भारतकोश
संग्रह पर लौटें

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पदार्थद्वैविध्यम् ] आगमपरिच्छेदः २०७

यहाँ क्रिया पद के न होने पर भी ये दो वाक्य कैसे माने जा सकेंगे ? इसका उत्तर यह है कि 'इषे त्वा' के बाद 'छिनत्ति' क्रिया का अध्याहार करना चाहिये, और 'ऊर्जे त्वा, के अनन्तर 'अनुमार्ष्टि' = सम्मार्जन करता है, क्रिया का अध्याहार करना चाहिये । ये दोनों वाक्य क्रमशः पलाश-शाखा के छेदन और मार्जन रूप दो पृथक् कर्मों का प्रकाशन करने वाले दृष्टार्थक ही हैं, अर्थात् 'इषे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुझे इच्छित अन्न के लिये तोड़ता हूँ । और 'ऊर्जे त्वा' का अर्थ है—हे पलाशशाखे ! मैं तुम्हारा रस के लिये अथवा बल के लिये सम्मार्जन करता हूँ, यह अर्थ निश्चित होता है । इसी तरह दूसरे एक वेदवाक्य में अश्रुत पद का अध्याहार बताने के लिये भी मीमांसा में एक अधिकरण बताया गया है । तथाहि—आग्नेय नामक प्रकृतियाग में 'देवस्य त्वा सवितुः······अग्नये जुष्टं निर्वपामि' इत्यादि मंत्र पठित हैं, उसका निर्णय मीमांसा में नवमाध्याय के प्रथम पाद में ३८-३९ सूत्रों से किया है । तथाहि—उपर्युक्त मंत्र में 'अग्नि' शब्द का सौर्यादि विकृति याग में ऊह किया जाय या न किया जाय । अर्थात् 'अग्नि' शब्द के स्थान पर 'सूर्यं' शब्द की योजना की जाय या न की जाय ? यह संशय आने पर 'सवितुः' यहाँ 'सवितृ' शब्द का ऊह न करने के लिये जैसे पीछे के अधिकरण में बताया गया है, उसी प्रकार यहाँ पर 'अग्नि' पद का ऊह न किया जाय—यह पूर्वपक्ष प्राप्त होने पर सवित्रादि शब्द कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध नहीं है इसलिये उनका ऊह संभव न होने पर भी 'अग्न्यादि' शब्द तो कर्म से प्रत्यक्ष संबद्ध होने से विकृतियाग में 'सूर्याय जुष्टं निर्वपामि' यह ऊह करना चाहिये—यह सिद्धान्त किया है । यहाँ पर भी पदाध्याहार ही बताया गया है । सारांश यह है कि 'पद का अध्याहार न कर पद के अर्थ का अध्याहार किया जाय' यह मानने पर मीमांसा के पूर्वोक्त अधिकरणों से विरोध होता है । इसलिये उस पक्ष को छोड़कर पदाध्याहार पक्ष का ही स्वीकार करना चाहिये । तस्मात् आसक्ति को लक्षण में 'पदजन्य पदार्थोपस्थिति' का स्वीकार करना उचित ही है ।

पदजन्यपदार्थोपस्थिति, शाब्दबोध में कारण है, यह बताया गया । परन्तु वह पदार्थ कितने प्रकार का है, यह आकांक्षा होने पर ग्रन्थकार कहते हैं—

पदार्थश्च द्विविधः—शक्यो लक्ष्यश्चेति । तत्र शक्तिर्नाम पदानामर्थेषु मुख्या वृत्तिः, यथा घटपदस्य पृथुबुध्नोदराद्याकृति-विशिष्टे वस्तुविशेषे वृत्तिः । सा¹ च शक्तिः पदार्थान्तरम् । सिद्धान्ते कारणेषु कार्यानुकूल-शक्तिमात्रस्य पदार्थान्तरत्वात् ।


१. सा च शक्तिरिति । नैयायिकास्तावत् संकेत एव शक्तिः न तु पदार्थान्तरम् प्रमाणाभावात् । स च संकेत: 'अस्मात् पदात् अयमर्थो बोद्धव्यः इतीच्छारूपः । तत्रापि न संकेतमात्रं शक्तिः, किन्तु ईश्वरसंकेत एवेति न पामरादिसंकेतितानामपभाषितानामपि

२०८ | वेदान्तपरिभाषा | [ पदार्थद्वैविध्यम् ]

**अर्थ—**और वह पदार्थ शक्य तथा लक्ष्य भेद से दो प्रकार का है ( उनमें शक्य का अर्थ है शक्ति रूप वृत्ति से युक्त और लक्ष्य का अर्थ है लक्षणा रूप वृत्ति से युक्त ) । पदों के वाच्य अर्थ में स्थित मुख्य वृत्ति को ही शक्यपद की घटक शक्ति कहते हैं । जैसे—'घट' पद की तल तथा मध्य भाग में वर्तुल आकार से युक्त वस्तु विशेष में रहने वाली वृत्ति ही शक्ति कही जाती है । वह शक्ति, पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ है । क्योंकि कारण में विद्यमान होती हुई कार्योत्पत्ति के अनुकूल ( जनक ) समस्त ( यावत् ) शक्ति को सिद्धान्त में पृथक् पदार्थ के रूप में स्वीकार किया है ।

**विवरण—**कुछ लोग शक्य, लक्ष्य और गौण भेद से तीन पदार्थ मानते हैं । किन्तु मूल में 'पदार्थ द्विविध है' कहकर उनका निराकरण किया है । गौण पदार्थ का लक्ष्य पदार्थ में ही अन्तर्भाव होता है, यह आगे चलकर ग्रन्थकार स्वयं कहेंगे । पद का अर्थ के साथ जो सम्बन्ध उसे वृत्ति कहते हैं । यह वृत्ति शक्तितथा लक्षणा भेद से द्विविध है । इनमें से 'शक्ति नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को शक्य या वाच्य और लक्षणा नामक वृत्ति से युक्त पदार्थ को लक्ष्य, यह शास्त्रीय संज्ञा है । इस कारण शक्य और लक्ष्य में से शक्य पदार्थ का निरूपण कर्तव्य होने पर पदार्थ को 'शक्य' संज्ञा जिस शक्ति के कारण प्राप्त होती है उस शक्ति का ही यहाँ निरूपण किया है । वृत्तिरूप सम्बन्ध साक्षात् और परम्परा भेद से दो प्रकार का है । उनमें से पद का पदार्थ के साथ मुख्य ( साक्षात् ) अर्थात् प्रथमोपस्थित जो सम्बन्ध = वृत्ति, उसे शक्ति कहते हैं—यह शक्ति का लक्षण है ।

शक्तत्वम् । स चेश्वरसंकेतो न ईश्वरसंकेतत्वेन गृह्यमाणः कारणम् । किन्तु संकेतत्वेन । अतः अविदुषामपि घटादिशब्दात् शाब्दबोधोपपत्तिः । आधुनिकसंकेतितानां चैत्रादिशब्दानां 'द्वादशेऽहनि पिता नाम कुर्यात्' इति सामान्यतः ईश्वरसंकेतितत्वमस्त्येवेति न दोष इति वदन्ति ।

तदिदं मीमांसका न सहन्ते । तेषामयमाशयः अभिधा नाम शक्तिः । सा च पदार्थान्तरम् । कारणेषु कार्यानुकूलशक्तिमात्रमतिरिक्तमङ्गीकरणीयम् । वह्निर्मणिसमवहितो दाहं न जनयति, मण्यसमवहितः उत्तेजकमण्यन्तरसमवहितो वा दाहं जनयति, इत्यत्र हि शक्तिसत्त्व-तद्विनाशौ एव नियामको सा च शक्तिः न द्रव्यं, गुणः, कर्मादिकं वा, तद्गुणराहित्यादित्यतिरिक्तः पदार्थः । एवं च शब्दनिष्ठा शक्तिरपि अतिरिक्तैव अंगीकरणीया । कस्मिन् पदे कीदृशार्थबोधनानुकूलशक्तिर्विद्यते इति नु व्यावहारादिसिद्धशक्तिविषयः पदार्थः शक्यः इति ज्ञेयम् । यदि सर्वत्रैव शक्तिः पदार्थान्तरम्, तदा किमु वक्तव्यं शक्तिविशेषस्य पदनिष्ठस्य पदार्थान्तरत्वे इति । एवं च मीमांसकसिद्धान्ते अद्वैतसिद्धान्ते च यथा कारणनिष्ठा कार्यानुकूला शक्तिः पदार्थान्तरं तथा पदनिष्ठा पदार्थोंपस्थित्यनुकूला शक्तिरपि पदार्थान्तरं, तस्या अपि कारणनिष्ठकार्यानुकूलशक्तित्वात् । कारणत्वात् पदार्थोंपस्थितेश्च कार्यत्वात् ।

पदशक्तिविचारः ] आगमपरिच्छेदः २०९

उदा०—'घट' पद से प्रथमतः ही बड़े वर्तुल—मध्य भाग वाले, कृश कण्ठ वाले पदार्थ की उपस्थिति 'शक्ति' वृत्ति से होती है । परन्तु लक्ष्य पदार्थ के साथ पद का पहले जैसा साक्षात् सम्बन्ध नहीं रहता अर्थात् पद श्रवण होने के अनन्तर प्रथमतः ही लक्ष्य पदार्थ का ज्ञान नहीं होता, अपितु शक्य ( वाच्य ) पदार्थ के द्वारा, परम्परा से ( शक्य-पदार्थ-ज्ञान के व्यवधान से ) होता । इस कारण शक्ति का लक्षण लक्ष्य पदार्थ में अतिव्याप्त नहीं होता ।

प्राचीन नैयायिकों का कहना है कि 'पद' के साथ अर्थ का जो सम्बन्ध हो उसे शक्ति कहते हैं । यह शक्ति द्रव्य-गुणादि सात पदार्थों से पृथक् ( अतिरिक्त ) पदार्थ नहीं है । किन्तु 'इस पद से यह अर्थ समझना' इत्याकारक जो ईश्वरेच्छा ( आत्मगुणरूप पदार्थ ) उसी में शक्ति का अन्तर्भाव होता है । आधुनिक 'देवदत्तादि' नाम में भी शक्ति है ही । क्योंकि 'पिता ग्यारहवें दिन पुत्र का नाम रखे' ऐसी ईश्वरेच्छा वहाँ भी रहती ही है ।

और नवीन नैयायिक—"ईश्वरेच्छा को शक्तिरूप न मानकर उसे केवल इच्छारूप ही मानते हैं । इस कारण आधुनिक संकेत में शक्ति का होना सिद्ध है ।

नैयायिकों के मत का खण्डन करने के लिये ग्रन्थकार ने 'सा च शक्तिः' इत्यादि वाक्य से शक्ति को पृथक् पदार्थ सिद्ध किया है । तथाहि—प्राचीन नैयायिकों के मतानुसार शक्ति का ईश्वरेच्छारूप होना सम्बन्ध नहीं । क्योंकि मनुष्य की इच्छा से नदी-नगर आदिकों की जो संज्ञायें रूढ हुई हैं, उनमें ईश्वरेच्छा नहीं होती । अब नव्य नैयायिकों से कथनानुसार सामान्य इच्छारूप शक्ति को मानें तो वह भी संभव नहीं । क्योंकि मनुष्य पट आदि की इच्छा से घट आदि पद का उच्चारण करे तो वहाँ भी इच्छा के विद्यमान होने के कारण घट पद की पट में भी शक्ति का स्वीकार करना पड़ेगा । इसलिये इस वृत्तिरूप शक्ति को पृथक् पदार्थ के रूप में ही स्वीकार करना चाहिये । इतना ही नहीं, हम वेदान्तियों ने संसार की समस्त वस्तुओं के कारणों में विद्यमान कार्योत्पादानुकूलता ( कार्य उत्पन्न करने को योग्यता ) को ही शक्ति समझ, सामान्य शक्ति को भी अतिरिक्त पदार्थ के रूप में स्वीकृत किया है । तब पदनिष्ठ अर्थबोध रूप कार्य की जनक शक्ति हमारे मत में पृथक् पदार्थ है, यह तो अत्यन्त स्पष्ट है ।

हम लोग 'अर्थापत्ति' प्रमाण से शक्ति का पार्थक्य ( पृथक् पदार्थत्व ) सिद्ध करते हैं । तथाहि—केवल अग्नि, दाह करने में समर्थ है, किन्तु मणि के सान्निध्य से दाह नहीं होता । इस कारण मणि के सान्निध्य से दाहकारणीभूत अग्नि शक्ति नष्ट हो गई, यह कल्पना करनी पड़ती है । इसलिये यह भ्रष्ट होने वाला शक्तिरूप पदार्थ, अन्य सब पदार्थों की अपेक्षा विलक्षण ( पृथक् ) पदार्थ सिद्ध होता है । यदि यह कहें कि—प्रतिबन्धक का अभाव, कार्यमात्र के प्रति कारण होता है । यहाँ तो मणिरूप प्रतिबन्धक पदार्थ के विद्यमान होने से प्रतिबन्धकाभावरूप कारण नहीं है, इसलिये दाहरूप कार्य नहीं होता ।

२१०वेदान्तपरिभाषा[ जातिशक्तिवादः

परन्तु यह कहना ठीक नहीं क्योंकि है प्रतिबन्धकाभाव अभावरूप होने से उसमें किसी भाव कार्य के प्रति कारणता नहीं बन सकती। इसके अतिरिक्त (१) दाहादिकार्य वह्निनिष्ठ दाहानुकूल शक्तिरूप पदार्थ से युक्त है, (२) क्योंकि उसमें कार्यत्व है, (३) घटादि के समान। यह¹ अनुमान भी शक्ति को अतिरिक्त पदार्थ सिद्ध करता है। इसी प्रकार 'परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते' इस परमात्मा की अनेकविध (सत्त्वादिगुणों से अनेकरूप) पर (सूक्ष्म), कार्यगम्य शक्ति है। 'शक्तयः सर्वभावानामचिन्त्या ज्ञान-गोचराः' सब पदार्थों में अचिन्त्य (अनिर्वचनीय) और कार्यज्ञानगम्य शक्तियां हैं, आदि अनेक श्रुतियाँ शक्ति का पार्थक्य सिद्ध करती हैं। तस्मात् शक्ति, अतिरिक्त पदार्थ है और पदनिष्ठ शक्ति भी इच्छारूप नहीं है। तब पदनिष्ठ शक्ति का ज्ञान किस प्रमाण से होता है ? उत्तर है कि 'अनुमान प्रमाण' उसमें ज्ञापक है।

सा² च तत्तत्पदजन्य-पदार्थज्ञान-कार्यानुमेया। तादृशशक्ति-विषयत्वं शक्यत्वम्।³ तच्च जातेरेव न व्यक्तेः, व्यक्तीनामानन्त्येन


१. 'दाहादिकार्यं वह्नि निष्ठस्वानुकूलशक्तिपूर्वकं कार्यत्वात् घटवत्'।

२. ननु कारणेषु कार्यानुमेयाः शक्तयः सन्तु नाम, किन्तु प्रकृते केन कार्येण पदनिष्ठा शक्तिः अनुमीयते, यतः पदनिष्ठा शक्तिः नैव सिद्धा प्रमाणाभावात्, कैव . कथा तदतिरिक्ततायाः। तत्रेदं समाधानं करोति ग्रन्थकारः-सा च तत्तत्पदजन्येति। सा च पदनिष्ठा शक्तिः तत्तत्पदजन्यं यत् पदार्थज्ञानं तद्रूपं यत् कार्यं तेन अनुमेया भवति।

३. उक्तलक्षणशक्तिविषयत्वं ( शक्तिजन्यबोधविषयत्वं ) शक्यत्वं जातेर्व्यक्तेर्वा ? इति जिज्ञासायां गौतमीयाः ( नैयायिकाः ) जात्याकृतिव्यक्तीनां पदशक्यत्वं वदन्ति। दीधित्त्यानुयायिनस्तु व्यक्तेरेव, वैयाकरणा अपि व्यक्तेरेवेति। तत्र ग्रन्थकारो ब्रवीति-तच्च जातेरेव। जातिरत्र अनुगतो धर्मः, परैः जातिशब्देन व्यवह्रियमाणो विज्ञेयः। ननु इतः पूर्वं जातेर्निरसनं कृतम्, अत्र च जातेः शक्यत्वं व्यवस्थाप्यते। इति परस्परविरुद्धम्। तत्रैवं बोद्धव्यम्—पूर्वग्रन्थेन जातेर्निरसनं न कृतं किन्तु जातेः पदार्थान्तरत्वं तल्लक्षणादिकं च निरस्तमासीत्। सकलगोव्यक्तिषु अनुगतः गोत्वरूपो धर्मंस्तु अभ्युपगत एवेति न किञ्चिदपि परस्परं विरुद्धम्। अतो वेदान्ते सर्वत्र जातिपदेन अनुगतो धर्म एव स्वीकृतव्यः। एवञ्च मीमांसकाः अनेकशक्तिकल्पनाप्रसङ्गात् व्यक्तौ जातिविशिष्टव्यक्तौ वा शक्तिं नाङ्गीकुर्वन्ति। तेन गवान्तरबोधापत्तेः एव गवि शक्तिरिति मतं प्रत्युक्तं भवति। अन्यच्च व्यक्तिशक्तिवादे अनेककार्यकारणभावकल्पनाप्रसंगेन गौरवं भवति। जातिशक्तिवादे तु नैवमिति आकृति-(जाति-) शक्तिवाद एव युक्तः। तेन 'श्येनचितं चिन्वीत' इति वाक्यमपि श्येनाकारचयनविधानात् सार्थकं भवति। नहि श्येनपक्षिभिः चयनं कर्तुं योग्यम्। 'गामानय, व्रीहीन् प्रोक्षति' इत्यादौ व्यक्तीनां बोधः आक्षेपात् भवति। आक्षेपो

जातिशक्तिवादः ] आगमपरिच्छेदः २११

गुरुत्वात् । कथं तर्हि गवादि-पदाद् व्यक्तिभानमिति चेत्, जातेर्व्यक्ति-समान-संवित्संवेद्य^१त्वादिति ब्रूमः ।

अर्थ—और वह पदनिष्ठ शक्ति, तत्तद् विशेष पद से तत्तद् विशेष पदार्थ के ज्ञान-रूप कार्य से अनुमेय ( अनुमान प्रमाण से जानने योग्य ) है । पदार्थ में ऐसी शक्ति की विषयता होना उसकी शक्यता है । वह शक्यत्व ( ता ) जाति में ही रहता है, व्यक्ति में नहीं। क्योंकि व्यक्ति अनन्त ( असंख्य ) होने से प्रत्येक व्यक्ति पृथक् शक्यत्व मानने में गौरव है । व्यक्ति में यदि शक्यत्व ( शक्ति ) नहीं है तो 'गो' आदि पदों के श्रवण करते ही सास्नादिमान् गोव्यक्ति का ज्ञान कैसे होता है ?' उत्तर यह है कि—जाति, व्यक्ति


नामाद्यपत्तिः । तथा च व्यक्तिबोधं विना आनयनादिक्रियान्वयानुपपत्त्या लक्षणया व्यक्ति-बोधः । तथापि 'गौरस्ति' इत्यत्र तु अपेक्षाऽभावेन अन्वयानुपपत्त्यभावात् व्यक्तिबोधाऽ-संभवः इति जातेर्व्यक्तिसमानसंवेद्यत्वेन जातिभासकसामग्र्यैव व्यक्तेरपि भानमिति अन्ये मन्यन्ते । व्यक्तेः समाना संविद् व्यक्तिसमानसंविद्, तया संवेद्या—व्यक्तिसमान-संवित्संवेद्या, तस्याः भावः, तस्मात् । यया संविद्व्यक्त्या ( ज्ञानव्यक्त्या ) घटवृत्ति घटत्वं गृह्यते, तयैव घटस्यापि ग्रहणं भवति । जातिव्यक्त्योः अभेदाभ्युपगमात् न सामग्र्यन्तरस्यावश्यकता भवति ।

गुरुमते तु जातौ व्यक्तौ च शक्तिः । तथापि जातौ सा ज्ञायमाना कारणम् व्यक्तौ तु स्वरूपसती ( स्वरूपेण विद्यमाना ) हेतुः । तथा च व्यक्तौ स्वरूपेण विद्यमानैव शक्तिः तदुपस्थितौ हेतुः, तेन व्यक्तेरपि शक्यत्वं शाब्दबोध्यत्वं चोपपन्नम् तथा चोक्तं तत्त्वप्रदीपि-कायाम्—“आकृतेः शब्दार्थत्वेऽपि तस्या एव शब्दार्थत्वमितिनियमनाङ्गीकारात्” इति । ज्ञायमानशक्त्या जात्युपस्थितिदेशायां स्वरूपेणवर्तमानया शक्त्या व्यक्त्युपस्थितेरुपपत्तौ सत्यां व्यक्तिशक्तिज्ञानं तदुपस्थितौ न अपेक्षितं भवति । एवन्तर्हि जात्युपस्थितावपि जातिशक्तिज्ञानं कारणं न स्यात्, तत्रापि स्वरूपसत्या शक्त्या तदुपस्थितिः संभविष्यति । परं नैतदुचितम् यतो जातौ यदि शक्तिः स्वरूपसती हेतुः स्यात्, तदा अगृहीतशक्तिकाना-मपि पुंसां तत्तच्छब्दात् तत्तदर्थोपस्थितिः स्यात्, तत्र तत्रापि तत्तच्छक्तेः स्वरूपेण विद्य-मानत्वात् । न च तथा दृश्यते, जातौ सा ज्ञाता हेतुर्भवति ।

किन्तु मतमिदं नाभिमतं भाट्टानाम् । ते हि व्यक्तौ स्वरूपसती शक्तिरपि न गौरवा-दङ्गीकरणीयेति मन्यन्ते । तन्त्रवार्तिकेऽपि—“आकृति-व्यक्त्योरत्यन्तभेदाभावात् कदा-चिद् व्यक्तिरूपेण आकृतिरभिधीयते, कदाचित् सामान्यरूपेण । शब्दस्य उभयरूपं वस्तु अर्थत्वात् । अत एव 'गामानय' इति चोदिते अर्थप्रकरणाभावे यां कांचिद् सामान्ययुक्तां गाम् आनयति, सर्वां न विशिष्टाम् । अतः आकृतिरेव शब्दार्थः इति सिध्यति ।”


१. 'तयेति'—इति पाठान्तरम् ।

२१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिशक्तिवादः

ज्ञानरूप एक ही ज्ञान से संवेद्य होने से, जाति ज्ञान के होते ही व्यक्तिज्ञान और व्यक्ति- ज्ञान के होते ही उसमें ही जातिज्ञान होता है। ऐसा हम कहते हैं।

विवरण —'घट' पद के श्रवण करते ही कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ का ज्ञान ( स्मरण ) होता है। 'पट' पद के श्रवण करने पर कंबुग्रीवादिमान् पदार्थ की मन में उपस्थिति नहीं होती। अतः इस अन्वयव्यतिरेक से 'घट' पद की शक्ति 'कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में है' यह सिद्ध होता है। इस विषय में अनुमान-प्रयोग इस प्रकार है—

( १ ) 'पदार्थज्ञान, पदनिष्ठ-स्वबोधानुकूल-शक्तिपूर्वक है, ( २ ) क्योंकि वह पदार्थ- ज्ञान पदजन्य-पदार्थज्ञान कार्यरूप है, ( ३ ) जैसे घटरूप पदार्थ का ज्ञान 'घट' पद की कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में विद्यमान शक्ति से युक्त है।' इस अनुमान से पदनिष्ठ शक्ति, अतिरिक्त सिद्ध होती है। इस प्रकार शक्ति का निरूपण किया। अब 'तादृश०' इत्यादि वाक्य से उस शक्ति से युक्त ऐसे शक्य पदार्थ का स्वरूप बताया है। पूर्वोक्त शक्ति से उत्पन्न होने वाले ज्ञान का जो विषय होता है वह पदार्थ 'शक्य' होता है। अर्थात् उस पदार्थ में उस पद का शक्यत्व रहता है। जैसे—'घट' पद से घटत्व' अर्थ का बोध होता है, अतः 'घट' पद की शक्ति से होनेवाले इस ज्ञान में 'घटत्व' विषय रहता है अर्थात् वह 'घटत्वविषयक' घटत्व का ज्ञान है। इस कारण घटपद का 'घटत्व' शक्य है, अर्थात् शक्यत्व घटनिष्ठ है।

'पद का शक्य अर्थ कौन सा ?' इस विषय में तत्तद् शास्त्रकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ लोग 'गो' पद की सास्नादिमान् ( सास्ना = गाय के कण्ठ के नीचे लटकती मांसमय झालर ) गोव्यक्ति में शक्ति मानते हैं। नैयायिक--जातिविशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है ( 'गो' पद गोत्वविशिष्ट गोव्यक्ति में शक्ति रहती है अर्थात् गोत्वविशिष्ट गो, गोपद का शक्य है ) ऐसा कहते हैं। इन सब कल्पों का निरसन करने के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने पूर्वोत्तर मीमांसा-साधारण शक्यत्व कहाँ रहता है यह 'तच्च' आदि ग्रन्थ से बताया है। गवादि ( गो आदि ) पदों की शक्ति, जाति में ही रहती है, इसे स्वीकार करना चाहिये। क्योंकि व्यक्ति में शक्ति मानने पर गोव्यक्तियों के अनन्त होने से उनमें रहने वाली शक्तियाँ भी अनन्त माननी होंगी। परन्तु इस प्रकार अनन्त शक्तियों की कल्पना करने में बहुत गौरव है। इसके अतिरिक्त एक 'गो' पद से एक व्यक्ति में शक्तिग्रहण ( शक्तिज्ञान ) होने पर भी अन्य गोव्यक्ति का उस पद से ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वहाँ की शक्ति भिन्न है, और उसका ज्ञान होने के लिये अन्य गोनिष्ठ शक्ति का ज्ञान आवश्यक है। इस रीति से असंख्य गौओं की शक्ति का ज्ञान सहस्र युगों में भी नहीं हो पायगा। इस प्रकार 'गो' आदि पदों की शक्तिग्रह का होना संभव ही नहीं


१. पदार्थज्ञानं पदनिष्ठस्वानुकूलशक्तिपूर्वकं पदजन्यपदार्थज्ञानरूपकार्यत्वात्, घटरूप-पदार्थज्ञानवत् ।

जातिशक्तिवादः ] आगमपरिच्छेदः २१३

होगा। ऐसे अनेक दोष व्यक्तिशक्तिवाद में पैदा होते हैं। तस्मात् व्यक्ति में शक्ति को नहीं मान सकते।

नैयायिकों के 'जातिविशिष्ट व्यक्ति-शक्तिवाद' पक्ष में भी अनन्त व्यक्तियों का ज्ञान न होने के कारण अमुक शब्द की अमुक अर्थ में ही शक्ति है, ऐसा नियम नहीं किया जा सकेगा, आदि पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही हैं। इसलिये मीमांसकों का अभिमत जातिशक्तिवाद ही स्वीकार करना चाहिये। यह मानने पर गोत्व जाति के एक होने से एक व्यक्ति में गोत्व जाति का ज्ञान होने पर भी सर्वत्र गोत्व जाति के एक होने से अन्य व्यक्तियों में भी शक्तिग्रह होता है, और इस पक्ष में लाघव भी है।

शंका—प्रत्यक्ष परिच्छेद में 'जातित्वोपाधित्वपरिभाषायाः सकलप्रमाणागोचरतया०' इत्यादि कहकर जाति और उपाधि का खण्डन किया है। और यहाँ पदों की शक्ति 'सकलप्रमाणागोचर' ऐसी जाति में है—ऐसा कहते हैं, अतः यह कैसे संभव है ? जाति पदार्थ ही यदि आपके मत में नहीं हैं तो आप उसमें शक्ति को भी कैसे मान सकेंगे।

समाधान—शंका ठीक है। परन्तु उसका उत्तर इस प्रकार है—हमने (ग्रन्थकार ने (पहिले जाति का खण्डन नहीं किया है किन्तु नैयायिकों की 'जाति अतिरिक्त पदार्थ हैं' इस परिभाषा का ही खण्डन किया है अर्थात् जाति स्वतन्त्र ( पृथक् ) पदार्थ नहीं, इतना ही बताया है, इसलिये वहाँ 'घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानम्' यह कहकर 'घटत्वादि' धर्म के सद्भाव का (अस्तित्व का) अङ्गीकार किया है। 'घटत्व घट की अपेक्षा अतिरिक्त एवं उसमें समवाय संबंध से रहनेवाला पदार्थ हैं' यह नैयायिकों का मत सर्वथा अयोग्य है। तस्मात् यहाँ 'जाति' शब्द को घटत्वादि आकृतियों का वाचक समझना चाहिये। अतएव भाष्यकार श्री शंकराचार्य ने शारीरक भाष्य में (अ० १-३-२८) 'आकृतिभिश्च शब्दानां सम्बन्धो न व्यक्तिभिः' इत्यादि कहकर जाति शब्द के स्थान पर 'आकृति' शब्द की ही योजना की है। अतः यहाँ पर भी जाति शब्द की योजना आकृति को उद्देश्य करके ही की गई है। यह समझना चाहिये। इसलिये किसी प्रकार का विरोध नहीं आता। नैयायिक जिस अनुगत धर्म को जाति कहते हैं, वह जाति शब्द अनुगत धर्मरूप अर्थ में ही यहाँ प्रयुक्त किया है। 'गोत्वादि अनुगत धर्मरूप अर्थ में शब्दों की शक्ति है' इस सिद्धान्त पर ऐसी शंका उठती है कि—'व्यक्ति में या जाति-विशिष्ट व्यक्ति में पद की शक्ति को स्वीकार करने वाले हमारे मत में जैसे आपने दोष दिये वैसे ही आपके स्वीकृत किये हुए इस जातिशक्तिवाद में भी दोष हैं। क्योंकि 'गामानय' 'व्रीहीन् प्रोक्षति' आदि व्यक्तिमात्रबोधक वाक्यों का अर्थ जातिशक्तिवादी आपके मत में 'गोत्व जाति को लाओ' और 'व्रीहित्व जाति का प्रोक्षण करो' होने लगेगा। परन्तु वैसा होना संभव नहीं। क्योंकि अमूर्त 'जाति' पदार्थ का आनयन किंवा प्रोक्षण असंभव है। इस कारण यहाँ पर जो केवल व्यक्ति का बोध होता है, उसकी अनुपपत्ति होगी

२१४ वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

अर्थात् व्यक्तिबोध नहीं होगा। यह महादोष जातिशक्तिवाद में आता है, ऐसी स्थिति में आप व्यक्तिबोध की उपपत्ति कैसे लगाते हैं ?

व्यक्तिभान की इस उपपत्ति की मीमांसा के भिन्न-भिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से बताया है। कितने ही विद्वान् अर्थापत्तिप्रमाण से व्यक्ति का भान ( ज्ञान ) मानते हैं। हम 'गामानय' इस उत्तम वृद्धवाक्य को सुनकर मध्यमवृद्ध के द्वारा गोव्यक्ति को लाया जाता हुआ देखते हैं। उसे यदि व्यक्तिबोध न हुआ होता तो 'आनयन' क्रिया में व्यक्ति का अन्वय ही न हुआ होता। इसलिये 'अर्थापत्ति' प्रमाण से ऐसे वाक्यों में व्यक्तियों का भान होना स्वीकार करना चाहिये।

परन्तु यह मत योग्य नहीं है। क्योंकि 'गामानय' इस वाक्य में यद्यपि वैसा ज्ञान ( व्यक्तिभान ) हो सकता है तथापि 'गौरस्ति' इस वाक्य में उक्त प्रकार से कैसी भी अन्वयानुपपत्ति संभव नहीं है। अतः यहाँ व्यक्तिबोध नहीं होगा, यह दोष इस पक्ष में आता है, इसलिये ग्रन्थकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने इस ग्रन्थ में उस पद का किञ्चिन्मात्र भी उल्लेख न कर अन्य तीन आचार्यों के ही मतों उल्लेख किया है। उनमें से ग्रन्थकार को तीसरा भाट्ट पक्ष ( कुमारिल भट्ट का पक्ष ) ही विशेषतः सम्मत है। तथापि प्रथमतः दो पक्षों बताकर अनन्तर तीसरा पक्ष सिद्धान्त के रूप में बतावेंगे। उक्त शंका का 'न च०' इत्यादि वाक्य में अनुवाद कर 'जातेः' आदि ग्रन्थ से प्रथम पक्ष के समान समाधान बताया है। नैयायिकों के समान वेदान्ती धर्म को धर्मी की अपेक्षा पृथक् नहीं मानते, किन्तु धर्म और धर्मी का तादात्म्य ( ऐक्य ) मानते हैं। इस कारण वस्तुतः यद्यपि जाति ही शक्य है तथापि जाति और व्यक्तिरूप धर्म-धर्मी का अभेद होने से एक ज्ञान से ही जाति और व्यक्ति का ज्ञान हो जाता है अर्थात् जति का ज्ञान होते ही उसमें ही व्यक्ति का ज्ञान होता है एवं व्यक्ति के ज्ञान में जाति भी भासती है, यह तात्पर्य है। इसलिये जातिशक्तिवाद में व्यक्तिभान की अनुपपत्ति नहीं हो पाती।

पद से व्यक्ति का ज्ञान कैसे सम्भव हो सकता है? क्योंकि पद की शक्ति व्यक्ति में है ही नहीं। तब व्यक्ति का भान होता है' यह भी आप कैसे निश्चय करेंगे? और शक्ति के न होने पर भी पद से पदार्थ का ज्ञान होता है, ऐसा मानने पर जिस किसी भी शब्द से जिस किसी अर्थ का ज्ञान होने लगेगा। ऐसी शंका के निरसनार्थ ग्रन्थकार पूर्वोक्त समाधान की अरुचि से, अग्रिम ग्रन्थ के द्वारा प्रभाकर मतानुसार व्यक्तिबोध की उपपत्ति को बताते हैं।

'यद्वा, गवादिपदानां व्यक्तौ शक्तिः स्वरूपसती न तु ज्ञाता


९. शाब्दबोधे पदवृत्तिविषयस्य भानं न भवति। अन्यथा अन्वयेऽपि शक्तिकल्पना न भवेत्। किन्तु अन्वयेऽपि भाट्टैः शक्तिरङ्गीकृता। तदुक्तं न्यायसिद्धान्तमञ्जर्याम् — 'भाट्टास्तु अन्वयविशिष्टे शक्तिग्रहात् अन्वयेऽपि शक्तिरेवेत्याहुरिति'। अतो व्यक्तावपि

गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि ] आगमपरिच्छेदः २१५

हेतुः । जातौ तु^१ ज्ञाता । न^२ व्यक्त्यंशे शक्तिज्ञानमपि कारणं गौरवात् ।^३ जातिशक्तिमत्त्व-ज्ञाने सति व्यक्तिशक्ति^४मत्त्वज्ञानं विना व्यक्तिधी-विलम्बाभावाच्च ।

अत एव न्यायमतेऽप्यन्वये शक्तिः स्वरूपसतीति सिद्धान्तः । ज्ञानमान-शक्ति-विषयत्वमेव वाच्यत्वमिति जातिरेव वाच्या ।

अर्थ— अथवा 'गौः' इत्यादि पदों की व्यक्ति में स्वरूपतः विद्यमान शक्ति है (और वह व्यक्ति के ज्ञान होने में कारण है) व्यक्ति में विद्यमान वह शक्ति ज्ञात होकर व्यक्ति के बोधन में कारण नहीं होती। किन्तु जाति के बोधन में मात्र वह शक्ति ज्ञात होकर ही कारण होती है। 'व्यक्ति' अंश में व्यक्ति-शक्ति का ज्ञान भी कारण है, यह मानना आवश्यक नहीं है। क्योंकि व्यक्तिशक्तिज्ञान तथा जातिशक्तिज्ञान—दोनों को शाब्दबोध में कारण मानने में गौरव (दोष) होता है। और जाति के शक्तिमत्त्व (शक्ति) का ज्ञान होने पर व्यक्तिशक्ति का ज्ञान होने पर भी व्यक्ति के ज्ञान न होने में विलम्ब (देर) नहीं लगती। इसीलिये जहाँ शक्ति का ज्ञान न होते हुए भी वस्तु का ज्ञान होता है, वहाँ शक्तिज्ञान की कल्पना करना अनुचित है, अतएव न्यायमत में भी 'शक्ति अन्वय में स्वरूपसती (स्वरूपतः विद्यमान) रहती हैं' (वह ज्ञान नहीं रहती) सिद्धान्त किया है।

(शंका—व्यक्ति में शक्ति को स्वरूपसती मानने पर व्यक्ति भी गवादि पदों की वाच्य होने लगेगी, अतः इसका समाधान करते हैं—) ज्ञायमान शक्ति में (शक्तिजन्यज्ञान में) जो पदार्थ विषय होता है, वही वाच्य होता है—इस प्रकार 'वाच्य' का लक्षण (परिभाषा) होने से (ज्ञानमान-शक्ति-विषय) जाति ही 'गवादि' पदों का वाच्य ठहरती है। (व्यक्ति वाच्य नहीं होती) अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आने पाता।

विवरण— शक्ति के विषय में प्रभाकर के सिद्धान्त का आशय इस प्रकार है—कारण की सत्ता कार्य में आवश्यक रहती है, परन्तु कुछ कार्यों की उत्पत्ति में कारण का स्वरूपतः रहना आवश्यक होता है, परन्तु कितने ही कार्यों में कारण के प्रत्यक्ष न होने पर भी उसके केवल ज्ञान से भी कार्य निष्पन्न हो सकता है।


स्वरूपसती शक्तिरपेक्षितेवेति गुरुमतानुसारेणाह—यद्धे'ति। अर्थात् पदात् व्यक्तिज्ञानं दुर्लभं तत्प्रयोजकशक्तेरभावादित्यरुचिरिति सूच्यते।
१. 'सा'—इति पाठान्तरम्।
२. 'च'—इति पाठान्तरम्।
३. व्यक्तिभाने शक्तिः कारणं, न तु तज्ज्ञानमपि, उभयत्र शक्तिज्ञानस्य कारणत्व-कल्पने गौरवम्।
४. 'क्ति-ज्ञानं'—इति पाठान्तरम्।

२१६ वेदान्तपरिभाषा [गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

उदाहरणार्थ—घटादि कार्यों की उत्पत्ति में आवश्यक दण्डादिकारणों की स्वरूपतः सत्ता आवश्यक होती है, दण्ड के ज्ञानमात्र से घट की उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् दण्ड की स्वरूपसत्ता ही घट में कारण होती है । किन्तु धूम से अग्नि का अनुमान जब होता है उस समय अनुमिति में यद्यपि धूम कारण है तथापि उसकी स्वरूपतः सत्ता आवश्यक नहीं होती । धूलि को ही धूम समझकर उसके सहारे से भी 'पर्वत वह्निमान् है' यह अनुमिति होती है । अतः कहीं वस्तु की स्वरूपसत्ता कारण होती है और कहीं उसका ज्ञान अर्थात् ज्ञानसत्ता कार्य की जनक होती है । इसी प्रकार प्रकृत में भी व्यक्ति और जाति दोनों में शक्ति, मान लेनी चाहिये । व्यक्ति के बोध के लिये शक्ति की स्वरूप-सत्ता आवश्यक है और जाति के ज्ञान के लिये शक्ति की ज्ञात सत्ता को कारण मान-कर व्यक्तिबोध की उत्पत्ति लगानी चाहिये, अर्थात् 'गोः' इत्यादि पदों से गोव्यक्ति का ज्ञान होने के लिये इस व्यक्ति में शक्ति है' इस प्रकार के शक्तिज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अपितु वह शक्ति व्यक्ति में स्वरूपतः होने पर भी व्यक्ति का ज्ञान हो सकता है, क्योंकि गवादि पदों में व्यक्तिबोधक सामर्थ्य रहता ही है । परन्तु जाति का ज्ञान होने के लिये मात्र 'यह जाति शक्तिमती है' यह ज्ञान रहना आवश्यक होता है ।

शंका--जिस प्रकार जातिज्ञान के लिये उसकी शक्ति का ज्ञान होना आवश्यक है उसी प्रकार व्यक्तिज्ञान के लिये भी व्यक्ति-शक्तिज्ञान कारण है, यह क्यों न कहा जाय ? सभी जगह ज्ञात शक्ति को ही कारण मानने में लाघव भी है, क्योंकि एक ही प्रयोजक मानना पड़ता है ।

ग्रन्थकार 'न व्यक्त्यंशे' वाक्य से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर समाधान करते हैं । व्यक्ति अंश में उसकी शक्ति का ज्ञान भी कारण होता है यह मानने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि ऐसा मानने पर जातिज्ञान के लिये जातिशक्तिज्ञान और व्यक्तिज्ञान के लिये व्यक्तिशक्तिज्ञान—इस प्रकार दो ज्ञान शाब्दबोध में कारण मानने होंगे । परन्तु एक पद के शाब्दबोधार्थ दो ज्ञानों का कारण मानने में 'गौरव' दोष होता है । अतः इसकी अपेक्षा जातिशक्तिज्ञान से जाति की उपस्थिति ( ज्ञान ) होते ही वहाँ स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही व्यक्तिज्ञान हो जाता है, यह मानने में लाघव है, क्योंकि इस पक्ष में दो कारणों की कल्पना नहीं करनी पड़ती ।

शंका—व्यक्ति अंश में शक्ति ज्ञान को कारण मानने में यद्यपि गौरव है तथापि वह फलमुख है, क्योंकि पदगत शक्ति का ज्ञान हुए बिना उस शक्तिमान् पद के ज्ञान से भी पदार्थज्ञान कैसे सम्भव हो सकेगा ? अतः इस प्रकार के फलमुख गौरव दोषावह नहीं हुआ करते । इसलिये व्यक्ति और जाति के शक्तियों का ज्ञान ही उनके बोध में कारण होता है कहना होगा ।

इसके अतिरिक्त शक्तिज्ञान के बिना अर्थात् केवल पद का ज्ञान होने से ही पदार्थ की उपस्थिति मान ली जाय तो जिस व्यक्ति को म्लेच्छ भाषा का ज्ञान न हो उसे भी

गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि] आगमपरिच्छेदः २१७

उस भाषा के शब्द सुनकर स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही पदार्थज्ञान होने लगेगा । अतः आवश्यक गौरव का भी स्वीकार कर ज्ञानद्वय से ही ( दो शक्तियों के ज्ञान से ही ) पदार्थज्ञान का होना स्वीकार करना चाहिये ।

ग्रन्थकार ने 'जातिशक्ति०' आदि वाक्यों से इस शंका का समाधान किया है । तथाहि—इस गौरव को फलमुख नहीं कह सकते । क्योंकि पदश्रवण होने पर अर्थात् व्यक्तिशक्ति का ज्ञान न होने पर भी जातिशक्तिज्ञान से जातिज्ञान होते ही तत्काल तदभिन्न व्यक्ति का भी ज्ञान हो जाता है । उसके होने में विलम्ब नहीं लगता । इस अबाधित अनुभव का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः दो ज्ञानों को कारण मानने की भी आवश्यकता नहीं होती । हम इस अवाधित अनुभव के बल से जातिशक्तिज्ञान ही व्यक्तिज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। यह मानने से 'म्लेच्छ भाषा के शब्दों से अनभिज्ञ को बोध होने लगेगा' आदि आपत्ति भी उपस्थित नहीं होगी । क्योंकि म्लेच्छ-भाषा के शब्दों की वाच्य जातियों से सम्बन्धित शक्तियों का ज्ञान न होने से ही अनभिज्ञ व्यक्ति को उससे अर्थबोध नहीं होने पाता । इसी प्रकार ज्ञानद्वयकल्पनारूप गौरव का भी स्वीकार नहीं करना पड़ता ।

शंका—जातिज्ञान उसकी शक्ति के ज्ञान से होता है और व्यक्तिज्ञान 'स्वरूपतः विद्यमान' शक्ति से ही होता है—यह मानने में विनिगमक क्या है ? इसके विपरीत, शक्तिज्ञान से ही व्यक्ति का बोध होता है; किन्तु जाति का स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ज्ञान होता है, क्यों न माना जाय ? अर्थात् व्यक्तिज्ञान में ज्ञात शक्ति की अपेक्षा होती है और जातिज्ञान में स्वरूपसती शक्ति की आवश्यकता होती है । व्यक्तिशक्ति-ज्ञान से ही शीघ्रतया जातिज्ञान होता है अर्थात् व्यक्ति शक्ति ज्ञान, जातिज्ञान में प्रयोजक है, यह मानने में क्या अड़चन है ? अर्थात् आपके पक्ष में विनिगमनाविरह दोष आता है ।

समाधान—हमारे मत में उपर्युक्त दोष नहीं आने पाता । क्योंकि व्यक्तिशक्ति-ज्ञान के होने पर अविलम्बेन जाति का ज्ञान होता है—ऐसा नियमेन अनुभव नहीं है । 'अयं गोपदवाच्यः' यह व्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है—इस वाक्य से व्यक्तिशक्तिज्ञान ( सामने स्थित गोव्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है, इस प्रकार शक्ति का ज्ञान ) होता है, परन्तु वहाँ ज्ञान की उपस्थिति नहीं होती । इस रीति से व्यक्तिशक्तिज्ञान, जाति-ज्ञान में व्यभिचारी साधन है, और वह व्यभिचार ही व्यक्तिज्ञान को कारण न मानने में तथा जातिशक्तिज्ञान को ही कारण मानने में विनिगमक है । इसके अतिरिक्त व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता यदि स्वीकार की जाय तो संसारभर के यच्च यावद् व्यक्तियों का ज्ञान होना अशक्य होने से शक्तिग्रह का सम्भव ही न होगा, और अनन्त शक्तियों के मानने में महान् गौरव है । ये सब दोष व्यक्तिशक्तिवाद पक्ष में आते हैं, इसलिये व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता नहीं मानी जा सकती । हमारे उपर्युक्त कथन में नैयायिकों की भी सम्मति है । क्योंकि नैयायिक भी कुछ स्थलों में स्वरूपसती शक्ति

२१८ | वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

और स्थलों में ज्ञानशक्ति को कारण मानते हैं। इस प्रकार प्रभाकर-मत का नैयायिकों से स्वीकार किया गया-सा ही है। इसी आशय से ग्रन्थकार 'अत एव' आदि ग्रन्थ कह रहे हैं। पद और अन्वय दोनों के शक्ति के होने पर भी पदजन्य ज्ञान के लिये शक्ति की ज्ञातसत्ता ही कारण होती है, परन्तु अन्वयबोधार्थमात्र उसकी स्वरूपसत्ता के रहने से भी अन्वयबोध हो सकता है। इस रीति से एक बार स्वरूपसत्त्व को स्वीकार कर लिया तो उसी न्याय से जातिबोध में ज्ञायमानत्वेन शक्ति को और व्यक्तिज्ञान में स्वरूपेणैव शक्ति को कारण क्यों न माना जाय। इसलिये अन्वय में स्वरूपसत्तारूप शक्ति का नैयायिकों से किया हुआ स्वीकार हमारे पक्ष का पोषक ही है।

शंका—किसी रीति से क्यों न हो, आप व्यक्ति में शक्ति को तो मानते ही हैं। अतः शक्तियुक्तत्वरूप शक्यत्व व्यक्ति में भी है। तब 'तच्च जातेरेव न व्यक्तेः' कहकर व्यक्ति का आप निरास क्यों करते हैं? अर्थात् यह पूर्वोत्तर विरोध होगा। इस शंका का 'ज्ञायमान०' आदि वाक्य से निरसन किया गया है। व्यक्ति में शक्ति के मानने पर भी 'व्यक्ति' शक्य होगी, व्यक्ति में शक्यत्व होगा—ऐसा हम नहीं मानते। क्योंकि 'जिस पदार्थ में शक्यत्व ( शक्तियुक्तत्व ) होता है वह पदार्थ शक्य होता है।' यह नियम हमारा नहीं है। अर्थात् हमारी 'शक्तियुक्तत्वं शक्यत्वम्' शक्य पदार्थ की परिभाषा नहीं है। किन्तु हमारी परिभाषा तो 'ज्ञायमानशक्तिविषयत्वम्'—ज्ञानविषयीभूत ( ज्ञान का विषय होने वाली ) शक्ति में जो पदार्थ विषय रहता है वह 'शक्य' है—प्रसिद्ध है। इसी आशय से—'तादृशशक्तिविषयत्वम्' यह शक्य की परिभाषा हमने की है। प्रकृत में व्यक्ति में शक्ति तो है परन्तु वह ज्ञायमान नहीं है ( उसका वहाँ ज्ञान नहीं रहता ) इसलिये व्यक्ति में शक्यत्व नहीं आ पाता। किन्तु शक्यत्व जातिनिष्ठ ही है। इस प्रकार शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेश करने से सिद्धान्त में पूर्वोत्तर-विरोध रूप दोष नहीं रहता।

यहाँ तक बताये गये प्रभाकर-मत में अरुचि इस प्रकार पैदा होती है—यदि व्यक्ति को आप शक्य नहीं मानते तो उसमें शक्ति की कल्पना भी किसलिये करते हैं? क्योंकि एक पद में 'स्वरूपसती' और 'ज्ञायमाना' शक्तियों को मानना भी कल्पना-गौरव ही है। 'जाति और व्यक्ति के शक्तियों का ज्ञान कारण है' इस पक्ष में जिस गौरव-दोष को आप देते हैं, वही दोष आप के पक्ष में भी आता है। इस पर आप ( प्रभाकर ) यदि कहें कि "इस गौरव को हम स्वीकृत करते हैं, क्योंकि व्यक्ति में शक्ति के न मानने पर तो एक ही पद से जाति और व्यक्ति दोनों की प्रतीति का सम्भव नहीं होगी। अतः अर्थापत्ति प्रमाण से पद की शक्ति व्यक्ति में भी हम मानते हैं, परन्तु उसके लिये ज्ञान-द्वयकल्पना करना व्यर्थ तथा गौरवपूर्ण है इसलिये हम ज्ञानद्वय का स्वीकार नहीं करते।"

परन्तु यह कथन भी आपका ठीक नहीं बैठता। क्योंकि यदि आप यहाँ पर व्यक्ति-बोध के लिये शक्ति का स्वीकार करें तो 'गंगायां घोषः' यहाँ 'गंगा' पद से 'गंगातीर'

गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि ] आगमपरिच्छेदः २१९

की प्रतीति होने से 'गंगा शब्द की तीर अर्थ में भी शक्ति है, यह आपको स्वीकार करना होगा। 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' आदि वाक्यों में 'काक' पद की मार्जार आदि में भी शक्ति को मानना होगा। इसके अतिरिक्त व्यक्ति में शक्यत्व न आ पाये एतदर्थ शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेशरूप गौरव भी आप को स्वीकार करना पड़ता है। अतः स्वरूपसती शक्ति का मानने वाला आपका पक्ष गौरवपूर्ण होने से अनुपपन्न है। प्रभाकर-मत में इस प्रकार अरुचि मानकर ग्रन्थकार स्वाभीष्ट समाधान बताते हैं।

'अथवा व्यक्तिर्लक्षणयाऽवगमः। यथा नीलो घट इत्यत्र नीलशब्दस्य नीलगुण-विशिष्टे लक्षणा, तथा जातिवाचकस्य^२ तद्विशिष्टे लक्षणा। ^३तदुक्तम्-‘अनन्यलभ्यो^४ हि शब्दार्थः' इति। एवं शक्यो^५ निरूपितः।

अर्थ— अथवा व्यक्ति का बोध लक्षणा से मान लीजिये। जिस प्रकार 'नील घट' इस वाक्य में नीलगुणवाचक नील शब्द की गुणी में (नील युक्त अर्थ में) लक्षणा स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार जातिवाचक पदों की भी जातिविशिष्ट व्यक्तियों में लक्षणा कर लेनी चाहिये। अतएव मीमांसकों ने 'जो अर्थ अनन्यलभ्य (अन्य प्रकार से ज्ञात नहीं होता) हो वही शब्दार्थ होता है' यह बताया है। इस रीति से शक्य पदार्थ का निरूपण किया गया।

विवरण— आप (प्रभाकर) प्रथमतः व्यक्ति में स्वरूपसती शक्ति मानते हैं, जिससे व्यक्ति में भी शक्यत्व आता है। उसे हटाने के लिये शक्यत्व के लक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेश किया जाता है, परन्तु इतना करने पर भी शक्तिद्वयकल्पनारूप गौरव नहीं टलता। अतः गुरुकल्प के स्वीकार करने की अपेक्षा भाट्ट मत के अनुसार ही व्यक्ति-बोध की व्यवस्था लगाना उचित है। वह व्यवस्था इस प्रकार है—वास्तव में 'नील' शब्द गुण (नीलरूप) का वाचक है। परन्तु नीलपदवाच्य नीलगुण को घट द्रव्य तो


१. व्यक्तेरशक्यत्वे तत्र शक्तिकल्पनमपि वृथा, तज्ज्ञानस्य लक्षणयैव संभवात् अन्वयस्य च वाक्यगम्यत्वेन पदशक्त्यविषयत्वादित्यरुचिरिति पक्षान्तरमाह—अथवेति। गवादिपदस्य जातौ शक्तिः, तद्विशिष्टव्यक्तौ लक्षणा।
२. कशब्दस्य०-इति पाठान्तरम्।
३. तदुक्तम्-मीमांसकैरिति शेषः। अनन्यलभ्यः इत्यनेन लक्षणादिना लभ्यो यो न भवति स शब्दार्थः शब्दशक्तिगम्य इति बोध्यते।
४. 'भ्याश०'-इति पाठान्तरम्।
५. क्यार्थो', इति पाठान्तरम्।

२२० वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

कह नहीं सकते। इस कारण जब 'नीलो घटः' हम कहते हैं तब इस शब्द के वाच्यार्थ का ग्रहण न हो सकने से नील शब्द की नीलगुणयुक्त अर्थ में लक्षणा कर 'नीलो घटः' का 'नीलगुणयुक्तः' (नीलगुणविशिष्टो घटः) अर्थ (शास्त्रकारों द्वारा) किया जाता है। अर्थात् यहाँ पर यद्यपि एक ही 'नील' पद से नील गुण और तद्विशिष्ट घट दोनों अर्थ प्रतीत होते हैं। तथापि एक ही पद से दो अर्थों की प्रतीति होने के लिये 'नील' पद की नील गुण और तद्विशिष्ट दोनों अर्थों में शक्ति कोई नहीं मानता। किन्तु लक्षणावृत्ति से ही नीलगुणविशिष्ट अर्थ का बोध होने से कारण नील शब्द की नीलगुणरूप अर्थ में ही शक्ति है और 'नीलगुणविशिष्ट' रूप अर्थ लक्ष्य (लक्षणा से ज्ञेय) है। उसी प्रकार घटत्वजातिवाचक 'घट' पद की 'घटत्वजातिविशिष्ट-घट व्यक्ति' रूप अर्थ में लक्षणा समझ लेनी चाहिये। इसी प्रकार गुणवाचक की गुणविशिष्ट में और जातिवाचक की जाति-विशिष्ट अर्थ में लक्षणा स्वीकार कर प्रकृत में भी 'गो' आदि एक ही पद से जाति का शक्ति से बोध होता है और गोव्यक्ति का लक्षणा से बोध होता है—इस रीति से व्यक्तिबोध की उपपत्ति लग जाती है। स्वरूपसत् और ज्ञायमान दो शक्तियों की कल्पना भी नहीं करनी पड़ती। तथा इस पक्ष में शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' विशेषण का निवेश कर 'ज्ञायमानशक्तिविषयत्वम्' इस गुरुभूत लक्षण के स्वीकार करने का भी प्रसंग नहीं आता। इसी प्रकार (इस पक्ष में) 'गंगायां घोषः' में 'गंगा' पद की 'तीर' अर्थ में शक्ति मानने का भी प्रसंग नहीं आता। क्योंकि 'तीर' अर्थ की प्रतीति लक्षण से ही हो जाती है। इसलिये इस पक्ष का स्वीकार करके ही व्यक्तिबोध की उपपत्ति लगानी चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रभाकर ने अपने मत के पोषक रूप में तार्किकों ने भी 'अन्वय में स्वरूपसती शक्ति को माना है' कहा है किन्तु वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि तार्किकों का स्वरूपसत्तारूप शक्तिवाद भी गुरुभूत ही है। और अन्वय वाक्यगम्य है, पदगम्य नहीं, इस कारण पद में अन्वयबोध करा देने का सामर्थ्य नहीं है। इसलिये पदों की केवल जाति में ही शक्ति है। और व्यक्ति, अन्वय तथा गंगादि पदों से तीरादिबोध यह सब लक्षणगम्य मानने में अत्यन्त लाघव है। अतः 'शक्तिविषयत्व' ही शक्यत्व का लक्षण ठीक बैठता है। ग्रन्थकार ने अपने इस कथन में 'तदुक्तम्' इत्यादि ग्रंथ से मीमांसकों की सम्मति प्रदर्शित की है। उस वाक्य का तात्पर्य इस प्रकार है—अभिधा वृत्ति से अन्य लक्षणादि वृत्ति से जिस अर्थ का ज्ञान हो सकता हो, उसमें पद की शक्ति मानने की कोई आवश्यकता नहीं। अन्यथा दूसरी लक्षणावृत्ति को कहीं अवकाश ही नहीं मिलेगा। क्योंकि सभी जगह शक्ति से ही पदार्थापस्थिति हो सकेगी। यदि शब्द की अभिधारूप एक ही वृत्ति मान लें तो 'तुम शत्रु के घर भोजनार्थ मत जाओ' इस उद्देश्य से 'विषं भुङ्क्ष्व'--विष खाओ, इस प्रकार किसी हितचिन्तक व्यक्ति के कहने पर उन पदों की 'शत्रुगृह में भोजननिवृत्ति' रूप अर्थ में भी है, मानना होगा। इस अतिप्रसंग का निवारण करने के लिये यदि लक्षणा नामक वृत्ति को अभिधा वृत्ति से पृथक् मानना

लक्ष्यपदार्थनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः १२१

आवश्यक हो तो जहाँ (जिस अर्थ में) लक्षणा की प्रवृत्ति का संभव है वहाँ (उस अर्थ में) उस शब्द की शक्ति मानना अनुचित है। इसलिये जो अर्थ लक्षणादिलभ्य न हो उसी अर्थ में शब्द की शक्ति माननी चाहिये। इसी न्याय से शब्द की एक अर्थ में शक्ति मानकर उसी शब्द से प्रतीयमान अन्य समस्त अर्थों को लक्ष्य समझना चाहिये। क्योंकि 'अन्यायश्चानेकार्थत्वम्' एक ही शब्द के अनेक अर्थ हैं—यह मानना अन्याय है।

प्रकृत में भी शब्द की जातिरूप अर्थ में शक्ति मानने पर व्यक्तिबोध लक्षणा से होता है, यही कहना उचित होगा।

शंका—यदि ऐसी बात है तो विपरीत ही 'अर्थात् व्यक्ति में शब्द की शक्ति और जाति का भान लक्षण से होता है' क्यों न माना जाय ?

समाधान—शब्द की शक्ति समस्त व्यक्तियों में है या किसी एक व्यक्ति में है ? समस्त व्यक्तियों में यदि आप उसे कहें तो 'गामानय' कहने पर समस्त गौओं को ले आने का प्रसंग प्राप्त होगा। इस आपत्ति से बचने के लिये 'एक व्यक्ति में शक्ति है' कहो तो 'अन्य गोव्यक्ति में शक्ति नहीं है' कहना होगा। यदि अन्य व्यक्ति में भी शक्ति है कहो, तो अश्वादि अर्थों में भी उस शब्द की शक्ति प्राप्त होगी। इसलिये व्यक्तिशक्तिवाद सर्वथा अनुपपन्न है। अतः जाति में ही पद की शक्ति और व्यक्ति आदि का बोध लक्षणाजन्य है, यही मत युक्तियुक्त है। इस प्रकार 'शक्तिविषयत्वं शक्यत्वम्' और 'तच्च जातेरेव न व्यक्तेः' यह हमारा मत सर्वथा उपपन्न है।

इस रीति से शक्य और लक्ष्य इन दो पदार्थों में से शक्य पदार्थ का निरूपण किया गया। अब लक्ष्य पदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं—

अथ लक्ष्य-पदार्थो निरूप्यते। तत्र लक्षणा-विषयो लक्ष्यः। 'लक्षणा च द्विविधा, केवललक्षणा लक्षित-लक्षणा चेति। तत्र शक्य-साक्षात्सम्बन्धः केवल-लक्षणा, यथा 'गङ्गायां घोष' इति अत्र प्रवाह-साक्षात्सम्बन्धिनि तीरे गङ्गापदस्य केवललक्षणा।

अर्थ—अब लक्ष्य पदार्थ का निरूपण किया जाता है तत्रेति—शक्य और लक्ष्य में से लक्ष्य वह होता है जो (पदार्थ) लक्षणा में (लक्षणाजन्य ज्ञान में) विषय हो। केवल लक्षणा और लक्षितलक्षणा भेद से लक्षणा दो प्रकार की है। उनमें शक्य का साक्षात्सम्बन्ध जहाँ हो वह केवललक्षणा है। जैसे—'गंगापर घोष' इस वाक्य में गंगा


१. मीमांसकानां मते वाक्येऽपि लक्षणा विद्यते। अतः न हि शक्यसम्बन्ध एव लक्षणा, किन्तु बोध्यसम्बन्ध एव। बोधकत्वञ्च वाक्यस्यापि विद्यते। यदि वाक्ये न लक्षणा, तर्हि "वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवते"त्यादिवाक्यानां बहूनामातर्थक्यापत्तिः। यदि पदमात्रे लक्षणा, तर्हि "वायुर्वै" इत्यादौ एकेनैव पदेन कर्मप्राशस्त्यलक्षणोपपत्तेः सर्वेषां पदानां वैयर्थ्यापत्तिः।

५२२वेदान्तपरिभाषा[ लक्ष्यपदार्थनिरूपणम्

पद की गंगा पदवाच्य गंगाप्रवाहरूप पदार्थ के साथ साक्षात् संयोग से सम्बद्ध रहने वाले तीर रूप अर्थ में केवल लक्षणा है।

विवरण—शक्य पदार्थ का निरूपण करने के अनन्तर लक्ष्य पदार्थ ही आकांक्षा का विषय होता है। अतः लक्ष्य पदार्थ का निरूपण करना उचित हैं। जिस प्रकार 'शक्ति-विषयत्व' यह शक्य का लक्षण बताया उसी प्रकार 'लक्षणा में जो पदार्थ विषय होता है वह लक्ष्य' यह लक्ष्य पदार्थ का सामान्य लक्षण है। परन्तु लक्षणा क्या वस्तु है? इस जिज्ञासा को शान्त करने के लिये यहाँ पर लक्षणा का लक्षण कहना उचित था। किन्तु शास्त्रान्तरों में प्रसिद्ध लक्षणा के लक्षण 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' को गृहीत कर यहाँ 'लक्षणा च' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा लक्षणा के प्रकारों का वर्णन किया है।

प्रसंगतः लक्षणा के स्वरूप को बताना अनुचित न होगा। शक्ति ओर लक्षणा ये दोनों शब्द की सम्बन्धरूप वृत्तियाँ हैं। इनमें जो पदार्थ प्रथमतः उपस्थित (ज्ञात) होता है, उसके साथ पद का मुख्य सम्बन्ध रहता है और वही शक्ति है। ऊपर मुख्य सम्बन्ध कहने से अमुख्य सम्बन्ध भी प्रतीत होता है। अमुख्य सम्बन्ध वह है—पद का श्रवण होते ही मुख्यत्वेन प्रथमतः जिसका ज्ञान नहीं होता, वरन् उसके लक्ष्य अर्थ का शक्यार्थ के साथ संबंधज्ञान होने के अनन्तर ज्ञान हो। यही लक्षणावृत्ति है। इसी कारण 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' यह लक्षण लक्षणा का किया गया है। पद के वास्तविक अर्थ का मुख्य वृत्ति से ही सर्वत्र बोध मानना उचित है, परन्तु जहाँ इस मुख्य वृत्ति का संभव ही नहीं रहता वहाँ इस अमुख्य वृत्ति का स्वीकार करना पड़ता है। इस सम्बन्ध में अग्रिम अभियुक्त-वचन ध्यान में रखने योग्य है।

'मानान्तरविरोधे तु मुख्यार्थस्यापरिग्रहे।
मुख्यार्थेनाविनाभूते प्रवृत्तिर्लक्षणेष्यते॥'

जहाँ पर मुख्य अर्थ का अन्य प्रमाणों के साथ विरोध रहने से उसका (मुख्यार्थ का) ग्रहण नहीं किया जाता वहाँ पर मुख्य (वाच्य) अर्थ के साथ अविनाभूत (नित्यसंबंध) अर्थ की कल्पना करना ही लक्षणा है। जैसे 'गंगायां घोषः' यहाँ पर गंगा पद का मुख्य (शब्द-श्रवण होते ही प्रथमतः मन में उपस्थित होने वाला) अर्थ 'प्रवाह' (भगीरथ-रथ-रथांग खाता-वच्छिन्न-जलप्रवाह) है। परन्तु उस प्रवाह पर घोष (ग्वाले का घर) का वृत्तित्व (रहना) सम्भव नहीं। अतः गंगापद का मुख्यार्थ प्रवाह का प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ विरोध होता है। इसलिये मुख्यार्थ को छोड़कर उसके साथ (प्रवाहरूप मुख्यार्थ के साथ) संयोग सम्बन्ध से नित्यसंबद्ध तीररूप अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है। इसे लक्षणा कहते हैं। यहाँ प्रथमतः तीर का ज्ञान नहीं होता किन्तु प्रवाहरूप मुख्य (शक्य) अर्थ का ज्ञान होने के अनन्तर होता है। इस कारण गंगापद का उस लक्ष्य अर्थ के साथ मुख्य सम्बन्ध न होकर अमुख्य सम्बन्ध है। प्रवाहरूप अर्थ का विद्यमान संयोग सम्बन्ध भी प्रकृत में लक्षणा है। यद्यपि यह संयोग सम्बन्ध गंगा और तीर का सम्बन्ध है और

लक्षितलक्षणा निरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २२३

इसी कारण वह पदवृत्ति नहीं है किन्तु प्रवाहवृत्ति है, तथापि स्वप्रतियोगिवाचकत्व रूप परम्परा सम्बन्ध से तीर पद के साथ भी गंगापद का सम्बन्ध है, इसी कारण यह अमुख्य सम्बन्ध है। इस रीति से लक्षणाजन्य तीरादि पदार्थों के ज्ञान में विषय होने वाला तीरादि पदार्थ लक्ष्य है।

यह शक्य सम्बन्ध (मुख्य संबन्ध) कहीं पर साक्षात् संयोगादि संबन्धरूप रहता है और कहीं पर परम्परा से रहता है, इस कारण लक्षणा के भी दो प्रकार हो जाते हैं। सम्बन्ध के अनुरोध से 'केवललक्षणा' और 'लक्षितलक्षणा' ये उनके नाम हैं। शक्य (वाच्य, मुख्य) अर्थ से साक्षात् सम्बन्ध यदि हो तो उसे केवललक्षणा कहते हैं। जैसे—प्रवाहरूप वाच्यार्थ का तीरूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग सम्बन्ध है, इसलिये 'गंगायां घोषः' में केवललक्षणा है।

अब शक्यपरम्परासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा के प्रकार को बताते हैं—

यज्ञ शक्यपरम्परा-सम्बन्धेनार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र लक्षित-लक्षणा। यथा द्विरेफ-पदस्य रेफद्वये¹ शक्तस्य भ्रमरपद-घटित-परम्परा-संबंधेन मधुकरे वृत्तिः।

अर्थ— जहाँ पर शक्यार्थ के परम्परासम्बन्ध के द्वारा अर्थान्तर (वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ) की प्रतीति होती हो वहाँ लक्षितलक्षणा समझनी चाहिए। जैसे 'द्विरेफ' (अर्थात् दो रेफ (रकार) रूप अर्थ में शक्त पद की भ्रमरपद से घटित परम्परासम्बन्ध से मधुकररूप अर्थ में वृत्ति है। (शक्यार्थ रूप दो रेफों के परंपरासम्बन्ध के द्वारा द्विरेफ पद से मधुकररूप अर्थ की प्रतीति होने से यह लक्षितलक्षणा।)

विवरण— द्विरेफ शब्द के सुनते ही मधुकर (भौंरा) अर्थ की प्रतीति होती है। किन्तु मधुकर, द्विरेफ शब्द का वाच्यार्थ नहीं है। क्योंकि 'द्वि' का अर्थ दो और 'रेफ' का अर्थ रकार, यही 'द्विरेफ' शब्द का वाच्यार्थ है। इसलिये द्विरेफपद की 'जिस शब्द में दो रेफ हों वह शब्द' इस अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। किन्तु इस रीति से तो 'शर्करा' आदि दो रेफों से युक्त पदों की की उपस्थिति होती है, उसके निवारणार्थ 'भ्रमर' रूप अर्थ में ही वह निरूढ लक्षणा है—कहना चाहिये। उस भ्रमरपद का भ्रमररूप अर्थ शक्ति सम्बन्ध है, इस कारण मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है। अर्थात् 'द्विरेफ' पद का दो रेफरूप अर्थ में शक्तिरूप सम्बन्ध, और उन दो रेफों का लक्षणा के द्वारा भ्रमरपद से सम्बन्ध, और उस भ्रमरपद का मधुकररूप अर्थ के शक्ति सम्बन्ध, इस प्रकार परम्परा सम्बन्ध के द्वारा 'द्विरेफ' पद से मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है।

'द्विरेफ' पद से भ्रमररूप अर्थ का बोधन शक्तिवृत्ति से न होकर, लक्षणा से होता


१. 'यत्र०'—इति पाठान्तरम् ।

२२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षितलक्षणाया गौण्यन्तर्भावः

है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु 'गंगायां घोषः' यहाँ पर जैसे प्रवाहरूप शक्यार्थ का तीररूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग संबन्ध है, वैसे द्विरेफ पद का जो 'दो रेफरूप' वाच्यार्थ उसका भ्रमर या मधुकररूप अर्थ से साक्षात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु द्विरेफ पद से लक्षित भ्रमर-पद के द्वारा 'दो रेफों का भ्रमर' अर्थ से संबन्ध होता है, इस कारण यह शक्य-परम्परासम्बन्धरूप लक्षितलक्षणा है। यहाँ पर शक्ययुक्त-भ्रमरपद-प्रतिपाद्यत्व ( वाच्यरूप रेफद्वयों से युक्त भ्रमरपद से प्रतिपाद्य = वाच्य ) ही 'द्विरेफ' पद का मधुकररूप अर्थ के साथ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भ्रमर पद घटक ( अवयव ) है। इसलिये यह सम्बन्ध भ्रमरपद से घटित कहा जाता है। यहाँ पर दो लक्षणाएँ करनी होती हैं। उनमें 'द्विरेफ' पद की रेफद्वययुक्त भ्रमरपद में जो लक्षणा की जाती है उसे केवल लक्षणा कहते हैं। कारण यह है कि शक्य ( वाच्य ) रेफद्वय का रेफद्वययुक्त भ्रमरपद के साथ अवयवावयविभावरूप साक्षात् सम्बन्ध है और मधुकररूप अर्थ का उसके साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं है किन्तु भ्रमरपद के साथ वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है। अर्थात् यहाँ शक्य के साथ सम्बन्ध न होकर लक्षित के साथ लक्ष्य का सम्बन्ध है। इस कारण शक्य के साथ लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध करना यदि अपेक्षित हो तो वह लक्षित के द्वारा ही होगा। इसलिये वहाँ संभवनीय परंपरासम्बन्ध अर्थात् स्वलक्ष्यपदवाच्यत्व ( स्व = रेफद्वय ) लक्ष्य भ्रमरपद का वाच्यत्व मधुकर अर्थ में है। यहाँ पर वाच्यार्थ का सम्बन्ध न होकर वाच्यार्थ से लक्षित 'भ्रमरपद' का 'मधुकररूप' लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध होने के कारण इस लक्षणा को 'लक्षितलक्षणा' यह अन्वर्थ संज्ञा दी गई है।

कुछ लोग शब्द की शक्ति, लक्षणा और गौणी रूप तीन वृत्तियों को मानकर शक्य लक्ष्य और गौण रूप से पदार्थ को भी त्रिविध बताते हैं। परन्तु उसका निराकरण 'पदार्थश्च द्विविधः' कहकर कर दिया गया है। उसी का विवरण करने के लिये गौणी वृत्ति का लक्षितलक्षणा वृत्ति में ही अन्तर्भाव होने से उस वृत्ति से युक्त गौण पदार्थ को पृथक्रूप से स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। इसी बात को बताते हैं-

गौण्यपि लक्षित-लक्षणैव । यथा सिंहो माणवक इति अत्र सिंह-शब्द-वाच्य-सम्बन्धि-क्रौर्य्यादि-सम्बन्धेन माणवकस्य प्रतीतिः¹ ।

अर्थ—गौणी भी लक्षितलक्षणा ही है। जैसे--'यह बटु सिंह है' इस वाक्य में 'सिंह' शब्द का वाच्यार्थ जो सिंह पशु उसके साथ सम्बद्ध रहने वाले क्रूरत्वादि धर्मरूप सम्बन्ध से माणवक ( बटु ) की प्रतीति होती है।

विवरण—'सिंहो माणवकः' यह बटु ( कुमार ) सिंह है, यहाँ पर 'सिंह' शब्द का 'सिंह पशु' वाच्यार्थ है। परन्तु उसके साथ 'बटु' का किसी प्रकार से सम्बन्ध नहीं है,


१. 'ते:'-इति पाठान्तरम् ।

प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२५

इस कारण यहाँ शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा का संभव नहीं है। अतः शब्द की गौणी नामक पृथक् वृत्ति माननी चाहिये। इस प्रकार गौणी-वृत्तिवादी कह सकता है।

परन्तु यहाँ शक्यार्थ का लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् सम्बन्ध संभव न होने पर भी 'द्विरेफ' पद के समान परम्परासम्बन्ध का संभव हो सकता है। इस कारण 'लक्षितलक्षणा' नामक लक्षणा के द्वितीय प्रकार में गौणीवृत्ति का अन्तर्भाव होता है, इसलिये गौणी वृत्ति को पृथक् रूप से मानने की आवश्यकता नहीं है। कारण यह है कि 'गंगायां घोषः' और 'द्विरेफः' इन शब्दों से प्रतीयमान तीर और मधुकररूप अर्थों की उपपत्ति लगाने के लिये शक्य-साक्षात्सम्बन्ध और शक्य-परम्परासम्बन्धरूप द्विविध सम्बन्ध के कारण केवललक्षणा और लक्षितलक्षणा नामक लक्षणा के दो भेदों का स्वीकार अवश्य करना चाहिये। उनका स्वीकार कर लेने पर 'सिंहो माणवकः' इत्यादि स्थलों में भासमान परम्परासम्बन्ध से उस वाक्यार्थ की उपपत्ति लग जाने के कारण गौणी को पृथक्वृत्ति मानना व्यर्थ है।

**प्रश्न—**प्रकृत में शक्यार्थ का परम्परासम्बन्ध कौन-सा है ?

**उत्तर—**प्रकृत में 'सिंह पशु' इस वाच्यार्थ का माणवक के साथ अभेद का सम्भव न होने से तात्पर्यानुपपत्ति के कारण लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है, और वह लक्षणा 'यह बटु सिंह के समान क्रूरत्वादि गुणों से युक्त है' इस अर्थ में ही माननी चाहिये, अर्थात् प्रकृत में सिंह पशु—'सिंह' शब्द का वाच्यार्थ है और क्रौर्यादिगुण-विशिष्ट-बटु—यह उस शब्द का लक्ष्यार्थ है। वाच्य अर्थ का माणवक से साक्षात् सम्बन्ध न होने पर भी सिंहरूप वाच्यार्थ से सम्बद्ध अर्थात् उसमें तादात्म्य सम्बन्ध से विद्यमान शौर्यादि गुणों के द्वारा सिंह पशु माणवक से सम्बद्ध है जैसे सिंह क्रौर्यादि गुणों से युक्त है वैसे ही माणवक भी है। इसलिए प्रकृति में सिंह शब्द 'स्ववाच्यवृत्ति-क्रौर्यादिसामानाधिकरण्य' सम्बन्ध से लक्ष्यभूत माणवक के साथ सम्बद्ध है। स्व ( सिंह शब्द ) के वाच्य सिंह पशु में विद्यमान क्रौर्यादि गुणों का अधिकरण जैसे सिंह है वैसे माणवक भी है। इस कारण दोनों में क्रूरत्वादिगुणयुक्त होना ही यहाँ पर शक्य सम्बन्ध है। यहाँ भी पूर्ववत् सिंह पद की 'स्ववाच्यवृत्तित्व' इस साक्षात् सम्बन्धरूप केवललक्षणा से लक्षित क्रौर्यादि गुणों का माणवक के साथ सामानाधिकरण्य सम्बन्ध होने से यह लक्षितलक्षणा है। इस रीति से लक्षितलक्षणा में ही गौणी वृत्ति का अन्तर्भाव होने से उस वृत्ति से विशिष्ट गौण पदार्थ भी पृथक् नहीं है। अतः 'पदार्थ द्विविध है' यह मत सर्वथा योग्य है।

इस रीति से सम्बन्ध के कारण होने वाली लक्षणा के द्विविधत्व को बताया। अब सर्वप्रसिद्ध जहल्लक्षणादि भेद से लक्षणा के तीन प्रकारों को बताते हैं।

प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा-जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा,
१५ वे० प०

२२६वेदान्तपरिभाषा[ प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविध।

जहदजहल्लक्षणा चेति। तत्र¹ शक्यमनन्तर्भाव्य यत्रार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र² जहल्लक्षणा, यथा³ विषं भुङ्क्ष्वेति। अत्र⁴ स्वार्थं विहाय शत्रुगृहे भोजननिवृत्तिर्लक्ष्यते⁵।

अर्थ— अन्य प्रकार से यह लक्षणा—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा—त्रिविध है। उनमें से जिस लक्षणा में वाच्यार्थ का अन्तर्भाव लक्ष्यार्थ में न होकर अन्यार्थ (शक्यभिन्न अर्थ) की प्रतीति होती है (शक्यार्थ भासित न होकर केवल लक्ष्यार्थ भासित होता है) उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे—'विष खा' इस वाक्यगत पदों से विषभक्षण रूप वाच्यार्थ का ज्ञान न होकर 'शत्रु के घर मत जाओ' इस लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है, अतः यह जहल्लक्षणा है।

विवरण— १—लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ का यत्किञ्चित् भी अन्तर्भाव न होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर केवल लक्ष्यार्थ का स्वीकार करना, २—लक्ष्यार्थ के साथ वाच्यार्थ की भी प्रतीति होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग न कर उसका भी लक्ष्यार्थ में स्वीकार करना, ३—शक्यार्थ का कुछ विरुद्ध भाग त्याग कर केवल उसके अविरुद्ध भाग (अंश) का स्वीकार करना, इन तीन कारणों से लक्षण के जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा नामक तीन भेद होते हैं। लक्षणा के ये तीनों नाम अन्वर्थक हैं। 'ओहाक्—' त्यागे = त्याग करना, धातु से सर्वथा त्याग, अंशतः त्याग और विरुद्धांश का त्याग (अविरुद्ध का त्याग न करना) आदि अर्थों को लेकर लक्षणा के उपर्युक्त नाम रूढ़ हुए हैं। 'तत्र शक्य' इत्यादि ग्रन्थ से जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण बताया गया है। शक्यार्थ का लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव न होकर केवल लक्ष्यार्थ की ही प्रतीति जहाँ होती है वहाँ वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर्तव्य होने से उस लक्षणा को जहल्लक्षणा कहते हैं। इसका प्रसिद्ध उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है। यहाँ 'गंगा' पद के प्रवाह रूप वाच्यार्थ का सर्वथा परित्याग कर अर्थात् लक्षणा के द्वारा बोध्य अर्थ से वाच्यार्थ को पृथक् कर केवल तत्संबंधी तीररूप लक्ष्यार्थ का ही ग्रहण किया जाता है। इसलिये गंगा पद जहल्लक्षणा का उदाहरण है। सभी लोगों के द्वारा जहल्लक्षणा के उदाहरण रूप में दिखाये गये 'गङ्गायां घोषः' से अतिरिक्त


१. 'तत्र'—इति पाठो नास्ति क्वचित्।
२. 'रस्य'—इति पाठान्तरम्।
३. 'विषं भुङ्क्ष्व' अत्र वाक्यलक्षणैव। पदलक्षणापरं केषाञ्चिद्व्याख्यानमनुचितमेव-तात्पर्यस्य प्रत्येकपदाऽज्ञाप्यत्वात्। तथा चोक्तमद्वैतसिद्धेरखण्डार्थत्वोपपत्तौ—"तथा च समुदाय एव लक्षणा, न प्रत्येकपदे, प्रत्येकं तात्पर्यज्ञापकत्वाऽभावात्।"
४. 'त्रहि०'—इति पाठान्तरम्।
५. 'लक्षिता' इति पाठान्तरम्।