भारतकोश
वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 265, कुल 482 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 265

पदार्थद्वैविध्यम् ] आगमपरिच्छेदः २०७

यहाँ क्रिया पद के न होने पर भी ये दो वाक्य कैसे माने जा सकेंगे ? इसका उत्तर यह है कि 'इषे त्वा' के बाद 'छिनत्ति' क्रिया का अध्याहार करना चाहिये, और 'ऊर्जे त्वा, के अनन्तर 'अनुमार्ष्टि' = सम्मार्जन करता है, क्रिया का अध्याहार करना चाहिये । ये दोनों वाक्य क्रमशः पलाश-शाखा के छेदन और मार्जन रूप दो पृथक् कर्मों का प्रकाशन करने वाले दृष्टार्थक ही हैं, अर्थात् 'इषे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुझे इच्छित अन्न के लिये तोड़ता हूँ । और 'ऊर्जे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुम्हारा रस के लिये अथवा बल के लिये सम्मार्जन करता हूँ, यह अर्थ निश्चित होता है । इसी तरह दूसरे एक वेदवाक्य में अश्रुत पद का अध्याहार बताने के लिये भी मीमांसा में एक अधिकरण बताया गया है । तथाहि—आग्नेय नामक प्रकृतियाग में 'देवस्य त्वा सवितुः······अग्नये जुष्टं निर्वपामि' इत्यादि मंत्र पठित हैं, उसका निर्णय मीमांसा में नवमाध्याय के प्रथम पाद में ३८-३९ सूत्रों से किया है । तथाहि—उपर्युक्त मंत्र में 'अग्नि' शब्द का सौर्यादि विकृति याग में ऊह किया जाय या न किया जाय । अर्थात् 'अग्नि' शब्द के स्थान पर 'सूर्यं' शब्द की योजना की जाय या न की जाय ? यह संशय आने पर 'सवितुः' यहाँ 'सवितृ' शब्द का ऊह न करने के लिये जैसे पीछे के अधिकरण में बताया गया है, उसी प्रकार यहाँ पर 'अग्नि' पद का ऊह न किया जाय—यह पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर सवित्रादि शब्द कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध नहीं है इसलिये उनका ऊह संभव न होने पर भी 'अग्न्यादि' शब्द तो कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध होने से विकृतियाग में 'सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' यह ऊह करना चाहिये—यह सिद्धान्त किया है । यहाँ पर भी पदाध्याहार ही बताया गया है । सारांश यह है कि 'पद का अध्याहार न कर पद के अर्थ का अध्याहार किया जाय' यह मानने पर मीमांसा के पूर्वोक्त अधिकरणों से विरोध होता है । इसलिये उस पक्ष को छोड़कर पदाध्याहार पक्ष का ही स्वीकार करना चाहिये । तस्मात् आसक्ति को लक्षण में 'पदजन्य पदार्थोपस्थिति' का स्वीकार करना उचित ही है ।

पदजन्यपदार्थोपस्थिति, शाब्दबोध में कारण है, यह बताया गया । परन्तु वह पदार्थ कितने प्रकार का है, यह आकांक्षा होने पर ग्रन्थकार कहते हैं—

पदार्थश्च द्विविधः—शक्यो लक्ष्यश्चेति । तत्र शक्तिर्नाम पदानामर्थेषु मुख्या वृत्तिः, यथा घटपदस्य पृथुबुध्नोदराद्याकृति-विशिष्टे वस्तुविशेषे वृत्तिः । सा¹ च शक्तिः पदार्थान्तरम् । सिद्धान्ते कारणेषु कार्यानुकूल-शक्तिमात्रस्य पदार्थान्तरत्वात् ।


१. सा च शक्तिरिति । नैयायिकास्तावत् संकेत एव शक्तिः न तु पदार्थान्तरम् प्रमाणाभावात् । स च संकेत: 'अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः इतीच्छारूपः । तत्रापि न संकेतमात्रं शक्तिः, किन्तु ईश्वरसंकेत एवेति न पामरादिसंकेतितानामपभाषितानामपि