वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें२२० वेदान्तपरिभाषा [ गवादिपदाद्व्यक्तिभाने कल्पान्तराणि
कह नहीं सकते। इस कारण जब 'नीलो घटः' हम कहते हैं तब इस शब्द के वाच्यार्थ का ग्रहण न हो सकने से नील शब्द की नीलगुणयुक्त अर्थ में लक्षणा कर 'नीलो घटः' का 'नीलगुणयुक्तः' (नीलगुणविशिष्टो घटः) अर्थ (शास्त्रकारों द्वारा) किया जाता है। अर्थात् यहाँ पर यद्यपि एक ही 'नील' पद से नील गुण और तद्विशिष्ट घट दोनों अर्थ प्रतीत होते हैं। तथापि एक ही पद से दो अर्थों की प्रतीति होने के लिये 'नील' पद की नील गुण और तद्विशिष्ट दोनों अर्थों में शक्ति कोई नहीं मानता। किन्तु लक्षणावृत्ति से ही नीलगुणविशिष्ट अर्थ का बोध होने से कारण नील शब्द की नीलगुणरूप अर्थ में ही शक्ति है और 'नीलगुणविशिष्ट' रूप अर्थ लक्ष्य (लक्षणा से ज्ञेय) है। उसी प्रकार घटत्वजातिवाचक 'घट' पद की 'घटत्वजातिविशिष्ट-घट व्यक्ति' रूप अर्थ में लक्षणा समझ लेनी चाहिये। इसी प्रकार गुणवाचक की गुणविशिष्ट में और जातिवाचक की जाति-विशिष्ट अर्थ में लक्षणा स्वीकार कर प्रकृत में भी 'गो' आदि एक ही पद से जाति का शक्ति से बोध होता है और गोव्यक्ति का लक्षणा से बोध होता है—इस रीति से व्यक्तिबोध की उपपत्ति लग जाती है। स्वरूपसत् और ज्ञायमान दो शक्तियों की कल्पना भी नहीं करनी पड़ती। तथा इस पक्ष में शक्यत्वलक्षण में 'ज्ञायमान' विशेषण का निवेश कर 'ज्ञायमानशक्तिविषयत्वम्' इस गुरुभूत लक्षण के स्वीकार करने का भी प्रसंग नहीं आता। इसी प्रकार (इस पक्ष में) 'गंगायां घोषः' में 'गंगा' पद की 'तीर' अर्थ में शक्ति मानने का भी प्रसंग नहीं आता। क्योंकि 'तीर' अर्थ की प्रतीति लक्षण से ही हो जाती है। इसलिये इस पक्ष का स्वीकार करके ही व्यक्तिबोध की उपपत्ति लगानी चाहिये। इसके अतिरिक्त प्रभाकर ने अपने मत के पोषक रूप में तार्किकों ने भी 'अन्वय में स्वरूपसती शक्ति को माना है' कहा है किन्तु वह भी ठीक नहीं है। क्योंकि तार्किकों का स्वरूपसत्तारूप शक्तिवाद भी गुरुभूत ही है। और अन्वय वाक्यगम्य है, पदगम्य नहीं, इस कारण पद में अन्वयबोध करा देने का सामर्थ्य नहीं है। इसलिये पदों की केवल जाति में ही शक्ति है। और व्यक्ति, अन्वय तथा गंगादि पदों से तीरादिबोध यह सब लक्षणगम्य मानने में अत्यन्त लाघव है। अतः 'शक्तिविषयत्व' ही शक्यत्व का लक्षण ठीक बैठता है। ग्रन्थकार ने अपने इस कथन में 'तदुक्तम्' इत्यादि ग्रंथ से मीमांसकों की सम्मति प्रदर्शित की है। उस वाक्य का तात्पर्य इस प्रकार है—अभिधा वृत्ति से अन्य लक्षणादि वृत्ति से जिस अर्थ का ज्ञान हो सकता हो, उसमें पद की शक्ति मानने की कोई आवश्यकता नहीं। अन्यथा दूसरी लक्षणावृत्ति को कहीं अवकाश ही नहीं मिलेगा। क्योंकि सभी जगह शक्ति से ही पदार्थापस्थिति हो सकेगी। यदि शब्द की अभिधारूप एक ही वृत्ति मान लें तो 'तुम शत्रु के घर भोजनार्थ मत जाओ' इस उद्देश्य से 'विषं भुङ्क्ष्व'--विष खाओ, इस प्रकार किसी हितचिन्तक व्यक्ति के कहने पर उन पदों की 'शत्रुगृह में भोजननिवृत्ति' रूप अर्थ में भी है, मानना होगा। इस अतिप्रसंग का निवारण करने के लिये यदि लक्षणा नामक वृत्ति को अभिधा वृत्ति से पृथक् मानना