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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

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गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि ] आगमपरिच्छेदः २१९

की प्रतीति होने से 'गंगा शब्द की तीर अर्थ में भी शक्ति है, यह आपको स्वीकार करना होगा। 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' आदि वाक्यों में 'काक' पद की मार्जार आदि में भी शक्ति को मानना होगा। इसके अतिरिक्त व्यक्ति में शक्यत्व न आ पाये एतदर्थ शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेशरूप गौरव भी आप को स्वीकार करना पड़ता है। अतः स्वरूपसती शक्ति का मानने वाला आपका पक्ष गौरवपूर्ण होने से अनुपपन्न है। प्रभाकर-मत में इस प्रकार अरुचि मानकर ग्रन्थकार स्वाभीष्ट समाधान बताते हैं।

'अथवा व्यक्तिर्लक्षणयाऽवगमः। यथा नीलो घट इत्यत्र नीलशब्दस्य नीलगुण-विशिष्टे लक्षणा, तथा जातिवाचकस्य^२ तद्विशिष्टे लक्षणा। ^३तदुक्तम्-‘अनन्यलभ्यो^४ हि शब्दार्थः' इति। एवं शक्यो^५ निरूपितः।

अर्थ— अथवा व्यक्ति का बोध लक्षणा से मान लीजिये। जिस प्रकार 'नील घट' इस वाक्य में नीलगुणवाचक नील शब्द की गुणी में (नील युक्त अर्थ में) लक्षणा स्वीकार करते हैं, उसी प्रकार जातिवाचक पदों की भी जातिविशिष्ट व्यक्तियों में लक्षणा कर लेनी चाहिये। अतएव मीमांसकों ने 'जो अर्थ अनन्यलभ्य (अन्य प्रकार से ज्ञात नहीं होता) हो वही शब्दार्थ होता है' यह बताया है। इस रीति से शक्य पदार्थ का निरूपण किया गया।

विवरण— आप (प्रभाकर) प्रथमतः व्यक्ति में स्वरूपसती शक्ति मानते हैं, जिससे व्यक्ति में भी शक्यत्व आता है। उसे हटाने के लिये शक्यत्व के लक्षण में 'ज्ञायमान' पद का निवेश किया जाता है, परन्तु इतना करने पर भी शक्तिद्वयकल्पनारूप गौरव नहीं टलता। अतः गुरुकल्प के स्वीकार करने की अपेक्षा भाट्ट मत के अनुसार ही व्यक्ति-बोध की व्यवस्था लगाना उचित है। वह व्यवस्था इस प्रकार है—वास्तव में 'नील' शब्द गुण (नीलरूप) का वाचक है। परन्तु नीलपदवाच्य नीलगुण को घट द्रव्य तो


१. व्यक्तेरशक्यत्वे तत्र शक्तिकल्पनमपि वृथा, तज्ज्ञानस्य लक्षणयैव संभवात् अन्वयस्य च वाक्यगम्यत्वेन पदशक्त्यविषयत्वादित्यरुचिरिति पक्षान्तरमाह—अथवेति। गवादिपदस्य जातौ शक्तिः, तद्विशिष्टव्यक्तौ लक्षणा।
२. कशब्दस्य०-इति पाठान्तरम्।
३. तदुक्तम्-मीमांसकैरिति शेषः। अनन्यलभ्यः इत्यनेन लक्षणादिना लभ्यो यो न भवति स शब्दार्थः शब्दशक्तिगम्य इति बोध्यते।
४. 'भ्याश०'-इति पाठान्तरम्।
५. क्यार्थो', इति पाठान्तरम्।