वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२०६ | वेदान्तपरिभाषा | [ आसत्तिनिरूपणम्
नहीं होती। प्रत्युत (विपरीत) 'पदार्थोपस्थिति पदजन्य होनी चाहिये' यह सिद्धान्त ही, इस उदाहरण से पुष्ट होता है।
'द्वारम्' के अनन्तर 'पिधेहि' क्रिया (पद) का अध्याहार किसलिये है? उसके बिना किये भी केवल 'पिधानरूप' अर्थ के अध्याहार करने से भी उपर्युक्त बोध की उपपत्ति का संभव हो सकती है' इस शंका के उत्तर में कहते हैं कि वृत्ति के द्वारा जिस अर्थ की उपस्थिति नहीं होती, वह अर्थ (पदार्थ) भी शाब्दबोध का विषय होता है, ऐसा मानने पर अनेक दोष उपस्थित होंगे।
१—जिस पद से पदार्थ का किसी प्रकार का संबंध हो उस पदार्थ का शाब्दबोध होता है—यह कहने पर 'घट शब्द' आकाश के साथ समवाय संबंध से संबद्ध होने से 'घटमानय' वाक्य का 'आकाशमानय' अर्थ भी होने लगेगा। इसलिये पद-पदार्थों का वृत्तिरूप विशेष संबंध ही मानना चाहिये। और उसे मानने पर सर्वत्र वृत्ति के द्वारा ही शाब्दबोध के होने से 'द्वारम्' में मात्र बिना वृत्ति के भी सामान्य संबंध से 'पिधेहि' अर्थ का शाब्दबोध होता है, यह मानने में गौरव है।
२—वैसे ही 'द्वारम्' यहाँ द्वितीया का जो कर्मत्व रूप अर्थ है उसका कहीं भी अन्वय नहीं होगा। क्योंकि पदजन्य अर्थ का पदजन्य अर्थ से ही अन्वय करने का नियम है।
३—इसी प्रकार 'पुष्पेभ्यः' शब्द का उच्चारण कर 'स्पृहयति' पद का अध्याहार न करके 'सामान्य इच्छा' रूप अर्थ का अध्याहार करने से 'स्पृह्' धातु के योग में ही होने वाली चतुर्थी विभक्ति की उपपत्ति नहीं लगेगी। तस्मात् प्रकृत में भी 'पिधेहि' पद का ही अध्याहार करना चाहिये। केवल पिधानादि अर्थ का अध्याहार कर शाब्दबोध की उपपत्ति नहीं लग सकती। पदजन्य पदार्थोपस्थिति का ही पूर्व-मीमांसकों ने भी स्वीकार किया है, यह प्रदर्शित करने के लिये ग्रन्थकार ने 'अत एव इषे त्वा' इत्यादि कहा है। उसका विवरण मीमांसा के द्वितीय अध्याय के प्रथम पाद में इस प्रकार किया है—
'इषे त्वोर्जेत्वा०' यह श्रुति, इस अधिकरण का विषय है। यहाँ संशय इस प्रकार किया है कि यह समस्त मंत्ररूप एक ही वाक्य है या विभिन्न दो वाक्य हैं? इस पर पूर्वपक्षी कहता है कि यह एक ही वाक्य मानना चाहिये, क्योंकि यह मंत्र अदृष्टार्थ है। और दो अदृष्ट अर्थों की कल्पना करने की अपेक्षा, एक अदृष्ट के मानने में ही लाघव है। यहाँ 'क्रिया' श्रुत नहीं है। इसलिये यह 'मंत्र' कर्मप्रकाशक होने से दृष्टार्थ है, नहीं मान सकते। तस्मात् यह अदृष्टार्थ-प्रतिपादक एक वाक्य है, यही कहना चाहिये।
इस प्रकार पूर्वपक्ष के प्राप्त होने पर 'समेषु वाक्यभेदः स्यात्' (२-१-४७) सूत्र से सिद्धान्त बताया है—ये दो भिन्न वाक्य हैं, ऐसा मानना चाहिये, क्योंकि 'इषे त्वा' और 'उर्जे त्वा' ये पद सम (परस्पर) की आकांक्षा नहीं रखते हैं।