वेदान्त परिभाषा (गजानन शास्त्री मुसलगांवकर हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedanta Paribhasha Hindi
धर्मराजाध्वरीन्द्र द्वारा
स्रोत: Vedanta Paribhasha with Hindi Commentary by Pt. Gajanan Shastri Musalgaonkar (उद्गम)
लक्षितलक्षणा निरूपणम् ] आगमपरिच्छेदः २२३
इसी कारण वह पदवृत्ति नहीं है किन्तु प्रवाहवृत्ति है, तथापि स्वप्रतियोगिवाचकत्व रूप परम्परा सम्बन्ध से तीर पद के साथ भी गंगापद का सम्बन्ध है, इसी कारण यह अमुख्य सम्बन्ध है। इस रीति से लक्षणाजन्य तीरादि पदार्थों के ज्ञान में विषय होने वाला तीरादि पदार्थ लक्ष्य है।
यह शक्य सम्बन्ध (मुख्य संबन्ध) कहीं पर साक्षात् संयोगादि संबन्धरूप रहता है और कहीं पर परम्परा से रहता है, इस कारण लक्षणा के भी दो प्रकार हो जाते हैं। सम्बन्ध के अनुरोध से 'केवललक्षणा' और 'लक्षितलक्षणा' ये उनके नाम हैं। शक्य (वाच्य, मुख्य) अर्थ से साक्षात् सम्बन्ध यदि हो तो उसे केवललक्षणा कहते हैं। जैसे—प्रवाहरूप वाच्यार्थ का तीरूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग सम्बन्ध है, इसलिये 'गंगायां घोषः' में केवललक्षणा है।
अब शक्यपरम्परासम्बन्धरूप द्वितीय लक्षणा के प्रकार को बताते हैं—
यज्ञ शक्यपरम्परा-सम्बन्धेनार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र लक्षित-लक्षणा। यथा द्विरेफ-पदस्य रेफद्वये¹ शक्तस्य भ्रमरपद-घटित-परम्परा-संबंधेन मधुकरे वृत्तिः।
अर्थ— जहाँ पर शक्यार्थ के परम्परासम्बन्ध के द्वारा अर्थान्तर (वाच्यार्थ से भिन्न अर्थ) की प्रतीति होती हो वहाँ लक्षितलक्षणा समझनी चाहिए। जैसे 'द्विरेफ' (अर्थात् दो रेफ (रकार) रूप अर्थ में शक्त पद की भ्रमरपद से घटित परम्परासम्बन्ध से मधुकररूप अर्थ में वृत्ति है। (शक्यार्थ रूप दो रेफों के परंपरासम्बन्ध के द्वारा द्विरेफ पद से मधुकररूप अर्थ की प्रतीति होने से यह लक्षितलक्षणा।)
विवरण— द्विरेफ शब्द के सुनते ही मधुकर (भौंरा) अर्थ की प्रतीति होती है। किन्तु मधुकर, द्विरेफ शब्द का वाच्यार्थ नहीं है। क्योंकि 'द्वि' का अर्थ दो और 'रेफ' का अर्थ रकार, यही 'द्विरेफ' शब्द का वाच्यार्थ है। इसलिये द्विरेफपद की 'जिस शब्द में दो रेफ हों वह शब्द' इस अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। किन्तु इस रीति से तो 'शर्करा' आदि दो रेफों से युक्त पदों की की उपस्थिति होती है, उसके निवारणार्थ 'भ्रमर' रूप अर्थ में ही वह निरूढ लक्षणा है—कहना चाहिये। उस भ्रमरपद का भ्रमररूप अर्थ शक्ति सम्बन्ध है, इस कारण मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है। अर्थात् 'द्विरेफ' पद का दो रेफरूप अर्थ में शक्तिरूप सम्बन्ध, और उन दो रेफों का लक्षणा के द्वारा भ्रमरपद से सम्बन्ध, और उस भ्रमरपद का मधुकररूप अर्थ के शक्ति सम्बन्ध, इस प्रकार परम्परा सम्बन्ध के द्वारा 'द्विरेफ' पद से मधुकर अर्थ की प्रतीति होती है।
'द्विरेफ' पद से भ्रमररूप अर्थ का बोधन शक्तिवृत्ति से न होकर, लक्षणा से होता
१. 'यत्र०'—इति पाठान्तरम् ।
२२४ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षितलक्षणाया गौण्यन्तर्भावः
है, इसमें सन्देह नहीं, किन्तु 'गंगायां घोषः' यहाँ पर जैसे प्रवाहरूप शक्यार्थ का तीररूप लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् संयोग संबन्ध है, वैसे द्विरेफ पद का जो 'दो रेफरूप' वाच्यार्थ उसका भ्रमर या मधुकररूप अर्थ से साक्षात् कोई भी सम्बन्ध नहीं है, किन्तु द्विरेफ पद से लक्षित भ्रमर-पद के द्वारा 'दो रेफों का भ्रमर' अर्थ से संबन्ध होता है, इस कारण यह शक्य-परम्परासम्बन्धरूप लक्षितलक्षणा है। यहाँ पर शक्ययुक्त-भ्रमरपद-प्रतिपाद्यत्व ( वाच्यरूप रेफद्वयों से युक्त भ्रमरपद से प्रतिपाद्य = वाच्य ) ही 'द्विरेफ' पद का मधुकररूप अर्थ के साथ सम्बन्ध है। इस सम्बन्ध में भ्रमर पद घटक ( अवयव ) है। इसलिये यह सम्बन्ध भ्रमरपद से घटित कहा जाता है। यहाँ पर दो लक्षणाएँ करनी होती हैं। उनमें 'द्विरेफ' पद की रेफद्वययुक्त भ्रमरपद में जो लक्षणा की जाती है उसे केवल लक्षणा कहते हैं। कारण यह है कि शक्य ( वाच्य ) रेफद्वय का रेफद्वययुक्त भ्रमरपद के साथ अवयवावयविभावरूप साक्षात् सम्बन्ध है और मधुकररूप अर्थ का उसके साथ साक्षात् सम्बन्ध नहीं है किन्तु भ्रमरपद के साथ वाच्य-वाचकभाव सम्बन्ध है। अर्थात् यहाँ शक्य के साथ सम्बन्ध न होकर लक्षित के साथ लक्ष्य का सम्बन्ध है। इस कारण शक्य के साथ लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध करना यदि अपेक्षित हो तो वह लक्षित के द्वारा ही होगा। इसलिये वहाँ संभवनीय परंपरासम्बन्ध अर्थात् स्वलक्ष्यपदवाच्यत्व ( स्व = रेफद्वय ) लक्ष्य भ्रमरपद का वाच्यत्व मधुकर अर्थ में है। यहाँ पर वाच्यार्थ का सम्बन्ध न होकर वाच्यार्थ से लक्षित 'भ्रमरपद' का 'मधुकररूप' लक्ष्यार्थ का सम्बन्ध होने के कारण इस लक्षणा को 'लक्षितलक्षणा' यह अन्वर्थ संज्ञा दी गई है।
कुछ लोग शब्द की शक्ति, लक्षणा और गौणी रूप तीन वृत्तियों को मानकर शक्य लक्ष्य और गौण रूप से पदार्थ को भी त्रिविध बताते हैं। परन्तु उसका निराकरण 'पदार्थश्च द्विविधः' कहकर कर दिया गया है। उसी का विवरण करने के लिये गौणी वृत्ति का लक्षितलक्षणा वृत्ति में ही अन्तर्भाव होने से उस वृत्ति से युक्त गौण पदार्थ को पृथक्रूप से स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं है। इसी बात को बताते हैं-
गौण्यपि लक्षित-लक्षणैव । यथा सिंहो माणवक इति अत्र सिंह-शब्द-वाच्य-सम्बन्धि-क्रौर्य्यादि-सम्बन्धेन माणवकस्य प्रतीतिः¹ ।
अर्थ—गौणी भी लक्षितलक्षणा ही है। जैसे--'यह बटु सिंह है' इस वाक्य में 'सिंह' शब्द का वाच्यार्थ जो सिंह पशु उसके साथ सम्बद्ध रहने वाले क्रूरत्वादि धर्मरूप सम्बन्ध से माणवक ( बटु ) की प्रतीति होती है।
विवरण—'सिंहो माणवकः' यह बटु ( कुमार ) सिंह है, यहाँ पर 'सिंह' शब्द का 'सिंह पशु' वाच्यार्थ है। परन्तु उसके साथ 'बटु' का किसी प्रकार से सम्बन्ध नहीं है,
१. 'ते:'-इति पाठान्तरम् ।
प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२५
इस कारण यहाँ शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा का संभव नहीं है। अतः शब्द की गौणी नामक पृथक् वृत्ति माननी चाहिये। इस प्रकार गौणी-वृत्तिवादी कह सकता है।
परन्तु यहाँ शक्यार्थ का लक्ष्यार्थ के साथ साक्षात् सम्बन्ध संभव न होने पर भी 'द्विरेफ' पद के समान परम्परासम्बन्ध का संभव हो सकता है। इस कारण 'लक्षितलक्षणा' नामक लक्षणा के द्वितीय प्रकार में गौणीवृत्ति का अन्तर्भाव होता है, इसलिये गौणी वृत्ति को पृथक् रूप से मानने की आवश्यकता नहीं है। कारण यह है कि 'गंगायां घोषः' और 'द्विरेफः' इन शब्दों से प्रतीयमान तीर और मधुकररूप अर्थों की उपपत्ति लगाने के लिये शक्य-साक्षात्सम्बन्ध और शक्य-परम्परासम्बन्धरूप द्विविध सम्बन्ध के कारण केवललक्षणा और लक्षितलक्षणा नामक लक्षणा के दो भेदों का स्वीकार अवश्य करना चाहिये। उनका स्वीकार कर लेने पर 'सिंहो माणवकः' इत्यादि स्थलों में भासमान परम्परासम्बन्ध से उस वाक्यार्थ की उपपत्ति लग जाने के कारण गौणी को पृथक्वृत्ति मानना व्यर्थ है।
**प्रश्न—**प्रकृत में शक्यार्थ का परम्परासम्बन्ध कौन-सा है ?
**उत्तर—**प्रकृत में 'सिंह पशु' इस वाच्यार्थ का माणवक के साथ अभेद का सम्भव न होने से तात्पर्यानुपपत्ति के कारण लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है, और वह लक्षणा 'यह बटु सिंह के समान क्रूरत्वादि गुणों से युक्त है' इस अर्थ में ही माननी चाहिये, अर्थात् प्रकृत में सिंह पशु—'सिंह' शब्द का वाच्यार्थ है और क्रौर्यादिगुण-विशिष्ट-बटु—यह उस शब्द का लक्ष्यार्थ है। वाच्य अर्थ का माणवक से साक्षात् सम्बन्ध न होने पर भी सिंहरूप वाच्यार्थ से सम्बद्ध अर्थात् उसमें तादात्म्य सम्बन्ध से विद्यमान शौर्यादि गुणों के द्वारा सिंह पशु माणवक से सम्बद्ध है जैसे सिंह क्रौर्यादि गुणों से युक्त है वैसे ही माणवक भी है। इसलिए प्रकृति में सिंह शब्द 'स्ववाच्यवृत्ति-क्रौर्यादिसामानाधिकरण्य' सम्बन्ध से लक्ष्यभूत माणवक के साथ सम्बद्ध है। स्व ( सिंह शब्द ) के वाच्य सिंह पशु में विद्यमान क्रौर्यादि गुणों का अधिकरण जैसे सिंह है वैसे माणवक भी है। इस कारण दोनों में क्रूरत्वादिगुणयुक्त होना ही यहाँ पर शक्य सम्बन्ध है। यहाँ भी पूर्ववत् सिंह पद की 'स्ववाच्यवृत्तित्व' इस साक्षात् सम्बन्धरूप केवललक्षणा से लक्षित क्रौर्यादि गुणों का माणवक के साथ सामानाधिकरण्य सम्बन्ध होने से यह लक्षितलक्षणा है। इस रीति से लक्षितलक्षणा में ही गौणी वृत्ति का अन्तर्भाव होने से उस वृत्ति से विशिष्ट गौण पदार्थ भी पृथक् नहीं है। अतः 'पदार्थ द्विविध है' यह मत सर्वथा योग्य है।
इस रीति से सम्बन्ध के कारण होने वाली लक्षणा के द्विविधत्व को बताया। अब सर्वप्रसिद्ध जहल्लक्षणादि भेद से लक्षणा के तीन प्रकारों को बताते हैं।
प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा-जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा,
१५ वे० प०
| २२६ | वेदान्तपरिभाषा | [ प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविध। |
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जहदजहल्लक्षणा चेति। तत्र¹ शक्यमनन्तर्भाव्य यत्रार्थान्तरप्रतीतिस्तत्र² जहल्लक्षणा, यथा³ विषं भुङ्क्ष्वेति। अत्र⁴ स्वार्थं विहाय शत्रुगृहे भोजननिवृत्तिर्लक्ष्यते⁵।
अर्थ— अन्य प्रकार से यह लक्षणा—जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा—त्रिविध है। उनमें से जिस लक्षणा में वाच्यार्थ का अन्तर्भाव लक्ष्यार्थ में न होकर अन्यार्थ (शक्यभिन्न अर्थ) की प्रतीति होती है (शक्यार्थ भासित न होकर केवल लक्ष्यार्थ भासित होता है) उसे जहल्लक्षणा कहते हैं। जैसे—'विष खा' इस वाक्यगत पदों से विषभक्षण रूप वाच्यार्थ का ज्ञान न होकर 'शत्रु के घर मत जाओ' इस लक्ष्यार्थ की प्रतीति होती है, अतः यह जहल्लक्षणा है।
विवरण— १—लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ का यत्किञ्चित् भी अन्तर्भाव न होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर केवल लक्ष्यार्थ का स्वीकार करना, २—लक्ष्यार्थ के साथ वाच्यार्थ की भी प्रतीति होना अर्थात् वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग न कर उसका भी लक्ष्यार्थ में स्वीकार करना, ३—शक्यार्थ का कुछ विरुद्ध भाग त्याग कर केवल उसके अविरुद्ध भाग (अंश) का स्वीकार करना, इन तीन कारणों से लक्षण के जहल्लक्षणा, अजहल्लक्षणा और जहदजहल्लक्षणा नामक तीन भेद होते हैं। लक्षणा के ये तीनों नाम अन्वर्थक हैं। 'ओहाक्—' त्यागे = त्याग करना, धातु से सर्वथा त्याग, अंशतः त्याग और विरुद्धांश का त्याग (अविरुद्ध का त्याग न करना) आदि अर्थों को लेकर लक्षणा के उपर्युक्त नाम रूढ़ हुए हैं। 'तत्र शक्य' इत्यादि ग्रन्थ से जहल्लक्षणा का स्वरूप और उदाहरण बताया गया है। शक्यार्थ का लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव न होकर केवल लक्ष्यार्थ की ही प्रतीति जहाँ होती है वहाँ वाच्यार्थ का सर्वथैव त्याग कर्तव्य होने से उस लक्षणा को जहल्लक्षणा कहते हैं। इसका प्रसिद्ध उदाहरण 'गङ्गायां घोषः' है। यहाँ 'गंगा' पद के प्रवाह रूप वाच्यार्थ का सर्वथा परित्याग कर अर्थात् लक्षणा के द्वारा बोध्य अर्थ से वाच्यार्थ को पृथक् कर केवल तत्संबंधी तीररूप लक्ष्यार्थ का ही ग्रहण किया जाता है। इसलिये गंगा पद जहल्लक्षणा का उदाहरण है। सभी लोगों के द्वारा जहल्लक्षणा के उदाहरण रूप में दिखाये गये 'गङ्गायां घोषः' से अतिरिक्त
१. 'तत्र'—इति पाठो नास्ति क्वचित्।
२. 'रस्य'—इति पाठान्तरम्।
३. 'विषं भुङ्क्ष्व' अत्र वाक्यलक्षणैव। पदलक्षणापरं केषाञ्चिद्व्याख्यानमनुचितमेव-तात्पर्यस्य प्रत्येकपदाऽज्ञाप्यत्वात्। तथा चोक्तमद्वैतसिद्धेरखण्डार्थत्वोपपत्तौ—"तथा च समुदाय एव लक्षणा, न प्रत्येकपदे, प्रत्येकं तात्पर्यज्ञापकत्वाऽभावात्।"
४. 'त्रहि०'—इति पाठान्तरम्।
५. 'लक्षिता' इति पाठान्तरम्।
प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२७
उदाहरण यहाँ ग्रन्थकार ने दिया है। दूसरा यह भी कारण है कि 'गंगायां घोषः' में केवल 'तीरत्व' धर्म से तीररूप लक्ष्यार्थ का बोध नहीं होता। ऐसा न मानने पर अन्य नदी के तीर में भी तीरत्व होने से उस तीर का भी 'गंगा' पद से बोध होने लगेगा। इसलिये 'गंगातीरत्व' धर्म से ही तीर का बोध मानना चाहिये। और ऐसा मानने पर गंगा पद के वाच्यार्थ का भी तीररूप लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव हो जाने से 'नीलो घटः' वाक्य के 'नील' पद के समान इसे भी कोई अजहल्लक्षणा कह देगा। इसलिये ऐसे विवादास्पद स्थल का उदाहरण न देकर ग्रंथकार ने 'विषं भुङ्क्ष्व' इस 'निःसंदिग्धवाक्य को ही उदाहरण के रूप में रखा है। जब कोई व्यक्ति अपने परमप्रिय मित्र से कहे कि 'विषं भुङ्क्ष्व'--विष खाओ, तब 'प्रिय मित्र हालाहल विष खाकर प्राण दे दे' ऐसा उद्देश्य तो कहने वाले का हो ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमप्रिय है। इसलिये इस वाच्यार्थ के स्वीकार करने पर तात्पर्य की अनुपपत्ति होती है। इस कारण उस समय श्रोता उस वाक्य का अर्थ इस प्रकार ही समझता है जब कि देवदत्त मेरा शत्रु है और वह भोजन के लिये बुला रहा है और यह यज्ञदत्त मेरा परमप्रिय मित्र होता हुआ मुझे 'विष खाओ' कह रहा है। ऐसी स्थिति में 'विष क्यों नहीं खाते' यही उसके कहने का उद्देश्य है। अतः अपने शत्रु देवदत्त के घर भोजनार्थ नहीं जाना चाहिये, वहाँ भोजनार्थ जाने पर अवश्य ही कोई संकट उपस्थित होगा। ऐसा समझकर ही यह सुनने वाला व्यक्ति उस वाक्य का अर्थ यही समझता है कि शत्रु के घर भोजन नहीं करना चाहिये।
इस स्थल में 'विषं भुङ्क्ष्व' इस समस्त वाक्य की 'शत्रुगृहे भोजननिवृत्तिः' रूप अर्थ में लक्षणा है। किन्तु इस लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ का यत्किंचित् भी भान अथवा अन्तर्भाव नहीं है। इसलिये यह शुद्ध-जहल्लक्षणा है। इसमें किसी का भी वैमत्य नहीं है।
प्रश्न—यहाँ शक्य सम्बन्ध कौन-सा है ? और यदि वह न हो तो लक्षण के न घट सकने से इसे लक्षणा ही नहीं कह सकते।
उत्तर—'विषं भुङ्क्ष्व' में विष शब्द मुख्य वृत्ति से (अभिधा शक्ति से) विषबोधक न होकर अपकारकत्वरूप शक्यसम्बन्ध से (लक्षणा से) 'शत्रु का अन्न' ही विष शब्द का अर्थ है। इसी प्रकार 'भुङ्क्ष्व' में भुज् धातु अपनी शक्तिवृत्ति से भोजनरूप अर्थ में न होकर वह वैपरीत्य अथवा लक्षणावृत्ति सम्बन्ध से भोजननिवृत्ति का बोधक है। अर्थात् यहाँ पर 'अपकारकत्व' और 'वैपरीत्य' साक्षात् शक्य सम्बन्ध है। इस कारण प्रकृति में लक्षणा का लक्षण अच्छी तरह से घटित हो जाता है। वाक्यार्थ में शब्द की शक्ति होने पर भी शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा का सम्भव ग्रन्थकार आगे बताने वाले हैं :
इस रीति से शत्रु-अन्न के भोजन की निवृत्तिरूप लक्ष्यार्थ में हालाहलादिरूप वाच्यार्थ का यत्किंचित् भी ज्ञान नहीं होता। इसलिए यह जहल्लक्षणा है।
२२८ वेदान्तपरिभाषा [ प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा
अब अजहल्लक्षणा के स्वरूप को बताते हैं—
यत्र शक्यार्थमन्तर्भाव्यैवार्थान्तर-प्रतीतिस्तत्राजहल्लक्षणा,१ यथा शुक्लो घट इति । अत्र हि शुक्लशब्दः स्वार्थं शुक्लगुणमन्तर्भाव्यैव तद्वति द्रव्ये लक्षणया वर्तते ।
जहाँ पर शक्यार्थ का अन्तर्भाव करके ही अन्य (लक्ष्य) अर्थ की प्रतीति होती है, वहाँ पर (वाच्यार्थ का त्याग न किया होने से) अजहल्लक्षणा होती है। जैसे—'शुक्लो घटः' इस वाक्य में शुक्ल शब्द, अपने 'शुक्लगुण' रूप स्वार्थ (वाच्यार्थ) का शुक्लगुणविशिष्ट द्रव्यरूप लक्ष्यार्थ में अन्तर्भाव करके ही शुक्लगुणवान् द्रव्य (घट) रूप अर्थ में लक्षणावृत्ति से रहता है अर्थात् उपर्युक्त अर्थ का बोधन करता है, इसलिए यह अजहल्लक्षणा का उदाहरण है।
विवरण—लक्षणा से प्रतीत होनेवाले लक्ष्यार्थ में वाच्यार्थ भी जब अन्तर्भूत होता है तब उस लक्षणा को अजहल्लक्षणा कहते हैं। शक्यार्थविशिष्टविषया-वृत्तिरजहल्लक्षणा' शक्यार्थ से (वाच्यार्थ से) विशिष्ट विषय को विषय करने वाली वृत्ति को अजहल्लक्षणा कहते हैं। क्योंकि—अजहल्लक्षणा में 'गङ्गायां घोषः' या 'विषं भुङ्क्ष्व' आदि जहल्लक्षणा के उदाहरणों में वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग करना पड़ता है वैसा इसमें वाच्यार्थ का सर्वथा त्याग नहीं करना पड़ता। जैसे—'शुक्लो-घटः' में शुक्ल शब्द शुक्लगुण का वाचक है अर्थात् शुक्ल (शुभ्र) वर्ण उसका वाच्यार्थ है। वह गुण होने से 'घट' अर्थात् द्रव्य नहीं है यह स्पष्ट है। इस कारण शुक्ल शब्द के वाच्यार्थ की वाक्य में—उपपत्ति न लग सकने से (अनुपपत्ति होने से) उस शब्द की शुक्लगुण के साथ नित्यसम्बद्ध रहने वाले 'शुक्लगुणवान् घट' रूप अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है। किन्तु लक्षणा के स्वीकार करने पर भी शुक्लगुण रूप वाच्यार्थ की सर्वथा अप्रतीति नहीं होती। क्योंकि शुक्लगुणविशिष्ट घट का ज्ञान 'शुक्ल गुण' रूप विशेषण के ज्ञान के बिना सम्भव नहीं है इसलिए यह अजहल्लक्षणा का उदाहरण है। इसी प्रकार 'रक्तो धावति' वाक्य में रक्त शब्द की 'रक्तगुणविशिष्ट अश्व' रूप अर्थ में वृत्ति स्वीकार कर 'लाल घोड़ा दौड़ता है' अर्थ की प्रतीति अजहल्लक्षणा से ही होती है।
अब तीसरी जहदजहल्लक्षणा का लक्षण और उदाहरण बताते हैं—
यत्र हि विशिष्ट-वाचकः शब्दः २एकदेशं विहाय एकदेशे वर्तते
१. शक्यार्थविशिष्टविषया वृत्तिः अजहल्लक्षणेत्यर्थः ।
२. 'स्वार्थैक'—इति पाठान्तरम् ।
प्रकारान्तरेण लक्षणा त्रिविधा ] आगमपरिच्छेदः २२९
तत्र जहदजहल्लक्षणा¹, यथा सोऽयं देवदत्त इति । अत्र हि पदद्वय- वाच्ययोर्विशिष्टयोरैक्यानुपपत्त्या पदद्वयस्य विशेष्यमात्रपरत्वम् । यथा वा तत्त्वमसीत्यादौ तत् पद-वाच्यस्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्टस्य त्वंपद- वाच्येनान्तःकरण-विशिष्टेनैक्यायोगादैक्यसिद्धयर्थं स्वरूपे लक्षणेति साम्प्रदायिकाः ।
अर्थ— जिस वाक्य में विशिष्ट वाचक शब्द अपने विशेषणरूप एकदेश को ( एक अंश को ) छोड़कर विशेष्यरूप एक अंश का बोधक होता है, वहाँ जहदजहल्लक्षणा होती है । जैसे—'सोऽयं देवदत्तः'—वह यह देवदत्त—इस वाक्य में 'वह' पद का 'तत्कालविशिष्ट' और 'यह' पद का 'एतत्कालविशिष्ट' अर्थ है । परन्तु 'देवदत्त' परोक्ष और अपरोक्षरूप विरुद्ध उभय कालों से विशिष्ट होकर एक ही समय में स्थित नहीं हो सकता । इसलिये 'वह' और 'यह' दोनों पद केवल देवदत्त रूप विशेष्य अर्थ के ही बोधक हैं अर्थात् दोनों पद केवल विशेष्यपरक हैं । स्वार्थपरक ( वाच्यार्थपरक ) नहीं हैं । इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । अथवा 'तत् त्वमसि'—वह ब्रह्म तू है—आदि अभेदबोधक वाक्यों में 'तत्' पद का वाच्य सर्वज्ञत्वादिविशिष्ट चैतन्य के साथ ऐक्य का संभव नहीं हो सकता । अतः चैतन्यों की एकता के लिये स्वरूप में ( शुद्ध चैतन्य में ) उनकी लक्षणा करनी पड़ती है ऐसा साम्प्रदायिक ( प्राचीन वेदान्ती ) कहते हैं ।
विवरण— व्यवहार में 'सोऽयं देवदत्तः' कहा जाता है । इस वाक्य का वाच्यार्थ है 'वह यह देवदत्त' । इसमें 'सः'—वह शब्द का वाच्यार्थ है 'पूर्वकाल में स्थित' अर्थात् वर्तमान में जिसका प्रत्यक्ष न हो । और 'अयम्'—यह शब्द का वाच्यार्थ है, जिसको उंगली से निर्देश कर सकें, ऐसा वर्तमान काल में स्थित व्यक्ति । तत्कालीन देवदत्त तत्काल से विशिष्ट होने से परोक्ष और एतत्कालीन देवदत्त, इस काल से युक्त होने से अपरोक्ष ( प्रत्यक्ष ) है । किन्तु एक ही देवदत्त का एक ही काल में, उस काल से और इस काल से विशिष्ट रहना सम्भव नहीं । क्योंकि परोक्षत्व और अपरोक्षत्व दोनों धर्म परस्पर विरुद्ध हैं । इस कारण पूर्वोक्त वाक्य से तथाकथित विरुद्ध धर्मों से युक्त देवदत्त का ऐक्य संभवनीय नहीं । किन्तु वह वाक्य ( सोऽयं देवदत्तः ) तत्कालविशिष्ट और एतत्कालविशिष्ट देवदत्त, एक ही है, भिन्न नहीं है—इस उद्देश्य से ही यह वाक्य कहा गया है । इस कारण जहाँ ऐसे विशिष्टों का ऐक्य सम्भव न हो वहाँ उनके विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्य ही दोनों पदों का अर्थ स्वीकृत किया जाता है । ऐसी लक्षणा को ही 'जहदजहल्लक्षणा' या 'भागत्यागलक्षणा' कहते हैं । इसमें विशेषण और
१. शक्यैकदेशमात्रवृत्तिः जहदजहल्लक्षणेत्यर्थः ।
२३० वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्
विशेष्यवाचक पदों में से 'विशेषण' के भाग ( अंश ) को त्याग कर 'विशेष्य' भाग का ग्रहण किया जाता है इसलिए इस वृत्ति को भागत्याग या जहदजहल्लक्षणा कहना सर्वथा योग्य है । प्राचीन वेदान्तियों ने अभेदबोधक महावाक्यों का अर्थ लगाने के लिए इस लक्षणा को स्वीकार किया है । परन्तु वेदान्तपरिभाषाकार—श्रीधर्मराजाध्वरीन्द्र को यह साम्प्रदायिक मत मान्य नहीं है—यह अग्रिम ग्रन्थ से ही स्पष्ट होगा । तथापि उन्होंने सम्प्रदाय का अनुसरण कर 'तत्त्वमसि' इत्यादि महावाक्यों में इस लक्षणा के लक्षण को घटित कर दिखाया है । 'तत्' का अर्थ है सर्वज्ञत्वादिधर्मों से विशिष्ट ईश्वरचैतन्य, और 'त्वम्' का अर्थ है अन्तःकरणोपाधिविशिष्ट अल्पज्ञ चैतन्य । इनका अभेद ( ऐक्य ) होना सम्भव नहीं । क्योंकि मायोपाधिक जो सर्वज्ञ ईश्वर है वह अल्पज्ञ जीव कैसे हो सकेगा ? अर्थात् इस वाच्यार्थ का असंभव होने पर लक्षणा स्वीकार करनी पड़ती है । परन्तु पहले की तरह जहत् और अजहत् लक्षणाओं का लक्षण इसमें घटित न हो सकने से इस वाक्य में उनका ग्रहण नहीं किया जा सकता । क्योंकि उन शब्दों के वाच्यार्थ का त्याग पर चैतन्यरूप विशेष्यांश का भी त्याग करना पड़ता है, और उसके करने पर उस वाक्य का श्रुति को विवक्षित अभेदार्थ नहीं बन पाता और अजहल्लक्षणा के न्याय से वाच्यार्थ सर्वथा त्याग न करने पर भी विवक्षित ऐक्य का असंभव ही रहता है । अतः पूर्वोक्त दोनों लक्षणाओं से भिन्न ऐसी तीसरी जहदजहल्लक्षणा का ही स्वीकार करना पड़ता है । अर्थात् तत्पद के वाच्यार्थ में से सर्वज्ञत्वादि और त्वं पद के वाच्यार्थ में से किंचिज्ज्ञत्वादिरूप औपाधिक विशेषणों का त्याग कर केवल विशेष्यभूत चैतन्य अर्थ को ही दोनों पदों में से स्वीकार करना पड़ता है । इस कारण श्रुतिविवक्षित चैतन्याभेदरूप अर्थ सिद्ध होता है ।
इस प्रकार साम्प्रदायिक मत को बताकर अब अपने मत के अनुसार 'सोऽयं देवदत्तः' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों के अभेदार्थरूप वाक्यार्थ की उपपत्ति बताते हैं—
'वयन्तु ब्रूमः—सोऽयं देवदत्तः, तत्त्वमसीत्यादौ विशिष्टवाचकपदानामेकदेशपरत्वेऽपि न लक्षणा, शक्त्युपस्थितयोर्विशिष्टयोरभेदान्वयानुपपत्तौ विशेष्ययोः शक्त्युपस्थितयोरेवाभेदान्वयाऽविरोधात् ।
१. साम्प्रदायिकाः सर्वज्ञात्मपादादयो भागत्यागलक्षणामपादादयो भागत्यागलक्षणमाश्रित्य शुद्धचैतन्यस्वरूपे 'तत्-त्वम्' पदयोर्लक्षणेति वदन्ति । किन्तु ग्रन्थकारायैतन्नरोचत इति 'वयन्तु' इत्यनेन सूच्यते । यतः 'शक्त्यैव तात्पर्यविषयप्रतीत्युपपत्तौ लक्षणाश्रयणमन्याय्यम्' । तथा चोक्तमद्वैतसिद्धौ प्रत्यक्षस्य आगमबाध्यत्वप्रकरणे—"'सोऽयं देवदत्तः' इत्यादिवाक्य इव शक्यैकदेशस्य अन्वयाभ्युपगमात्, विशेषणबाधेन विशेष्यमात्रान्वयस्यैव अत्र लक्षणाशब्देन व्यपदेशात्" ।
सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम् ] आगमपरिच्छेदः २३१
यथा घटोऽनित्य इत्यत्र घटपदवाच्यैकदेशघटत्वस्यायोग्यत्वेऽपि योग्यघटव्यक्त्या सहानित्यत्वान्वयः।
अर्थ— इस विषय में हम तो ऐसा कहते हैं—'वही यह देवदत्त' 'वह ब्रह्म तू है' आदि वाक्यों में 'सः' 'अयम्' 'तत्' और 'त्वम्' ये विशिष्टवाचक पद यद्यपि विशेष्य के एकदेश के ही बोधक हैं तथापि उस बोध के लिये उन पदों की विशेष्यांश में लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं। क्योंकि शक्ति-वृत्ति से उपस्थित (ज्ञात) हुए तत्काल-तया एतत्काल से विशिष्ट देवदत्त के अभेदान्वयरूप अर्थ की अनुपपत्ति रहने पर भी शक्तिवृत्ति से ही उपस्थित हुए विशेष्यों का अभेदान्वय करने में किसी प्रकार का विरोध नहीं है। यथा—'घट अनित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद के 'घटत्व जाति-विशिष्ट घट' रूप वाच्यार्थ का एकदेश (विशेषणांश) यद्यपि-अनित्यत्व के साथ अन्वित होने के योग्य नहीं है, तथापि अन्वययोग्य घटव्यक्तिरूप विशेष्यांश के साथ उसका अन्वय हो सकता है। तात्पर्य यह है कि—हम 'घट' व्यक्ति को ही अनित्य समझते हैं 'घटत्व' जाति को नहीं—यह ज्ञान-शक्ति से ही होता है। अतः यहाँ लक्षणा मानने की आवश्यकता नहीं है।
विवरण— ग्रन्थकार ने 'घट' पद की शक्ति 'घटत्वजातिविशिष्ट घट' रूप अर्थ में गृहीत कर अपना मत प्रतिपादन किया है। 'शब्द' की 'विशिष्ट' में शक्ति होती है—ऐसा मानने पर घट पद की 'घटत्व' जाति रूप अर्थ में शक्ति जैसी है तद्वत् वह 'घट व्यक्ति' रूप अर्थ में भी है—यह सिद्ध होता है। इसलिये जहां पर विशिष्टपदार्थान्वय का बाध होता हो, वहाँ जिस अंश का बाध नहीं हो रहा है उसी अंश में उस शब्द का पर्यवसान मानना चाहिये। क्योंकि जितने अंश में शक्ति रहती है उस सम्पूर्ण अंश का शाब्द बोध में भान होना ही चाहिये यह कोई नियम नहीं है। 'आकाश' शब्द की शब्दाश्रयत्वविशिष्ट आकाश पदार्थ में शक्ति है, इसलिये 'आकाश है' ऐसा कहने पर शब्दाश्रयत्व का बोध जैसे तात्पर्य का विषय नहीं होता उसी तरह विशिष्टवाचकपदों का पर्यवसान एकदेश में मानने पर भी मुख्यवृत्ति से ही 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों की अखण्डार्थत्व (ऐक्यार्थत्व) उपपन्न होता है। अतः उसके निमित्त लक्षणा मानने का आवश्यकता नहीं।
अन्य दार्शनिकों ने भी ऐसा ही माना है। 'घट अनित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद का 'घटत्व-विशिष्ट घट' वाच्यार्थ है। परन्तु 'घटत्व' और 'घट' दोनों से भी अनित्यत्व का अन्वय होना संभव नहीं। क्योंकि 'घटत्व' जाति होने से उनके मतानुसार वह नित्य है। हमारे मत में भी उसे व्यावहारिक नित्यत्व तो है ही। इसलिये नैयायिक यहाँ पर वाच्य के एकदेश रूप विशेष्यांश घट के साथ ही अनित्यत्व का अन्वय स्वीकार करते हैं और 'घटव्यक्ति अनित्य है' यही उपर्युक्त वाक्य का अर्थ करते हैं। यहाँ यह बोध शक्ति से ही होता है। इसलिये लक्षणा नहीं स्वीकार करनी पड़ती।
२३२ वेदान्तपरिभाषा [ सोऽयं देवदत्तः इत्यत्र स्वमतम्
शंका—ऐसा मानने पर 'घट नित्य है' इस वाक्य में घटरूप विशेष्यांश का नित्यत्व के साथ अन्वय जब बाधित होता है तब उसका घटत्व रूप विशेषणांश में पर्यवसान भी मुख्यवृत्ति से ही होने लगेगा, जिससे 'यह बोध लक्षणा से ही होता है' इस प्रमाणिक व्यवहार का बाध होगा—इस शंका के समाधानार्थ ग्रन्थकार कहते हैं—
यत्र पदार्थैकदेशस्य विशेषणतयोपस्थितिः, तत्रैव स्वातन्त्र्येणोपस्थितये लक्षणाऽभ्युपगमः। यथा घटो नित्य इत्यत्र घटपदाद्घटत्वस्य शक्त्या स्वातन्त्र्येणानुपस्थित्या तादृशोपस्थित्यर्थं घटपदस्य घटत्वे लक्षणा।
अर्थ—जिस वाक्य में पदार्थ के एकदेश की (एक अंश की) विशेषण रूप से उपस्थिति हो वहीं पर उसकी (केवल विशेषण की) स्वतंत्रताया उपस्थिति होने के लिये लक्षणा का अभ्युपगम (स्वीकार) करना पड़ता है। जैसे—'घट नित्य है' इस वाक्य में 'घट' पद से शक्तिवृत्ति के द्वारा केवल घटत्व की स्वतंत्रताया उपस्थिति (ज्ञान) नहीं होती, इसलिये वैसी (विशेषण रूप घटत्व की) उपस्थिति होने के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है।
विवरण—शक्ति प्रधानतया विशेष्य में रहती है, इसलिये उसका (विशेष्य का) स्वतंत्रताया (केवल व्यक्ति के रूप से) होने वाला बोध, शक्तिवृत्ति से ही हो सकता है, इसलिये वहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं पड़ती। परन्तु विशेषण में गौणता रहती है, इसलिये जिस वाक्य में स्वतंत्रताया (विशेष्य की अपेक्षा न करते हुए) केवल गुणभूत विशेषण से ही पदार्थ का अन्वय होना होता है, उस वाक्य में उस विशेषण रूप अंश की ही उपस्थिति के लिये लक्षणा अवश्य स्वीकार करनी चाहिये। जैसे 'घट नित्य है' कहने पर घट पद से विशेषण और विशेष्य (घटत्व और घटत्वावच्छिन्न घट व्यक्ति) के साथ परस्पर संबद्ध दोनों अर्थों की उपस्थिति का संभव होने पर भी घटव्यक्ति रूप विशेष्यांश से नित्यत्व का अन्वय हो नहीं सकता। क्योंकि घटव्यक्ति के नित्य न होने से विशेष्यरूप अंशके साथ नित्यत्व का अन्वय-बोध न होकर केवल विशेषणीभूत घटत्व रूप एकदेश के ही साथ नित्यत्व अन्वित होता है, इस प्रकार की उपस्थिति के लिये घट पद की घटत्वरूप अर्थ में लक्षणा ही माननी पड़ती है। क्योंकि पदार्थ, पदार्थ के साथ ही अन्वित होता है। 'पदजन्य पदार्थ की प्रतीति में शक्तिवृत्ति के द्वारा विशेष्य-भूत अंश के ही साथ पदार्थ का अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ पदार्थ अन्वित नहीं होता' यह नियम होने से 'घट' पद से विशेष्य-निरपेक्ष 'घटत्व' इस विशेषणरूप अंश की उपस्थिति लक्षण के बिना नहीं हो पाती। अतः ऐसे स्थल पर लक्षणा माननी ही पड़ती है।
इस प्रकार विशिष्टवाचक पद से केवल विशेष्य की उपस्थिति होने के लिए लक्षणा को स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वहाँ तो केवल विशेषण की उपस्थिति
महावाक्यलक्षणाखण्डनम् ] आगमपरिच्छेदः २३३
के लिये लक्षणा माननी पड़ती है यह नियम बताया गया । अब उसी नियम को प्रकृत 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में लगाकर वहाँ भी लक्षणा के बिना ही अखण्डार्थ की उपपत्ति को बताते हैं—
एवमेव तत्त्वमसीत्यादिवाक्येऽपि न लक्षणा । शक्त्या स्वातन्त्र्ये- णोपस्थितयोस्तत्त्वम्पदार्थयोरभेदान्वये बाधकाभावात् । अन्यथा गेहे घटो, घटे रूपं, घटमानयेत्यादौ घटत्वगेहत्वादेरभिमतान्वयबोधायोग्य- तया तत्रापि घटादिपदानां विशेष्यमात्रपरत्वं लक्षणयैव स्यात् । तस्मात्तत्त्वमसीत्यादिवाक्येषु आचार्याणां लक्षणोक्तिरभ्युपगमवादेन बोध्या ।
**अर्थ—**इसी न्याय के अनुसार 'तत्त्वमसि' इत्यादि प्रकृत वाक्यों में भी लक्षणा करने की आवश्यकता नहीं है । क्योंकि शक्तिवृत्ति के द्वारा, स्वतंत्रतया ( सर्वज्ञत्वादि विशेषणों की अपेक्षा न करते हुए केवल विशेष्यरूप से ) चैतन्यरूप से उपस्थित होने वाले 'तत्' और 'त्वम्' पदार्थों का अभेद से अन्वय होने में कोई भी बाधक नहीं है । अन्यथा ( ऐसे स्थल पर यदि लक्षणा को न माने ) 'घर में घट है' 'घट में रूप है' 'घट लाओ' आदि वाक्यों में भी घटत्व, गेहत्व आदि धर्मों में गृहादि पदार्थरूप अंशों में अभिमत अन्वय-बोध करा देने की योग्यता न होने से वहाँ पर भी घटादिपदों का केवल विशेष्यपरत्व लक्षणा से ही होने लगेगा । तस्मात् पूर्वाचार्यों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जहदजहल्लक्षणा का अभ्युपगमवाद से स्वीकार किया है, ऐसा समझना चाहिये ।
**विवरण—**उपर्युक्त नियम मानने पर विशिष्टवाचक पदों से केवल विशेष्य का ज्ञान होने के लिये लक्षणा का स्वीकार करने की आवश्यकता नहीं, यह सिद्ध होता है । इसी प्रकार 'तत्त्वमसि' आदि अभेदार्थक वाक्यों में भी लक्षणारूप गौण वृत्ति को नहीं मानना पड़ता । क्योंकि 'तत्' पद से सर्वज्ञत्वविशिष्ट चैतन्य और 'त्वम्' पद से अल्पज्ञत्व विशिष्ट चैतन्यरूप विशिष्ट अर्थों के उपस्थित होने पर भी तथा उनका भेदान्वय बाधित होने पर भी वे पद जहदजहल्लक्षणा के द्वारा शुद्ध ( सर्वज्ञत्वादिविशेषरहित ) चैतन्य के बोधक होते हैं' यह आप का मन्तव्य ( केवल विशेष्यमात्र की उपस्थिति ) तो ऊपर बताये नियम से ही हो सकता है । तब लक्षणारूप गौण वृत्ति को मानने की आवश्यकता नहीं होती ।
**शंका—**घट आदि पद स्वाभाविक रूप से ही घटत्वादि विशेषण और घटादि विशेष्य दोनों के बोधक होते हैं अर्थात् उनकी शक्ति उन दोनों में होती है, इसलिये जहाँ पर उनमें से एक ही की उपस्थिति होती हो वहाँ वह एकदेश, उन पदों का वाच्यार्थ है, यह नहीं कहा जा सकता । इसलिये 'घट नित्य है' इत्यादि वाक्यों में केवल विशेषण का
२३४ वेदान्तपरिभाषा [ महावाक्यलक्षणाखण्डनम्
ज्ञान होने के लिये आप को वहाँ पर जैसी लक्षणा माननी पड़ती है, वैसे ही 'तत्त्वमसि' इत्यादि वाक्यों में भी उसे मानना पड़ता है, तब यहाँ लक्षणा की आवश्यकता नहीं है' यह आप कैसे कहते हैं ?
समा०—ग्रन्थकार ने इस शंका का निराकरण 'अन्यथा०' इत्यादि वाक्य से किया है। विशेषण के समान केवल विशेष्य का बोध भी लक्षणा से ही होता है, ऐसा मानने पर 'घर में घट है' इस वाक्य में गृहत्वविशिष्ट गृह इस प्रकार के विशिष्टार्थ-बोधक 'गृह' पद से केवल 'गृह' रूप विशेष्यांश का बोध होने के लिये ऐसे वाक्य में भी लक्षणा का स्वीकार करना पड़ेगा। क्योंकि यहाँ पर भी वाच्यैकदेशभूत घटत्वरूप अर्थ के साथ 'गृह' पदार्थ का आधेयता-सम्बन्ध से अन्वय का होना असंभव है। क्योंकि गृह में घटत्व नहीं रहता। उसी प्रकार घट गृह में रहता है, वह गृहत्व जाति में नहीं रह सकता। वैसे ही घट में रूप है' इस वाक्य का घटत्वविशिष्ट घट में अर्थात् घटत्व और घट इन दोनों में रूप है—यह अर्थ उपपन्न नहीं होता, क्योंकि रूप घट में रहता है, उसका घटत्व-जाति में होना संभव नहीं। इसलिये घटत्व का रूप के साथ आधेयता-सम्बन्ध से अभिलषित अन्वय हो नहीं सकता। इसलिये इस वाक्य से 'घट में रूप है' इत्याकारक जो बोध होता है वह भी लक्षणा से ही होता है—कहना पड़ेगा। इसी प्रकार 'गाय को लाओ' इस वाक्य में 'गो' इस विशिष्ट पद की भी केवल 'गो' इस अर्थ में लक्षणा मानकर ही विशेष्य का आनयन ( लाना ) क्रिया में अन्वय होता है—कहना होगा, क्योंकि वहाँ भी वाच्यैकदेशरूप ( विशेषणरूप ) अमूर्त गोत्व का आनयन क्रिया में कर्मत्वरूप से अन्वित होना संभव नहीं है।
इस पर—'गेहे घट:' आदि वाक्यों में हम लक्षणा मानते हैं उसमें क्या बाधक है—यदि कहें तो यह उचित न होगा। क्योंकि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्ति' प्राधान्य से सब व्यवहार हुआ करते हैं, इस नियम के अनुसार उस वाक्य के वाच्यार्थ का प्रधानभूत एकदेशरूप विशेष्य की उपस्थिति होने पर वह अर्थ शक्य ( वाच्य ) है, यही मानना उचित है। वाक्य में विशेषण की प्रधानता न होने से विशेष्यरहित विशेषण का ज्ञान लक्षणा के बिना हो नहीं सकता। इसलिये केवल विशेषणरूप अंश में लक्षणा को अवश्य मानना पड़ता है। क्योंकि 'घट पद का घटत्व वाच्य है' ऐसा प्राधान्य से व्यवहार नहीं होता, इसलिये 'पदार्थ: पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम भी विशेषण-विषयक ही है, ऐसा समझना चाहिये, अर्थात् विशेषण के साथ पदार्थ का अन्वय न होकर विशेष्य के ही साथ होता है, यह उस नियम का अर्थ समझना चाहिये।
शंका—परन्तु ऐसा कहने पर वाक्यवृत्ति, पंचदशी आदि पूर्वाचार्यकृत वेदान्त-ग्रन्थों के साथ विरोध होता है, क्योंकि 'तत्त्वमस्यादिवाक्येषु लक्षणा भागलक्षणा' 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में भागलक्षणारूप लक्षणा माननी पड़ती है, इस कहने से विरोध होता है, उसका परिहार किस प्रकार से होगा ?
जहदजहल्लक्षणाया उदाहरणम् ] आगमपरिच्छेदः १३५
समाधान—श्रीमदाचार्य ने तथा विद्यारण्य आदिकों ने 'तत्त्वमसि' आदि वाक्यों में जो भागलक्षणा मानी है, वह पूर्वपरम्परा का अनुसरण कर मानी है । वस्तुतः उन्हें भी वैसी लक्षणा मानने की आवश्यकता नहीं थी ।
इस पर यदि कोई ऐसा कहें कि 'तत्त्वमसि' आदि वाक्य में अभेदान्वय की उपपत्ति लगाने के लिये ही यह तीसरा प्रकार अर्थात् 'जहदजहल्लक्षणा' माना गया है । यदि आप के कथनानुसार इस वाक्य में भी उसका उपयोग न हो तो 'लक्षणा त्रिविधा' इस प्रकार लक्षणा के तीन प्रकार बताने का क्या उपयोग होगा ? इस प्रश्न पर ग्रन्थकार कहते हैं-
जहदजहल्लक्षणोदाहरणं तु--काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्याद्येव । तत्र शक्यकाकपरित्यागेनाशक्यदध्युपघातकत्वपुरस्कारेण काकेऽ-काकेऽपि काकशब्दस्य प्रवृत्तेः ।
अर्थ—'कौओं से दही की रक्षा की जाय' इत्यादि वाक्य ही जहदजहल्लक्षणा के उदाहरण हैं । क्योंकि ऐसे वाक्यों में 'काक' शब्द के वाच्यार्थ (काकत्वविशिष्टकाक) का परित्याग कर और अशक्यार्थ (अवाच्य लक्ष्यार्थ-दध्युपघातकत्व) का पुरस्कार कर 'काक' शब्द की काक तथा अकाक (काकभिन्न अर्थात् दधि को दूषित करने वाले मार्जारादि प्राणी) अर्थ में प्रवृत्ति है । (इसलिये यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है।)
विवरण—'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' यह जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण है । मूल-ग्रन्थस्थ 'इत्यादि' शब्द से 'छत्रिणो यान्ति' इत्यादि उदाहरणों को समझना चाहिये । इस कारण 'लक्षणा त्रिविधा' इस वाक्य के साथ कोई विरोध नहीं हो पाता ।
जब कि घर के बड़े लोग बच्चों से कहते हैं कि 'दही की ओर देखना, कौए उसे दूषित न करने पायें' तब केवल कौए दही को दूषित न करें, बिल्ली, कुत्ते आदि उसे दूषित करें' यह उस वाक्य का आशय नहीं होता, अपितु सभी से उसका (दही का) रक्षण करना ही उस वाक्य का तात्पर्य-विषयभूत अर्थ होता है । इसलिये उस वाक्य का अर्थ श्रोता बालक यह समझता है कि मुझे सभी-दध्युपघातक प्राणियों से दही की रक्षा करने की आज्ञा हुई है । इस प्रकार की प्रतीति उसे काक शब्द की दध्युपघातक प्राणियों में लक्षणा मानने से ही होती है । यहाँ दधिरक्षण रूप तात्पर्यार्थ की केवल वाच्यार्थ से अनुपपत्ति होने पर लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है, अतः यही जहदजहल्लक्षणा है ।
शंका—उपर्युक्त वाक्य में लक्षणा का स्वीकार आवश्यक होने पर भी 'विरुद्ध विशेष अंशों का त्याग कर अविरुद्ध विशेष अंशों का स्वीकार करना' रूप जहदजहल्लक्षणा का लक्षण प्रकृत स्थल में संभव नहीं होता, क्योंकि उसमें 'काक' पद के वाच्यार्थ का त्याग नहीं होता है । इसलिये इसे (काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्) जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण कैसे कहा जा सकता है ।
| २३६ | वेदान्तपरिभाषा | [ लक्षणायां बीजम् |
|---|
समाधान—प्राचीन साम्प्रदायिकों ने 'विरुद्धांश-त्यागपूर्वक अविरुद्ध अंश-विशेष का स्वीकार करना' यह लक्षण जहदजहल्लक्षणा का किया है। परन्तु धर्मराजाध्वरीन्द्र आदि नवीन वेदान्तियों ने उसे स्वीकार नहीं किया। नवीनों का कहना है कि शक्य और अशक्य अर्थ का सामान्यतया बोध करा देने वाली जो लक्षणा हो वही जहदजहल्लक्षणा है।
प्रकृत उदाहरण में इस लक्षण का समन्वय होता है। क्योंकि यहाँ पर 'काक' शब्द काकत्वरूप वाच्यार्थ का त्याग कर अशक्य (वाच्यार्थभिन्न) 'दध्युपघातकत्व' धर्म का पुरस्कार करता है और मार्जार, श्वान आदि लक्ष्यार्थों के साथ वाच्यरूप 'काक' का भी उसी धर्म से (दध्युपघातकत्वरूप से) बोध कर देता है। इस रीति से यह वाक्य (काक) और अशक्य (मार्जार आदि) का बोधक होने से जहदजहल्लक्षणा का उदाहरण हो सकता है इसी प्रकार 'छत्रिणो गच्छन्ति' छाते वाले लोग जा रहे हैं—आदि वाक्य भी इसी लक्षणा के उदाहरण बन सकते हैं। इस वाक्य में भी 'एकसार्थवाहित्व'—एक समूह का घटक होना—सम्बन्ध से 'छत्रिन्' पद शक्य (छत्रवान् लोग) और अशक्य (छत्ररहित लोग) दोनों का ही बोधक है।
इस प्रकार लक्षणा का स्वरूप बताकर अब उसका बीज बताते हैं—
लक्षणाबीजं तु तात्पर्यानुपपत्तिरेव न त्वन्वयानुपपत्तिः, काकेभ्यो दधि रक्ष्यतामित्यत्रान्वयानुपपत्तेरभावात्। गङ्गायां घोष इत्यादौ तात्पर्यानुपपत्तेरपि सम्भवात्।
**अर्थ—**परन्तु तात्पर्य की अनुपपत्ति ही लक्षणा में बीज है। अन्वय की अनुपपत्ति, लक्षणा में बीज नहीं है। क्योंकि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' वाक्य में अन्वय की अनुपपत्ति नहीं है। (वाक्य के पदों का परस्पर अन्वय लग सकता है) उसी प्रकार 'गङ्गायां घोषः' आदि वाक्यों में तात्पर्य की अनुपपत्ति का भी सम्भव होता है। (इसलिये एकमात्र तात्पर्यानुपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानने में लाघव है)
विवरण—'तत्त्वमसि' आदि अभेदबोधक वाक्यों में गौणी लक्षणा (गौण लक्षणा-वृत्ति) मानने की आवश्यकता नहीं है, यह ऊपर बताया गया है। इसी पर यदि कोई कह दे कि 'जिस प्रकार 'शक्ति' शब्द की एक वृत्ति है--उसी प्रकार 'लक्षणा' भी शब्द की एक वृत्ति है। इस कारण शक्ति से जैसे शक्यार्थ का ज्ञान होता है वैसे ही लक्षणा से शक्यसम्बद्ध लक्ष्यार्थ का भी ज्ञान होता है, तब उसमें गौणत्व कैसा ?
इस शङ्का के निरसनार्थ यहाँ पर लक्षणा का बीज बताया गया है। शब्द से लक्षणा के द्वारा लक्ष्यार्थ का ज्ञान होने में जो कारण हो उसे लक्षणा का बीज कहते हैं। शब्द के प्रसिद्ध अर्थ को शक्यार्थ या वाच्यार्थ कहते हैं, जहाँ पर वाच्यार्थ की उपपत्ति नहीं लगती वहाँ अगत्या लक्षणा का स्वीकार करना पड़ता है। इसलिये उसे मुख्य शक्ति की
लक्षणायां बीजम् ] आगमपरिच्छेदः २३७
अपेक्षया गौणत्व समझा जाता है। अर्थात् जहाँ वाक्यार्थ से ही शाब्दबोध का होना संभव हो वहाँ लक्षणा को मानने की आवश्यकता नहीं होती।
परन्तु कुछ वादी—मुख्यार्थ के अन्वयानुपपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानते हैं। अतः उसका निराकरण करने के लिये ग्रन्थकार ने मूल में कहा है—'अन्वयानुपपत्ति, लक्षणा में बीज नहीं है।' क्योंकि 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' इस वाक्य में दधिरक्षण का केवल 'काक' शब्द के साथ (उसके मुख्यार्थ के साथ अन्वय मानने पर भी वह अनुपपन्न नहीं होता, इसलिये अन्वयानुपपत्तिरूप लक्षणाबीज प्रकृत उदाहरण में अव्याप्त रहता है। किन्तु मार्जार आदि प्राणियों को यदि दूषित करने दिया जाय तो 'दधिरक्षण' रूप तात्पर्य की अनुपपत्ति होती है। अतः तात्पर्यानुपपत्ति को ही लक्षणा में बीज मानना आवश्यक है। उसके मानने पर सभी जगह शाब्द-बोध की उपपत्ति लग जाती है। अतः पृथक्रूप से 'अन्वयानुपपत्ति' रूप लक्षणाबीज मानने की आवश्यकता ही नहीं रहती। क्योंकि 'अन्वयानुपपत्ति और तात्पर्यानुपपत्ति' रूप दो लक्षणाबीज मानने की अपेक्षा सर्वत्र एक को ही बीज मानने में लाघव है।
इसके अतिरिक्त जहाँ कहीं वाक्य में अन्वयानुपपत्ति रहती है वहाँ तात्पर्यानुपपत्ति भी रहती है। 'गङ्गायां घोषः' यह वाक्य अन्वयानुपपत्ति रूप लक्षणाबीज के उदाहरण में दिया जाता है। क्योंकि 'गङ्गा' पद का मुख्यार्थ प्रवाह का घोष के साथ आधेयता-सम्बन्ध से अन्वय हो नहीं सकता। इस अन्वयानुपपत्ति के कारण गङ्गापद की 'गङ्गा-सम्बन्धी तीर' अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है—यह अन्वयानुपपत्ति को बीज मानने वालों का कहना है। परन्तु यहाँ जैसी अन्वयानुपपत्ति है वैसी ही तात्पर्यानुपपत्ति भी है। क्योंकि 'गङ्गा' पद का 'प्रवाह' रूप मुख्य अर्थ करने पर उस वाक्य के 'तीरप्रतीति-जननयोग्यत्व' रूप तात्पर्य का असम्भव हो जाता है। इस कारण इस वाक्य में भी तात्पर्यानुपपत्ति होने से लक्षणा का स्वीकार किया जाना चाहिये। तस्मात् भिन्न-भिन्न उदाहरणों में लक्षणा के भिन्न-भिन्न प्रयोजक मानने की अपेक्षा 'तात्पर्यानुपपत्ति' रूप एक ही बीज मानना उचित है। तात्पर्यार्थ के स्वरूप को ग्रन्थकार स्वयं बतावेंगे। 'गङ्गायां घोषः' इस उदाहरण में तात्पर्य निश्चय करने के लिये अन्वयानुपपत्ति का उपयोग हो सकता है। उसी प्रकार 'काकेभ्यो दधि रक्ष्यताम्' यहाँ प्रयोजनासिद्धि का और 'सैन्धवमानय' में देश, काल, प्रकरण आदिकों का भी तात्पर्य निश्चय करने में उपयोग होता है। अर्थात् तात्पर्यार्थ के निश्चायक कारण भिन्न-भिन्न होते हैं।
नैयायिकों का कहना है कि—'जिस प्रकार शक्ति केवल पदवृत्ति होती है उसी प्रकार लक्षणा भी पदवृत्ति ही है। क्योंकि लक्षणा में भी शक्ति के समान वृत्तित्व है। अतः जो भी वृत्ति हो उसका पदनिष्ठ होना ही उचित है'। इस मत का निराकरण ग्रन्थकार करते हैं—
२३८ वेदान्तपरिभाषा [ लक्षणाया वाक्यवृत्तित्वमपि
लक्षणा च न पदमात्रवृत्तिः, किन्तु वाक्यवृत्तिरपि । यथा गम्भीरायां नद्यां घोष इत्यत्र गम्भीरायां नद्यामिति पदद्वयसमुदायस्य तीरे लक्षणा ।
अर्थ—लक्षणा केवल पदमात्रवृत्ति नहीं है किन्तु वाक्यवृत्ति भी है । जैसे—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' गहरी नदी पर ग्वाले का घर है । इस वाक्य में गंभीर और नदी दो पदों के समूह की तीर अर्थ में लक्षणा है ।
विवरण—नैयायिक अनुमान¹ करते हैं कि—'लक्षणा, पदमात्रवृत्ति है, क्योंकि उसमें वृत्तित्व है, शक्ति के समान ।' परन्तु उनका यह अनुमान ठीक नहीं है । क्योंकि 'गम्भीरायां नद्यां घोषः' वाक्य में पदमात्रवृत्तित्व का व्यभिचार होता है । इस वाक्य में गंभीर विशेषण से विशिष्ट नदी पद की ही तीररूप अर्थ में लक्षणा की जाती है । इस कारण यहाँ लक्षणा में पदमात्रवृत्तित्व का संभव नहीं हो पाता ।
इसके अतिरिक्त इस अनुमान में 'वृत्तित्व' हेतु सोपाधिक² है, क्योंकि यहाँ 'शक्तित्व' उपाधि है । तथाहि—जहाँ 'पदमात्रवृत्तित्व' रूप साध्य होता है वहाँ ( घट पट आदि स्थलों में ) शक्तित्व भी रहता है । इस कारण 'शक्तित्व' साध्यव्यापक हुआ । और जहाँ 'वृत्तित्व' रूप हेतु हो वहाँ 'शक्तित्व' के रहने का कोई नियम नहीं है जैसे—गंभीर और नदी दोनों पदों में लक्षणावृत्ति है किन्तु 'शक्तित्व' नहीं है, इस कारण 'शक्तित्व' साधनाव्यापक हुआ । अतः यह अनुमान सोपाधिकत्वरूप दोष से दूषित है ।
गम्भीरायां नद्यां घोषः । वाक्य में नदी में 'गंभीर' विशेषण दिया है । परन्तु गंभीर जल पर घर का होना असंभव है । और यह व्यक्ति तो ऐसा बता रहा है, अतः इन दो पदों के उच्चारण से नदी शब्द का तीररूप अर्थ ही इस व्यक्ति को विवक्षित होगा, यह प्रतीति होती है, इस कारण यहाँ पर दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा है—यह मानना होगा । क्योंकि केवल 'नदी' पद की 'तीर' रूप अर्थ में यदि लक्षणा मान लें तो 'गंभीर तीर पर घोष है' यह अर्थ होने लगेगा । परन्तु तीर में 'गंभीर' विशेषण नहीं दिया जा सकता । क्योंकि तीर गंभीर नहीं होता । यदि 'गंभीर' पद की ही तीर अर्थ में लक्षणा मानें तो वह भी नहीं हो सकता, क्योंकि 'गंभीर' और 'तीर' में अभेद का होना संभव ही नहीं, इसी तरह 'तीर' और 'नदी' का भी अभेदान्वय कभी नहीं बन सकता । इसी प्रकार इन दो पदों में से किसी एक पद की तीररूप अर्थ में लक्षणा कर समीप के पद को उस तात्पर्य का केवल ज्ञापक मान लेने पर भी गंभीर और नदी दो पदों की
१. 'लक्षणा पदमात्रवृत्तिः वृत्तित्वात् शक्तिवत् ।'
२. उक्तानुमाने 'शक्तित्वम्' उपाधिः । यथा—दृष्टान्ते शक्तौ पदमात्रवृत्तित्वरूपं साध्यमस्ति, शक्तित्वमपि अस्ति, अतः साध्यव्यापकत्वम्, साधनं वृत्तित्वं लक्षणायामपि, तत्र शक्तित्वं नास्ति इति साधनाव्यापकत्वमपि ।
वाक्यलक्षणाया उपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २३९
आवृत्ति करने में कोई कारण नहीं है । अतः पुनरुक्ति की उपपत्ति ही नहीं लगाई जा सकती ।
इस पर यदि ऐसा कहें कि—'नदी' शब्द की केवल 'तीर' अर्थ में लक्षणा न कर 'नदी तीर' अर्थ में लक्षणा है, और 'नदीतीर' रूप लक्ष्यार्थ के 'नदी' रूप अंश के साथ ही गंभीर पद का अन्वय होता है, ऐसा करने पर कोई दोष नहीं है ।
परन्तु यह कहना ठीक नहीं है—एक पदार्थ का दूसरे पदार्थ के साथ ही अन्वय होता है, उसके एकदेश के साथ नहीं । यह शाब्दबोध के विषय में नियम है । अतः 'नदीतीर' पद के नदीरूप एक अंश के साथ गंभीर पद का अन्वय हो नहीं सकता । इसलिये परिशेषन्याय से गंभीर और नदी दोनों पदों की तीररूप अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है । वह अर्थ गंभीर और नदी परस्परान्वित इन दो पदों से निष्पन्न होता है इस कारण यह वाक्यवृत्ति लक्षणा है । अर्थात् शक्ति के समान लक्षणा भी पदमात्रवृत्ति ही होती है, यह नियम नहीं बनाया जा सकता । प्रत्युत लक्षणा जैसी पदवृत्ति होती है, वैसी वाक्यवृत्ति भी होती है—यह मानना पड़ता है ।
शंका—लक्षणा का स्वरूप तो 'शक्यसम्बन्धो लक्षणा' बताया गया है । किन्तु वाक्यार्थ में शक्ति के न होने से उसको शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा कैसे संभव हो सकेगी ? इस प्रकार शंका उपस्थित कर उसका समाधान ग्रन्थकार करते हैं—
ननु ^१वाक्यार्थस्याशक्यतया कथं शक्यसम्बन्धरूपा लक्षणा ? ।
उच्यते । शक्त्या ^२यत्पदसम्बन्धेन ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा, शक्तिज्ञाप्यश्च यथा पदार्थस्तथा वाक्यार्थोऽपीति न काचिदनुपपत्तिः ।
**अर्थ—**वाक्यार्थ में अशक्यता होने से अर्थात् वाक्यार्थ में शक्यत्व के न होने से उसमें शक्यसम्बन्धरूप लक्षणा है—यह कैसे कहा जा सकेगा ? ऐसा शंका यदि हो तो समाधान बताते हैं—शक्ति से पदसम्बन्ध के द्वारा जो बोधित किया जाता है उसका सम्बन्ध ही लक्षणा है, और पदार्थ जैसे शक्ति से ज्ञाप्य ( बोध्य ) होता है, वैसे वाक्यार्थ भी शक्ति से ज्ञाप्य होता है । अतः वाक्य में लक्षणा के स्वीकार करने में कोई अनुपपत्ति नहीं है ।
**विवरण—**जब किसी शाक्यार्थ ( वाच्यार्थ ) की उपपत्ति नहीं लगती, तब उसकी शक्यार्थसंबद्ध अर्थ में लक्षणा करनी पड़ती है । परन्तु जो अर्थ, वाच्य ही नहीं है उसकी तत्संबद्ध अर्थ में लक्षणा कहना तो बन्ध्यापुत्र का किसी से सम्बन्ध प्रदर्शन करने के
१. क्यस्याश०'–इति पाठान्तरम् ।
२. पदेन स्वनिष्ठशक्त्या यज्ज्ञाप्यते तत्सम्बन्धो लक्षणा । तथा च—'स्वबोध्यसम्बन्धत्वं' लक्षणाया लक्षणमुभयसाधारणत्वादावश्यकम् ।
२४० वेदान्तपरिभाषा [ अर्थवादानां पदैकवाक्यता
समान ही होगा—यह आशय शंका करने वाले का है। इस पर ग्रन्थकार यह समाधान देते हैं—पदार्थ (पदजन्य अर्थ) जैसे शक्य (वाच्य) है वैसे ही वाक्यार्थ भी शक्य (वाच्य) है। इसलिये शक्यसंबंधरूप लक्षणा वाक्य में भी हो सकती है क्योंकि 'जो अर्थ, शक्ति से साक्षात् बोधन किया जाय वही शक्यार्थ है' इस प्रकार शक्य शब्द की व्याख्या यदि हमने स्वीकार की होती तो आपको कथनानुसार हमारे पक्ष में भी वाक्य में लक्षणा की अनुपपत्ति हुई होती। परन्तु शक्यार्थ का वैसा लक्षण न कर 'शक्ति से साक्षात् या परम्परा से जो अर्थ ज्ञात हो वही शक्यार्थ है' लक्षण मानते हैं—इस कारण शक्ति से साक्षात् यद्यपि पदार्थ ही बोधित होता है तथापि परंपरा से वाक्यार्थ भी बोधित होता है। पद से पदार्थ का ज्ञान होते ही उन पदार्थों के परस्पर अन्वय से हमें जो अर्थ ज्ञात होता है, वही वाक्यार्थ है, वह भी शक्ति से ही परम्परया ज्ञात होता है। इसलिये पदार्थ के समान वाक्यार्थ में भी शक्यता है। इस कारण पद के समान वाक्य की भी अपने शक्यार्थ—सम्बद्ध अर्थ में लक्षणा हो सकती है।
अब लौकिक वाक्य में जैसी लक्षणा हो सकती है उसी प्रकार वैदिक वाक्य में भी लक्षणा होती है—इस बात को ग्रन्थकार कह रहे हैं—
एवमर्थवादवाक्यानां प्रशंसारूपाणां प्राशस्त्ये लक्षणा। सोऽरोदी-
दित्यादिनिन्दार्थवाक्यानां¹ निन्दितत्वे लक्षणा। अर्थवादगतपदानां
²प्राशस्त्यादिलक्षणाऽभ्युपगमे एकेन पदेन लक्षणया तदुपस्थितिसम्भवे
पदान्तरवैयर्थ्यं स्यात्। एवं च विध्यपेक्षित-प्राशस्त्यरूपपदार्थ-
प्रत्ययकतया अर्थवादपदसमुदायस्य³ पदस्थानीयतया विधिवाक्येन⁴
एकवाक्यत्व भवतीत्यर्थवादानां⁵ पदैकवाक्यता।
**अर्थ—**इसी प्रकार प्रशंसारूप अर्थवाद-वाक्यों की विधि के प्राशस्त्य में लक्षणा एवं 'सोऽरोदीत्' इत्यादि निन्दार्थक अर्थवादवाक्यों की 'निन्दितत्व' रूप अर्थ में लक्षणा होती है।
१. 'वादानां'–इति पाठान्तरम्।
२. स्त्ये ल०'–इति पाठान्तरम्।
३. 'प्रशस्तः' इत्येकेन पदेन यावानपेक्षितः अर्थो बोध्यते, तावानेव 'वायुर्वैक्षेपिष्ठा देवता वायुमेव स्वेन भागधेयेन उपधावति स एवैनं भूतिं गमयति' अस्यार्थवादवाक्यस्या- प्यर्थः इति पदसमुदायस्यापि अस्य पदस्थानीयत्वम्।
४. 'पदेन'–इति पाठान्तरम्।
५. 'दवाक्यानां'–इति पाठान्तरम्।
वाक्यलक्षणोपपादनम् ] आगमपरिच्छेदः २४१
शंका—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा होती है—यह क्यों नहीं मानते ?
समाधान—अर्थवादवाक्य के पदों की ही प्राशस्त्य अथवा निन्दितत्व रूप अर्थ में लक्षणा यदि मान लें तो एक ही पद से लक्षणा के द्वारा उन अर्थों की उपस्थिति हो जायगी जिससे अन्य पद व्यर्थ होंगे अर्थात् एक ही पद से प्राशस्त्य या निन्दितत्वादि अर्थों का लक्षणा के द्वारा यदि ज्ञान हो जाय तो अन्य पद व्यर्थ हैं, समझना पड़ेगा । इसलिये अर्थवाद-वाक्य के पदसमूह में विधि से अपेक्षित ऐसे प्राशस्त्यरूप पदार्थ की बोधकता होने के कारण पदस्थानीयत्व होता है। अर्थात् वह पदसमूह एक पद के समान ही होता है। इस कारण उनकी विधिवाक्य के साथ एकवाक्यता होती है। इसलिये अर्थवादवाक्यों की पदैकवाक्यता मानी जाती है।
विवरण—'गम्भीरायां नद्यां घोषः' इस वाक्य के किसी एक ही पद की लक्षणा न होकर गम्भीर एवं नदी दो पदों की अर्थात् वाक्य की ही तीर अर्थ में लक्षणा माननी पड़ती है।
इस पर यदि कोई कहे कि 'पदार्थः पदार्थेनान्वेति न तु तदेकदेशेन' यह नियम व्यभिचारी है अर्थात् नित्य ( अव्यभिचारी ) नहीं। जैसे—'चैत्रस्य गुरुकुलम्' चैत्र के गुरु का कुल इस वाक्य में 'चैत्रस्य' ( इस ) षष्ठ्यन्तपद का 'गुरुकुलम्' के गुरु शब्द के साथ अन्वय माने बिना गति ही नहीं है, इसलिये एकदेशान्वय का स्वीकार करना पड़ता है तो प्रकृत में भी उसी प्रकार एकादेशान्वय मानकर, गंभीर ऐसी जो नदी, उसका तीर-ऐसा अर्थ करने में क्या दोष है ? इसलिये ग्रन्थकार ने पूर्व समाधान की अरुचि से 'जहाँ वाक्य की लक्षणा माने बिना गति नहीं है', ऐसे वैदिक अर्थवाद-वाक्यों को दिखाया है।
अर्थवाद, विधि अथवा निषेध के साक्षात् बोधक नहीं होते, किन्तु गुणवाद और अनुवाद रूप से वे अपने अर्थ को बताते हैं। परन्तु वह अर्थ सदैव उत्पन्न ही हो सो बात नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों में साक्षात् विधिनिषेधबोधकत्व का संभव नहीं होता। इस कारण अर्थवाद-वाक्यों के मुख्यार्थ को भी सदैव स्वीकार नहीं किया जाता। अतः लक्षणा के द्वारा विधि के प्राशस्त्यादि का ज्ञान करा देना ही अर्थवादवाक्यों का अर्थ माना जाता है।
वेद में 'वायुर्वै क्षेपिष्ठा देवता'—वायु अतिवेगवती देवता है—इत्यादि स्तुतिपरक अर्थवाद-वाक्यों की वायव्यपशुयागरूप विधि की स्तुति में लक्षणा माननी चाहिये। इसी प्रकार 'सोऽरोदीत् यदरोदीत्तद्रुद्रस्य रुद्रत्वम्' इत्यादि निन्दापरक अर्थवादवाक्यों की 'बर्हिर्याग में रजतदान नहीं करना चाहिये' इस विवक्षित निषेध के लिए 'जो बर्हिर्याग में रजतदान करता है वह रोता है' इस प्रकार निन्दा के अर्थ में लक्षणा है, यह स्वीकार करना ही होगा। यहाँ किसी एक पद की लक्षणा है—ऐसा नहीं कह सकते।
शंका—इस उदाहरण में भी प्राशस्त्यादि अर्थों में पदों की ही लक्षणा मान ली जाय। समस्त वाक्य की यह लक्षणा है—यह आग्रह क्यों ?
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समाधान—अर्थवाद-वाक्य के अन्तर्गत—पदों की ही प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा मान लेने पर उनमें से एक ही पद, प्राशस्त्य-द्योतक होगा और अन्य पद व्यर्थ होने लगेंगे। क्योंकि विधि-निषेधों के प्रतिपादक वचनों को ही स्वार्थ में प्रामाण्य होता है, और अर्थवाद उनके प्रत्यक्षरूप से बोधक नहीं होते। इस कारण 'अनार्थक्यमतदर्थानाम्' इस नियम से उस वेदभाग को अनार्थक्य प्राप्त होने लगेगा।
परन्तु 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' इस अध्ययनविधि से प्रेरित होकर अक्षरशः ग्रहण किये जाने वाले वेदसमूह को अनार्थक्य प्राप्त होना इष्ट नहीं है। इसलिए अर्थवाद-वाक्यों की प्राशस्त्यादि अर्थ में लक्षणा स्वीकार करनी चाहिए। अतः सभी वाक्य, विधेय की स्तुति कर उसकी अवश्यकर्तव्यता का ज्ञान करा देने के कारण उन्हें अनर्थकत्व नहीं है—मानना पड़ता है।
$^१$अर्थवाद के चार प्रकार होते हैं। उनमें से 'पुराकल्प' और 'परकृति' इन दो प्रकारों का यथासंभव प्राशस्त्य अथवा निन्दा में ही अन्तर्भाव हो जाने से यहाँ स्तुति-निन्दापरक अर्थवाद से उनका भी ग्रहण कर लेना चाहिए।
शंका—लक्षणा के द्वारा अर्थवादवाक्यों को प्राशस्त्यबोधक मानने पर भी उनकी अनर्थकता (व्यर्थता) कैसे दूर होगी? क्योंकि 'जो वाक्य, विधिनिषेध का साक्षात् बोधक होता है वही सार्थक समझा जाता है', यह मीमांसा का नियम है। और अर्थवाद वाक्यों का साक्षात् विधि-निषेध बोधन न करना तो प्रसिद्ध ही है। ऐसी आशंकाके के समाधानार्थ ग्रन्थकार 'एवं च विध्यपेक्षित०' ग्रन्थ प्रारम्भ करते हैं।
स्तुतिपरक अर्थवाद, प्राशस्त्यबोधन के द्वारा विधि के साथ और निन्दापरक अर्थवाद, निषिद्ध पदार्थ के निन्दितत्व को बताते हुए निषेध के साथ एकवाक्यता को प्राप्त होते हैं। इस कारण अर्थवादों को परम्परा से विधिनिषेधबोधकत्व होता है। इसलिये उन्हें व्यर्थ नहीं कह सकते।
इस एकवाक्यता के 'पदैकवाक्यता' तथा 'वाक्यैकवाक्यता' नामक दो प्रकार हैं। इनमें से अर्थवादवाक्यों में पदैकवाक्यता ही होती है। क्योंकि विधि एवं निषेधों को प्रशस्तत्व तथा निन्दितत्व की अपेक्षा रहती है, और समग्र अर्थवादवाक्य, विहित का
१. अर्थवादश्चतुर्विधः—स्तुतिः, निन्दा, परकृतिः पुराकल्पश्चेति। (गो. सू. २।१।६४) तत्र परकृतिः एककर्तृकमुपाख्यानम्— (भाट्टदी० ६।७।२६), पुराकल्पः बहुकर्तृको विधिः— (जै. सू. वृ. अ. ६)। प्रकारान्तरेण स त्रिविधोऽर्थवादः—गुणवादः, अनुवादः, भूतार्थवादश्चेति। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. २०) तदुक्तम्—विरोघे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते। भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधामतः। — (न्या. सि. मं. ४ पृ. ६१) मीमांसकास्तु विधिशेषः निषेधशेषश्चेत्यर्थवादं द्वैविध्येन विभेजिरे।— (लौ. भा.)।