वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंलक्ष्यपदार्थनिरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः १२१
आवश्यक हो तो जहाँ (जिस अर्थ में) लक्षणा की प्रवृत्ति का संभव है वहाँ (उस अर्थ में) उस शब्द की शक्ति मानना अनुचित है। इसलिये जो अर्थ लक्षणादिलभ्य न हो उसी अर्थ में शब्द की शक्ति माननी चाहिये। इसी न्याय से शब्द की एक अर्थ में शक्ति मानकर उसी शब्द से प्रतीयमान अन्य समस्त अर्थों को लक्ष्य समझना चाहिये। क्योंकि 'अन्यायश्चानेकार्थत्वम्' एक ही शब्द के अनेक अर्थ हैं—यह मानना अन्याय है।
प्रकृत में भी शब्द की जातिरूप अर्थ में शक्ति मानने पर व्यक्तिबोध लक्षणा से होता है, यही कहना उचित होगा।
शंका—यदि ऐसी बात है तो विपरीत ही 'अर्थात् व्यक्ति में शब्द की शक्ति और जाति का भान लक्षण से होता है' क्यों न माना जाय ?
समाधान—शब्द की शक्ति समस्त व्यक्तियों में है या किसी एक व्यक्ति में है ? समस्त व्यक्तियों में यदि आप उसे कहें तो 'गामानय' कहने पर समस्त गौओं को ले आने का प्रसंग प्राप्त होगा। इस आपत्ति से बचने के लिये 'एक व्यक्ति में शक्ति है' कहो तो 'अन्य गोव्यक्ति में शक्ति नहीं है' कहना होगा। यदि अन्य व्यक्ति में भी शक्ति है कहो, तो अश्वादि अर्थों में भी उस शब्द की शक्ति प्राप्त होगी। इसलिये व्यक्तिशक्तिवाद सर्वथा अनुपपन्न है। अतः जाति में ही पद की शक्ति और व्यक्ति आदि का बोध लक्षणाजन्य है, यही मत युक्तियुक्त है। इस प्रकार 'शक्तिविषयत्वं शक्यत्वम्' और 'तच्च जातेरेव न व्यक्तेः' यह हमारा मत सर्वथा उपपन्न है।
इस रीति से शक्य और लक्ष्य इन दो पदार्थों में से शक्य पदार्थ का निरूपण किया गया। अब लक्ष्य पदार्थ के निरूपण की प्रतिज्ञा करते हैं—
अथ लक्ष्य-पदार्थो निरूप्यते। तत्र लक्षणा-विषयो लक्ष्यः। 'लक्षणा च द्विविधा, केवललक्षणा लक्षित-लक्षणा चेति। तत्र शक्य-साक्षात्सम्बन्धः केवल-लक्षणा, यथा 'गङ्गायां घोष' इति अत्र प्रवाह-साक्षात्सम्बन्धिनि तीरे गङ्गापदस्य केवललक्षणा।
अर्थ—अब लक्ष्य पदार्थ का निरूपण किया जाता है तत्रेति—शक्य और लक्ष्य में से लक्ष्य वह होता है जो (पदार्थ) लक्षणा में (लक्षणाजन्य ज्ञान में) विषय हो। केवल लक्षणा और लक्षितलक्षणा भेद से लक्षणा दो प्रकार की है। उनमें शक्य का साक्षात्सम्बन्ध जहाँ हो वह केवललक्षणा है। जैसे—'गंगापर घोष' इस वाक्य में गंगा
१. मीमांसकानां मते वाक्येऽपि लक्षणा विद्यते। अतः न हि शक्यसम्बन्ध एव लक्षणा, किन्तु बोध्यसम्बन्ध एव। बोधकत्वञ्च वाक्यस्यापि विद्यते। यदि वाक्ये न लक्षणा, तर्हि "वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवते"त्यादिवाक्यानां बहूनामातर्थक्यापत्तिः। यदि पदमात्रे लक्षणा, तर्हि "वायुर्वै" इत्यादौ एकेनैव पदेन कर्मप्राशस्त्यलक्षणोपपत्तेः सर्वेषां पदानां वैयर्थ्यापत्तिः।