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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 272, कुल 482 में से

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२१४ वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

अर्थात् व्यक्तिबोध नहीं होगा। यह महादोष जातिशक्तिवाद में आता है, ऐसी स्थिति में आप व्यक्तिबोध की उपपत्ति कैसे लगाते हैं ?

व्यक्तिभान की इस उपपत्ति की मीमांसा के भिन्न-भिन्न आचार्यों ने भिन्न-भिन्न प्रकार से बताया है। कितने ही विद्वान् अर्थापत्तिप्रमाण से व्यक्ति का भान ( ज्ञान ) मानते हैं। हम 'गामानय' इस उत्तम वृद्धवाक्य को सुनकर मध्यमवृद्ध के द्वारा गोव्यक्ति को लाया जाता हुआ देखते हैं। उसे यदि व्यक्तिबोध न हुआ होता तो 'आनयन' क्रिया में व्यक्ति का अन्वय ही न हुआ होता। इसलिये 'अर्थापत्ति' प्रमाण से ऐसे वाक्यों में व्यक्तियों का भान होना स्वीकार करना चाहिये।

परन्तु यह मत योग्य नहीं है। क्योंकि 'गामानय' इस वाक्य में यद्यपि वैसा ज्ञान ( व्यक्तिभान ) हो सकता है तथापि 'गौरस्ति' इस वाक्य में उक्त प्रकार से कैसी भी अन्वयानुपपत्ति संभव नहीं है। अतः यहाँ व्यक्तिबोध नहीं होगा, यह दोष इस पक्ष में आता है, इसलिये ग्रन्थकार धर्मराजाध्वरीन्द्र ने इस ग्रन्थ में उस पद का किञ्चिन्मात्र भी उल्लेख न कर अन्य तीन आचार्यों के ही मतों उल्लेख किया है। उनमें से ग्रन्थकार को तीसरा भाट्ट पक्ष ( कुमारिल भट्ट का पक्ष ) ही विशेषतः सम्मत है। तथापि प्रथमतः दो पक्षों बताकर अनन्तर तीसरा पक्ष सिद्धान्त के रूप में बतावेंगे। उक्त शंका का 'न च०' इत्यादि वाक्य में अनुवाद कर 'जातेः' आदि ग्रन्थ से प्रथम पक्ष के समान समाधान बताया है। नैयायिकों के समान वेदान्ती धर्म को धर्मी की अपेक्षा पृथक् नहीं मानते, किन्तु धर्म और धर्मी का तादात्म्य ( ऐक्य ) मानते हैं। इस कारण वस्तुतः यद्यपि जाति ही शक्य है तथापि जाति और व्यक्तिरूप धर्म-धर्मी का अभेद होने से एक ज्ञान से ही जाति और व्यक्ति का ज्ञान हो जाता है अर्थात् जति का ज्ञान होते ही उसमें ही व्यक्ति का ज्ञान होता है एवं व्यक्ति के ज्ञान में जाति भी भासती है, यह तात्पर्य है। इसलिये जातिशक्तिवाद में व्यक्तिभान की अनुपपत्ति नहीं हो पाती।

पद से व्यक्ति का ज्ञान कैसे सम्भव हो सकता है? क्योंकि पद की शक्ति व्यक्ति में है ही नहीं। तब व्यक्ति का भान होता है' यह भी आप कैसे निश्चय करेंगे? और शक्ति के न होने पर भी पद से पदार्थ का ज्ञान होता है, ऐसा मानने पर जिस किसी भी शब्द से जिस किसी अर्थ का ज्ञान होने लगेगा। ऐसी शंका के निरसनार्थ ग्रन्थकार पूर्वोक्त समाधान की अरुचि से, अग्रिम ग्रन्थ के द्वारा प्रभाकर मतानुसार व्यक्तिबोध की उपपत्ति को बताते हैं।

'यद्वा, गवादिपदानां व्यक्तौ शक्तिः स्वरूपसती न तु ज्ञाता


९. शाब्दबोधे पदवृत्तिविषयस्य भानं न भवति। अन्यथा अन्वयेऽपि शक्तिकल्पना न भवेत्। किन्तु अन्वयेऽपि भाट्टैः शक्तिरङ्गीकृता। तदुक्तं न्यायसिद्धान्तमञ्जर्याम् — 'भाट्टास्तु अन्वयविशिष्टे शक्तिग्रहात् अन्वयेऽपि शक्तिरेवेत्याहुरिति'। अतो व्यक्तावपि