वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२१२ | वेदान्तपरिभाषा | [ जातिशक्तिवादः
ज्ञानरूप एक ही ज्ञान से संवेद्य होने से, जाति ज्ञान के होते ही व्यक्तिज्ञान और व्यक्ति- ज्ञान के होते ही उसमें ही जातिज्ञान होता है। ऐसा हम कहते हैं।
विवरण —'घट' पद के श्रवण करते ही कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ का ज्ञान ( स्मरण ) होता है। 'पट' पद के श्रवण करने पर कंबुग्रीवादिमान् पदार्थ की मन में उपस्थिति नहीं होती। अतः इस अन्वयव्यतिरेक से 'घट' पद की शक्ति 'कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में है' यह सिद्ध होता है। इस विषय में अनुमान-प्रयोग इस प्रकार है—
( १ ) 'पदार्थज्ञान, पदनिष्ठ-स्वबोधानुकूल-शक्तिपूर्वक है, ( २ ) क्योंकि वह पदार्थ- ज्ञान पदजन्य-पदार्थज्ञान कार्यरूप है, ( ३ ) जैसे घटरूप पदार्थ का ज्ञान 'घट' पद की कम्बुग्रीवादिमान् पदार्थ में विद्यमान शक्ति से युक्त है।' इस अनुमान से पदनिष्ठ शक्ति, अतिरिक्त सिद्ध होती है। इस प्रकार शक्ति का निरूपण किया। अब 'तादृश०' इत्यादि वाक्य से उस शक्ति से युक्त ऐसे शक्य पदार्थ का स्वरूप बताया है। पूर्वोक्त शक्ति से उत्पन्न होने वाले ज्ञान का जो विषय होता है वह पदार्थ 'शक्य' होता है। अर्थात् उस पदार्थ में उस पद का शक्यत्व रहता है। जैसे—'घट' पद से घटत्व' अर्थ का बोध होता है, अतः 'घट' पद की शक्ति से होनेवाले इस ज्ञान में 'घटत्व' विषय रहता है अर्थात् वह 'घटत्वविषयक' घटत्व का ज्ञान है। इस कारण घटपद का 'घटत्व' शक्य है, अर्थात् शक्यत्व घटनिष्ठ है।
'पद का शक्य अर्थ कौन सा ?' इस विषय में तत्तद् शास्त्रकारों के भिन्न-भिन्न मत हैं। कुछ लोग 'गो' पद की सास्नादिमान् ( सास्ना = गाय के कण्ठ के नीचे लटकती मांसमय झालर ) गोव्यक्ति में शक्ति मानते हैं। नैयायिक--जातिविशिष्ट व्यक्ति में शक्ति है ( 'गो' पद गोत्वविशिष्ट गोव्यक्ति में शक्ति रहती है अर्थात् गोत्वविशिष्ट गो, गोपद का शक्य है ) ऐसा कहते हैं। इन सब कल्पों का निरसन करने के उद्देश्य से ग्रन्थकार ने पूर्वोत्तर मीमांसा-साधारण शक्यत्व कहाँ रहता है यह 'तच्च' आदि ग्रन्थ से बताया है। गवादि ( गो आदि ) पदों की शक्ति, जाति में ही रहती है, इसे स्वीकार करना चाहिये। क्योंकि व्यक्ति में शक्ति मानने पर गोव्यक्तियों के अनन्त होने से उनमें रहने वाली शक्तियाँ भी अनन्त माननी होंगी। परन्तु इस प्रकार अनन्त शक्तियों की कल्पना करने में बहुत गौरव है। इसके अतिरिक्त एक 'गो' पद से एक व्यक्ति में शक्तिग्रहण ( शक्तिज्ञान ) होने पर भी अन्य गोव्यक्ति का उस पद से ज्ञान नहीं होता, क्योंकि वहाँ की शक्ति भिन्न है, और उसका ज्ञान होने के लिये अन्य गोनिष्ठ शक्ति का ज्ञान आवश्यक है। इस रीति से असंख्य गौओं की शक्ति का ज्ञान सहस्र युगों में भी नहीं हो पायगा। इस प्रकार 'गो' आदि पदों की शक्तिग्रह का होना संभव ही नहीं
१. पदार्थज्ञानं पदनिष्ठस्वानुकूलशक्तिपूर्वकं पदजन्यपदार्थज्ञानरूपकार्यत्वात्, घटरूप-पदार्थज्ञानवत् ।