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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 276, कुल 482 में से

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२१८ | वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि

और स्थलों में ज्ञानशक्ति को कारण मानते हैं। इस प्रकार प्रभाकर-मत का नैयायिकों से स्वीकार किया गया-सा ही है। इसी आशय से ग्रन्थकार 'अत एव' आदि ग्रन्थ कह रहे हैं। पद और अन्वय दोनों के शक्ति के होने पर भी पदजन्य ज्ञान के लिये शक्ति की ज्ञातसत्ता ही कारण होती है, परन्तु अन्वयबोधार्थमात्र उसकी स्वरूपसत्ता के रहने से भी अन्वयबोध हो सकता है। इस रीति से एक बार स्वरूपसत्त्व को स्वीकार कर लिया तो उसी न्याय से जातिबोध में ज्ञायमानत्वेन शक्ति को और व्यक्तिज्ञान में स्वरूपेणैव शक्ति को कारण क्यों न माना जाय। इसलिये अन्वय में स्वरूपसत्तारूप शक्ति का नैयायिकों से किया हुआ स्वीकार हमारे पक्ष का पोषक ही है।

शंका—किसी रीति से क्यों न हो, आप व्यक्ति में शक्ति को तो मानते ही हैं। अतः शक्तियुक्तत्वरूप शक्यत्व व्यक्ति में भी है। तब 'तच्च जातेरेव न व्यक्तेः' कहकर व्यक्ति का आप निरास क्यों करते हैं? अर्थात् यह पूर्वोत्तर विरोध होगा। इस शंका का 'ज्ञायमान०' आदि वाक्य से निरसन किया गया है। व्यक्ति में शक्ति के मानने पर भी 'व्यक्ति' शक्य होगी, व्यक्ति में शक्यत्व होगा—ऐसा हम नहीं मानते। क्योंकि 'जिस पदार्थ में शक्यत्व ( शक्तियुक्तत्व ) होता है वह पदार्थ शक्य होता है।' यह नियम हमारा नहीं है। अर्थात् हमारी 'शक्तियुक्तत्वं शक्यत्वम्' शक्य पदार्थ की परिभाषा नहीं है। किन्तु हमारी परिभाषा तो 'ज्ञायमानशक्तिविषयत्वम्'—ज्ञानविषयीभूत ( ज्ञान का विषय होने वाली ) शक्ति में जो पदार्थ विषय रहता है वह 'शक्य' है—प्रसिद्ध है। इसी आशय से—'तादृशशक्तिविषयत्वम्' यह शक्य की परिभाषा हमने की है। प्रकृत में व्यक्ति में शक्ति तो है परन्तु वह ज्ञायमान नहीं है ( उसका वहाँ ज्ञान नहीं रहता ) इसलिये व्यक्ति में शक्यत्व नहीं आ पाता। किन्तु शक्यत्व जातिनिष्ठ ही है। इस प्रकार शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेश करने से सिद्धान्त में पूर्वोत्तर-विरोध रूप दोष नहीं रहता।

यहाँ तक बताये गये प्रभाकर-मत में अरुचि इस प्रकार पैदा होती है—यदि व्यक्ति को आप शक्य नहीं मानते तो उसमें शक्ति की कल्पना भी किसलिये करते हैं? क्योंकि एक पद में 'स्वरूपसती' और 'ज्ञायमाना' शक्तियों को मानना भी कल्पना-गौरव ही है। 'जाति और व्यक्ति के शक्तियों का ज्ञान कारण है' इस पक्ष में जिस गौरव-दोष को आप देते हैं, वही दोष आप के पक्ष में भी आता है। इस पर आप ( प्रभाकर ) यदि कहें कि "इस गौरव को हम स्वीकृत करते हैं, क्योंकि व्यक्ति में शक्ति के न मानने पर तो एक ही पद से जाति और व्यक्ति दोनों की प्रतीति का सम्भव नहीं होगी। अतः अर्थापत्ति प्रमाण से पद की शक्ति व्यक्ति में भी हम मानते हैं, परन्तु उसके लिये ज्ञान-द्वयकल्पना करना व्यर्थ तथा गौरवपूर्ण है इसलिये हम ज्ञानद्वय का स्वीकार नहीं करते।"

परन्तु यह कथन भी आपका ठीक नहीं बैठता। क्योंकि यदि आप यहाँ पर व्यक्ति-बोध के लिये शक्ति का स्वीकार करें तो 'गंगायां घोषः' यहाँ 'गंगा' पद से 'गंगातीर'