भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ
१९८वेदान्तपरिभाषा[ बलाबलाधिकरणविचारः

वेदान्ती—आकांक्षा, पदों में न मानकर उनके अर्थों में स्वीकार करते हैं। और वह 'अन्वय-बोध'-प्रागभावस्वरूप न होकर, जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्वरूप ( भावरूप ) स्वीकार करते हैं। नैयायिकों के समान आकांक्षा को पदनिष्ठ और अभाव रूप मानने पर 'तप्ते पयसि दध्यानयति सा वैश्वदेव्यामिक्षा, वाजिभ्यो वाजिनम्' इस श्रुतिवाक्य में-वैश्वदेव-याग का जैसा आमिक्षा से अन्वय होता है, उसी प्रकार वाजिन से भी अन्वय होने लगेगा और इस याग के दो द्रव्य हैं, ऐसा अनुपपन्न अर्थ स्वीकार करना पड़ेगा। जिससे कर्म में विप्रतिपत्ति होगी। क्योंकि 'आमिक्षा' पद के समान 'वाजिन' पद को भी विश्वेदेवान्वयबोधप्रागभावरूप आकांक्षा है ही। तस्मात् आकांक्षा, वाजिनादि पदों में न होकर अर्थ में रहती है, और वह अन्वयबोधाभावरूप न होकर जिज्ञासा-विषयत्व-योग्यत्वरूप ही स्वीकार करनी चाहिये।

आपके कथनानुसार आकांक्षा का लक्षण स्वीकार करने पर भी वाजिन का वैश्वदेव के साथ अन्वय होने का अतिप्रसंग नहीं टलता। अर्थात् आपका आकांक्षा का लक्षण निराकांक्ष ( आकांक्षारहित ) वाजिन में अतिव्याप्त होता है। इस आशय की शंका कर ग्रन्थकार उसका-समाधान भी करते हैं।

ननु तत्रापि वाजिनस्य जिज्ञासाऽविषयत्वेऽपि तद्योग्यत्वमस्त्येव। प्रदेय-द्रव्यत्वस्य यागनिरूपित-जिज्ञासा-विषयता^१वच्छेदकत्वादिति चेत्, न। ^२स्व-समानजातीय-पदार्थान्वय-बोध^३विरहसहकृतप्रदेय-द्रव्यत्व^४स्यैव तदवच्छेदकत्वेन वाजिनद्रव्यस्य ^५स्वसमानजातीयामिक्षा-


१. 'तायोग्यता'-इति पाठान्तरम्।
२. स्वसमानजातीयेत्यत्र 'स्व'पदं यस्मिन् 'जिज्ञासाविषयत्वयोग्यत्वमभिमतं'तत्परम्। तस्य समानजातीयः प्रदेयद्रव्यत्वेन समभिव्याहृतत्वेन वा सदृशः यः पदार्थः तस्य योऽन्वय-बोधविरहः अन्वयबोधाभावः तेन सहकृतं विशिष्टं यत् प्रदेयद्रव्यत्वं तस्यैवेत्यर्थः। एवकारेण अविशिष्टप्रदेयद्रव्यत्वस्य योग्यतावच्छेदकत्वनिरासः।
३. 'घासह'-इति पाठान्तरम्।
४. 'स्य तद'-इति पाठान्तरम्।
५. स्वसमानजातीयेत्यत्र 'स्व'पदं वाजिनपरम्। तस्य समानजातीयं प्रदेयद्रव्यत्वेन सदृशं यत् आमिक्षाद्रव्यं, तस्य यो वैश्वदेवयागे अन्वयबोधः तेन सहकृतत्वेन विशिष्टत्वेन। अनेन वाजिननिष्ठप्रदेयद्रव्यत्वे विशेषणाभावः प्रदर्शितः। तादृशावच्छेदकत्वाभावात् परस्परजिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकत्वाऽभावात्। यस्मात् वाजिनद्रव्यनिष्ठं प्रदेयद्रव्यत्वं स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोध-सहकृतं, तस्मात् तत् न स्वसमानजातीय-पदार्थान्वय-बोधविरहसहकृतम्। तेन तत्र तादृशान्वयबोधविरहकृतप्रदेयद्रव्यत्वाभावे सिद्धे, सिद्धो

बलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः १९९

द्रव्यानवयबोधसहकृतत्वेन तादृशावच्छेद^१काभावात् । ^२आमिक्षायां तु नैवम्, वाजिना^३ऽन्वयस्य तदाऽनुपस्थितत्वात् ।

उदाहरणात्तरेष्वपि दुर्बलत्वप्रयोजक आकाङ्क्षा-विरह एव द्रष्टव्यः ।

अर्थ—'तप्ते पयसि' इत्यादि वाक्य में भी वाजिन को—वैश्वदेव-याग की जिज्ञासा का विषयत्व न होने पर भी जिज्ञासा का विषय होने की योग्यता है ही । (वैश्वदेव याग को वाजिन की आकांक्षा होना रूप दोष आपके पक्ष में भी आता ही है) क्योंकि प्रकृत में यागनिरूपित (याग में जिज्ञासाविषयत्व होने की योग्यता का) अवच्छेदक 'प्रदेयद्रव्यत्व' (देने के योग्य द्रव्य होना) है, और वह प्रकृत वाजिन में भी है ।

परन्तु यह कहना ठीक नहीं । क्योंकि हम केवल 'प्रदेयद्रव्यत्व' को ही योग्यता का अवच्छेदक नहीं मानते । किन्तु स्वसमानजातीय पदार्थ के अन्वयबोधाभाव से सहकृत (युक्त) प्रदेयद्रव्यत्व ही प्रकृत स्थल में योग्यता का अवच्छेदक है । इस कारण 'वाजिन' से अन्वय करते समय उक्त अवच्छेदक नहीं है, किन्तु 'आमिक्षा' से याग का अन्वय करते समय उक्त योग्यतावच्छेदक (प्रदेयत्व) उसमें रहता है । क्योंकि आमिक्षा से याग का अन्वय करते समय उसका वाजिन से अन्वय उपस्थित (प्राप्त) ही नहीं होता । इसी प्रकार अन्य उदाहरणों में भी (श्रुति-लिंग आदि की युगपत्प्राप्तिरूप उदाहरणों में भी) श्रुति से अन्य लिंगादि प्रमाणों में 'पारदौर्बल्य' न्याय से आकांक्षा का अभाव रहता है, यह समझ लेना चाहिये ।

**विवरण—**शंका करने वाले का आशय यह है कि—आप 'जिज्ञासा के विषयत्व को तो आकांक्षा का लक्षण मानते नहीं, किन्तु आपके मत में 'जिज्ञासाविषयत्व-योग्यत्व' ही आकांक्षा का लक्षण है । परन्तु ऐसा मानने पर 'वाजिन का भी वैश्वदेव-याग से अन्वय होने लगेगा' इस प्रकार का दोष आपके पक्ष में भी स्थित है । क्योंकि वैश्वदेव-याग की आकांक्षा, श्रुति-प्रमाण से प्राप्त आमिक्षा से ही शान्त हो जाने के कारण उस याग की जिज्ञासा में 'वाजिन' के विषय न होने पर भी उसमें (वाजिन में) जिज्ञासा का विषय


जिज्ञासाविषयत्वयोग्यतावच्छेदकत्वाभावः, तादृशप्रदेयद्रव्यत्वस्यैव योग्यतावच्छेदकत्वात् तस्य चात्राभावात् ।

१. 'कत्वाभा'-इति पाठान्तरम् ।
२. आमिक्षायान्तु न स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोधसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वमस्ति । यदा तत्र स्वसमानजातीयपदार्थान्वयबोधसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वं स्यात्, तदा तत्र स्वसमानजातीय-पदार्थान्वयबोधविरहसहकृतप्रदेयद्रव्यत्वं न स्यात्, तादृशयोग्यतावच्छेदकस्य तादृशप्रदेय-द्रव्यत्वस्य अभावेन तादृशयोग्यत्वरूपाकांक्षाऽपि न स्यात्, किन्तु न तथास्ति ।
३. 'नोऽन्व'-इति पाठान्तरम् ।

२०० वेदान्तपरिभाषा [ बलाबलाधिकरणविचारः

बनने की योग्यता तो है ही। कारण यह है कि प्रकृत स्थल में याग की योग्यत्व रूप आकांक्षा का अवच्छेदक, प्रदेयद्रव्यत्व को ही मानना चाहिये। तथाहि--

याग का अर्थ है—देवता के उद्देश्य से द्रव्य का त्याग (दान)। उस त्याग (दातु) को देय पदार्थ (वस्तु) की अपेक्षा रहती है। अर्थात् 'किस वस्तु का त्याग (दान) करें, ऐसी द्रव्याकांक्षा याग को होती है, तब समीप में पठित प्रदेय-द्रव्य से वह आकांक्षा पूर्ण होती है। अतः जो द्रव्य सन्निहित होते हैं, वे 'देने के योग्य हैं' ऐसा निश्चित होते ही वे द्रव्य, याग की जिज्ञासा के विषय होते हैं। अर्थात् आमिक्षादि द्रव्यों में जिज्ञासा का विषय होने की योग्यता ही, योग्यता का अवच्छेदक धर्म है अर्थात् 'प्रदेयद्रव्यत्व' ही अवच्छेदक धर्म है, यह आपको मानना चाहिये। ऐसा मानने पर वह प्रदेय-द्रव्यत्व जैसे आमिक्षा में है वैसे ही वाजिन में भी है। क्योंकि वाजिन, आकाश जैसा अदेय (देने के अयोग्य) पदार्थ तो है नहीं। जिस प्रकार अामिक्षा प्रदेय-द्रव्य है उसी प्रकार 'वाजिन' भी है। इसलिये उस अवच्छेदक से अवच्छिन्न (युक्त) योग्यत्वरूप आकांक्षालक्षण, प्रकृत 'वाजिन' में अतिव्याप्त होता है। अतः हमारे पक्ष में जो दोष आपने दिया, वही आपके मत में भी आता है।

इस पूर्वपक्ष का 'इति चेत्' पदों से अनुवाद कर 'न' आदि ग्रन्थ से उसका समाधान बताया है। उसका आशय इस प्रकार है—हम प्रदेय-द्रव्यत्व मात्र को ही यहाँ योग्यता का अवच्छेदक मानते होते तो आपके कथनानुसार वह दोष हमारे पक्ष में भी आया होता। परन्तु हम केवल प्रदेय-द्रव्यत्व को योग्यतावच्छेदक नहीं मानते और वैसा मानना उचित भी नहीं है। कारण यह है कि द्रव्य में, प्रदेयत्व धर्म के होने मात्र से ही वह द्रव्य (पदार्थ) याग की जिज्ञासा का विषय होने योग्य रहता ही है यह नियम यदि कर दिया जाय ('प्रदेयद्रव्यत्व' मात्र ही योग्यता का अवच्छेदक मानने पर) तो जिस वाक्य से एक बार शाब्दबोध हो गया है उसी से पुनः शाब्दबोध होने का प्रसंग प्राप्त होगा। अर्थात् 'वैश्वदेवी आमिक्षा' इस वाक्य से एक बार 'आमिक्षा से वैश्वदेव-याग करें' यह अर्थ प्रतीत होने पर भी आमिक्षा का प्रदेय-द्रव्यत्व रूप धर्म निवृत्त न होने से पुनः-पुनः उस वाक्य से वही अर्थ प्रतीत होने का अतिप्रसंग प्राप्त होगा। इसलिये प्रदेयद्रव्यत्वरूप धर्म को योग्यतावच्छेदक नहीं स्वीकार कर सकते। अतः हम 'प्रदेय-द्रव्यत्व में 'स्वसमानजातीय०' इत्यादि विशेषण देकर जो प्रदेयद्रव्यत्व, अपने सहित कहे गये अन्य प्रदेयद्रव्य के अन्वयबोधाभाव से युक्त होने का (जिस प्रदेय-द्रव्य का याग के साथ अन्वय होते समय यागसन्निधिपठित अन्य द्रव्य से अन्वित होने का) ज्ञान यदि न हो तो उस प्रदेय-द्रव्य में प्रदेयद्रव्यत्वरूप धर्म ही, योग्यता का अवच्छेदक होता है' ऐसा मानते हैं। यहाँ 'स्वसमानजातीयपदार्थान्वयबोधाभाव' विशेषण है और 'प्रदेयद्रव्यत्व' विशेष्य है। इस विशेषण से विशिष्ट हुए प्रदेयद्रव्यत्व को ही अवच्छेदक माना है। इस कारण उन विशेषण-विशेष्य में से एक के न होने पर भी विशिष्टाभाव सिद्ध होता है।

बलाबलाधिकरणविचारः ] आगमपरिच्छेदः २०१

वाजिन में 'प्रदेयद्रव्यत्व' रूप विशेष्य तो है परन्तु 'अन्यबोधाभाव' रूप विशेषण नहीं है। कारण यह है कि याग का वाजिन के साथ अन्वय करते समय अपने साथ पढ़े गये आमिक्षा द्रव्य के साथ याग के अन्वय का ज्ञान हुआ रहता है। इसलिये विशेषण के न होने से 'विशिष्टद्रव्यत्व' वहाँ नहीं है। अर्थात् वाजिन में हमारा माना हुआ विशिष्टयोग्यतावच्छेदक न होने से वह (वाजिन) याग की जिज्ञासा के विषय होने योग्य नहीं है। इसलिये हमारे पक्ष में कोई दोष नहीं आने पाता।

इस पर यदि आप कहें कि इस प्रकार के विशिष्ट अवच्छेदक के मानने पर याग का आमिक्षा के साथ भी अन्वय न हो सकेगा। क्योंकि अमिक्षा के साथ अन्वित होते समय याग का अपने समीप में पठित वाजिन के साथ अन्वय होने का ज्ञान नहीं है, नहीं कहा जा सकता। (याग और वाजिन के अन्वय का ज्ञान तो रहता ही है) अर्थात् वाजिन के साथ उसके अन्वय का ज्ञान होते रहने से 'अन्वयबोधाभाव' रूप विशेषण वहाँ भी नहीं है, तब आपका विशिष्ट अवच्छेदक वहाँ कैसे होगा ? उसके न होने पर आमिक्षा, यागनिरूपित (याग की) जिज्ञासा का विषय भी कैसे बनेगी ? अर्थात् ऐसे अवच्छेदक के मानने पर याग की जिज्ञासा का विषय न 'वाजिन' होता है और न आमिक्षा' ही होती है। क्योंकि जैसे वाजिन से अन्वय होते समय आमिक्षान्वय उपस्थित रहता है उसी प्रकार आमिक्षा से अन्वय करते समय वाजिनान्वय भी उपस्थित रहता है।

परन्तु यह शंका ठीक नहीं है, कारण, वाजिनान्वय जैसी आमिक्षान्वय के समय स्थित नहीं है। 'आमिक्षा', श्रुतिप्रमाण से प्राप्त है, इसलिये वह वाक्य-प्रमाण से प्राप्त होने वाले वाजिन की अपेक्षा पूर्वोक्त बलाबलाधिकरण-न्याय से प्रबल है। प्रबल होने से 'आमिक्षा' का याग के साथ प्रथमतः अन्वय होता है, उस समय वाजिनान्वय की प्राप्ति भी नहीं रहती। क्योंकि वाक्य से प्राप्त 'वाजिन', प्रथम लिङ्ग की तदनन्तर श्रुति की कल्पना कर याग के साथ अन्वित होने के योग्य हो पाता है। परन्तु 'आमिक्षा' साक्षात् श्रुत होने से उसे अन्वित होने में अन्य प्रमाणों की अपेक्षा नहीं रहती। इसलिये वह प्रथम क्षण में ही याग से अन्वित होती है। उस समय वाजिनान्वयबोध का अभाव रहता है। उससे (अभाव से) विशिष्ट अवच्छेदक का होना आमिक्षा में संभव है। अत एव याग को आमिक्षाविषयक जिज्ञासा होती है, और उसकी पूर्ति प्रत्यक्षश्रुत आमिक्षा से होती है। तत्पश्चात् वाजिनान्वय के समय में आमिक्षान्वयबोध के विद्यमान होने से उक्त योग्यतावच्छेदक का वाजिन होना सम्भव नहीं। इस कारण 'वाजिन से याग का अन्वय होने लगेगा' यह दोष हमारे पक्ष में नहीं होता।

इसी न्याय से जहाँ श्रुति-लिङ्गादिकों में से दो की प्राप्ति होगी वहाँ श्रुत होने से प्रबल हुए पदार्थ के साथ एक बार अन्वय होने के बाद, दुर्बल लिङ्गादिकों से प्राप्त पदार्थ के साथ याग का अन्वय नहीं होता, समझ लेना चाहिये। तस्मात् उक्त विशिष्ट-योग्यतावच्छेदक से युक्त आकांक्षा-लक्षण, जो पूर्वोत्तर-मीमांसा सम्मत है, सर्वथा समुचित

२०२ | वेदान्तपरिभाषा | [ योग्यतानिरूपणम्

है। इस प्रकार आकांक्षा का लक्षण बताकर अब योग्यतारूप (वाक्यार्थ ज्ञान के) कारण का निरूपण करते हैं—

योग्यता च तात्पर्यविषयीभूत-¹संसर्गाबाधः। वह्निना सिञ्चं-तीत्यादौ तादृशसंसर्गबाधान्न योग्यता। 'स प्रजापतिरात्मनोवपा-मुदखिदत्' इत्यादावपि तात्पर्य-विषयीभूत ³-पशुप्राशस्त्याबाधाद् योग्यता। तत्त्वमस्यादिवाक्येष्वपि वाच्याभेद-बाधेऽपि ⁴लक्ष्यस्वरूपा-भेदे बाधाभावाद् योग्यता।

अर्थ—'तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग का बाध न होना' ही योग्यता है। 'अग्नि से सिंचन करता है' आदि वाक्य में योग्यता नहीं है। क्योंकि उस वाक्य का अग्निकरणक आद्रीकरणरूप अर्थ प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित होता है। 'उस प्रजापति ने अपनी वपा (पेट के भीतर की कोमल महीन वस्तु) को खींचकर निकाला और उससे अग्नि में हवन किया' आदि वाक्य का पशुप्राशस्त्य ही तात्पर्यविषयीभूत अर्थ है ओर वह किसी प्रमाण से बाधित न होने के कारण उस वाक्य में योग्यता है। उसी तरह 'वह ब्रह्म तू है' आदि वाक्य में भी योग्यता के लक्षण की अव्याप्ति नहीं होती, क्योंकि 'तत्' और 'त्वम्' इन पदों के वाच्य-अर्थ में अभेद का बाध होने पर भी लक्ष्यार्थभूत चैतन्य के अभेद रूप अर्थ का बाध नहीं होता।

विवरण—वाक्य के तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग का (कर्मत्वादि सम्बन्ध का) बाध न होना—योग्यता का लक्षण है। 'वत्सं बधान' बछड़े को बांधों, इस वाक्य में योग्यता है। क्योंकि यहाँ वत्सकर्मक बन्धन—तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग है। वह किसी प्रमाण से बाधित नहीं होता। परन्तु, यहाँ 'संसर्गाबाधः' न कहकर केवल 'तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गः' इतना ही लक्षण यदि किया होता तो 'अग्निना सिञ्चेत्' आदि वाक्य में उसकी अतिव्याप्ति हुई होती। इस आशय से ग्रन्थकार ने 'वह्निना' इत्यादि कहा है। 'अग्नि से सिंचन करे, इस वाक्य का 'अग्नि-करणक सेचन' रूप अर्थ वक्ता के तात्पर्य का विषय है। परन्तु उस करणत्व संसर्ग का प्रत्यक्षादि प्रमाणों से बाध होता है। क्योंकि दाहक


१. अत्र संसर्गपदं न लक्षणघटकं तात्पर्यविषयाऽबाधस्यैव लक्षणत्वात्। तदुक्तमद्वैतसिद्धौ—'योग्यताऽपि तात्पर्यविषयाऽबाध एव" इति। अन्यथा अखण्डार्थपरे वाक्ये लक्षणस्य अव्याप्तिर्भवेत्।
२. ऽञ्चेदित्या०'—इति पाठान्तरम्।
३. तूवरपशु०'—इति पाठान्तरम्।
४. लक्ष्यस्वरूपाभेदे इति प्राचीनमतेन उक्तम्। स्वमते तत्वमसीत्यादौ लक्षणाभावस्य वक्ष्यमाणत्वात्।

योग्यता निरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २०३

अग्नि से तद्विरुद्ध आर्द्रीकरण क्रिया का होना संभव नहीं। इसलिये उक्त योग्यता के लक्षण की ऐसी वाक्य में अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी तरह 'जलेन दहेत्' इत्यादि वाक्य में योग्यता नहीं है--समझना चाहिये।

'संसर्गाबाधः' इतना ही लक्षण न कर उस संसर्ग में 'तात्पर्यविषयीभूत' विशेषण क्यों दिया ? यह 'स प्रजापतिः' आदि वाक्य से बताया गया है।

'संसर्गाबाधः' इतना ही लक्षण यदि करें तो 'स प्रजापतिः' इत्यादि अर्थवाद वाक्यों में अव्याप्ति होगी। क्योंकि अपनी वपा का उत्च्छेद करने पर कोई जीवित नहीं रह सकता। इस कारण उस वाक्य का कर्मत्व रूप संसर्ग, अन्य प्रमाणों से बाधित होता है। इसीलिये वह अर्थ, तात्पर्यविषयीभूत होना चाहिये—यह हमारा कहना है। प्रकृत स्थल में प्रत्यक्ष वपा का उत्पाटन, श्रुति के तात्पर्य का विषय नहीं है किन्तु पशुप्राशस्त्य ही श्रुति को विवक्षित है। जो प्रजाकाम हो 'स एतं प्राजापत्यं तूपरमालभेत' 'वह इस प्रजापतिदेवताक तूपर = श्रृंगरहित पशु का आलंभन = हनन करे' इस विधि का प्रशस्तत्व बताने के लिये 'स प्रजापतिः' इत्यादि वाक्य श्रुति में पठित है जिस पशु को सींग नहीं होते उसे 'तूपर' कहते हैं। इस गुणवाद रूप अर्थवाद का वाच्यार्थ इस प्रकार है कि पूर्व समय में जब पशु नहीं थे, तब प्रजापति ने अग्नि में अपनी वपा का हवन करते बराबर तूपर-अज उत्पन्न हुआ। इससे तात्पर्य इतना ही है कि 'तूपर' पशु का हवन कर प्राजापत्य याग करने से विपुल पशुओं की प्राप्ति होती है। (मी. १-२-१०) इस अर्थ का किसी प्रमाण से बाध नहीं होता। इस कारण उस वाक्य में योग्यता की व्याप्ति नहीं होती।

इसी प्रकार 'सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्' उसने रुदन किया इसलिये उसे 'रुद्र' कहते हैं। ऐसे अर्थवाद-वाक्यों में योग्यता है—समझना चाहिये। क्योंकि इस वाक्य का तात्पर्यार्थ इस प्रकार है—'बर्हिषि रजतं न देयम्' बर्हिर्याग में रजत का दान न करे, इस निषेध का यह अर्थवाद है। जो बर्हिर्याग में रजत देगा उसे एक वर्ष के भीतर ही रुदन का प्रसंग प्राप्त होता है। इसलिये बर्हिर्याग में रजतदान अप्रशस्त है। यह उस वाक्य का तात्पर्य-विषयभूत अर्थ है।

'तत्त्वमसि' वह ब्रह्म तू है 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं सच्चिदानन्द रूप ब्रह्मस्वरूप हूँ, इत्यादि वाक्यों में जीव और ब्रह्म का अभेद ही तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग है। किन्तु वह आपके कथनानुसार बाधित होता है। क्योंकि 'तत्त्वमसि' वाक्य में 'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वं' पद का अर्थ अपरोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है। किन्तु उन परस्परविरुद्धधर्म-युक्त चैतन्यों में अभेद का सम्भव नहीं, इसलिये वह अर्थ बाधित होता है। इसी तरह 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य में 'अहं' और 'ब्रह्म 'इनके अभेदान्वय का सम्भव नहीं होता। इसलिये आपका योग्यता-लक्षण अभेदार्थक वाक्यों में अव्याप्त होता है।

२०४वेदान्तपरिभाषा[ आसत्तिनिरूपणम्

इस शंका का 'तत्त्वमस्या'दि वाक्य से निराकरण इस प्रकार किया है—'तत्त्वम्' इत्यादि पदों का वाच्य ( शक्य = शक्ति से ज्ञात होनेवाला ) अर्थ, श्रुति को विवक्षित नहीं है । किन्तु उन पदों का लक्ष्य ( लक्षणा से ज्ञात होनेवाला--शुद्ध चैतन्य का अभेद रूप ) अर्थ बताने में ही श्रुति का तात्पर्य है और वह अबाधित होने से पूर्वोक्त दोष नहीं आता । इसी तरह जहाँ पर ( गङ्गायां घोषः ) लक्ष्यार्थ विवक्षित रहता है वहाँ लक्ष्यार्थ का अबाध रहना रूप दृष्टि से ही योग्यता का लक्षण विवक्षित है । तस्मात् 'तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गाबाधः योग्यता' यह योग्यता का निर्दोष लक्षण है ।

अब क्रमप्राप्त आसत्ति का लक्षण बताते हैं—

आसत्तिश्चाव्यवधानेन पदजन्य-पदार्थोपस्थितिः । मानान्त- रोपस्थापितपदार्थस्यानवय-बोधाभावात्पदजन्येति । अत एवाश्रुत- पदार्थस्थले तत्तत्पदाध्याहारः 'द्वारम्' इत्यादौ 'पिधेहि' इति । अत एव 'इषे त्वा'१ इत्यादिमन्त्रे 'छिनद्मि'२ इति पदाध्याहारः । अत एव विकृतिषु 'सूर्याय३ जुष्टं निर्वपामि' इति पदप्रयोगः ।

अर्थ—अव्यवधान से ( बीच में अन्य पदों का व्यवधान = उपस्थित न होकर ) जो पदजन्य पदार्थ की उपस्थिति उसे आसत्ति कहते हैं । प्रत्यक्षादि शब्देतर प्रमाणों से उपस्थित होने वाले पदार्थों का अन्वय में बोध नहीं होता, इसलिये 'पदजन्य' यह पद लक्षण में दिया है । पदजन्य पदार्थोपस्थिति अपेक्षित होने से ही जहाँ पर क्रिया कार-कादि दूसरा पद नहीं कहा हो ऐसे 'द्वारम्' इस एक शब्द के अर्थ की पूर्ति करने के लिये 'पिधेहि' ऐसे पदों का अध्याहार करना पड़ता है, और इसी कारण 'इषे त्वा' इत्यादि मंत्रों में 'छिनद्मि' ऐसे पद का ही अध्याहार करना चाहिये । यह निर्णय मीमांसा में किया है ( मी० २-१-४७ ) । ऐसी पदजन्य-उपस्थिति मीमांसकों को मान्य होने से सौर्यादि विकृति यागों में 'सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' मैं सूर्यदेवता को उद्देश्य कर सावित्र हवि का निर्वाप करता हूँ—इन पदों का उच्चारण करना चाहिये, यह सिद्धान्त किया गया है ।

विवरण—पदजन्य पदार्थ की अव्यवधान से उपस्थित होना ही आसत्ति है । जिस क्रिया-कारकादि पदसमूह वाक्य से शाब्दबोध होता है उस वाक्य के वे पद, अन्य पदों के व्यावधान से ( प्रतिबन्ध से ) रहित होने चाहिये । जैसे—'गाम्' और 'आनय' ये दोनों पद, एक के बाद एक ऐसे क्रम से, बीच में अन्य पद के व्यवधान से रहित, उच्चारण करने पर ही, उससे वाक्यार्थ बोध होता है । परन्तु यदि कोई 'गाम्'


१. त्वेत्यादौ०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'बृमीत्यादि०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्वा'-इति पाठान्तरम् ।

आसत्तिनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २०५

कहकर चुप हो जाय या बीच में ही अप्रकृत कोई शब्द कह दे, बाद 'आनय' कहे तो श्रोता को उस वाक्य से कुछ भी अर्थबोध नहीं होगा। इसलिये आसत्ति, शाब्दबोध में कारण रहती है। इसी प्रकार 'चन्द्रं भुंक्ष्व ओदनं पश्य' इत्यादि वाक्यों से भी अर्थबोध नहीं होता। क्योंकि यहाँ 'चन्द्रं' का 'पश्य' क्रिया से सम्बन्ध है। परन्तु 'पश्य' क्रिया, अव्यवधान से नहीं कही गई है। 'भुंक्ष्व' और ओदनम्' इन दो पदों के व्यवधान से कही गई है। इस कारण ऐसे वाक्य में आसत्तिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' ऐसे पदसमूह में यद्यपि क्रिया कारकादि समस्त पद उपस्थित रहते हैं और उनमें परस्पराकांक्षा तथा अन्वययोग्यता भी रहती है, तथापि उन पदों की अव्यवधान से उपस्थिति न होने के कारण उस वाक्य से 'देवदत्त ने खाया' और 'पर्वत अग्निमान् है।' इस अर्थ की प्रतीति नहीं होती।

यहाँ अव्यवधान से जो पदार्थोपस्थिति होनी है, वह पदजन्य हो, यह क्यों कहा, उस का कारण ग्रन्थकार ने 'मानान्तरोपस्थापित०' आदि ग्रन्थ से बताया है। उसका निष्कर्ष यह है—'सामने घट दीखने पर भी कोई व्यक्ति अंगुलि-निर्देश करते हुए 'सोमदत्त ! देखो' कहता है। उस समय सोमदत्त को घट का बोध होता है, परन्तु उस वाक्यार्थ में घट का अन्वयबोध ( शाब्दबोध ) नहीं होता। परन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण से ही उस समय घट का बोध होता है।

आसत्ति के लक्षण में 'पदजन्य' यदि न दें तो प्रत्यक्षात्मक उपस्थिति भी 'सोमदत्त पश्य' इस वाक्य में अव्यवधान से ही होती है, अतः उस लक्षण की प्रत्यक्ष में अतिव्याप्ति होगी। उसकी निवृत्ति के लिये 'पदजन्य' पद आवश्यक है। घट का ज्ञान उक्त वाक्य में अव्यवधान से होने पर भी वह पदजन्य नहीं अर्थात् 'घटम्' इत्याकारक पद से नहीं हुआ है, इसलिये अतिव्याप्ति नहीं हो पाती।

पदार्थ की उपस्थिति पदजन्य होने पर ही उस पदार्थ का शाब्दबोध होता है और अन्य उपाय से पदार्थ का बोध हुआ तो वह प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से होता है, यह आप कह रहे हैं। किन्तु ऐसा मानने पर 'द्वारम्' इतना ही शब्द श्रवण करने के बाद 'पिधेहि' क्रिया का जो ज्ञान होता है वह शाब्दबोधात्मक नहीं है कहना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर 'पिधान' अर्थ की उपस्थिति पदजन्य नहीं होती। किन्तु सभी शास्त्रकारों ने तो 'पिधान' क्रिया का ज्ञान शाब्दबोधात्मक माना है। तब सिद्धान्त में इसकी उपपत्ति किस प्रकार होगी ? यह आकांक्षा होने पर ग्रन्थकार ने 'अत एवाश्रुत०' इत्यादि ग्रन्थ से उसका समाधान बताया है। तथा हि—'पिधेहि' क्रिया का जो शाब्दबोध होता है वह पदजन्य ही होता है। क्योंकि पदजन्य पदार्थबोध ही शाब्दबोध में कारण होने से ऐसे अश्रुत पदार्थ के स्थल में 'पिधेहि' पद का अध्याहार ( योजना ) करना होता है। इस प्रकार ऐसे अध्याहृत पद से बोध के होने से यहाँ आसत्ति-लक्षण की अव्याप्ति

२०६ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम्

नहीं होती। प्रत्युत (विपरीत) 'पदार्थोपस्थिति पदजन्य होनी चाहिये' यह सिद्धान्त ही, इस उदाहरण से पुष्ट होता है।

'द्वारम्' के अनन्तर 'पिधेहि' क्रिया (पद) का अध्याहार किसलिये है? उसके बिना किये भी केवल 'पिधानरूप' अर्थ के अध्याहार करने से भी उपर्युक्त बोध की उपपत्ति का संभव हो सकती है' इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि वृत्ति के द्वारा जिस अर्थ की उपस्थिति नहीं होती, वह अर्थ (पदार्थ) भी शाब्दबोध का विषय होता है, ऐसा मानने पर अनेक दोष उपस्थित होंगे।

१—जिस पद से पदार्थ का किसी प्रकार का संबंध हो उस पदार्थ का शाब्दबोध होता है—यह कहने पर 'घट शब्द' आकाश के साथ समवाय संबंध से संबद्ध होने से 'घटमानय' वाक्य का 'आकाशमानय' अर्थ भी होने लगेगा। इसलिये पद-पदार्थों का वृत्तिरूप विशेष संबंध ही मानना चाहिये। और उसे मानने पर सर्वत्र वृत्ति के द्वारा ही शाब्दबोध के होने से 'द्वारम्' में मात्र बिना वृत्ति के भी सामान्य संबंध से 'पिधेहि' अर्थ का शाब्दबोध होता है, यह मानने में गौरव है।

२—वैसे ही 'द्वारम्' यहाँ द्वितीया का जो कर्मत्व रूप अर्थ है उसका कहीं भी अन्वय नहीं होगा। क्योंकि पदजन्य अर्थ का पदजन्य अर्थ से ही अन्वय करने का नियम है।

३—इसी प्रकार 'पुष्पेभ्यः' शब्द का उच्चारण कर 'स्पृहयति' पद का अध्याहार न करके 'सामान्य इच्छा' रूप अर्थ का अध्याहार करने से 'स्पृह्' धातु के योग में ही होने वाली चतुर्थी विभक्ति की उपपत्ति नहीं लगेगी। तस्मात् प्रकृत में भी 'पिधेहि' पद का ही अध्याहार करना चाहिये। केवल पिधानादि अर्थ का अध्याहार कर शाब्दबोध की उपपत्ति नहीं लग सकती। पदजन्य पदार्थोपस्थिति का ही पूर्व-मीमांसकों ने भी स्वीकार किया है, यह प्रदर्शित करने के लिये ग्रन्थकार ने 'अत एव इषे त्वा' इत्यादि कहा है। उसका विवरण मीमांसा के द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद में इस प्रकार किया है—

'इषे त्वोर्जेत्वा०' यह श्रुति, इस अधिकरण का विषय है। यहाँ संशय इस प्रकार किया है कि यह समस्त मंत्ररूप एक ही वाक्य है या विभिन्न दो वाक्य हैं? इस पर पूर्वपक्षी कहता है कि यह एक ही वाक्य मानना चाहिये, क्योंकि यह मंत्र अदृष्टार्थ है। और दो अदृष्ट अर्थों की कल्पना करने की अपेक्षा, एक अदृष्ट के मानने में ही लाघव है। यहाँ 'क्रिया' श्रुत नहीं है। इसलिये यह 'मंत्र' कर्मप्रकाशक होने से दृष्टार्थ है, नहीं मान सकते। तस्मात् यह अदृष्टार्थ-प्रतिपादक एक वाक्य है, यही कहना चाहिये।

इस प्रकार पूर्वपक्ष के प्राप्त होने पर 'समेषु वाक्यभेदः स्यात्' (२-१-४७) सूत्र से सिद्धान्त बताया है—ये दो भिन्न वाक्य हैं, ऐसा मानना चाहिये, क्योंकि 'इषे त्वा' और 'उर्जे त्वा' ये पद सम (परस्पर) की आकांक्षा नहीं रखते हैं।

पदार्थद्वैविध्यम् ] आगमपरिच्छेदः २०७

यहाँ क्रिया पद के न होने पर भी ये दो वाक्य कैसे माने जा सकेंगे ? इसका उत्तर यह है कि 'इषे त्वा' के बाद 'छिनत्ति' क्रिया का अध्याहार करना चाहिये, और 'ऊर्जे त्वा, के अनन्तर 'अनुमार्ष्टि' = सम्मार्जन करता है, क्रिया का अध्याहार करना चाहिये । ये दोनों वाक्य क्रमशः पलाश-शाखा के छेदन और मार्जन रूप दो पृथक् कर्मों का प्रकाशन करने वाले दृष्टार्थक ही हैं, अर्थात् 'इषे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुझे इच्छित अन्न के लिये तोड़ता हूँ । और 'ऊर्जे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुम्हारा रस के लिये अथवा बल के लिये सम्मार्जन करता हूँ, यह अर्थ निश्चित होता है । इसी तरह दूसरे एक वेदवाक्य में अश्रुत पद का अध्याहार बताने के लिये भी मीमांसा में एक अधिकरण बताया गया है । तथाहि—आग्नेय नामक प्रकृतियाग में 'देवस्य त्वा सवितुः······अग्नये जुष्टं निर्वपामि' इत्यादि मंत्र पठित हैं, उसका निर्णय मीमांसा में नवमाध्याय के प्रथम पाद में ३८-३९ सूत्रों से किया है । तथाहि—उपर्युक्त मंत्र में 'अग्नि' शब्द का सौर्यादि विकृति याग में ऊह किया जाय या न किया जाय । अर्थात् 'अग्नि' शब्द के स्थान पर 'सूर्यं' शब्द की योजना की जाय या न की जाय ? यह संशय आने पर 'सवितुः' यहाँ 'सवितृ' शब्द का ऊह न करने के लिये जैसे पीछे के अधिकरण में बताया गया है, उसी प्रकार यहाँ पर 'अग्नि' पद का ऊह न किया जाय—यह पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर सवित्रादि शब्द कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध नहीं है इसलिये उनका ऊह संभव न होने पर भी 'अग्न्यादि' शब्द तो कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध होने से विकृतियाग में 'सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' यह ऊह करना चाहिये—यह सिद्धान्त किया है । यहाँ पर भी पदाध्याहार ही बताया गया है । सारांश यह है कि 'पद का अध्याहार न कर पद के अर्थ का अध्याहार किया जाय' यह मानने पर मीमांसा के पूर्वोक्त अधिकरणों से विरोध होता है । इसलिये उस पक्ष को छोड़कर पदाध्याहार पक्ष का ही स्वीकार करना चाहिये । तस्मात् आसक्ति को लक्षण में 'पदजन्य पदार्थोपस्थिति' का स्वीकार करना उचित ही है ।

पदजन्यपदार्थोपस्थिति, शाब्दबोध में कारण है, यह बताया गया । परन्तु वह पदार्थ कितने प्रकार का है, यह आकांक्षा होने पर ग्रन्थकार कहते हैं—

पदार्थश्च द्विविधः—शक्यो लक्ष्यश्चेति । तत्र शक्तिर्नाम पदानामर्थेषु मुख्या वृत्तिः, यथा घटपदस्य पृथुबुध्नोदराद्याकृति-विशिष्टे वस्तुविशेषे वृत्तिः । सा¹ च शक्तिः पदार्थान्तरम् । सिद्धान्ते कारणेषु कार्यानुकूल-शक्तिमात्रस्य पदार्थान्तरत्वात् ।


१. सा च शक्तिरिति । नैयायिकास्तावत् संकेत एव शक्तिः न तु पदार्थान्तरम् प्रमाणाभावात् । स च संकेत: 'अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः इतीच्छारूपः । तत्रापि न संकेतमात्रं शक्तिः, किन्तु ईश्वरसंकेत एवेति न पामरादिसंकेतितानामपभाषितानामपि

२०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पदार्थद्वैविध्यम् ]

**अर्थ—**और वह पदार्थ शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार का है ( उनमें शक्य का अर्थ है शक्ति रूप वृत्ति से युक्त और लक्ष्य का अर्थ है लक्षणा रूप वृत्ति से युक्त ) । पदों के वाच्य अर्थ में स्थित मुख्य वृत्ति को ही शक्यपद की घटक शक्ति कहते हैं । जैसे—'घट' पद की तल तथा मध्य भाग में वर्तुल आकार से युक्त वस्तु विशेष में रहने वाली वृत्ति ही शक्ति कही जाती है । वह शक्ति, पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ है । क्योंकि कारण में विद्यमान होती हुई कार्योत्पत्ति के अनुकूल ( जनक ) समस्त ( यावत् ) शक्ति को सिद्धान्त में पृथक् पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है ।

**विवरण—**कुछ लोग शक्य, लक्ष्य और गौण भेद से तीन पदार्थ मानते हैं । किन्तु मूल में 'पदार्थ द्विविध है' कहकर उनका निराकरण किया है । गौण पदार्थ का लक्ष्य पदार्थ में ही अन्तर्भाव होता है, यह आगे चलकर ग्रन्थकार स्वयं कहेंगे । पद का अर्थ के साथ जो सम्बन्ध उसे वृत्ति कहते हैं । यह वृत्ति शक्तितथा लक्षणा भेद से द्विविध है । इनमें से 'शक्ति नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को शक्य या वाच्य और लक्षणा नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को लक्ष्य, यह शास्त्रीय संज्ञा है । इस कारण शक्य और लक्ष्य में से शक्य पदार्थ का निरूपण कर्तव्य होने पर पदार्थ को 'शक्य' संज्ञा जिस शक्ति के कारण प्राप्त होती है उस शक्ति का ही यहाँ निरूपण किया है । वृत्तिरूप सम्बन्ध साक्षात् और परम्परा भेद से दो प्रकार का है । उनमें से पद का पदार्थ के साथ मुख्य ( साक्षात् ) अर्थात् प्रथमोपस्थित जो सम्बन्ध = वृत्ति, उसे शक्ति कहते हैं—यह शक्ति का लक्षण है ।

शक्तत्वम् । स चेश्वरसंकेतो न ईश्वरसंकेतत्वेन गृह्यमाणः कारणम् । किन्तु संकेतत्वेन । अतः अविदुषामपि घटादिशब्दात् शाब्दबोधोपपत्तिः । आधुनिकसंकेतितानां चैत्रादिशब्दानां 'द्वादशेऽहनि पिता नाम कुर्यात्' इति सामान्यतः ईश्वरसंकेतितत्वमस्त्येवेति न दोष इति वदन्ति ।

तदिदं मीमांसका न सहन्ते । तेषामयमाशयः अभिधा नाम शक्तिः । सा च पदार्थान्तरम् । कारणेषु कार्यानुकूलशक्तिमात्रमतिरिक्तमङ्गीकरणीयम् । वह्निर्मणिसमवहितो दाहं न जनयति, मण्यसमवहितः उत्तेजकमण्यन्तरसमवहितो वा दाहं जनयति, इत्यत्र हि शक्तिसत्त्व-तद्विनाशौ एव नियामको सा च शक्तिः न द्रव्यं, गुणः, कर्मादिकं वा, तद्गुणराहित्यादित्यतिरिक्तः पदार्थः । एवं च शब्दनिष्ठा शक्तिरपि अतिरिक्तैव अंगीकरणीया । कस्मिन् पदे कीदृशार्थबोधनानुकूलशक्तिर्विद्यते इति नु व्यावहारादिसिद्धशक्तिविषयः पदार्थः शक्यः इति ज्ञेयम् । यदि सर्वत्रैव शक्तिः पदार्थान्तरम्, तदा किमु वक्तव्यं शक्तिविशेषस्य पदनिष्ठस्य पदार्थान्तरत्वे इति । एवं च मीमांसकसिद्धान्ते अद्वैतसिद्धान्ते च यथा कारणनिष्ठा कार्यानुकूला शक्तिः पदार्थान्तरं तथा पदनिष्ठा पदार्थोंपस्थित्यनुकूला शक्तिरपि पदार्थान्तरं, तस्या अपि कारणनिष्ठकार्यानुकूलशक्तित्वात् । कारणत्वात् पदार्थोंपस्थितेश्च कार्यत्वात् ।

पदशक्तिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २०९

उदा०—'घट' पद से प्रथमतः ही बड़े वर्तुल—मध्य भाग वाले, कृश कण्ठ वाले पदार्थ की उपस्थिति 'शक्ति' वृत्ति से होती है । परन्तु लक्ष्य पदार्थ के साथ पद का पहले जैसा साक्षात् सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् पद श्रवण होने के अनन्तर प्रथमतः ही लक्ष्य पदार्थ का ज्ञान नहीं होता, अपितु शक्य ( वाच्य ) पदार्थ के द्वारा, परम्परा से ( शक्य-पदार्थ-ज्ञान के व्यवधान से ) होता । इस कारण शक्ति का लक्षण लक्ष्य पदार्थ में अतिव्याप्त नहीं होता ।

प्राचीन नैयायिकों का कहना है कि 'पद' के साथ अर्थ का जो सम्बन्ध हो उसे शक्ति कहते हैं । यह शक्ति द्रव्य-गुणादि सात पदार्थों से पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ नहीं है । किन्तु 'इस पद से यह अर्थ समझना' इत्याकारक जो ईश्वरेच्छा ( आत्मगुणरूप पदार्थ ) उसी में शक्ति का अन्तर्भाव होता है । आधुनिक 'देवदत्तादि' नाम में भी शक्ति है ही । क्योंकि 'पिता ग्यारहवें दिन पुत्र का नाम रखे' ऐसी ईश्वरेच्छा वहाँ भी रहती ही है ।

और नवीन नैयायिक—"ईश्वरेच्छा को शक्तिरूप न मानकर उसे केवल इच्छारूप ही मानते हैं । इस कारण आधुनिक संकेत में शक्ति का होना सिद्ध है ।

नैयायिकों के मत का खण्डन करने के लिये ग्रन्थकार ने 'सा च शक्तिः' इत्यादि वाक्य से शक्ति को पृथक् पदार्थ सिद्ध किया है । तथाहि—प्राचीन नैयायिकों के मतानुसार शक्ति का ईश्वरेच्छारूप होना सम्बन्ध नहीं । क्योंकि मनुष्य की इच्छा से नदी-नगर आदिकों की जो संज्ञायें रूढ हुई हैं, उनमें ईश्वरेच्छा नहीं होती । अब नव्य नैयायिकों से कथनानुसार सामान्य इच्छारूप शक्ति को मानें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि मनुष्य पट आदि की इच्छा से घट आदि पद का उच्चारण करे तो वहाँ भी इच्छा के विद्यमान होने के कारण घट पद की पट में भी शक्ति का स्वीकार करना पड़ेगा । इसलिये इस वृत्तिरूप शक्ति को पृथक् पदार्थ के रूप में ही स्वीकार करना चाहिये । इतना ही नहीं, हम वेदान्तियों ने संसार की समस्त वस्तुओं के कारणों में विद्यमान कार्योत्पादानुकूलता ( कार्य उत्पन्न करने को योग्यता ) को ही शक्ति समझ, सामान्य शक्ति को भी अतिरिक्त पदार्थ के रूप में स्वीकृत किया है । तब पदनिष्ठ अर्थबोध रूप कार्य की जनक शक्ति हमारे मत में पृथक् पदार्थ है, यह तो अत्यन्त स्पष्ट है ।

हम लोग 'अर्थापत्ति' प्रमाण से शक्ति का पार्थक्य ( पृथक् पदार्थत्व ) सिद्ध करते हैं । तथाहि—केवल अग्नि, दाह करने में समर्थ है, किन्तु मणि के सान्निध्य से दाह नहीं होता । इस कारण मणि के सान्निध्य से दाहकारणीभूत अग्नि शक्ति नष्ट हो गई, यह कल्पना करनी पड़ती है । इसलिये यह भ्रष्ट होने वाला शक्तिरूप पदार्थ, अन्य सब पदार्थों की अपेक्षा विलक्षण ( पृथक् ) पदार्थ सिद्ध होता है । यदि यह कहें कि—प्रतिबन्धक का अभाव, कार्यमात्र के प्रति कारण होता है । यहाँ तो मणिरूप प्रतिबन्धक पदार्थ के विद्यमान होने से प्रतिबन्धकाभावरूप कारण नहीं है, इसलिये दाहरूप कार्य नहीं होता ।

२१०वेदान्तपरिभाषा[ जातिशक्तिवादः

परन्तु यह कहना ठीक नहीं क्योंकि है प्रतिबन्धकाभाव अभावरूप होने से उसमें किसी भाव कार्य के प्रति कारणता नहीं बन सकती। इसके अतिरिक्त (१) दाहादिकार्य वह्निनिष्ठ दाहानुकूल शक्तिरूप पदार्थ से युक्त है, (२) क्योंकि उसमें कार्यत्व है, (३) घटादि के समान। यह¹ अनुमान भी शक्ति को अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध करता है। इसी प्रकार 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' इस परमात्मा की अनेकविध (सत्त्वादिगुणों से अनेकरूप) पर (सूक्ष्म), कार्यगम्य शक्ति है। 'शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्या ज्ञान-गोचराः' सब पदार्थों में अचिन्त्य (अनिर्वचनीय) और कार्यज्ञानगम्य शक्तियां हैं, आदि अनेक श्रुतियाँ शक्ति का पार्थक्य सिद्ध करती हैं। तस्मात् शक्ति, अतिरिक्त पदार्थ है और पदनिष्ठ शक्ति भी इच्छारूप नहीं है। तब पदनिष्ठ शक्ति का ज्ञान किस प्रमाण से होता है ? उत्तर है कि 'अनुमान प्रमाण' उसमें ज्ञापक है।

सा² च तत्तत्पदजन्य-पदार्थज्ञान-कार्यानुमेया। तादृशशक्ति-विषयत्वं शक्यत्वम्।³ तच्च जातेरेव न व्यक्तेः, व्यक्तीनामानन्त्येन


१. 'दाहादिकार्यं वह्नि निष्ठस्वानुकूलशक्तिपूर्वकं कार्यत्वात् घटवत्'।

२. ननु कारणेषु कार्यानुमेयाः शक्तयः सन्तु नाम, किन्तु प्रकृते केन कार्येण पदनिष्ठा शक्तिः अनुमीयते, यतः पदनिष्ठा शक्तिः नैव सिद्धा प्रमाणाभावात्, कैव . कथा तदतिरिक्ततायाः। तत्रेदं समाधानं करोति ग्रन्थकारः-सा च तत्तत्पदजन्येति। सा च पदनिष्ठा शक्तिः तत्तत्पदजन्यं यत् पदार्थज्ञानं तद्रूपं यत् कार्यं तेन अनुमेया भवति।

३. उक्तलक्षणशक्तिविषयत्वं ( शक्तिजन्यबोधविषयत्वं ) शक्यत्वं जातेर्व्यक्तेर्वा ? इति जिज्ञासायां गौतमीयाः ( नैयायिकाः ) जात्याकृतिव्यक्तीनां पदशक्यत्वं वदन्ति। दीधित्त्यानुयायिनस्तु व्यक्तेरेव, वैयाकरणा अपि व्यक्तेरेवेति। तत्र ग्रन्थकारो ब्रवीति-तच्च जातेरेव। जातिरत्र अनुगतो धर्मः, परैः जातिशब्देन व्यवह्रियमाणो विज्ञेयः। ननु इतः पूर्वं जातेर्निरसनं कृतम्, अत्र च जातेः शक्यत्वं व्यवस्थाप्यते। इति परस्परविरुद्धम्। तत्रैवं बोद्धव्यम्—पूर्वग्रन्थेन जातेर्निरसनं न कृतं किन्तु जातेः पदार्थान्तरत्वं तल्लक्षणादिकं च निरस्तमासीत्। सकलगोव्यक्तिषु अनुगतः गोत्वरूपो धर्मंस्तु अभ्युपगत एवेति न किञ्चिदपि परस्परं विरुद्धम्। अतो वेदान्ते सर्वत्र जातिपदेन अनुगतो धर्म एव स्वीकृतव्यः। एवञ्च मीमांसकाः अनेकशक्तिकल्पनाप्रसङ्गात् व्यक्तौ जातिविशिष्टव्यक्तौ वा शक्तिं नाङ्गीकुर्वन्ति। तेन गवान्तरबोधापत्तेः एव गवि शक्तिरिति मतं प्रत्युक्तं भवति। अन्यच्च व्यक्तिशक्तिवादे अनेककार्यकारणभावकल्पनाप्रसंगेन गौरवं भवति। जातिशक्तिवादे तु नैवमिति आकृति-(जाति-) शक्तिवाद एव युक्तः। तेन 'श्येनचितं चिन्वीत' इति वाक्यमपि श्येनाकारचयनविधानात् सार्थकं भवति। नहि श्येनपक्षिभिः चयनं कर्तुं योग्यम्। 'गामानय, व्रीहीन् प्रोक्षति' इत्यादौ व्यक्तीनां बोधः आक्षेपात् भवति। आक्षेपो

जातिशक्तिवादः ] आगमपरिच्छेदः २११

गुरुत्वात् । कथं तर्हि गवादि-पदाद् व्यक्तिभानमिति चेत्, जातेर्व्यक्ति-समान-संवित्संवेद्य^१त्वादिति ब्रूमः ।

अर्थ—और वह पदनिष्ठ शक्ति, तत्तद् विशेष पद से तत्तद् विशेष पदार्थ के ज्ञान-रूप कार्य से अनुमेय ( अनुमान प्रमाण से जानने योग्य ) है । पदार्थ में ऐसी शक्ति की विषयता होना उसकी शक्यता है । वह शक्यत्व ( ता ) जाति में ही रहता है, व्यक्ति में नहीं। क्योंकि व्यक्ति अनन्त ( असंख्य ) होने से प्रत्येक व्यक्ति पृथक् शक्यत्व मानने में गौरव है । व्यक्ति में यदि शक्यत्व ( शक्ति ) नहीं है तो 'गो' आदि पदों के श्रवण करते ही सास्नादिमान् गोव्यक्ति का ज्ञान कैसे होता है ?' उत्तर यह है कि—जाति, व्यक्ति


नामाद्यपत्तिः । तथा च व्यक्तिबोधं विना आनयनादिक्रियान्वयानुपपत्त्या लक्षणया व्यक्ति-बोधः । तथापि 'गौरस्ति' इत्यत्र तु अपेक्षाऽभावेन अन्वयानुपपत्त्यभावात् व्यक्तिबोधाऽ-संभवः इति जातेर्व्यक्तिसमानसंवेद्यत्वेन जातिभासकसामग्र्यैव व्यक्तेरपि भानमिति अन्ये मन्यन्ते । व्यक्तेः समाना संविद् व्यक्तिसमानसंविद्, तया संवेद्या—व्यक्तिसमान-संवित्संवेद्या, तस्याः भावः, तस्मात् । यया संविद्व्यक्त्या ( ज्ञानव्यक्त्या ) घटवृत्ति घटत्वं गृह्यते, तयैव घटस्यापि ग्रहणं भवति । जातिव्यक्त्योः अभेदाभ्युपगमात् न सामग्र्यन्तरस्यावश्यकता भवति ।

गुरुमते तु जातौ व्यक्तौ च शक्तिः । तथापि जातौ सा ज्ञायमाना कारणम् व्यक्तौ तु स्वरूपसती ( स्वरूपेण विद्यमाना ) हेतुः । तथा च व्यक्तौ स्वरूपेण विद्यमानैव शक्तिः तदुपस्थितौ हेतुः, तेन व्यक्तेरपि शक्यत्वं शाब्दबोध्यत्वं चोपपन्नम् तथा चोक्तं तत्त्वप्रदीपि-कायाम्—“आकृतेः शब्दार्थत्वेऽपि तस्या एव शब्दार्थत्वमितिनियमनाङ्गीकारात्” इति । ज्ञायमानशक्त्या जात्युपस्थितिदेशायां स्वरूपेणवर्तमानया शक्त्या व्यक्त्युपस्थितेरुपपत्तौ सत्यां व्यक्तिशक्तिज्ञानं तदुपस्थितौ न अपेक्षितं भवति । एवन्तर्हि जात्युपस्थितावपि जातिशक्तिज्ञानं कारणं न स्यात्, तत्रापि स्वरूपसत्या शक्त्या तदुपस्थितिः संभविष्यति । परं नैतदुचितम् यतो जातौ यदि शक्तिः स्वरूपसती हेतुः स्यात्, तदा अगृहीतशक्तिकाना-मपि पुंसां तत्तच्छब्दात् तत्तदर्थोपस्थितिः स्यात्, तत्र तत्रापि तत्तच्छक्तेः स्वरूपेण विद्य-मानत्वात् । न च तथा दृश्यते, जातौ सा ज्ञाता हेतुर्भवति ।

किन्तु मतमिदं नाभिमतं भाट्टानाम् । ते हि व्यक्तौ स्वरूपसती शक्तिरपि न गौरवा-दङ्गीकरणीयेति मन्यन्ते । तन्त्रवार्तिकेऽपि—“आकृति-व्यक्त्योरत्यन्तभेदाभावात् कदा-चिद् व्यक्तिरूपेण आकृतिरभिधीयते, कदाचित् सामान्यरूपेण । शब्दस्य उभयरूपं वस्तु अर्थत्वात् । अत एव 'गामानय' इति चोदिते अर्थप्रकरणाभावे यां कांचिद् सामान्ययुक्तां गाम् आनयति, सर्वां न विशिष्टाम् । अतः आकृतिरेव शब्दार्थः इति सिध्यति ।”


१. 'तयेति'—इति पाठान्तरम् ।

२१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिशक्तिवादः

ज्ञानरूप एक ही ज्ञान से संवेद्य होने से, जाति ज्ञान के होते ही व्यक्तिज्ञान और व्यक्ति- ज्ञान के होते ही उसमें ही जातिज्ञान होता है। ऐसा हम कहते हैं।

विवरण —'घट' पद के श्रवण करते ही कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ का ज्ञान ( स्मरण ) होता है। 'पट' पद के श्रवण करने पर कंबुग्रीवादिमान् पदार्थ की मन में उपस्थिति नहीं होती। अतः इस अन्वयव्यतिरेक से 'घट' पद की शक्ति 'कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में है' यह सिद्ध होता है। इस विषय में अनुमान-प्रयोग इस प्रकार है—

( १ ) 'पदार्थज्ञान, पदनिष्ठ-स्वबोधानुकूल-शक्तिपूर्वक है, ( २ ) क्योंकि वह पदार्थ- ज्ञान पदजन्य-पदार्थज्ञान कार्यरूप है, ( ३ ) जैसे घटरूप पदार्थ का ज्ञान 'घट' पद की कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में विद्यमान शक्ति से युक्त है।' इस अनुमान से पदनिष्ठ शक्ति, अतिरिक्त सिद्ध होती है। इस प्रकार शक्ति का निरूपण किया। अब 'तादृश०' इत्यादि वाक्य से उस शक्ति से युक्त ऐसे शक्य पदार्थ का स्वरूप बताया है। पूर्वोक्त शक्ति से उत्पन्न होने वाले ज्ञान का जो विषय होता है वह पदार्थ 'शक्य' होता है। अर्थात् उस पदार्थ में उस पद का शक्यत्व रहता है। जैसे—'घट' पद से घटत्व' अर्थ का बोध होता है, अतः 'घट' पद की शक्ति से होनेवाले इस ज्ञान में 'घटत्व' विषय रहता है अर्थात् वह 'घटत्वविषयक' घटत्व का ज्ञान है। इस कारण घटपद का 'घटत्व' शक्य है, अर्थात् शक्यत्व घटनिष्ठ है।

'पद का शक्य अर्थ कौन सा ?' इस विषय में तत्तद् शास्त्रकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ लोग 'गो' पद की सास्नादिमान् ( सास्ना = गाय के कण्ठ के नीचे लटकती मांसमय झालर ) गोव्यक्ति में शक्ति मानते हैं। नैयायिक--जातिविशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है ( 'गो' पद गोत्वविशिष्ट गोव्यक्ति में शक्ति रहती है अर्थात् गोत्वविशिष्ट गो, गोपद का शक्य है ) ऐसा कहते हैं। इन सब कल्पों का निरसन करने के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने पूर्वोत्तर मीमांसा-साधारण शक्यत्व कहाँ रहता है यह 'तच्च' आदि ग्रन्थ से बताया है। गवादि ( गो आदि ) पदों की शक्ति, जाति में ही रहती है, इसे स्वीकार करना चाहिये। क्योंकि व्यक्ति में शक्ति मानने पर गोव्यक्तियों के अनन्त होने से उनमें रहने वाली शक्तियाँ भी अनन्त माननी होंगी। परन्तु इस प्रकार अनन्त शक्तियों की कल्पना करने में बहुत गौरव है। इसके अतिरिक्त एक 'गो' पद से एक व्यक्ति में शक्तिग्रहण ( शक्तिज्ञान ) होने पर भी अन्य गोव्यक्ति का उस पद से ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वहाँ की शक्ति भिन्न है, और उसका ज्ञान होने के लिये अन्य गोनिष्ठ शक्ति का ज्ञान आवश्यक है। इस रीति से असंख्य गौओं की शक्ति का ज्ञान सहस्र युगों में भी नहीं हो पायगा। इस प्रकार 'गो' आदि पदों की शक्तिग्रह का होना संभव ही नहीं


१. पदार्थज्ञानं पदनिष्ठस्वानुकूलशक्तिपूर्वकं पदजन्यपदार्थज्ञानरूपकार्यत्वात्, घटरूप-पदार्थज्ञानवत् ।

जातिशक्तिवादः ] आगमपरिच्छेदः २१३

होगा। ऐसे अनेक दोष व्यक्तिशक्तिवाद में पैदा होते हैं। तस्मात् व्यक्ति में शक्ति को नहीं मान सकते।

नैयायिकों के 'जातिविशिष्ट व्यक्ति-शक्तिवाद' पक्ष में भी अनन्त व्यक्तियों का ज्ञान न होने के कारण अमुक शब्द की अमुक अर्थ में ही शक्ति है, ऐसा नियम नहीं किया जा सकेगा, आदि पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही हैं। इसलिये मीमांसकों का अभिमत जातिशक्तिवाद ही स्वीकार करना चाहिये। यह मानने पर गोत्व जाति के एक होने से एक व्यक्ति में गोत्व जाति का ज्ञान होने पर भी सर्वत्र गोत्व जाति के एक होने से अन्य व्यक्तियों में भी शक्तिग्रह होता है, और इस पक्ष में लाघव भी है।

शंका—प्रत्यक्ष परिच्छेद में 'जातित्वोपाधित्वपरिभाषायाः सकलप्रमाणागोचरतया०' इत्यादि कहकर जाति और उपाधि का खण्डन किया है। और यहाँ पदों की शक्ति 'सकलप्रमाणागोचर' ऐसी जाति में है—ऐसा कहते हैं, अतः यह कैसे संभव है ? जाति पदार्थ ही यदि आपके मत में नहीं हैं तो आप उसमें शक्ति को भी कैसे मान सकेंगे।

समाधान—शंका ठीक है। परन्तु उसका उत्तर इस प्रकार है—हमने (ग्रन्थकार ने (पहिले जाति का खण्डन नहीं किया है किन्तु नैयायिकों की 'जाति अतिरिक्त पदार्थ हैं' इस परिभाषा का ही खण्डन किया है अर्थात् जाति स्वतन्त्र ( पृथक् ) पदार्थ नहीं, इतना ही बताया है, इसलिये वहाँ 'घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानम्' यह कहकर 'घटत्वादि' धर्म के सद्भाव का (अस्तित्व का) अङ्गीकार किया है। 'घटत्व घट की अपेक्षा अतिरिक्त एवं उसमें समवाय संबंध से रहनेवाला पदार्थ हैं' यह नैयायिकों का मत सर्वथा अयोग्य है। तस्मात् यहाँ 'जाति' शब्द को घटत्वादि आकृतियों का वाचक समझना चाहिये। अतएव भाष्यकार श्री शंकराचार्य ने शारीरक भाष्य में (अ० १-३-२८) 'आकृतिभिश्च शब्दानां सम्बन्धो न व्यक्तिभिः' इत्यादि कहकर जाति शब्द के स्थान पर 'आकृति' शब्द की ही योजना की है। अतः यहाँ पर भी जाति शब्द की योजना आकृति को उद्देश्य करके ही की गई है। यह समझना चाहिये। इसलिये किसी प्रकार का विरोध नहीं आता। नैयायिक जिस अनुगत धर्म को जाति कहते हैं, वह जाति शब्द अनुगत धर्मरूप अर्थ में ही यहाँ प्रयुक्त किया है। 'गोत्वादि अनुगत धर्मरूप अर्थ में शब्दों की शक्ति है' इस सिद्धान्त पर ऐसी शंका उठती है कि—'व्यक्ति में या जाति-विशिष्ट व्यक्ति में पद की शक्ति को स्वीकार करने वाले हमारे मत में जैसे आपने दोष दिये वैसे ही आपके स्वीकृत किये हुए इस जातिशक्तिवाद में भी दोष हैं। क्योंकि 'गामानय' 'व्रीहीन् प्रोक्षति' आदि व्यक्तिमात्रबोधक वाक्यों का अर्थ जातिशक्तिवादी आपके मत में 'गोत्व जाति को लाओ' और 'व्रीहित्व जाति का प्रोक्षण करो' होने लगेगा। परन्तु वैसा होना संभव नहीं। क्योंकि अमूर्त 'जाति' पदार्थ का आनयन किंवा प्रोक्षण असंभव है। इस कारण यहाँ पर जो केवल व्यक्ति का बोध होता है, उसकी अनुपपत्ति होगी

२१४ वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

अर्थात् व्यक्तिबोध नहीं होगा। यह महादोष जातिशक्तिवाद में आता है, ऐसी स्थिति में आप व्यक्तिबोध की उपपत्ति कैसे लगाते हैं ?

व्यक्तिभान की इस उपपत्ति की मीमांसा के भिन्न-भिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से बताया है। कितने ही विद्वान् अर्थापत्तिप्रमाण से व्यक्ति का भान ( ज्ञान ) मानते हैं। हम 'गामानय' इस उत्तम वृद्धवाक्य को सुनकर मध्यमवृद्ध के द्वारा गोव्यक्ति को लाया जाता हुआ देखते हैं। उसे यदि व्यक्तिबोध न हुआ होता तो 'आनयन' क्रिया में व्यक्ति का अन्वय ही न हुआ होता। इसलिये 'अर्थापत्ति' प्रमाण से ऐसे वाक्यों में व्यक्तियों का भान होना स्वीकार करना चाहिये।

परन्तु यह मत योग्य नहीं है। क्योंकि 'गामानय' इस वाक्य में यद्यपि वैसा ज्ञान ( व्यक्तिभान ) हो सकता है तथापि 'गौरस्ति' इस वाक्य में उक्त प्रकार से कैसी भी अन्वयानुपपत्ति संभव नहीं है। अतः यहाँ व्यक्तिबोध नहीं होगा, यह दोष इस पक्ष में आता है, इसलिये ग्रन्थकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने इस ग्रन्थ में उस पद का किञ्चिन्मात्र भी उल्लेख न कर अन्य तीन आचार्यों के ही मतों उल्लेख किया है। उनमें से ग्रन्थकार को तीसरा भाट्ट पक्ष ( कुमारिल भट्ट का पक्ष ) ही विशेषतः सम्मत है। तथापि प्रथमतः दो पक्षों बताकर अनन्तर तीसरा पक्ष सिद्धान्त के रूप में बतावेंगे। उक्त शंका का 'न च०' इत्यादि वाक्य में अनुवाद कर 'जातेः' आदि ग्रन्थ से प्रथम पक्ष के समान समाधान बताया है। नैयायिकों के समान वेदान्ती धर्म को धर्मी की अपेक्षा पृथक् नहीं मानते, किन्तु धर्म और धर्मी का तादात्म्य ( ऐक्य ) मानते हैं। इस कारण वस्तुतः यद्यपि जाति ही शक्य है तथापि जाति और व्यक्तिरूप धर्म-धर्मी का अभेद होने से एक ज्ञान से ही जाति और व्यक्ति का ज्ञान हो जाता है अर्थात् जति का ज्ञान होते ही उसमें ही व्यक्ति का ज्ञान होता है एवं व्यक्ति के ज्ञान में जाति भी भासती है, यह तात्पर्य है। इसलिये जातिशक्तिवाद में व्यक्तिभान की अनुपपत्ति नहीं हो पाती।

पद से व्यक्ति का ज्ञान कैसे सम्भव हो सकता है? क्योंकि पद की शक्ति व्यक्ति में है ही नहीं। तब व्यक्ति का भान होता है' यह भी आप कैसे निश्चय करेंगे? और शक्ति के न होने पर भी पद से पदार्थ का ज्ञान होता है, ऐसा मानने पर जिस किसी भी शब्द से जिस किसी अर्थ का ज्ञान होने लगेगा। ऐसी शंका के निरसनार्थ ग्रन्थकार पूर्वोक्त समाधान की अरुचि से, अग्रिम ग्रन्थ के द्वारा प्रभाकर मतानुसार व्यक्तिबोध की उपपत्ति को बताते हैं।

'यद्वा, गवादिपदानां व्यक्तौ शक्तिः स्वरूपसती न तु ज्ञाता


९. शाब्दबोधे पदवृत्तिविषयस्य भानं न भवति। अन्यथा अन्वयेऽपि शक्तिकल्पना न भवेत्। किन्तु अन्वयेऽपि भाट्टैः शक्तिरङ्गीकृता। तदुक्तं न्यायसिद्धान्तमञ्जर्याम् — 'भाट्टास्तु अन्वयविशिष्टे शक्तिग्रहात् अन्वयेऽपि शक्तिरेवेत्याहुरिति'। अतो व्यक्तावपि

गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि ] आगमपरिच्छेदः २१५

हेतुः । जातौ तु^१ ज्ञाता । न^२ व्यक्त्यंशे शक्तिज्ञानमपि कारणं गौरवात् ।^३ जातिशक्तिमत्त्व-ज्ञाने सति व्यक्तिशक्ति^४मत्त्वज्ञानं विना व्यक्तिधी-विलम्बाभावाच्च ।

अत एव न्यायमतेऽप्यन्वये शक्तिः स्वरूपसतीति सिद्धान्तः । ज्ञानमान-शक्ति-विषयत्वमेव वाच्यत्वमिति जातिरेव वाच्या ।

अर्थ— अथवा 'गौः' इत्यादि पदों की व्यक्ति में स्वरूपतः विद्यमान शक्ति है (और वह व्यक्ति के ज्ञान होने में कारण है) व्यक्ति में विद्यमान वह शक्ति ज्ञात होकर व्यक्ति के बोधन में कारण नहीं होती। किन्तु जाति के बोधन में मात्र वह शक्ति ज्ञात होकर ही कारण होती है। 'व्यक्ति' अंश में व्यक्ति-शक्ति का ज्ञान भी कारण है, यह मानना आवश्यक नहीं है। क्योंकि व्यक्तिशक्तिज्ञान तथा जातिशक्तिज्ञान—दोनों को शाब्दबोध में कारण मानने में गौरव (दोष) होता है। और जाति के शक्तिमत्त्व (शक्ति) का ज्ञान होने पर व्यक्तिशक्ति का ज्ञान होने पर भी व्यक्ति के ज्ञान न होने में विलम्ब (देर) नहीं लगती। इसीलिये जहाँ शक्ति का ज्ञान न होते हुए भी वस्तु का ज्ञान होता है, वहाँ शक्तिज्ञान की कल्पना करना अनुचित है, अतएव न्यायमत में भी 'शक्ति अन्वय में स्वरूपसती (स्वरूपतः विद्यमान) रहती हैं' (वह ज्ञान नहीं रहती) सिद्धान्त किया है।

(शंका—व्यक्ति में शक्ति को स्वरूपसती मानने पर व्यक्ति भी गवादि पदों की वाच्य होने लगेगी, अतः इसका समाधान करते हैं—) ज्ञायमान शक्ति में (शक्तिजन्यज्ञान में) जो पदार्थ विषय होता है, वही वाच्य होता है—इस प्रकार 'वाच्य' का लक्षण (परिभाषा) होने से (ज्ञानमान-शक्ति-विषय) जाति ही 'गवादि' पदों का वाच्य ठहरती है। (व्यक्ति वाच्य नहीं होती) अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आने पाता।

विवरण— शक्ति के विषय में प्रभाकर के सिद्धान्त का आशय इस प्रकार है—कारण की सत्ता कार्य में आवश्यक रहती है, परन्तु कुछ कार्यों की उत्पत्ति में कारण का स्वरूपतः रहना आवश्यक होता है, परन्तु कितने ही कार्यों में कारण के प्रत्यक्ष न होने पर भी उसके केवल ज्ञान से भी कार्य निष्पन्न हो सकता है।


स्वरूपसती शक्तिरपेक्षितेवेति गुरुमतानुसारेणाह—यद्धे'ति। अर्थात् पदात् व्यक्तिज्ञानं दुर्लभं तत्प्रयोजकशक्तेरभावादित्यरुचिरिति सूच्यते।
१. 'सा'—इति पाठान्तरम्।
२. 'च'—इति पाठान्तरम्।
३. व्यक्तिभाने शक्तिः कारणं, न तु तज्ज्ञानमपि, उभयत्र शक्तिज्ञानस्य कारणत्व-कल्पने गौरवम्।
४. 'क्ति-ज्ञानं'—इति पाठान्तरम्।

२१६ वेदान्तपरिभाषा [गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

उदाहरणार्थ—घटादि कार्यों की उत्पत्ति में आवश्यक दण्डादिकारणों की स्वरूपतः सत्ता आवश्यक होती है, दण्ड के ज्ञानमात्र से घट की उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् दण्ड की स्वरूपसत्ता ही घट में कारण होती है । किन्तु धूम से अग्नि का अनुमान जब होता है उस समय अनुमिति में यद्यपि धूम कारण है तथापि उसकी स्वरूपतः सत्ता आवश्यक नहीं होती । धूलि को ही धूम समझकर उसके सहारे से भी 'पर्वत वह्निमान् है' यह अनुमिति होती है । अतः कहीं वस्तु की स्वरूपसत्ता कारण होती है और कहीं उसका ज्ञान अर्थात् ज्ञानसत्ता कार्य की जनक होती है । इसी प्रकार प्रकृत में भी व्यक्ति और जाति दोनों में शक्ति, मान लेनी चाहिये । व्यक्ति के बोध के लिये शक्ति की स्वरूप-सत्ता आवश्यक है और जाति के ज्ञान के लिये शक्ति की ज्ञात सत्ता को कारण मान-कर व्यक्तिबोध की उत्पत्ति लगानी चाहिये, अर्थात् 'गोः' इत्यादि पदों से गोव्यक्ति का ज्ञान होने के लिये इस व्यक्ति में शक्ति है' इस प्रकार के शक्तिज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अपितु वह शक्ति व्यक्ति में स्वरूपतः होने पर भी व्यक्ति का ज्ञान हो सकता है, क्योंकि गवादि पदों में व्यक्तिबोधक सामर्थ्य रहता ही है । परन्तु जाति का ज्ञान होने के लिये मात्र 'यह जाति शक्तिमती है' यह ज्ञान रहना आवश्यक होता है ।

शंका--जिस प्रकार जातिज्ञान के लिये उसकी शक्ति का ज्ञान होना आवश्यक है उसी प्रकार व्यक्तिज्ञान के लिये भी व्यक्ति-शक्तिज्ञान कारण है, यह क्यों न कहा जाय ? सभी जगह ज्ञात शक्ति को ही कारण मानने में लाघव भी है, क्योंकि एक ही प्रयोजक मानना पड़ता है ।

ग्रन्थकार 'न व्यक्त्यंशे' वाक्य से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर समाधान करते हैं । व्यक्ति अंश में उसकी शक्ति का ज्ञान भी कारण होता है यह मानने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि ऐसा मानने पर जातिज्ञान के लिये जातिशक्तिज्ञान और व्यक्तिज्ञान के लिये व्यक्तिशक्तिज्ञान—इस प्रकार दो ज्ञान शाब्दबोध में कारण मानने होंगे । परन्तु एक पद के शाब्दबोधार्थ दो ज्ञानों का कारण मानने में 'गौरव' दोष होता है । अतः इसकी अपेक्षा जातिशक्तिज्ञान से जाति की उपस्थिति ( ज्ञान ) होते ही वहाँ स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही व्यक्तिज्ञान हो जाता है, यह मानने में लाघव है, क्योंकि इस पक्ष में दो कारणों की कल्पना नहीं करनी पड़ती ।

शंका—व्यक्ति अंश में शक्ति ज्ञान को कारण मानने में यद्यपि गौरव है तथापि वह फलमुख है, क्योंकि पदगत शक्ति का ज्ञान हुए बिना उस शक्तिमान् पद के ज्ञान से भी पदार्थज्ञान कैसे सम्भव हो सकेगा ? अतः इस प्रकार के फलमुख गौरव दोषावह नहीं हुआ करते । इसलिये व्यक्ति और जाति के शक्तियों का ज्ञान ही उनके बोध में कारण होता है कहना होगा ।

इसके अतिरिक्त शक्तिज्ञान के बिना अर्थात् केवल पद का ज्ञान होने से ही पदार्थ की उपस्थिति मान ली जाय तो जिस व्यक्ति को म्लेच्छ भाषा का ज्ञान न हो उसे भी

गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि] आगमपरिच्छेदः २१७

उस भाषा के शब्द सुनकर स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही पदार्थज्ञान होने लगेगा । अतः आवश्यक गौरव का भी स्वीकार कर ज्ञानद्वय से ही ( दो शक्तियों के ज्ञान से ही ) पदार्थज्ञान का होना स्वीकार करना चाहिये ।

ग्रन्थकार ने 'जातिशक्ति०' आदि वाक्यों से इस शंका का समाधान किया है । तथाहि—इस गौरव को फलमुख नहीं कह सकते । क्योंकि पदश्रवण होने पर अर्थात् व्यक्तिशक्ति का ज्ञान न होने पर भी जातिशक्तिज्ञान से जातिज्ञान होते ही तत्काल तदभिन्न व्यक्ति का भी ज्ञान हो जाता है । उसके होने में विलम्ब नहीं लगता । इस अबाधित अनुभव का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः दो ज्ञानों को कारण मानने की भी आवश्यकता नहीं होती । हम इस अवाधित अनुभव के बल से जातिशक्तिज्ञान ही व्यक्तिज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। यह मानने से 'म्लेच्छ भाषा के शब्दों से अनभिज्ञ को बोध होने लगेगा' आदि आपत्ति भी उपस्थित नहीं होगी । क्योंकि म्लेच्छ-भाषा के शब्दों की वाच्य जातियों से सम्बन्धित शक्तियों का ज्ञान न होने से ही अनभिज्ञ व्यक्ति को उससे अर्थबोध नहीं होने पाता । इसी प्रकार ज्ञानद्वयकल्पनारूप गौरव का भी स्वीकार नहीं करना पड़ता ।

शंका—जातिज्ञान उसकी शक्ति के ज्ञान से होता है और व्यक्तिज्ञान 'स्वरूपतः विद्यमान' शक्ति से ही होता है—यह मानने में विनिगमक क्या है ? इसके विपरीत, शक्तिज्ञान से ही व्यक्ति का बोध होता है; किन्तु जाति का स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ज्ञान होता है, क्यों न माना जाय ? अर्थात् व्यक्तिज्ञान में ज्ञात शक्ति की अपेक्षा होती है और जातिज्ञान में स्वरूपसती शक्ति की आवश्यकता होती है । व्यक्तिशक्ति-ज्ञान से ही शीघ्रतया जातिज्ञान होता है अर्थात् व्यक्ति शक्ति ज्ञान, जातिज्ञान में प्रयोजक है, यह मानने में क्या अड़चन है ? अर्थात् आपके पक्ष में विनिगमनाविरह दोष आता है ।

समाधान—हमारे मत में उपर्युक्त दोष नहीं आने पाता । क्योंकि व्यक्तिशक्ति-ज्ञान के होने पर अविलम्बेन जाति का ज्ञान होता है—ऐसा नियमेन अनुभव नहीं है । 'अयं गोपदवाच्यः' यह व्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है—इस वाक्य से व्यक्तिशक्तिज्ञान ( सामने स्थित गोव्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है, इस प्रकार शक्ति का ज्ञान ) होता है, परन्तु वहाँ ज्ञान की उपस्थिति नहीं होती । इस रीति से व्यक्तिशक्तिज्ञान, जाति-ज्ञान में व्यभिचारी साधन है, और वह व्यभिचार ही व्यक्तिज्ञान को कारण न मानने में तथा जातिशक्तिज्ञान को ही कारण मानने में विनिगमक है । इसके अतिरिक्त व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता यदि स्वीकार की जाय तो संसारभर के यच्च यावद् व्यक्तियों का ज्ञान होना अशक्य होने से शक्तिग्रह का सम्भव ही न होगा, और अनन्त शक्तियों के मानने में महान् गौरव है । ये सब दोष व्यक्तिशक्तिवाद पक्ष में आते हैं, इसलिये व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता नहीं मानी जा सकती । हमारे उपर्युक्त कथन में नैयायिकों की भी सम्मति है । क्योंकि नैयायिक भी कुछ स्थलों में स्वरूपसती शक्ति