वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
पृष्ठ 271, कुल 482 में से
संदर्भ में पढ़ेंजातिशक्तिवादः ] आगमपरिच्छेदः २१३
होगा। ऐसे अनेक दोष व्यक्तिशक्तिवाद में पैदा होते हैं। तस्मात् व्यक्ति में शक्ति को नहीं मान सकते।
नैयायिकों के 'जातिविशिष्ट व्यक्ति-शक्तिवाद' पक्ष में भी अनन्त व्यक्तियों का ज्ञान न होने के कारण अमुक शब्द की अमुक अर्थ में ही शक्ति है, ऐसा नियम नहीं किया जा सकेगा, आदि पूर्वोक्त दोष तदवस्थ ही हैं। इसलिये मीमांसकों का अभिमत जातिशक्तिवाद ही स्वीकार करना चाहिये। यह मानने पर गोत्व जाति के एक होने से एक व्यक्ति में गोत्व जाति का ज्ञान होने पर भी सर्वत्र गोत्व जाति के एक होने से अन्य व्यक्तियों में भी शक्तिग्रह होता है, और इस पक्ष में लाघव भी है।
शंका—प्रत्यक्ष परिच्छेद में 'जातित्वोपाधित्वपरिभाषायाः सकलप्रमाणागोचरतया०' इत्यादि कहकर जाति और उपाधि का खण्डन किया है। और यहाँ पदों की शक्ति 'सकलप्रमाणागोचर' ऐसी जाति में है—ऐसा कहते हैं, अतः यह कैसे संभव है ? जाति पदार्थ ही यदि आपके मत में नहीं हैं तो आप उसमें शक्ति को भी कैसे मान सकेंगे।
समाधान—शंका ठीक है। परन्तु उसका उत्तर इस प्रकार है—हमने (ग्रन्थकार ने (पहिले जाति का खण्डन नहीं किया है किन्तु नैयायिकों की 'जाति अतिरिक्त पदार्थ हैं' इस परिभाषा का ही खण्डन किया है अर्थात् जाति स्वतन्त्र ( पृथक् ) पदार्थ नहीं, इतना ही बताया है, इसलिये वहाँ 'घटोऽयमित्यादि प्रत्यक्षं हि घटत्वादिसद्भावे मानम्' यह कहकर 'घटत्वादि' धर्म के सद्भाव का (अस्तित्व का) अङ्गीकार किया है। 'घटत्व घट की अपेक्षा अतिरिक्त एवं उसमें समवाय संबंध से रहनेवाला पदार्थ हैं' यह नैयायिकों का मत सर्वथा अयोग्य है। तस्मात् यहाँ 'जाति' शब्द को घटत्वादि आकृतियों का वाचक समझना चाहिये। अतएव भाष्यकार श्री शंकराचार्य ने शारीरक भाष्य में (अ० १-३-२८) 'आकृतिभिश्च शब्दानां सम्बन्धो न व्यक्तिभिः' इत्यादि कहकर जाति शब्द के स्थान पर 'आकृति' शब्द की ही योजना की है। अतः यहाँ पर भी जाति शब्द की योजना आकृति को उद्देश्य करके ही की गई है। यह समझना चाहिये। इसलिये किसी प्रकार का विरोध नहीं आता। नैयायिक जिस अनुगत धर्म को जाति कहते हैं, वह जाति शब्द अनुगत धर्मरूप अर्थ में ही यहाँ प्रयुक्त किया है। 'गोत्वादि अनुगत धर्मरूप अर्थ में शब्दों की शक्ति है' इस सिद्धान्त पर ऐसी शंका उठती है कि—'व्यक्ति में या जाति-विशिष्ट व्यक्ति में पद की शक्ति को स्वीकार करने वाले हमारे मत में जैसे आपने दोष दिये वैसे ही आपके स्वीकृत किये हुए इस जातिशक्तिवाद में भी दोष हैं। क्योंकि 'गामानय' 'व्रीहीन् प्रोक्षति' आदि व्यक्तिमात्रबोधक वाक्यों का अर्थ जातिशक्तिवादी आपके मत में 'गोत्व जाति को लाओ' और 'व्रीहित्व जाति का प्रोक्षण करो' होने लगेगा। परन्तु वैसा होना संभव नहीं। क्योंकि अमूर्त 'जाति' पदार्थ का आनयन किंवा प्रोक्षण असंभव है। इस कारण यहाँ पर जो केवल व्यक्ति का बोध होता है, उसकी अनुपपत्ति होगी