वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| २०४ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम् |
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इस शंका का 'तत्त्वमस्या'दि वाक्य से निराकरण इस प्रकार किया है—'तत्त्वम्' इत्यादि पदों का वाच्य ( शक्य = शक्ति से ज्ञात होनेवाला ) अर्थ, श्रुति को विवक्षित नहीं है । किन्तु उन पदों का लक्ष्य ( लक्षणा से ज्ञात होनेवाला--शुद्ध चैतन्य का अभेद रूप ) अर्थ बताने में ही श्रुति का तात्पर्य है और वह अबाधित होने से पूर्वोक्त दोष नहीं आता । इसी तरह जहाँ पर ( गङ्गायां घोषः ) लक्ष्यार्थ विवक्षित रहता है वहाँ लक्ष्यार्थ का अबाध रहना रूप दृष्टि से ही योग्यता का लक्षण विवक्षित है । तस्मात् 'तात्पर्यविषयीभूतसंसर्गाबाधः योग्यता' यह योग्यता का निर्दोष लक्षण है ।
अब क्रमप्राप्त आसत्ति का लक्षण बताते हैं—
आसत्तिश्चाव्यवधानेन पदजन्य-पदार्थोपस्थितिः । मानान्त- रोपस्थापितपदार्थस्यानवय-बोधाभावात्पदजन्येति । अत एवाश्रुत- पदार्थस्थले तत्तत्पदाध्याहारः 'द्वारम्' इत्यादौ 'पिधेहि' इति । अत एव 'इषे त्वा'१ इत्यादिमन्त्रे 'छिनद्मि'२ इति पदाध्याहारः । अत एव विकृतिषु 'सूर्याय३ जुष्टं निर्वपामि' इति पदप्रयोगः ।
अर्थ—अव्यवधान से ( बीच में अन्य पदों का व्यवधान = उपस्थित न होकर ) जो पदजन्य पदार्थ की उपस्थिति उसे आसत्ति कहते हैं । प्रत्यक्षादि शब्देतर प्रमाणों से उपस्थित होने वाले पदार्थों का अन्वय में बोध नहीं होता, इसलिये 'पदजन्य' यह पद लक्षण में दिया है । पदजन्य पदार्थोपस्थिति अपेक्षित होने से ही जहाँ पर क्रिया कार-कादि दूसरा पद नहीं कहा हो ऐसे 'द्वारम्' इस एक शब्द के अर्थ की पूर्ति करने के लिये 'पिधेहि' ऐसे पदों का अध्याहार करना पड़ता है, और इसी कारण 'इषे त्वा' इत्यादि मंत्रों में 'छिनद्मि' ऐसे पद का ही अध्याहार करना चाहिये । यह निर्णय मीमांसा में किया है ( मी० २-१-४७ ) । ऐसी पदजन्य-उपस्थिति मीमांसकों को मान्य होने से सौर्यादि विकृति यागों में 'सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' मैं सूर्यदेवता को उद्देश्य कर सावित्र हवि का निर्वाप करता हूँ—इन पदों का उच्चारण करना चाहिये, यह सिद्धान्त किया गया है ।
विवरण—पदजन्य पदार्थ की अव्यवधान से उपस्थित होना ही आसत्ति है । जिस क्रिया-कारकादि पदसमूह वाक्य से शाब्दबोध होता है उस वाक्य के वे पद, अन्य पदों के व्यावधान से ( प्रतिबन्ध से ) रहित होने चाहिये । जैसे—'गाम्' और 'आनय' ये दोनों पद, एक के बाद एक ऐसे क्रम से, बीच में अन्य पद के व्यवधान से रहित, उच्चारण करने पर ही, उससे वाक्यार्थ बोध होता है । परन्तु यदि कोई 'गाम्'
१. त्वेत्यादौ०'-इति पाठान्तरम् ।
२. 'बृमीत्यादि०'-इति पाठान्तरम् ।
३. 'त्वा'-इति पाठान्तरम् ।