वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें| ५२२ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्ष्यपदार्थनिरूपणम् |
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पद की गंगा पदवाच्य गंगाप्रवाहरूप पदार्थ के साथ साक्षात् संयोग से सम्बद्ध रहने वाले तीर रूप अर्थ में केवल लक्षणा है।
विवरण—शक्य पदार्थ का निरूपण करने के अनन्तर लक्ष्य पदार्थ ही आकांक्षा का विषय होता है। अतः लक्ष्य पदार्थ का निरूपण करना उचित हैं। जिस प्रकार 'शक्ति-विषयत्व' यह शक्य का लक्षण बताया उसी प्रकार 'लक्षणा में जो पदार्थ विषय होता है वह लक्ष्य' यह लक्ष्य पदार्थ का सामान्य लक्षण है। परन्तु लक्षणा क्या वस्तु है? इस जिज्ञासा को शान्त करने के लिये यहाँ पर लक्षणा का लक्षण कहना उचित था। किन्तु शास्त्रान्तरों में प्रसिद्ध लक्षणा के लक्षण 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' को गृहीत कर यहाँ 'लक्षणा च' इत्यादि ग्रन्थ के द्वारा लक्षणा के प्रकारों का वर्णन किया है।
प्रसंगतः लक्षणा के स्वरूप को बताना अनुचित न होगा। शक्ति ओर लक्षणा ये दोनों शब्द की सम्बन्धरूप वृत्तियाँ हैं। इनमें जो पदार्थ प्रथमतः उपस्थित (ज्ञात) होता है, उसके साथ पद का मुख्य सम्बन्ध रहता है और वही शक्ति है। ऊपर मुख्य सम्बन्ध कहने से अमुख्य सम्बन्ध भी प्रतीत होता है। अमुख्य सम्बन्ध वह है—पद का श्रवण होते ही मुख्यत्वेन प्रथमतः जिसका ज्ञान नहीं होता, वरन् उसके लक्ष्य अर्थ का शक्यार्थ के साथ संबंधज्ञान होने के अनन्तर ज्ञान हो। यही लक्षणावृत्ति है। इसी कारण 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' यह लक्षण लक्षणा का किया गया है। पद के वास्तविक अर्थ का मुख्य वृत्ति से ही सर्वत्र बोध मानना उचित है, परन्तु जहाँ इस मुख्य वृत्ति का संभव ही नहीं रहता वहाँ इस अमुख्य वृत्ति का स्वीकार करना पड़ता है। इस सम्बन्ध में अग्रिम अभियुक्त-वचन ध्यान में रखने योग्य है।
'मानान्तरविरोधे तु मुख्यार्थस्यापरिग्रहे।
मुख्यार्थेनाविनाभूते प्रवृत्तिर्लक्षणेष्यते॥'
जहाँ पर मुख्य अर्थ का अन्य प्रमाणों के साथ विरोध रहने से उसका (मुख्यार्थ का) ग्रहण नहीं किया जाता वहाँ पर मुख्य (वाच्य) अर्थ के साथ अविनाभूत (नित्यसंबंध) अर्थ की कल्पना करना ही लक्षणा है। जैसे 'गंगायां घोषः' यहाँ पर गंगा पद का मुख्य (शब्द-श्रवण होते ही प्रथमतः मन में उपस्थित होने वाला) अर्थ 'प्रवाह' (भगीरथ-रथ-रथांग खाता-वच्छिन्न-जलप्रवाह) है। परन्तु उस प्रवाह पर घोष (ग्वाले का घर) का वृत्तित्व (रहना) सम्भव नहीं। अतः गंगापद का मुख्यार्थ प्रवाह का प्रत्यक्ष प्रमाण के साथ विरोध होता है। इसलिये मुख्यार्थ को छोड़कर उसके साथ (प्रवाहरूप मुख्यार्थ के साथ) संयोग सम्बन्ध से नित्यसंबद्ध तीररूप अर्थ की कल्पना करनी पड़ती है। इसे लक्षणा कहते हैं। यहाँ प्रथमतः तीर का ज्ञान नहीं होता किन्तु प्रवाहरूप मुख्य (शक्य) अर्थ का ज्ञान होने के अनन्तर होता है। इस कारण गंगापद का उस लक्ष्य अर्थ के साथ मुख्य सम्बन्ध न होकर अमुख्य सम्बन्ध है। प्रवाहरूप अर्थ का विद्यमान संयोग सम्बन्ध भी प्रकृत में लक्षणा है। यद्यपि यह संयोग सम्बन्ध गंगा और तीर का सम्बन्ध है और