वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंयोग्यता निरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २०३
अग्नि से तद्विरुद्ध आर्द्रीकरण क्रिया का होना संभव नहीं। इसलिये उक्त योग्यता के लक्षण की ऐसी वाक्य में अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी तरह 'जलेन दहेत्' इत्यादि वाक्य में योग्यता नहीं है--समझना चाहिये।
'संसर्गाबाधः' इतना ही लक्षण न कर उस संसर्ग में 'तात्पर्यविषयीभूत' विशेषण क्यों दिया ? यह 'स प्रजापतिः' आदि वाक्य से बताया गया है।
'संसर्गाबाधः' इतना ही लक्षण यदि करें तो 'स प्रजापतिः' इत्यादि अर्थवाद वाक्यों में अव्याप्ति होगी। क्योंकि अपनी वपा का उत्च्छेद करने पर कोई जीवित नहीं रह सकता। इस कारण उस वाक्य का कर्मत्व रूप संसर्ग, अन्य प्रमाणों से बाधित होता है। इसीलिये वह अर्थ, तात्पर्यविषयीभूत होना चाहिये—यह हमारा कहना है। प्रकृत स्थल में प्रत्यक्ष वपा का उत्पाटन, श्रुति के तात्पर्य का विषय नहीं है किन्तु पशुप्राशस्त्य ही श्रुति को विवक्षित है। जो प्रजाकाम हो 'स एतं प्राजापत्यं तूपरमालभेत' 'वह इस प्रजापतिदेवताक तूपर = श्रृंगरहित पशु का आलंभन = हनन करे' इस विधि का प्रशस्तत्व बताने के लिये 'स प्रजापतिः' इत्यादि वाक्य श्रुति में पठित है जिस पशु को सींग नहीं होते उसे 'तूपर' कहते हैं। इस गुणवाद रूप अर्थवाद का वाच्यार्थ इस प्रकार है कि पूर्व समय में जब पशु नहीं थे, तब प्रजापति ने अग्नि में अपनी वपा का हवन करते बराबर तूपर-अज उत्पन्न हुआ। इससे तात्पर्य इतना ही है कि 'तूपर' पशु का हवन कर प्राजापत्य याग करने से विपुल पशुओं की प्राप्ति होती है। (मी. १-२-१०) इस अर्थ का किसी प्रमाण से बाध नहीं होता। इस कारण उस वाक्य में योग्यता की व्याप्ति नहीं होती।
इसी प्रकार 'सोऽरोदीद्यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्' उसने रुदन किया इसलिये उसे 'रुद्र' कहते हैं। ऐसे अर्थवाद-वाक्यों में योग्यता है—समझना चाहिये। क्योंकि इस वाक्य का तात्पर्यार्थ इस प्रकार है—'बर्हिषि रजतं न देयम्' बर्हिर्याग में रजत का दान न करे, इस निषेध का यह अर्थवाद है। जो बर्हिर्याग में रजत देगा उसे एक वर्ष के भीतर ही रुदन का प्रसंग प्राप्त होता है। इसलिये बर्हिर्याग में रजतदान अप्रशस्त है। यह उस वाक्य का तात्पर्य-विषयभूत अर्थ है।
'तत्त्वमसि' वह ब्रह्म तू है 'अहं ब्रह्मास्मि' मैं सच्चिदानन्द रूप ब्रह्मस्वरूप हूँ, इत्यादि वाक्यों में जीव और ब्रह्म का अभेद ही तात्पर्यविषयीभूत संसर्ग है। किन्तु वह आपके कथनानुसार बाधित होता है। क्योंकि 'तत्त्वमसि' वाक्य में 'तत्' पद का अर्थ परोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है, और 'त्वं' पद का अर्थ अपरोक्षत्वादि विशिष्ट चैतन्य है। किन्तु उन परस्परविरुद्धधर्म-युक्त चैतन्यों में अभेद का सम्भव नहीं, इसलिये वह अर्थ बाधित होता है। इसी तरह 'अहं ब्रह्मास्मि' इस वाक्य में 'अहं' और 'ब्रह्म 'इनके अभेदान्वय का सम्भव नहीं होता। इसलिये आपका योग्यता-लक्षण अभेदार्थक वाक्यों में अव्याप्त होता है।