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वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedanta Paribhasha Hindi

धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा

स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)

DevanagariHindipublished482 पृष्ठ

पृष्ठ 281, कुल 482 में से

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लक्षितलक्षणा निरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २२३

इसी कारण वह पदवृत्ति नहीं है किन्तु प्रवाहवृत्ति है, तथापि स्वप्रतियोगिवाचकत्व रूप परम्परा सम्बन्ध से तीर पद के साथ भी गंगापद का सम्बन्ध है, इसी कारण यह अमुख्य सम्बन्ध है। इस रीति से लक्षणाजन्य तीरादि पदार्थों के ज्ञान में विषय होने वाला तीरादि पदार्थ लक्ष्य है।

यह शक्य सम्बन्ध (मुख्य संबन्ध) कहीं पर साक्षात् संयोगादि संबन्धरूप रहता है और कहीं पर परम्परा से रहता है, इस कारण लक्षणा के भी दो प्रकार हो जाते हैं। सम्बन्ध के अनुरोध से 'केवललक्षणा' और 'लक्षितलक्षणा' ये उनके नाम हैं। शक्य (वाच्य, मुख्य) अर्थ से साक्षात् सम्बन्ध यदि हो तो उसे केवललक्षणा कहते हैं। जैसे—प्रवाहरूप वाच्यार्थ का तीरूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग सम्बन्ध है, इसलिये 'गंगायां घोषः' में केवललक्षणा है।

अब शक्यपरम्परासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा के प्रकार को बताते हैं—

यज्ञ शक्यपरम्परा-सम्बन्धेनार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र लक्षित-लक्षणा। यथा द्विरेफ-पदस्य रेफद्वये¹ शक्तस्य भ्रमरपद-घटित-परम्परा-संबंधेन मधुकरे वृत्तिः।

अर्थ— जहाँ पर शक्यार्थ के परम्परासम्बन्ध के द्वारा अर्थान्तर (वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ) की प्रतीति होती हो वहाँ लक्षितलक्षणा समझनी चाहिए। जैसे 'द्विरेफ' (अर्थात् दो रेफ (रकार) रूप अर्थ में शक्त पद की भ्रमरपद से घटित परम्परासम्बन्ध से मधुकररूप अर्थ में वृत्ति है। (शक्यार्थ रूप दो रेफों के परंपरासम्बन्ध के द्वारा द्विरेफ पद से मधुकररूप अर्थ की प्रतीति होने से यह लक्षितलक्षणा।)

विवरण— द्विरेफ शब्द के सुनते ही मधुकर (भौंरा) अर्थ की प्रतीति होती है। किन्तु मधुकर, द्विरेफ शब्द का वाच्यार्थ नहीं है। क्योंकि 'द्वि' का अर्थ दो और 'रेफ' का अर्थ रकार, यही 'द्विरेफ' शब्द का वाच्यार्थ है। इसलिये द्विरेफपद की 'जिस शब्द में दो रेफ हों वह शब्द' इस अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। किन्तु इस रीति से तो 'शर्करा' आदि दो रेफों से युक्त पदों की की उपस्थिति होती है, उसके निवारणार्थ 'भ्रमर' रूप अर्थ में ही वह निरूढ लक्षणा है—कहना चाहिये। उस भ्रमरपद का भ्रमररूप अर्थ शक्ति सम्बन्ध है, इस कारण मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है। अर्थात् 'द्विरेफ' पद का दो रेफरूप अर्थ में शक्तिरूप सम्बन्ध, और उन दो रेफों का लक्षणा के द्वारा भ्रमरपद से सम्बन्ध, और उस भ्रमरपद का मधुकररूप अर्थ के शक्ति सम्बन्ध, इस प्रकार परम्परा सम्बन्ध के द्वारा 'द्विरेफ' पद से मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है।

'द्विरेफ' पद से भ्रमररूप अर्थ का बोधन शक्तिवृत्ति से न होकर, लक्षणा से होता


१. 'यत्र०'—इति पाठान्तरम् ।

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