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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 275, कुल 482 में से

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गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि] आगमपरिच्छेदः २१७

उस भाषा के शब्द सुनकर स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ही पदार्थज्ञान होने लगेगा । अतः आवश्यक गौरव का भी स्वीकार कर ज्ञानद्वय से ही ( दो शक्तियों के ज्ञान से ही ) पदार्थज्ञान का होना स्वीकार करना चाहिये ।

ग्रन्थकार ने 'जातिशक्ति०' आदि वाक्यों से इस शंका का समाधान किया है । तथाहि—इस गौरव को फलमुख नहीं कह सकते । क्योंकि पदश्रवण होने पर अर्थात् व्यक्तिशक्ति का ज्ञान न होने पर भी जातिशक्तिज्ञान से जातिज्ञान होते ही तत्काल तदभिन्न व्यक्ति का भी ज्ञान हो जाता है । उसके होने में विलम्ब नहीं लगता । इस अबाधित अनुभव का अपलाप नहीं किया जा सकता । अतः दो ज्ञानों को कारण मानने की भी आवश्यकता नहीं होती । हम इस अवाधित अनुभव के बल से जातिशक्तिज्ञान ही व्यक्तिज्ञान के प्रति कारण मानते हैं। यह मानने से 'म्लेच्छ भाषा के शब्दों से अनभिज्ञ को बोध होने लगेगा' आदि आपत्ति भी उपस्थित नहीं होगी । क्योंकि म्लेच्छ-भाषा के शब्दों की वाच्य जातियों से सम्बन्धित शक्तियों का ज्ञान न होने से ही अनभिज्ञ व्यक्ति को उससे अर्थबोध नहीं होने पाता । इसी प्रकार ज्ञानद्वयकल्पनारूप गौरव का भी स्वीकार नहीं करना पड़ता ।

शंका—जातिज्ञान उसकी शक्ति के ज्ञान से होता है और व्यक्तिज्ञान 'स्वरूपतः विद्यमान' शक्ति से ही होता है—यह मानने में विनिगमक क्या है ? इसके विपरीत, शक्तिज्ञान से ही व्यक्ति का बोध होता है; किन्तु जाति का स्वरूपतः विद्यमान शक्ति से ज्ञान होता है, क्यों न माना जाय ? अर्थात् व्यक्तिज्ञान में ज्ञात शक्ति की अपेक्षा होती है और जातिज्ञान में स्वरूपसती शक्ति की आवश्यकता होती है । व्यक्तिशक्ति-ज्ञान से ही शीघ्रतया जातिज्ञान होता है अर्थात् व्यक्ति शक्ति ज्ञान, जातिज्ञान में प्रयोजक है, यह मानने में क्या अड़चन है ? अर्थात् आपके पक्ष में विनिगमनाविरह दोष आता है ।

समाधान—हमारे मत में उपर्युक्त दोष नहीं आने पाता । क्योंकि व्यक्तिशक्ति-ज्ञान के होने पर अविलम्बेन जाति का ज्ञान होता है—ऐसा नियमेन अनुभव नहीं है । 'अयं गोपदवाच्यः' यह व्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है—इस वाक्य से व्यक्तिशक्तिज्ञान ( सामने स्थित गोव्यक्ति 'गो' पद का वाच्य है, इस प्रकार शक्ति का ज्ञान ) होता है, परन्तु वहाँ ज्ञान की उपस्थिति नहीं होती । इस रीति से व्यक्तिशक्तिज्ञान, जाति-ज्ञान में व्यभिचारी साधन है, और वह व्यभिचार ही व्यक्तिज्ञान को कारण न मानने में तथा जातिशक्तिज्ञान को ही कारण मानने में विनिगमक है । इसके अतिरिक्त व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता यदि स्वीकार की जाय तो संसारभर के यच्च यावद् व्यक्तियों का ज्ञान होना अशक्य होने से शक्तिग्रह का सम्भव ही न होगा, और अनन्त शक्तियों के मानने में महान् गौरव है । ये सब दोष व्यक्तिशक्तिवाद पक्ष में आते हैं, इसलिये व्यक्तिशक्तिज्ञान में कारणता नहीं मानी जा सकती । हमारे उपर्युक्त कथन में नैयायिकों की भी सम्मति है । क्योंकि नैयायिक भी कुछ स्थलों में स्वरूपसती शक्ति