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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 263, कुल 482 में से

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आसत्तिनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २०५

कहकर चुप हो जाय या बीच में ही अप्रकृत कोई शब्द कह दे, बाद 'आनय' कहे तो श्रोता को उस वाक्य से कुछ भी अर्थबोध नहीं होगा। इसलिये आसत्ति, शाब्दबोध में कारण रहती है। इसी प्रकार 'चन्द्रं भुंक्ष्व ओदनं पश्य' इत्यादि वाक्यों से भी अर्थबोध नहीं होता। क्योंकि यहाँ 'चन्द्रं' का 'पश्य' क्रिया से सम्बन्ध है। परन्तु 'पश्य' क्रिया, अव्यवधान से नहीं कही गई है। 'भुंक्ष्व' और ओदनम्' इन दो पदों के व्यवधान से कही गई है। इस कारण ऐसे वाक्य में आसत्तिलक्षण की अतिव्याप्ति नहीं होती। इसी प्रकार 'गिरिर्भुक्तमग्निमान् देवदत्तेन' ऐसे पदसमूह में यद्यपि क्रिया कारकादि समस्त पद उपस्थित रहते हैं और उनमें परस्पराकांक्षा तथा अन्वययोग्यता भी रहती है, तथापि उन पदों की अव्यवधान से उपस्थिति न होने के कारण उस वाक्य से 'देवदत्त ने खाया' और 'पर्वत अग्निमान् है।' इस अर्थ की प्रतीति नहीं होती।

यहाँ अव्यवधान से जो पदार्थोपस्थिति होनी है, वह पदजन्य हो, यह क्यों कहा, उस का कारण ग्रन्थकार ने 'मानान्तरोपस्थापित०' आदि ग्रन्थ से बताया है। उसका निष्कर्ष यह है—'सामने घट दीखने पर भी कोई व्यक्ति अंगुलि-निर्देश करते हुए 'सोमदत्त ! देखो' कहता है। उस समय सोमदत्त को घट का बोध होता है, परन्तु उस वाक्यार्थ में घट का अन्वयबोध ( शाब्दबोध ) नहीं होता। परन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण से ही उस समय घट का बोध होता है।

आसत्ति के लक्षण में 'पदजन्य' यदि न दें तो प्रत्यक्षात्मक उपस्थिति भी 'सोमदत्त पश्य' इस वाक्य में अव्यवधान से ही होती है, अतः उस लक्षण की प्रत्यक्ष में अतिव्याप्ति होगी। उसकी निवृत्ति के लिये 'पदजन्य' पद आवश्यक है। घट का ज्ञान उक्त वाक्य में अव्यवधान से होने पर भी वह पदजन्य नहीं अर्थात् 'घटम्' इत्याकारक पद से नहीं हुआ है, इसलिये अतिव्याप्ति नहीं हो पाती।

पदार्थ की उपस्थिति पदजन्य होने पर ही उस पदार्थ का शाब्दबोध होता है और अन्य उपाय से पदार्थ का बोध हुआ तो वह प्रत्यक्षादि अन्य प्रमाणों से होता है, यह आप कह रहे हैं। किन्तु ऐसा मानने पर 'द्वारम्' इतना ही शब्द श्रवण करने के बाद 'पिधेहि' क्रिया का जो ज्ञान होता है वह शाब्दबोधात्मक नहीं है कहना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर 'पिधान' अर्थ की उपस्थिति पदजन्य नहीं होती। किन्तु सभी शास्त्रकारों ने तो 'पिधान' क्रिया का ज्ञान शाब्दबोधात्मक माना है। तब सिद्धान्त में इसकी उपपत्ति किस प्रकार होगी ? यह आकांक्षा होने पर ग्रन्थकार ने 'अत एवाश्रुत०' इत्यादि ग्रन्थ से उसका समाधान बताया है। तथा हि—'पिधेहि' क्रिया का जो शाब्दबोध होता है वह पदजन्य ही होता है। क्योंकि पदजन्य पदार्थबोध ही शाब्दबोध में कारण होने से ऐसे अश्रुत पदार्थ के स्थल में 'पिधेहि' पद का अध्याहार ( योजना ) करना होता है। इस प्रकार ऐसे अध्याहृत पद से बोध के होने से यहाँ आसत्ति-लक्षण की अव्याप्ति