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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 274, कुल 482 में से

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२१६ वेदान्तपरिभाषा [गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

उदाहरणार्थ—घटादि कार्यों की उत्पत्ति में आवश्यक दण्डादिकारणों की स्वरूपतः सत्ता आवश्यक होती है, दण्ड के ज्ञानमात्र से घट की उत्पत्ति नहीं होती अर्थात् दण्ड की स्वरूपसत्ता ही घट में कारण होती है । किन्तु धूम से अग्नि का अनुमान जब होता है उस समय अनुमिति में यद्यपि धूम कारण है तथापि उसकी स्वरूपतः सत्ता आवश्यक नहीं होती । धूलि को ही धूम समझकर उसके सहारे से भी 'पर्वत वह्निमान् है' यह अनुमिति होती है । अतः कहीं वस्तु की स्वरूपसत्ता कारण होती है और कहीं उसका ज्ञान अर्थात् ज्ञानसत्ता कार्य की जनक होती है । इसी प्रकार प्रकृत में भी व्यक्ति और जाति दोनों में शक्ति, मान लेनी चाहिये । व्यक्ति के बोध के लिये शक्ति की स्वरूप-सत्ता आवश्यक है और जाति के ज्ञान के लिये शक्ति की ज्ञात सत्ता को कारण मान-कर व्यक्तिबोध की उत्पत्ति लगानी चाहिये, अर्थात् 'गोः' इत्यादि पदों से गोव्यक्ति का ज्ञान होने के लिये इस व्यक्ति में शक्ति है' इस प्रकार के शक्तिज्ञान की अपेक्षा नहीं होती, अपितु वह शक्ति व्यक्ति में स्वरूपतः होने पर भी व्यक्ति का ज्ञान हो सकता है, क्योंकि गवादि पदों में व्यक्तिबोधक सामर्थ्य रहता ही है । परन्तु जाति का ज्ञान होने के लिये मात्र 'यह जाति शक्तिमती है' यह ज्ञान रहना आवश्यक होता है ।

शंका--जिस प्रकार जातिज्ञान के लिये उसकी शक्ति का ज्ञान होना आवश्यक है उसी प्रकार व्यक्तिज्ञान के लिये भी व्यक्ति-शक्तिज्ञान कारण है, यह क्यों न कहा जाय ? सभी जगह ज्ञात शक्ति को ही कारण मानने में लाघव भी है, क्योंकि एक ही प्रयोजक मानना पड़ता है ।

ग्रन्थकार 'न व्यक्त्यंशे' वाक्य से उपर्युक्त शंका का अनुवाद कर समाधान करते हैं । व्यक्ति अंश में उसकी शक्ति का ज्ञान भी कारण होता है यह मानने की आवश्यकता नहीं । क्योंकि ऐसा मानने पर जातिज्ञान के लिये जातिशक्तिज्ञान और व्यक्तिज्ञान के लिये व्यक्तिशक्तिज्ञान—इस प्रकार दो ज्ञान शाब्दबोध में कारण मानने होंगे । परन्तु एक पद के शाब्दबोधार्थ दो ज्ञानों का कारण मानने में 'गौरव' दोष होता है । अतः इसकी अपेक्षा जातिशक्तिज्ञान से जाति की उपस्थिति ( ज्ञान ) होते ही वहाँ स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही व्यक्तिज्ञान हो जाता है, यह मानने में लाघव है, क्योंकि इस पक्ष में दो कारणों की कल्पना नहीं करनी पड़ती ।

शंका—व्यक्ति अंश में शक्ति ज्ञान को कारण मानने में यद्यपि गौरव है तथापि वह फलमुख है, क्योंकि पदगत शक्ति का ज्ञान हुए बिना उस शक्तिमान् पद के ज्ञान से भी पदार्थज्ञान कैसे सम्भव हो सकेगा ? अतः इस प्रकार के फलमुख गौरव दोषावह नहीं हुआ करते । इसलिये व्यक्ति और जाति के शक्तियों का ज्ञान ही उनके बोध में कारण होता है कहना होगा ।

इसके अतिरिक्त शक्तिज्ञान के बिना अर्थात् केवल पद का ज्ञान होने से ही पदार्थ की उपस्थिति मान ली जाय तो जिस व्यक्ति को म्लेच्छ भाषा का ज्ञान न हो उसे भी