनेन वाजिननिष्ठप्रदेयद्रव्यत्वे विशेषणाभावः प्रदर्शितः। तादृशावच्छेदकत्वाभावात् परस्परजिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकत्वाऽभावात्। यस्मात् वाजिनद्रव्यनिष्ठं प्रदेयद्रव्यत्वं स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोध-सहकृतं, तस्मात् तत् न स्वसमानजातीय-पदार्थान्वय-बोधविरहसहकृतम्। तेन तत्र तादृशान्वयबोधविरहकृतप्रदेयद्रव्यत्वाभावे सिद्धे, सिद्धो

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