वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंगवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि ] आगमपरिच्छेदः २१५
हेतुः । जातौ तु^१ ज्ञाता । न^२ व्यक्त्यंशे शक्तिज्ञानमपि कारणं गौरवात् ।^३ जातिशक्तिमत्त्व-ज्ञाने सति व्यक्तिशक्ति^४मत्त्वज्ञानं विना व्यक्तिधी-विलम्बाभावाच्च ।
अत एव न्यायमतेऽप्यन्वये शक्तिः स्वरूपसतीति सिद्धान्तः । ज्ञानमान-शक्ति-विषयत्वमेव वाच्यत्वमिति जातिरेव वाच्या ।
अर्थ— अथवा 'गौः' इत्यादि पदों की व्यक्ति में स्वरूपतः विद्यमान शक्ति है (और वह व्यक्ति के ज्ञान होने में कारण है) व्यक्ति में विद्यमान वह शक्ति ज्ञात होकर व्यक्ति के बोधन में कारण नहीं होती। किन्तु जाति के बोधन में मात्र वह शक्ति ज्ञात होकर ही कारण होती है। 'व्यक्ति' अंश में व्यक्ति-शक्ति का ज्ञान भी कारण है, यह मानना आवश्यक नहीं है। क्योंकि व्यक्तिशक्तिज्ञान तथा जातिशक्तिज्ञान—दोनों को शाब्दबोध में कारण मानने में गौरव (दोष) होता है। और जाति के शक्तिमत्त्व (शक्ति) का ज्ञान होने पर व्यक्तिशक्ति का ज्ञान होने पर भी व्यक्ति के ज्ञान न होने में विलम्ब (देर) नहीं लगती। इसीलिये जहाँ शक्ति का ज्ञान न होते हुए भी वस्तु का ज्ञान होता है, वहाँ शक्तिज्ञान की कल्पना करना अनुचित है, अतएव न्यायमत में भी 'शक्ति अन्वय में स्वरूपसती (स्वरूपतः विद्यमान) रहती हैं' (वह ज्ञान नहीं रहती) सिद्धान्त किया है।
(शंका—व्यक्ति में शक्ति को स्वरूपसती मानने पर व्यक्ति भी गवादि पदों की वाच्य होने लगेगी, अतः इसका समाधान करते हैं—) ज्ञायमान शक्ति में (शक्तिजन्यज्ञान में) जो पदार्थ विषय होता है, वही वाच्य होता है—इस प्रकार 'वाच्य' का लक्षण (परिभाषा) होने से (ज्ञानमान-शक्ति-विषय) जाति ही 'गवादि' पदों का वाच्य ठहरती है। (व्यक्ति वाच्य नहीं होती) अतः पूर्वोक्त दोष नहीं आने पाता।
विवरण— शक्ति के विषय में प्रभाकर के सिद्धान्त का आशय इस प्रकार है—कारण की सत्ता कार्य में आवश्यक रहती है, परन्तु कुछ कार्यों की उत्पत्ति में कारण का स्वरूपतः रहना आवश्यक होता है, परन्तु कितने ही कार्यों में कारण के प्रत्यक्ष न होने पर भी उसके केवल ज्ञान से भी कार्य निष्पन्न हो सकता है।
स्वरूपसती शक्तिरपेक्षितेवेति गुरुमतानुसारेणाह—यद्धे'ति। अर्थात् पदात् व्यक्तिज्ञानं दुर्लभं तत्प्रयोजकशक्तेरभावादित्यरुचिरिति सूच्यते।
१. 'सा'—इति पाठान्तरम्।
२. 'च'—इति पाठान्तरम्।
३. व्यक्तिभाने शक्तिः कारणं, न तु तज्ज्ञानमपि, उभयत्र शक्तिज्ञानस्य कारणत्व-कल्पने गौरवम्।
४. 'क्ति-ज्ञानं'—इति पाठान्तरम्।